खूँटी पर टँगा वसंत - मनु शर्मा Khoonti Per Tanga Vasant - Hindi book by - Manu Sharma
लोगों की राय

कविता संग्रह >> खूँटी पर टँगा वसंत

खूँटी पर टँगा वसंत

मनु शर्मा

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2625
आईएसबीएन :81-88266-19-1

Like this Hindi book 15 पाठकों को प्रिय

169 पाठक हैं

जीवन के अकाव्यात्मक सत्य का काव्यात्मक वक्तव्य....

Khoti Per Tanga Vasant

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मन की भावुकता में गाड़ी पर जब मेरा श्लथ वैचारिक अपने बचे हुए शब्दों के साथ सैर के लिए निकलती है तो उसी का परिणाम होता है मेरी कविताएँ। वस्तुतः इन कविताओं में से प्रत्येक मेरे जीवन के काव्यात्मक सत्य का काव्यात्मक वक्तव्य है।
वस्तुतः इनकी प्रयोजन और इनकी उत्पत्ति का कारण भिन्न है, इनके जन्म के समय की स्थितियाँ भी एकदम बदली हुई। मेरे स्वतन्त्र मूड की कविताएँ यदि अवकाश के क्षणों का ‘उत्पाद’ है तो खबरदार कविताएँ व्यप्त क्षणों का ‘उत्पात’। वे यदि हैपेनिगं हैं तो ये डूइंग वे यदि अनायास हैं तो ये समास।
ये लगातार तेईस वर्षों तक रोज एक हिन्दी दैनिक के व्यंग्य-कॉलम में संकटमोचन उपनाम से लिखीं गई थीं। इन्हें आप कार्टून कविता कहें या खबरदार कविता, ये समय-सापेक्ष हैं, स्थिति-निरोधक नहीं। इनमें राजनीति, इतिहास, संस्कृति आदि सबकुछ किसी-न-किसी रूप में विद्यमान है।

मेरी कविताएँ


मैं आज गद्य लेखक हूँ, यद्यपि लेखन के शुरुआती दौर में ऐसा नहीं था। आरंभ में जैसा हर लेखक के साथ होता है, मेरे साथ भी हुआ। मैंने शुरू-शुरू में कविताएँ ही लिखीं।
बहुधा जब मेरे लेखन या अध्ययन की लंबी समाधि टूटती है, तब मैं थककर बगल की तख्त पर शांत मुद्रा में ढुलक जाता हूँ। शरीर आराम करने की स्थिति में होता है, पर मन को आराम कहाँ ? उसे आराम हराम है। वह अब भी क्रियाशील रहता है। वह स्मृति के भंडार की पुरानी अनुभूतियों को टटोलने में लग जाता है।

ऐसी स्थिति बीमार होकर पड़े रहने में भी होती है या जब अचानक रात को नींद टूट जाती है-कहीं कोई नहीं होता तो अँधेरे और सन्नाटे का साँय-साँय तब भी मेरा मन उन पुरानी अनुभूतियों को खँगालने में लग जाता है। ऐसे में जब कोई अनुभूति हमारी संवेदना से टकराती है तब एक चिनगारी-सी छूटती है, ऐसी ही चिनगारियाँ हमारी कविताओं की बीज-रूप होती हैं, जो अनुकूल मौसम पाकर पल्लवित-पुष्पित होती हैं।
इसलिए इन कविताओं के संदर्भ में स्पष्ट कह सकता हूँ कि ये ‘डूइंग’ न होकर ‘हैवेनिंग’ हैं। ये की नहीं गई हैं, हो गई हैं। इन्होंने अपनी इच्छानुसार जैसा चाहा, वैसा जामा पहन लिया है। इनकी ‘फॉर्म’ भी अपनी है, कहीं भी मेरा प्रयत्न नहीं, प्रयास नहीं।

मन की भावुकता की गाड़ी पर जब मेरी श्लथ वैचारिकता अपने बचे हुए शब्दों के साथ सैर के लिए निकलती है तो इसका परिणाम है-ये कविताएँ। वस्तुतः इनमें से प्रत्येक मेरे जीवन के अकाव्यात्मक सत्य का काव्यात्मक वक्तव्य हैं।
पर ये सारी बातें हमारी ‘खबरदार कविताओं’ के संदर्भ में लागू नहीं होतीं। वस्तुतः इनका प्रयोजन और इनकी उत्पत्ति का कारण भिन्न है, इनके जन्म के समय की स्थितियाँ भी एकदम बदली हुईं। मेरे स्वतंत्र मूड की कविताएँ यदि अवकाश के क्षणों का ‘उत्पाद’ हैं तो ये खबरदार कविताएँ व्यस्त क्षणों का ‘उत्पाद’। वे यदि हैवेनिंग’ हैं तो ये ‘डूइंग’। वे यदि अनायास हैं तो ये सायास। वस्तुतः दूसरे खंड की इन कविताओं का उद्देश्य था, नेताओं के वक्तव्यों और खबरों की खबर लेना। ये लगातार तेईस वर्षों तक रोज एक हिंदी दैनिक के व्यंग्य-कॉलम में ‘संकटमोचन’ उपनाम से लिखी गई थीं। इन्हें आप काईन कविता कहें या खबरदार कविता, ये समय सापेक्ष हैं, स्थिति निरेपक्ष नहीं। इनमें राजनीति, इतिहास संस्कृत आदि सबकुछ किसी-न-किसी रूप में विद्यमान है। जो है आपके समाने है। इसके आगे कविताएँ ही प्रासंगिक हैं-मैं नहीं।

मनु शर्मा

बचे शब्दों के साथ


किसी सूने मैदान में,
नदी के किनारे,
या बियाबान जंगलों में,
भटकता हुआ
हमारा ही प्रत्यय,
हमें मुँह चिढ़ाता है
और उन ऋषियों की ओर संकेत करता है,
जिनकी अनश्वर वाणियाँ
ऋचाएँ बन गई थीं,
काल की धनु पर चढ़कर,
अदृश्य हो गई थीं।

उस जंगल में,
वे आज भी भटक रही हैं,
जिन्हें हमारा विकास
निगल गया है,
और हमारा अस्तित्व
आदमी से बिखरकर भीड़ हो गया है।
जिनमें गुम हो गई हैं,
वे सारी ऋचाएँ,
मुष्य को ढूँढ़ती हुईं
मनुष्य की चिंतनाएँ।
जिनके जन्मे और अजन्मे अर्थों को,
इतिहास भी आधा-अधूरा
सहेज पाया है,
अब रह गए हैं,
मात्र कुछ शब्द !

आम हूँ, खास नहीं

मैं आम हूँ-
कहीं से खास नहीं।
इस जंगल में पेड़ों के बीच
उगा मात्र एक पेड़-
जिसकी अस्मिता,
अपना एक अदद नाम गिनाने के लिए भी,
शोर नहीं मचाती,
क्योंकि मैं आम हूँ।

मैं कलमी भी नहीं हूँ,
जिसकी डाल तराशकर बड़े यत्न से लगाई गई हो !
न सफेदा, न लँगड़ा, न मालदा,
न दशहरी, न आम्रपाली, न मल्लिका,
महज आम हूँ।

मेरे जन्म से पूर्व किसी सहज सैलानी ने
मुझे चूसकर फेंक दिया था,
मैं उसी गुठली से जन्मा !
मेरी जिजीविषा प्रकृति के-
आघात पर आघात झेलती रही।
धूप, बरसा, तूफान,
और जंगल की वह भयानक आग
सब मेरे सिर पर से निकल गए।
मेरी जीवनी-शक्ति,
अपने बलबूते,
धरती का स्तन निचोड़ती रही
और फल देती रही,
पक्षी मुझे कुतरते रहे,
आदमी चूसता रहा,
और मेरे बगल से गुजरती पगडंडी
चुपचाप पड़ी सब देखती रही,
इतना होने पर भी,
जंगल मेरी ओर
मुखातिब नहीं हुआ कभी,
क्योंकि मैं आम हूँ, खास नहीं।

हाँ, मेरे बगल की पगडंडी से
गुजरते हुए,
आदिवासियों के बच्चे जरूर मेरी ओर देखते हैं,
ललचाई आँखों से निहारते हैं,
कुछ उछल-कूदकर-
मेरी निचली बाँहों को छूने की
असफल चेष्टा करते हैं,
और जब हार मान बैठते हैं,
तब ढेले फेंकते हैं।
मुझ पर विश्राम ले रहे पक्षियों को
बड़ा बुरा लगता है,
बहुत से तो ढेले झेल भी नहीं पाते,
और आकाश की राह नापते हैं।
पर, मैं दुःखी नहीं होता,
उन ढेलों को भी
अपने प्रति उनकी आत्मीयता का,
प्रसाद मानता हूँ।
वे खिलखिलाते हैं,
उनकी खिलखिलाहटें
समेटकर,
अपनी अदृश्य झोली में बटोरता रहता हूँ।
यही मेरी संपत्ति है,
मेरे जीने का रस है
इससे मेरी जीने की इच्छा को बल मिलता है।
धरती और प्रकृति,
दोनों हमेशा मुझ पर सहृदय नहीं होतीं।
और न हर साल मुझमें फल ही आते हैं।
और तो और
तब ये बच्चे भी मुझसे नहीं बोलते।
तब मैं अपनी
मायूस जिंदगी ढोता हुआ,
अगले वर्ष की प्रतीक्षा करता हूँ,
क्योंकि जंगल में मैं आम हूँ,
कुछ खास नहीं।
जब वन महोत्सव हुआ था,
तब कुछ खास लोगों की आबादी
इस जंगल में बढ़ाई गई थी,
उनमें सुबबूल थे, यूकेलिप्टस थे,
पर आम नहीं था,
गोया मैं नहीं था।
मुझे कभी खास दरजा नहीं मिला।

हाँ, इस जंगल के ठेकेदारों के आदमी,
हाथों में कुल्हाड़ियाँ लिये,
जब बगल की पगडंडी से गुजरते हैं,
तब हमारी छतनार शाखों पर
नजर अवश्य डालते हैं,
उनकी नजरों में कुछ खास जरूर होता है,
पर आम नहीं।

(23 फरवरी, 1990)

पीछे पड़ा तूफान


मेरी प्याली में तूफान नहीं होता
पर जो चाय तुमने पिलाई थी
उसमें तूफान था।
मैंने चाय तो पी ली,
तूफान पी न सका।
पर वह मेरे पीछे
उसी दिन से लगा है,
आज भी वह मुझे घेरता है,
और मेरे मन का जहाज डगमगाता है।

(04 फरवरी, 1990)

कभी-न-कभी
मैं एक बीत रही सदी हूँ
रेत में खोती हुई एक नदी हूँ
जब कभी रेत हटाई जाएगी
तब शायद मैं मिल जाऊँ।
पर यह भी हो सकता है
कि मैं न मिलूँ,
क्योंकि पुरातत्त्व की खुदाई में
बहुत कुछ नहीं मिलता
यद्यपि जो नहीं मिलता
खुदाई उसी के लिए होती है।

जो मिल जाता है
वही हमारा जमा-खाता है,
इतिहास की बही में वही टाँका जाता है।
उसका मूल्य आँका जाता है,
पर इससे भी बहुत अधिक वह होता है
जो छूट जाता है,
वह अनजाना, अनचीन्हा रह जाता है।
शायद मैं भी ऐसा रह जाऊँ,
यदि रह गया
तो जरूर कभी-न-कभी पहचाना जाऊँगा।
क्योंकि न तो धरती इतनी निष्ठुर है
और न काल इतना निर्मम।

(16 जनवरी, 1992)




अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book