माधवी - भीष्म साहनी Madhavi - Hindi book by - Bhishm Sahni
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माधवी

भीष्म साहनी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2488
आईएसबीएन :9788171784585

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प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी का यह तीसरा नाटक ‘माधवी’ महाभारत की एक कथा पर आधारित है

Madhavi - Hindi Story on the Character Madhavi from Mahabharat by Bhisham Sahni

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी का यह तीसरा नाटक ‘माधवी’ महाभारत की एक कथा पर आधारित है। ऋषि विश्वामित्र का शिष्य गालव अपनी शिक्षा समाप्ति के समय गुरु-दक्षिणा देने की हट करता है और विश्वामित्र उसके हठी स्वभाव से क्रुद्ध होकर आठ सौ अश्वमेधी माँग लेते हैं। अश्वमेधी घोड़ों की खोज में भटकता गालव अन्त में दानवीर राजा ययाति के आश्रम में पहुँचता है। राज-पाट से निवृत्त राजा ययाति गालव की प्रतिज्ञा सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं, किन्तु वे देवी गुणों से युक्त अपनी एकमात्र पुत्री माधवी को, यह कहकर उसे सौंप देते हैं कि जहाँ कहीं किसी भी राजा के पास आठ सौ अश्वमेधी घोड़े मिले, उसके बदले वह माधवी को राजा के पास छोड़ दें। माधवी के बारे में कहा गया है कि उसके गर्भ से उत्पन्न बालक चक्रवर्ती राजा बनेगा।

यहीं से माधवी की कथा आरम्भ होती है। अनूठे और ममस्पर्शी घटना-चक्र में गुजरते हुए, इस, नाटक के प्रधान पात्र-माधवी, गालव, ययाति, विश्वामित्र और अनेक राजागण अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं, और एक विकट, हृदयग्राही मानवीय स्थिति के परिप्रेक्ष्य में, ये चरित्र नये-नये आयाम ग्रहण करते हैं। इनके केन्द्र में ययाति-कन्या माधवी है, जो लगभग एक अलौकिक मिथकीय परिवेश में रहते-बसते हुए भी अत्यधिक सजीव, सर्वथा प्रासंगिक और आकर्षक बनकर उभरती है।

 

माधवी

‘माधवी’ नाटक सबसे पहले प्रदर्शन ‘प्रयोग’ नाट्य संस्था ने प्रगति मैदान के ‘मंजर’ पर 29, 30 जून तथा 1 जुलाई 1984 को एम. के. रैना के निर्देशन में किया। इसमें भाग लेनेवाले कलाकार हैं-


मंच पर


माधवी : दीपा साही
गालव: जलीस एहसन
ययाति: दिनेशचन्द्र शर्मा
विश्वामित्र: रामगोपाल बजाज
कथावाचक: काव्य कुमार
राजा हर्यश्च: हरि सेमवाल
राजा दिवोदास: वेदप्रकाश ढींगरा
तापस: महेश कुमार
राज ज्योतिष: एन.आर.बरुआ
प्रतर्दन: मा. सनम ढींगरा
मन्त्री: नवेद असलम
कोरस एक: नदीम एहसन
कोरस दो: भूपेश खन्ना
कोरस तीन: तनवीर एहसन

 

दृश्य-1

 

 

[ढोले-मजीरे के साथ धुन, जो शीघ्र ही समाप्त हो जाती है]
कथावाचक:  धर्मग्रन्थों में मनुष्य के बहुत से गुण गिनायें हैं, पर कहा है, कर्तव्यपालन सबसे बड़ा गुण है। जो मनुष्य कर्तव्यपरायण है, वही सच्चा साधक है। अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य, अपने गुरु के प्रति कर्तव्य, अपने धर्म के प्रति कर्तव्य, इसी को सच्ची साधना कहते हैं।
और कर्तव्यपालन क्या, कि जो वचन दे दिया उसे पूरा किया। मुँह से जो बात कह दी, वह पत्थर पर लकीर बन गयी, तुलसीदास ने भी कहा है:


रघुकुल रीति सदा चली आयी
प्राण जायें पर वचन न जायी


तो देवियों और भद्रपुरुषों, आज हम आपको इस कर्तव्य-परायणता की एक और कथा सुनाते हैं।
महाभारत में एक प्रसंग आता है कि एक बार देवलोक में विषणु भगवान ध्यानमग्न बैठे थे कि सहसा उनका ध्यान भंग हो गया। वह बड़े विचलित हुए। उन्होंने मन को स्थिर कर, एकाग्र मन से विचार किया कि इसका क्या कारण है। तभी अपने दिव्यचक्षु से उन्होंने देखा कि नीचे पृथ्वी पर उनका एक भक्त, गंगा के तट पर खड़ा, दोनों हाथ जोड़े, नतमस्तक, उन्हें स्मरण कर रहा है।

इस पर विष्णु भगवान् ने तत्काल अपने वाहन गरुण को बुलाया और बोले, ‘हे गरुड़, तुम तत्काल पृथ्वी पर जाओ, हमारा एक भक्त संकट में है। वह गंगा में कूदकर आत्महत्या करने जा रहा है, और उसने हमें याद किया है।’ ‘जो आज्ञा, महाराज,’ गरुड़देव बोले और उसी समय, पर फैलाये, धरती की ओर उतरने लगे, और शीघ्र ही उन्होंने पाया कि एक वनस्थली के निकट, गंगातट पर एक युवक जलधारा की ओर मुँह किये खड़ा है। गरुड़ देवता ने धरती पर उतरते ही ब्राह्मण का रूप धारण किया और युवक के सामने जा उपस्थित हुए। ‘आपको क्या कष्ट है, मुनिकुमार ? मैं आपकी सहायता करना चाहता हूँ।’ इस पर युवक बोला, ‘मेरे जीवन की कोई सार्थकता नहीं। मैंने अपने गुरु को एक वचन दिया था, उसे मैं पूरा नहीं कर पाया। मैं अपने गुरु महाराज के लिए गुरु-दक्षिणा नहीं जुटा पाया हूँ। मुझ जैसे पातकी के लिए मर जाना ही उचित है।’
इस पर गरुड़देव बोले, ‘मुनिकुमार, विस्तार से बताओ कि तुम्हें कौन-सी गुरु-दक्षिणा जुटानी थी और तुम क्योंकर नहीं जुटा पाये,’ तो मुनिकुमार ने अपनी सारी व्यथा-गाथा कह सुनायी। इस पर गरुड़देव कहने लगे, ‘मुनिकुमार, इधर निकट ही महाराज ययाति का आश्रम है, वह बड़े दानवीर हैं। उनकी ख्याति देश-देशांतर में फैली है। उनके द्वार से कभी कोई अभ्यार्थी खाली हाथ नहीं लौटा। तुम उनके पास जाओ, निश्चय ही वह तुम्हारी मनोकामना पूरी करेंगे।’
यहीं से, ‘महाभारत’ में मुनिकुमार गालव की कथा आरम्भ होती है।

[महाराज ययाति का आश्रम। ययाति अपने दो आश्रमवासियों के साथ ! प्रात: काल]

ययाति: यहाँ कितना सूना-सूना है।
आश्रमवासी-1: हमने देखा महाराज, इस वनस्थली में आपका मन अभी तक नहीं लगा।
ययाति: नहीं लगा, बन्धु, ठीक कहते हो। जिन दिनों राज-पाट के कामों में व्यस्त था तो इस दिन की बाट
जोहता था कि कब राजपाट की चिन्ताओं से मुक्त होकर, एकान्त में, पूजा-अराधना में अपना समय व्यतीत करूँगा ?
मुस्कराकर

राज-पाट तो पीछे छोड़ आया, पर मन की अशान्ति अपने हाथ ले आया।
आ.वा.-2: कहाँ राज-पाट की धूम-धाम, और कहाँ वनों का सूनापन, कहाँ सभी प्रकार की सुविधाएँ, और कहाँ वनों का कठोर जीवन।
आ.वा.-1: महाराज को सुख-सुविधाओं से मोह नहीं है। जो राजा सत्ता और अधिकार त्याग सकता है, उसे सुख-ऐश्वर्य से मोह क्यों होगा ? पर फिर दानवीर ययाति का मन क्यों अशान्त होना चाहिए ? आपने सदा धर्म का पालन किया है, पितरों की पूजा अराधना में कभी त्रुटि नहीं रही। इसी के कारण आपको यश मिला है। समस्त आर्यावर्त में आपके नाम की धूम है।
आ.वा.-2: एक बात और भी महाराज, जिस कारण आपको यहाँ सूना-सूना लगता है।
ययाति: वह क्या ? तुम्हें सदा नयी-नयी बातें सूझती रहती हैं।
आ.वा.-2: प्रशंसा, महाराज। यहाँ प्रशंसा करनेवाले  दरबारी नहीं हैं, जो सारा वक्त राजा के आस-पास घूमते रहें, इसमें राजा के अहं की तुष्टि होती रहती है। प्रशंसा से राजा को अपार सुख मिलता है। यहाँ आपको वह सुख नहीं मिलता।
आ.वा.-1: इन्हें प्रशंसा की क्या आवश्यकता है ! दानवीरों में इनका नाम सत्य हरिश्चन्द्र और दानवीर कर्ण के साथ लिया जाता है, इन्हें प्रशंसा की ललक क्यों होगी ?
ययाति: मैंने कर्तव्य को सदा कर्तव्य मानकर ही किया है। मैंने सदा अपनी सामर्थ्य से बढ़कर दान दिया है।
आ.वा.-2: फिर कोई तो कारण होगा महाराज, कि आपका मन खोया-खोया रहता है।
आ.वा.-1: महाराज, क्या अपनी बेटी के कारण तो आपका मन अशान्त नहीं रहता ? राज-पाट में बने रहते तो आप माधवी का स्वयंवर रचा पाते। अच्छे से अच्छा वर उसे मिल जाता। उसकी स्वर्ग-वासिनी माँ की आत्मा को शान्ति मिलती।
ययाति: उसका स्वयंवर तो मैं यहाँ भी रचाऊंगा। राजाओं ने मुझे भुला दिया है, पर मैंने उन्हें नहीं भुलाया।


परिचारक का प्रवेश


परिचायक: महाराज, एक आगन्तुक आपसे मिलना चाहते हैं।
ययाति: आश्रम के द्वार तो सभी के लिए खुले हैं। अन्दर आने दो।
मुनिकुमार गालव का प्रवेश
आगे बढ़कर

बहुत दिनों के बाद किसी अतिथि ने हमारे आश्रम में पाँव रखे हैं।
गालव: मेरा नाम गालव है, महाराज, मैं ऋषि विश्वामित्र का शिष्य हूँ। अपनी शिक्षा समाप्त कर यहाँ आया हूँ।
ययाति: आसन ग्रहण करो, मुनिकुमार, लम्बी यात्रा करके आये हो, थक गये होंगे।
गालव: मैं बड़े संकट में हूँ, महाराज।

ययाति: पहले आसन ग्रहण करो, मुनिकुमार, ऐसी जल्दी क्या है ?
गालव: मैं विवश होकर, आपके द्वार पर आया हूँ, महाराज। आज्ञा हो तो मैं अपनी प्रार्थना आपके सम्मुख रखूँ ?
ययाति: मैं राज-पाट से निवृत्त हो चुका हूँ, एक साधारण आश्रमवासी हूँ। पर फिर भी, मुझसे जो बन पड़ेगा, तुम्हारी सहायता करूँगा।
गालव: महाराज, मैं बारह वर्ष तक ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में विद्या ग्रहण करता रहा हूँ। मैं बाहर विद्याओं में पारंगत हुआ हूँ।

ययाति: जानकर प्रसन्नता हुई। कहो, आगे कहो।
गालव: शिक्षा-समाप्ति पर मैंने गुरुवर से प्रार्थना की कि वह गुरु-दक्षिणा में क्या लेना स्वीकार करेंगे।
ययाति: गुरु-दक्षिणा देना शिष्य का पुण्य कर्तव्य है। कहो, उन्होंने कौन-सी गुरु-दक्षिणा माँगी ?
गालव: महाराज, गुरु-दक्षिणा में मुझे आठ सौ अश्वमेधी घोड़े देने हैं।
ययाति: हैरान होकर
आठ सौ अश्वमेधी घोड़े ? क्या ऋषि विश्वामित्र ने यह गुरु-दक्षिणा माँगी है ?


      


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