कमर दर्द कारण और बचाव - राजू वैश्य Kamar Dard Karan Aur Bachav - Hindi book by - Raju Vaisya
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कमर दर्द कारण और बचाव

राजू वैश्य

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2641
आईएसबीएन :81-88266-38-8

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इसमें कमर दर्द उसकी रोकथाम और उसके इलाज के संपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है...

Kamar Dard Karan Aur Bachav

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मनुष्य ने जब से पैरों पर खड़ा होना सीख लिया और अपने हाथों को शरीर का बोझ ढोने की गुलामी से मुक्त कर दिया तब से कमर दर्द उसका पीछा कर रहा है। कहा जा सकता है कि कमर दर्द पशु से मनुष्य बनने की कीमत है। आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने जीवन में कभी–न-कभी किसी दर्द को न झेला हो; लेकिन आधुनिकता और विलासिता के कारण कमर दर्द ने आज भयानक महामारी का रूप ले लिया है कमर दर्द की व्यापकता का सबसे बड़ा कारण गलत जीवन शैली है, जिसमें सुधार करके हम इस तकलीफ से बच सकते हैं। कई लोग ऐसे हैं, जो वर्षों से भयानक कमर दर्द झेल रहे हैं और एक तरह से विकलांग-जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जबकि ऐसे अनेक उपाय है जिनकी मदद से कमर दर्द को नियंत्रण में रखकर सामान्य एवं सक्रिय जीवन का आनंद लिया जा सकता है। लेकिन जानकारी के अभाव में लोग कमर दर्द के अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाते हैं। कई लोग कमर दर्द की तब तक अनदेखी करते रहते हैं जब तक कि स्थिति काबू से बाहर नहीं हो जाती। कई लोग कमर दर्द का इलाज कराने के लिए नीम-हकीमों अथवा नाइयों के पास चले जाते हैं और अपनी रीढ़ एवं गरदन तुड़वा बैठते हैं।

कहा जाता है-बचाव उपचार से बेहतर है। कमर दर्द होने पर उसके इलाज में समय और धन खर्च करने से बेहतर यह है कि इससे बचने के उपायों पर अमल करके तथा सही जीवन-पद्धति अपनाकर कमर दर्द को अपने से दूर ही रखा जाए।
आज हालाँकि स्वास्थ्य के विभिन्न विषयों पर अनगिनत पुस्तकें हैं लेकिन लोगों में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता का अभाव है। स्वास्थ्य विषय पर अच्छी पुस्तकों का अभाव इसका एक बड़ा कारण है। हिंदी में तो ऐसी पुस्तकें नहीं के बराबर हैं। प्रस्तुत पुस्तक इस अभाव को दूर करने की एक कोशिश है। इस पुस्तक का उद्देश्य कमर दर्द उसकी रोकथाम और उसके इलाज के संपूर्ण पहलुओं की सही और वैज्ञानिक जानकारी देना है ताकि लोग नीम-हकीमों के चक्कर में पड़कर अपनी कमर बेकार न कर लें। इस पुस्तक में कमर दर्द से बचाव के तरीकों के अलावा उसके उपचार की विभिन्न पद्धतियों की विस्तार से व्याख्या की गई है।

आशा है कि यह पुस्तक लोगों को कमर दर्द से निजात दिलाने में किसी-न-किसी तरह से सहायक सिद्ध होगी। हमारा विश्वास है कि कमर दर्द से पीड़ित ही नहीं बल्कि अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग लोग भी इस पुस्तक से पूरा लाभ उठाएँगे।
पुस्तक में दवाइयों के नाम बताने से यथासंभव बचा गया है। कुछ जगहों पर दवाइयों के नामों का उल्लेख है, लेकिन इन दवाइयों का इस्तेमाल चिकित्सक से सलाह लिये बिना कदापि न करें।

डॉ.राजू वैश्य

रीढ़ की संरचना


रीढ़ की संरचना का मुख्य आधार रीढ़ की हड्डी है। यह सीधी खड़ी रहती है और अन्य अंगों को सहारा देती है। रीढ़ की हड्डी गरदन, वक्ष, उदर और कूल्हे के पास हलकी मुड़ी होती है। गरदन (सर्वाइकल) और उदर (लंबर) में रीढ़ की हड्डी आगे की ओर उभरी हुई होती है, जबकि वक्ष (थोरेसिक) और कूल्हे (सेक्रम) में इसका झुकाव पीछे की ओर होता है। रीढ़ की रचना एक-दूसरे पर रखी 34 अलग-अलग हड्डियों से होती है, जिनके पिछले हिस्से से उँगली जैसी एक संरचना निकली रहती है, जिसके कारण रीढ़ की हड्डी काँटेदार टहनी जैसी प्रतीत होती है। इन हड्डियों को कशेरुका (वर्टिब्रा) कहा जाता है। इनकी संख्या 29 होती है। इनमें गरदन में 7, वक्ष में 12, उदर में 5 तथा कूल्हे में भी 5 कशेरुका होती है। शेष 5 कशेरुका बहुत छोटी होती हैं और ये आपस में जुड़ी होती हैं। कूल्हे की पाँचों कशेरुका भी आपस में जुड़ी होती हैं और ये सम्मिलित रूप से सेक्रम कहलाती हैं। इस तरह यदि सेक्रम को भी एक हड्डी मानी जाए तो रीढ़ की हड्डी में कुल 26 हड्डियाँ होती हैं-7 गरदन, 12 वक्ष, 5 उदर, एक सेक्रम तथा एक अनुत्रिक (कॉ्क्सिजियल)।

स्पाइनल कार्ड


हर दो हड्डियों (डिस्क) के बीच एक मुलायम हड्डी (कार्टिलेज) होती है। डिस्क रीढ़ को लचीला बनाती है और शॉक ऑब्जर्वर का काम करती है। रीढ़ की हड्डी में डिस्क के पीछे एक गुफा (कैनाल) होती है, जिसमें मस्तिष्क से आती हुई स्नायु तंत्र (स्पाइनल कॉर्ड) होती है, जिसमें से नसें निकलकर हाथों और पैरों में जाती हैं।

स्पाइनल कॉर्ड रीढ़ की हड्डियों की विशेष संरचना के बीच सुरक्षित रहती है। यह अत्यंत संवेदनशील, नाजुक और महत्त्वपूर्ण तंतु है, जिसके माध्यम से मस्तिष्क हाथ-पैर, आँतों और मूत्राशय की कार्यप्रणालियों का संचालन करता है। स्पाइनल कॉर्ड के माध्यम से मस्तिष्क विभिन्न अंगों की मांसपेशियों में विद्युत तरंगे भेजकर उन मांसपेशियों का संचालन करता है। इसके अलावा हाथ-पैर एवं शरीर के निचले भागों में होनेवाली ठंड-गरम एवं दर्द जैसी अनुभूतियाँ स्पाइनल कॉर्ड के माध्यम से ही वापस मस्तिष्क में जाती हैं। स्पाइनल कॉर्ड के क्षतिग्रस्त होने या उनपर दबाव पड़ने से स्फिंक्टर नियंत्रण समाप्त हो जाता है।

स्फिंक्टर नियंत्रण समाप्त होने पर हाथ-पैर हिलाने-डुलाने तथा मल-मूत्र त्यागने की प्रक्रिया पर से रोगी का नियंत्रण समाप्त हो जाता है। दरअसल, शरीर के निचले हिस्से की मांसपेशियों को संचालित करनेवाले स्नायु (नर्व) स्पाइनल कॉर्ड के माध्यम से ही मस्तिष्क से जुड़े रहते हैं। इस व्यवस्था के कारण ही हम अपनी इच्छा से मल-मूत्र त्यागते हैं। लेकिन स्पाइनल कॉर्ड के क्षतिग्रस्त होने पर या उसपर दवाब पड़ने पर ये नर्व काम करना बंद कर देते हैं, जिसके कारण नीचे की मांसपेशियों पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। इसके कारण रोगी का मल-मूत्र या तो स्वत: निकलता रहता है या बिलकुल ही नहीं निकलता।

स्पाइनल कॉर्ड रीढ़ की हड्डियों की जिस विशेष संरचना के भीतर सुरक्षित रहते हैं उसके ऊपर मांसपेशियों और फिर त्वचा की परत चढ़ी होती है। इस कारण किसी दुर्घटना में चोट लगने या कोई रोग होने पर स्पाइनल कॉर्ड का बचाव हो जाता है। जब रीढ़ तपेदिक और फोड़े जैसे रोगों से ग्रस्त होती है अथवा किसी दुर्घटना में चोट खाती है तब सबसे पहले रीढ़ की हड्डियाँ क्षतिग्रस्त होती हैं।

कमर दर्द के कारण


विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवनकाल में कम-से-कम एक बार कमर अथवा पीठ दर्द से अवश्य गुजरना पड़ता है। कमर दर्द मुख्यत: चार कारणों से हो सकता है-कमर की हड्डी में बीमारी, कमर की मांसपेशियों की समस्या, रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर या संक्रमण और दिमागी तनाव। हालाँकि ज्यादातर मामलों में मांसपेशियों में समस्या के कारण ही कमर दर्द होता है। मांसपेशियों में खिंचाव, ठंड लगने, गलत तरीके से बैठने, ज्यादा देर तक काम करने, भारी सामान उठाने आदि कारणों से मांसपेशियों में समस्या आ सकती है। कमर और पीठ दर्द होने के मुख्य कारणों में उठने-बैठने, चलने-फिरने एवं सोने के गलत तौर-तरीके, दिमागी तनाव, रीढ़ के ट्यूमर, स्पाइना बाईफिडा या स्पोंडाइलुलिस्थेसिस जैसी जन्मजात विकृतियाँ, रीढ़ में चोट या डिस्क की समस्या, तपेदिक, मायोफाइब्रोसाइट्स, एकाइलोसिंग स्पोंडुलोसिस जैसे रीढ़ अथवा कमर की मांसपेशियों के संक्रमण स्पांडुलाइसिस जैसे रीढ़ अथवा कमर की मांशपेशियों के संक्रमण, स्पांडुलाइसिस और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी उम्र से जुड़ी बीमारियों और व्यायाम नहीं करने जैसी प्रवृत्तियाँ आदि शामिल हैं।...


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