अम्मा - कमलेश्वर Amma - Hindi book by - Kamleshwar
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अम्मा

कमलेश्वर

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2438
आईएसबीएन :81-267-1196-5

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इसमें स्वाधीनता संघर्षकाल से लेकर सती-प्रथा विरोध तक की अनुगूँजें सुनी जा सकती है...

Amma a hindi book by Kamleshwar - अम्मा - कमलेश्वर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वरिष्ठ उपन्यासकार कमलेश्वर का यह उपन्यास एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की वकालत करता है जिसमें अपने बैरियों के लिए भी स्नेह व सम्मान की गुंजाइश हो। इस उपन्यास का कथा-फलक यों तो विस्तृत है लेकिन कमलेश्वर जी ने अपने रचनात्मक कौशल से इसे जिस तरह कम शब्दों में सम्भव किया है,वह काबिले-तारीफ है। इस उपन्यास में स्वाधीनता संघर्षकाल से लेकर सती-प्रथा विरोध तक की अनुगूँजे सुनी जा सकती हैं। इसमें अंग्रेज सिपाहियों की क्रूरता और रूढ़िवादी पारम्परिक समाज में विधवा स्त्री की त्रासद स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है जो पाठकों के मन में करुणा का भाव जगाता है। लोकप्रिय रचनाकार की कलम से निकली एक अनूठी कृति।

अम्मा: कुछ शब्द

यह सिने उपन्यास है। इसकी रचना की प्रक्रिया और प्रयोजन उन उपन्यासों से एकदम अलग है जो मैंने अपनी अनुभवजन्य संवेदना के तहत लिखे हैं। अतः यह कहने में मुझे संकोच नहीं है कि यह उपन्यास मेरे आन्तरिक अनुभव और सामाजिक सरोकारों से नहीं जन्मा है और इसका प्रयोजन और सरोकार भी अलग है। इसे लिखने का ढब और तरीका भी दूसरा है। इसकी सामाजिकता सिने-माध्यम की आवश्यकता तक सीमित है, लेकिन वह ग़ैर-ज़रूरी नहीं है। वह सिने-माध्यम तक सीमित ज़रूर है पर बाधित नहीं है।

हिन्दी फ़िल्मों की दुनिया हमारी लोक-संस्कृति की नई दुनिया है। पूरी तरह से यह मात्र मनोरंजन और व्यवसायिक सरोकारों के प्रदर्शन-केन्द्रित मायावी दुनिया ही नहीं है, यह अपने समय के मनुष्य के दुःख-सुख, घटनाओं-परिघटनाओं के सार्थक प्रस्तुतीकरण के साथ ही प्रश्नों और सपनों का संसार भी है। अक्षर ज्ञान से रिक्त दर्शक के लिए इसे प्रस्तुत करने में रचनात्मक श्रम की बेहद ज़रूरत पड़ती है।

यह उपन्यास साहित्य के स्थायी या परिवर्तनशील रचना विधान और शास्त्र की परिधि में नहीं समाएगा क्योंकि यह सिने-शास्त्र के आधीन लिखा गया है। यह फ़िल्म के तकनीकी रचना विधान की ज़रूरतों को पूरा करता है जिस पर फ़िल्मी पटकथा आश्रित रहती है। यह सिने-कथा भी ऐसे ही लिखी गई। भारतीय भाषाओं और हिन्दी की बहुत-सी फ़िल्मों ने नितांत अपना स्वतन्त्र कथा-संसार बनाया तो उसके लिए उपन्यास और कथा-विधा का सहारा लिया जाना ज़रूरी हुआ, उसी का परिणाम है यह सिने-उपन्यास !

तो यह अम्मा उपन्यास भी मूलतः फ़िल्म के लिए लिखा गया। इसके निर्माता-निर्देशक कृष्ण शाह थे, जो अमेरिका में रहते हुए अंग्रेजी फ़िल्मे बनाते हैं।
इस फ़िल्म की मुख्य भूमिका राखी ने निभाई थी। अन्य महत्वपूर्ण भूमिकाओं में मिथुन चक्रवर्ती, सुरेश ओबराय, अमोल पालेकर आदि थे।

फ़िल्म और मीडिया लेखन का बहुत बड़ा क्षेत्र आज के नए लेखकों के सामने मौजूद है। यह सिने उपन्यास पढ़ने के लिए तो है ही, यह फ़िल्म-लेखन की विधा को समझने-समझाने में भी सहायक हो सकता है। इन्हीं शब्दों के साथ यह नए पाठकों और फ़िल्म-विधा के लेखन में शामिल होने के इच्छुक नए लेखकों को समर्पित है !
-कमलेश्वर

अम्मा

पावन गोदावरी नदी के किनारे बसे नासिक नगर की रेलवे कॉलोनी में आज बड़ी धूमधाम थी। नासिक रेलने स्टेशन के असिस्टेंट स्टेशन मास्टर की बेटी शान्ता की आज शादी होनेवाली थी। कॉलोनी में रहनेवालों ने बारात के लिए जगह-जगह स्वागत द्वार बनाए थे। उन्हें बड़ी खूबसूरती से केले, आम के पत्तों से सजाया गया था। कॉलोनी के इस छोर से लेकर उस छोर तक रंग-बिरंगे कागजों की झंडियाँ लगाकर वातावरण को और भी सुन्दर बना दिया था।
बहुत ही सज्जन मिलनसार आदमी थे असिस्टेंट स्टेशन मास्टर। इसलिए रेलवे कॉलोनी में रहनेवाले हर व्यक्ति में ऐसा उत्साह और उछाह था जैसे उसकी अपनी बेटी की ही शादी हो।

ए.एस.एम. बाबू का घर मेहमानों और अड़ोस-पड़ोस की औरतों से भरा हुआ था। शान्ता शादी के कपड़े पहने एक कमरे में बैठी थी। शादी के मौके पर होनेवाली रस्म-रिवाजों को पूरा करते-करते थक गई थी। आज भाँवरे पड़ने तक उसे आधी रात तक जागना भी था। इसलिए दादी माँ ने उसे आराम करने की सलाह देकर इस कमरे में लिटा दिया था और बाहर से दरवाजा बन्द करके घर मैं मौजूद सभी औरतों को सख्त हिदायत दी थी कि शान्ता के आराम में कोई खलल न डाले।
‘आज मेरी शादी हो जाएगी और मैं एक अनजाने व्यक्ति के पल्लू से बँधकर एक अजनबी शहर के एक पराए घर में चली जाऊँगी। उस घर के सभी लोग अपरिचित होंगे, अनजाना वातावरण होगा। मैं किस तरह रह पाऊँगी उस पराए घर और घर के अनजाने लोगों के बीच...’बिस्तर पर लेटी शारदा मन ही मन अपने आप से पूछ रही थी।
अपनी शादी के बारे में सोचते-सोचते शान्ता अपने बचपन से लेकर आज तक की यादों की भीड़ में न जाने कहाँ गुम हो गई।

अपने अतीत की यादों को दोहराते हुए बचपन की एक घटना उसकी आँखों के आगे साकार हो उठी। उस समय शान्ता की उम्र केवल सात वर्ष थी और उसके पड़ोस में रहनेवाले सलीम की उम्र लगभग दस वर्ष की थी। रेलवे कॉलोनी के अन्य बच्चों के साथ शान्ता और सलीम बचपन से ही खेलते चले आए थे।
शान्ता के पिता असिस्टेंट स्टेशन मास्टर थे। इसलिए उन्हें काफी बड़ा क्वार्टर मिला था और उनके क्वार्टर के सामने बड़ा-सा लॉन था, जिसे मेहँदी की झाड़ियों से घेर दिया गया था। लॉन में मेहँदी की झाड़ियों के किनारे-किनारे रंग-बिरंगे फूलदार पौधे लगे हुए थे। इंगलिश फूलों और खुशबू बिखेरती मेहँदी की झाड़ियों से घिरा हरी घासवाला यह मैदान सुबह से शाम तक बच्चों से भरा रहता था। वे तरह-तरह के खेल खेलते रहते थे।

शान्ता की माँ ने उसके लिए एक बहुत ही सुन्दर गुड़िया बना दी थी। उसकी गुड़िया को देखकर, अपनी अम्मी से जिद करके सलीम ने एक गुड्डा बनवा लिया था। और उस दिन शान्ता की गुड़िया और सलीम के गुड्डे की शादी थी।
कॉलोनी भर के बच्चे लॉन में जमा हो गए थे। कुछ बच्चे अपनी बाँसुरी, पिपहरी, भोंपू, ढोलक जैसे खिलौने ले आए थे और दूल्हे के वेश में सजे-धजे सलीम के गुड्डे के आगे-आगे उन्हें बजाते हुए चल रहे थे। ठीक उसी तरह जिस तरह बारात में बाजे बजानेवाले दूल्हे की घोड़ी के आगे-आगे चलते हैं।

सलीम ने अपने अब्बा की शेरवानी पहन ली थी, जिसने उसकी टाँगों तक को ढक लिया था। सिर पर अब्बा की ही फैज कैप लगा ली थी और अपने गुड्डे को दोनों हाथों से पकड़कर लॉन पर चलता हुआ, बाजेवालों के पीछे-पीछे उस कोने की ओर बढ़ रहा था जहाँ शान्ता ने अपनी गुड़िया का घर बना रखा था। कॉलोनी के सभी लड़के बारातियों के वेश में सलीम के गुड्डे के साथ चल रहे थे और कॉलोनी की तमाम लड़कियाँ शान्ता के साथ इकट्ठी होकर बारात के स्वागत के लिए तैयार खड़ी थीं। उनमें से कई के एक पास खिलौनेवाली छोटी-छोटी ढोलकें थीं। वे उन ढोलकों को बजा रही थीं और शादी के मौके पर अपने-अपने घरों में गाए जानेवाले गीत गा रही थीं।
शान्ता बारात के स्वागत के लिए घर के दरवाजे पर खड़ी थी।
बारात दरवाजे पर पहुँची तो बड़ी हँसी-खुशी के साथ उसका स्वागत किया गया। एक लड़की ने पंडित बनकर गुड्डे-गुड़िया की भाँवरें डलवाईं....! शान्ता ने माँ से कहकर अपनी गुड़िया की शादी के लिए खाने की कुछ चीज़ें बनवा ली थीं। बारातियों के साथ-साथ शान्ता की सहेलियों ने भी मिल-बाँटकर उन चीजों को खाया और इस तरह बारात को शानदार दावत दे दी गई।

इसके बाद ! गुड़िया को गुड्डे के साथ विदा कर दिया गया।
हालाँकि यह केवल गुड्डे-गुड़िया का खेल था लेकिन न जाने क्यों शान्ता और सलीम को यह महसूस होता रहा कि गुड्डे-गुड़िया के रूप में उन दोनों की शादी हो रही है—वे दोनों गुड्डे-गुड़िया को हाथ में लिये हवन-कुंड के चारों ओर इस तरह फेरे लगा रहे हैं जैसे उनके गुड्डे और गुड़िया नहीं बल्कि वे दोनों ही सात फेरे लगा रहे हैं—जैसे उन्हीं की शादी हो रही हो।
और शादी होने का यह अहसास मासूम शान्ता और सलीम के नन्हें से भोले-भाले मन में इतनी गहराई तक बैठ गया था कि वे आमने-सामने पड़ते तो दोनों इस तरह शरमा जाते, जिस तरह नई-नई शादी होनेवाले दूल्हा-दुल्हन शरमा जाते हैं।
और आज शान्ता सचमुच दुल्हन बनी थी। उसका विवाह होनेवाला था। आज वह सचमुच ही अपने दूल्हे के साथ अग्नि के सात फेरे लगानेवाली थी। सबकुछ वैसा ही हो रहा था और होनेवाला था जैसा शान्ता की गुड़िया और सलीम के गुड्डे की शादी के मौके पर हुआ था। उस वक्त शान्ता को ऐसा लगा था कि सलीम के साथ अग्नि-कुंड के फेरे लगा रही है लेकिन आज उसे प्रवीन के साथ फेरे लगाने थे—प्रवीन उसका भावी पति—जिसे उसने अभी तक देखा भी नहीं था। पता नहीं कैसा होगा ?...सलीम जैसा या इससे सुन्दर !

तभी दरवाजे पर बाजों की आवाजें गूँज उठीं। घर की स्त्रियाँ दौड़ती हुई कमरे में आईं और शान्ता को सजा-सँवारकर कमरे के बाहर ले गईं।
दूल्हे के दरवाजे पर आते ही पहले माँ ने प्रवीन की आरती उतारी और फिर शान्ता ने फूलों का एक खूबसूरत हार उसके गले में डाल दिया। प्रवीन ने भी उसे माला पहनाई।
रेलवे कॉलोनी के लोग बड़े उल्लास से बारातियों का स्वागत-सत्कार कर रहे थे। उन्हें खिला-पिला रहे थे सलीम दोनों बाजुओं को एक दूसरे में लपेटे एक ओर खड़ा था। आज वह तेईस वर्ष का युवक था। शिक्षित और शालीन...आज भी उसके बदन पर वैसी ही शेरवानी थी। वैसी ही फैज कैप थी लेकिन उसके चेहरे पर वह खुशी नहीं थी, मन में वह उल्लास नहीं था जो आज से लगभग तेरह वर्ष पहले गुड्डे और गुड़िया के विवाह के समय था। उसके चेहरे पर उदासी थी, आँखें बुझी-बुझी और थकी-थकी दिखाई दे रही थीं जैसे उसे किसी ने अचानक ही उस समय जगा दिया हो जब वह एक सुन्दर सपना देख रहा था। वह सुन्दर सपना अधूरा रह गया था। और सपने के इस अधूरेपन ने उसके तन-मन में एक अजीब-सी शिथिलता भरा अवसाद भर दिया था। अजीब-सी उदासी और अजीब-सी खामोशी।

ट्रे में शर्बत के गिलास लिये कॉलोनी के ही एक लड़के ने सलीम की ओर ट्रे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘सलीम भाई लीजिए शर्बत पीजिए...आप इस तरह कटे-कटे चुपचाप क्यों खड़े हैं !’’
‘‘शुक्रिया दोस्त, दरअसल शर्बत पीने का मन नहीं हो रहा।’’ सलीम ने मुस्कुराने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा।
शुभ मुहूर्त में शान्ता और प्रवीन को पंडितों ने वेद मन्त्रों और अग्नि को साक्षी बनाकर एक सूत्र में बाँध दिया।
‘‘बाबू कुन्दनलालजी, अब शान्ता आज से आप की बेटी हो गई। हम जैसा होना चाहिए था आपका वैसा स्वागत-सत्कार नहीं कर पाए। जो भी भूल-चूक हो गई हो क्षमा कर दीजिएगा !’’ शान्ता के पिता ने प्रवीन के पिता से हाथ जोड़कर प्रार्थना की।
प्रवीन के पिता ने उनके दोनों हाथ थाम लिए और खुशी से छलछलाती आवाज में बोले, ‘‘कैसी बातें करते हैं
श्यामसुन्दरजी। शान्ता बेटी आपने हमें दे दी तो हम समझते हैं कि आपने अपना सबकुछ हमें अर्पित कर दिया। शान्ता बेटी से बढ़कर आपके पास और था भी क्या ? मुझे सबकुछ मिल गया श्यामसुन्दरजी...सबकुछ मिल गया।’’
प्रवीन के पिता बाबू कुन्दनलाल ने शान्ता के पिता बाबू श्यामसुन्दर को अपनी बाँहों में भरकर छाती से लगा लिया।
‘‘आज से शान्ता आपकी हुई बाबूजी, आज मैं एक बहुत बड़े कर्तव्य से मुक्त हो गया !’’ बाबू श्यामसुन्दर की आवाज भर्रा उठी थी।

‘‘आप ठीक कह रहे हैं भाई साहब, ‘‘एक बाराती बोल उठा, ‘‘लड़की का विवाह पिता पर सबसे बड़ा कर्ज होता है। भगवान की कृपा से आप इस कर्ज से मुक्त हो गए। इससे बड़ी खुशी की और क्या बात हो सकती है !’’
डोली आकर दरवाजे़ पर लगी ही थी कि अचानक फायर की आवाज के साथ ही दौड़ते हुए भारी बूटों की आवाजें चारों ओर से गूँज उठी। लोग भयभीत होकर उस ओर देखने लगे जिस ओर से फायर और भारी बूटों की आवाजें करीब आती जा रही थीं।
‘‘न-वी-न !’’ अंग्रेज सार्जेंट टाम का भारी-भरकम रौबीली आवाज गूँज उठी और फिर वह दौड़ता हुआ वहाँ पहुँच गया जहाँ दूल्हा प्रवीन, उसके और शान्ता के पिता अन्य लोगों के साथ खड़े थे।
‘‘कहाँ है नवीन !’’ सार्जेंट टाम ने कड़ककर प्रवीन से पूछा, ‘‘टुम उसका भाई है...वह टुमारा शादी में जरूर आया होगा।’’
‘‘नहीं, नवीन यहाँ नहीं है,’’ प्रवीन ने साहस करके कहा, ‘‘महीनों बीत गए हमने उसकी शक्ल तक नहीं देखी।’’
सार्जेंट टाम ने क्रोध से तिलमिलाकर अपने रिवाल्वर की नाल प्रवीन के सीने पर टिका दी और गुर्रा उठा, ‘‘झूठ बोलता है ! हम तुम्हें गोली से उड़ा देगा ! बता...कहाँ है नवीन ?’’

सभी लोग कहने लगे नवीन वहाँ नहीं है। वह अपने भाई की बारात में नहीं आया है।
टाम ने कड़ककर कहा और अपने सिपाहियों को हुक्म दिया, ‘‘हमारे जवानों ने इस घर और पूरे इलाक़े को घेर रखा है। नवीन यहाँ से निकलकर भाग नहीं सकता। सिपाहियों, घर का कोना-कोना छान मारो—ऐसा हो ही नहीं सकता कि छोटा भाई बड़े भाई की शादी में शामिल न हो...नवीन जरूर आया होगा...तलाश करो...पूरा घर छान डालो...आज मैं उसे जिन्दा या मुर्दा लेकर ही वापस लौटूँगा।’’
सिपाही अपनी-अपनी राइफल ताने बाबू श्यामसुन्दर के घर में घुस गए और तलाशी लेने लगे।
दुल्हन के वेश में खड़ी शान्ता थर-थर काँप रही थी। उसकी सात-आठ वर्ष ननद मंजू भय से काँपकर उसकी टाँगों से लिपट गई और फिर नीचे बैठ गई।

सिपाहियों ने सारा घर खँगाल डाला लेकिन नवीन जब वहाँ था ही नहीं, तो मिलता कहाँ से।
‘‘टुम नवीन का बाप हाय ?’’ सार्जेंट टाम ने बाबू कुन्दनलाल के सीने पर रिवाल्वर की नाल टिका दी, ‘‘टुमारा बेटा नवीन अंग्रेज सरकार का दुश्मन हाय—बागी हाय ! बागियों का लीडर हाय ! बटाओ कहाँ हाय वो, वरना हम इसी वक्त टुम सबको गोलियों से भून डालेगा।’’
सार्जेंट टाम का क्रोध बढ़ता जा रहा था। वह बड़े यकीन के साथ यहाँ आया था कि आज बागियों के लीडर नवीन को या तो गिरफ्तार करके जिन्दा ले जाएगा या फिर उसकी लाश लेकर जाएगा। और नवीन को गिरफ्तार करके या उसे मौत के घाट उतार देने के बाद उसका प्रमोशन हो जाएगा।
लेकिन बदनसीब टाम की यह साध पूरी न हुई। उसे लगा जैसे उसका मनचाहा शिकार उसके हाथों में आकर निकल गया हो।
अपनी नाकामयाबी पर झल्लाकर उसने अपना रिवाल्वर होल्सटर में रख लिया और अपने जवानों को वापस चलने का आदेश देकर उस ओर चल दिया, जहाँ उसकी गाड़ी खड़ी थी।

सार्जेंट टाम और सिपाही जब गाड़ियों में सवार होकर आँखों से ओझल हो गए तो सब लोगों के जी में जी आया। उन्होंने इस तरह इत्मीनान की साँस ली जैसे मौत ने अपने खूनी पंजों में जकड़ी उनकी गर्दनों को बिना हील-हुज्जत के छोड़ दिया हो।
‘‘बाबू कुन्दनलालजी, अब यहाँ से चलिए। क्या पता वह गोरा साहब फिर लौट आए और हम लोग फिर मुसीबत में पड़ जाएँ !’’ एक बाराती ने भयभीत स्वर में कहा।
बाबू कुन्दनलाल ने शान्ता के पिता बाबू श्यामसुन्दर से विदा ली और सब लोगों को साथ लेकर स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में आ बैठे।
एक सीट के आगे चादर बाँध दी गई और उस पर्दे में शान्ता को अपनी ननद मंजू के साथ बैठा दिया गया।
ट्रेन स्टार्ट होकर धीरे-धीरे रेंग रही थी कि तभी छोटी-सी गठरी लिये एक औरत जल्दी से ट्रेन में चढ़ आई। उसने बुर्का पहन रखा था। अपनी गठरी लेकर वह कम्पार्टमेंट के एक कोने में जा बैठी।

कुछ देर बाद बाबू कुन्दनलाल ने ससुराल से आया खाना निकाला और बाराती खाना खाने लगे। उन्होंने एक पत्तल पर पूड़ी-सब्जी रखकर चादर के बने पर्दे के पीछे बैठी शान्ता और मंजू के लिए भी भिजवा दी।
वह बारात में आए मेहमानों को खाना परोस रहे थे कि उनकी नजर कोने में बैठी बुर्कापोश औरत पर पड़ी। पूरे कम्पार्टमेंट में बाराती भरे हुए थे। वे आपस में हँसी-मजाक भी कर रहे थे।
बाबू कुन्दनलाल ने उस औरत के पास जाकर कहा, ‘‘आप उधर पर्दे में जा बैठिए। वहाँ मेरी बहू और बेटी बैठी हुई हैं। इतने मर्दों के बीच आपको अकेले बैठने में परेशानी महसूस हो रही होगी।’’
बुर्कापोश औरत ने बाबू कुन्दनलाल की सलाह मान ली और अपनी गठरी उठाकर पर्दे के पीछे शान्ता और मंजू के पास जा बैठी।
कुछ देर बाद ट्रेन एक स्टेशन पर पहुँचकर रुकी ही थी कि उसे सिपाहियों ने फिर अपने घेरे में ले लिया। सार्जेंट टाम हाथ में रिवाल्वर लिये उनका नेतृत्व कर रहा था।

सार्जेंट टाम ने अपना रिवाल्वर लहराते हुए जवानों को कड़ककर हुक्म दिया, ‘‘एक-एक डिब्बे की तलाशी लो। हमारे मुखबिरों ने खबर दी है कि बागी नवीन नासिक स्टेशन से इस ट्रेन में सवार हुआ है। उसे वहाँ प्लेटफार्म पर देखा गया था। सिपाहियों ने उसका पीछा किया तो वह उनकी आँखों में धूल झोंककर न जाने किधर गायब हो गया।’’
सार्जेंट टाम का आदेश पाते ही पुलिस के जवानों ने पहले ट्रेन से उतरनेवाले एक-एक यात्री की अच्छी तरह जाँच-पड़ताल की और फिर डिब्बे में घुस गए।
ट्रेन एक घंटे तक प्लेटफार्म पर खड़ी रही। इस एक घंटे में सिपाहियों ने ट्रेन का एक-एक डिब्बा छान डाला। प्लेटफार्म पर मौजूद एक-एक आदमी को अच्छी तरह देखा लेकिन उन्हें नवीन नहीं दिखाई दिया।
इस दूसरी असफलता ने टाम के क्रोध को और भी भड़का दिया। अपने सिपाहियों को गालियाँ बकते हुए वहाँ से चल पड़ा।
सार्जेंट टाम और उसके सिपाहियों के जाने के बाद ट्रेन स्टार्ट होकर आगे बढ़ने लगी।
‘‘बाबू कुन्दनलालजी, आपके छोटे बेटे नवीन ने अपनी करतूतों से आपके पूरे खानदान की जिन्दगी संकट में डाल दी है। जिन अंग्रेजों के राज में सूरज कभी नहीं छिपता, वहीं नवीन मुट्ठी-भर सिरफिरे छोकरों की मदद से उस अंग्रेजी राज का तख्ता पलट देना चाहता है !’’ मुंशी गिरधारीलाल ने खाते-खाते कहा।

‘‘बाबूजी, आप नवीन को समझाएँ कि वह अंग्रेज सरकार से वैर-विरोध छोड़ दे और शरीफ आदमियों की तरह जिन्दगी बसर करे। आप अपने शहर के इज्जतदार और सम्मानित आदमी हैं। आप कोशिश करेंगे तो अंग्रेज सरकार नवीन को माफ कर देगी—उसका नाम बागियों की लिस्ट से आप बड़ी आसानी से खारिज करवा सकते हैं। अब आप घर पहुँचकर सबसे पहले यही काम कीजिए !’’ मुंशीजी ने सलाह दी।
मुंशीजी और दूसरे लोगों की बातें सुनकर बुर्कापोश औरत कसमसाते हुए बार-बार पहलू बदल लेती थी।
‘‘आप आराम से बैठिए,’’ शान्ता ने उसे परेशान देखकर कहा। और फिर मंजू की ओर देखकर बोली, ‘‘तुम्हारे छोटे भैया बारात में नहीं आए।’’

‘‘नहीं भाभी, नवीन भैया तो घर आते ही नहीं हैं, इन अंग्रेज कुत्तों की वजह से....’’ मंजू ने भीगी आवाज में उत्तर दिया।
‘‘सचमुच ही कुत्ते हैं ये !’’ शान्ता घृणा-भरे स्वर में बोली, ‘‘पहले तो सूँघते हुए जनवासे में पहुँच गए, फिर घर पर आ धमके, और जब वहाँ भी नहीं मिले तो अब गाड़ी के डिब्बे सूँघते फिर रहे हैं।’’
‘‘छोटे भैया तक इन अंग्रेज कुत्तों का पहुँचना आसान नहीं है भाभी,’’ मंजू बोली, ‘‘खैर, अब आप खाना खाइए।’’
तभी मुंशीजी की आवाज फिर सुनाई दी, ‘‘बाबू कुन्दनलाल, नवीन को तो घर की मोह-ममता ही नहीं रह गई है। अरे, उस पर अगर क्रान्ति का भूत सवार न होता तो वह तुम्हारा दूसरा बाजू बन जाता। आज ठाठ से अपने बड़े भाई की शादी में शामिल हुआ होता।’’
मुंशीजी की बात सुनकर बुर्कापोश औरत फिर कसमसा उठी।
शान्ता ने पूड़ी का कौर तोड़कर मंजू की ओर बढ़ा दिया।
‘‘तुम भी खाओ न भाभी !’’ मंजू ने खाते हुए हुआ।
शान्ता ने अपने दोनों पाँव सीट पर रखे ही थे कि बुर्कापोश औरत का एक हाथ बाहर निकला और शान्ता के पैर छूकर फिर बुर्के में छिप गया।
शान्ता हड़बड़ाकर बोली, ‘‘आपको कुछ चाहिए ?’’


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