निर्मोही भँवरा - प्रबोध कुमार सान्याल Nirmohi Bhanvra - Hindi book by - Prabodh Kumar Sanyal
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निर्मोही भँवरा

प्रबोध कुमार सान्याल

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :248
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2370
आईएसबीएन :00000

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इसमें निर्मोही भँवरे जैसी एक लड़की के जीवन पर प्रकाश डाला गया है.....

Nirmohi Bhavra

प्रस्तुत हैं इसी पुस्तक के कुछ अंश


राय चौधुरियों का घराना साधारण नहीं है। नवाबी हूकूमत से आज तक इस कुल में चार कवि, तीन दार्शनिक, पाँच-छः कलाकार और दो बड़े सेनापति पैदा हुए। लेकिन समय के साथ-साथ सब कुछ बदलता गया शहर फैलने लगा। उसने राय चौधुरियों की हवेली ग्रस ली। लोग कहने लगे, अब इस वंश के लोप होने में देर नहीं है इस घर की एक मात्र लड़की हिना को देख कर ऐसा ही लगता है। उसने आभिजात्य को नकारा, विज्ञान की दीक्षा ली और नये समाज के निर्माण में योगदान दिया। लेकिन एक जगह वह हार गयी। वह किसी परंपरा से मेल न बैठा सकी। निर्मोही भँवरे की भाँति वह वन-वन मँडराती रही। यह उसके नये सर्जन की प्रक्रिया थी। लेकिन कब तक ? एक दिन वह प्रक्रिया ही शेष रही किन्तु उस भँवरे का तिल-तिल बिखर गया।

निर्मोही भँवरा


टैक्सी काफी दूर निकल गई थी, शायद कलकत्ते का बाहरी हिस्सा था यह।
चैत की तेज सूरज झुलसाये डाल रहा था। मेरे चेहरे पर चिन्ता व उद्वेग की छाया देख एवं इस ओर के इलाके में औरत का साथ कहीं उलझन में  न पड़ जाऊँ, यह सोचकर टैक्सीवाला बोला था-
आप लोग वापस तो आयेंगे न ? इधर कहीं भी टैक्सी नहीं मिलती सर ! हाँ, प्राइवेट बस अवश्य मिल जाती है। अगर आप कहें तो रुका रहूँ, भले ही वेटिंग चार्ज मत दीजिएगा ! महिला साथ में है, बिना सवारी के लौटने में तकलीफ होगी।
रुमाल से पसीना पोंछकर मैंने हिना की तरफ देखा तो वह होंठों में ही फुसफुसाई, इन जरा-जरा सी बातों में मैं सिर नहीं खपाया करती, जो मर्जी हो करो।

टैक्सीवाला फिर बोला, अगर लोग जल्दी आयें तो रुका रहूँ। दो बज रहे हैं-तीन तक आ जायेंगे ?
हठात् हिना को जाने क्या सूझा कि पीठ पर पड़ा हुआ पल्ला सिर पर डाल लिया उसने और बोली, हम लोगों के लौटने का कोई ठीक नहीं है, इसे जाने दो।
एक अजीब उलझन में पड़ गया था मैं। इस भरी दुपहरी में कहाँ और कितनी दूर जाना था, यह तो मैं स्वयं भी नहीं जानता था। हिना का कहना ही ठीक था, हमारे लौटने का समय निश्चित नहीं था,  अतः टैक्सीवाले को वापस भेजना उचित समझा।

किराया लेकर ड्राइवर ने गाड़ी घुमाई और हमारे लिये धूल का गुब्बार छोड़ता हुआ चला गया। आदमी का नामों-निशान तक नहीं था दूर-दूर तक। खुला मैदान और दोपहर की चिलचिलाती धूप। मैदान के पार दूर कहीं किसी कालोनी के दो-चार मकान दिखाई दे रहे थे, लेकिन किसकी शामत आई थी जो इस दुपहरी में घर से बाहर निकलता।
हिना बोली, कुछ भी याद नहीं तुम्हें ! विलायत जाकर तो तुम्हारी बुद्धि को बिल्कुल ही जंग लग गया है। चार साल पहले की तो बात है कि हम यहाँ पिकनिक के लिए आये थे। उधर उस बावड़ी के किनारे नाव लेकर तुम लोगों ने कितना उधम मचाया था ! मैं कीचड़ में गिर पड़ी थी ! नवेन्दु का मनीबैंग खो गया था !

चारों ओर नजर दौड़ाकर बोला, हाँ, याद आ गया। पर कितना बदल गया है सब। अब किधर जाना है-बड़ी तेज धूप है।
धूप है तो क्या हुआ ! यह तुम्हारा विलायत तो नहीं कि हर चार कदम पर सिर छुपाने की जगह मिल जाएगी।–वहाँ वह बड़ का पेड़ दिखाई दे रहा है !-चलो वहाँ चलकर बैठेंगे।
मुँह घुमाकर मैंने हिना से पूछा-अचानक तुमने सिर का पल्ला क्यों ले लिया ? मुझे तो डर लगता है भई, यह पल्ला हटा दो सिर से।
पल्ला सिर से उतारकर पीठ पर डाल लिया हिना और हँसकर बोली-मैंने तो टैक्सीवाले की वजह से सिर ढक लिया था, कहीं वह कुछ और समझ बैठता।
चलते-चलते हम लोग काफी दूर निकल गये। मैं न जाने किन भावनाओं में खोया हुआ था, अचानक बोला-तुम्हारा भी कोई जवाब नहीं हिना ! इतनी दूर आने की भला क्या जरूरत थी ? दो बात करने के लिए कलकत्ते से बिल्कुल बाहर चली आई ? लाओ, हैंडबैग मुझे दे दो। तुम बड़ी उत्तेजित हो जाती हो । और हिना के हाथ से बैग ले लिया।
बुझे स्वर में हिना बोली गुस्सा मत होओ, पार्थ। मैंने तो तुम्हें लेकर सीधे स्टेशन ही जाना चाहा था, पर तुम्हीं तो तैयार नहीं हुए !

मेरे तैयार होने से सब हो जाता ? पुलिस कचहरी तो है नहीं देश में ? अगर नवेन्दु नालिस कर देता तो ? तुमने एम. एस.-सी. पास  किया है लॉ तो पढ़ा नहीं है ?
जरा उग्र स्वर में हिना ने टोका-ठहरो। उलटी सीधी बात मत करो। कानून जानते होते तो तुम भी ऐसी बात नहीं कहते। यहाँ एकान्त में नहीं लाती तो सारी बातें खोलकर कैसे बताती ? नवेन्दु यह मौका दे रहा था क्या ? दो साल से तुम्हारे आने के दिन गिन रही हूँ। तुम्हारे बीच में पड़े बिना क्या कभी इसका फैसला हो सकता है ?
हिना की बातें सुनकर मैं मुस्करा पड़ा और बोला-मेरा बीच में पड़ना नवेन्दु भला क्यों पसन्द करेगा ? तुम्हारी तरह वह भी तो मेरा घनिष्ट मित्र है। और फिर-

और फिर क्या ?
मेरा मतलब था जब मेरी अज्ञानता में मेरे पीछे इस समस्या की सृष्टि हुई है तो मुझसे बिना पूछे उसका समाधान भी हो तो अच्छा था। और फिर कानूनन वह तुम्हारा पति तो है ही ! तुम पढ़ी लिखी लड़की हो हिना-
सहसा उत्तेजित हो उठी हिना, बोली-वह मेरा पति नहीं है। जिसे मैंने स्वीकार ही नहीं किया उसे पति कहने के लिए मजबूर मत करो पार्थ। उसकी तरफ नजरे घुमाकर मैंने पूछा मैंने-उससे शादी नहीं की तुमने ?
इसे शादी नहीं कहते –
लेकिन दूसरों की बात ?
मेरे प्रश्न का उत्तर दिये बिना हिना चुपचाप साथ-साथ चलती रही। मुझे मालूम था कि अन्दर ही अन्दर भरी बैठी है, कभी भी फट पड़ेगी।
विक्षोभ मेरे मन में भी कम नहीं था, लेकिन थोड़ी देर बाद शान्त स्वर में बोला-पिछले तीन साल में तुम्हारी करीब तीस चिट्ठियाँ मिलीं मुझे। पर आश्चर्य की बात तो यह है कि सबसे महत्त्वपूर्ण  खबर एक पत्र में भी नहीं लिखी ! मुझे मालूम है, तुम या नवेन्दु किसी को भी मेरे ऊपर शायद विश्वास नहीं था।

नहीं पार्थ, यह सच नहीं है !
 तो फिर ? चुप क्यों रही ? खबर क्यों नहीं दी ?
शर्म के मारे ! विश्वास करो पार्थ, मेरे मन में यह बात नहीं आई कि तुमसे शर्म करने की कोई बात ही नहीं थी ।
अंततः इस दूर वाले बड़ के पेड़ के नीचे हम आ ही पहुँचे। छाया मिली तो जरा जान में जान आई। हवा में भी कुछ ठंडक लगी। साड़ी के पल्ले से हिना ने मुँह और गला पोंछा और बोली-मुझे क्षमा करो पार्थ, बुरा मत मानो।
कलकत्ता पीछे छूट गया था। जनशून्य मैदान के किनारे उस विशाल वृक्ष के नीचे बैठने की इच्छा जगह देखकर मैंने बैग नीचे रख दिया और जेब से रुमाल निकालकर पेड़ के तने के पास बिछाकर हिना से बोला बैठ जाओ हिना। देखो मेरे और तुम्हारे बीच बात का साफ हो जाना उचित है।

पेड़ के पास से ही एक कच्ची पगडंडी पीछे कालोनी की तरफ चली गई थी। उधर की तरफ चार-पाँच कच्चे मकान दिखाई दे रहे थे। मैं यह सोचकर अपने मन में तसल्ली दे रहा था कि चलो अच्छा है जो कालोनी पास में ही है। मध्याह्न चिलचिलाती धूप से जलते इस निर्जन प्रान्तर     में यदि कोई भूला भटका आ भी गया तो हमें देखकर कम से कम पलातक तो नहीं समझेगा। सच तो यह है कि जाने कैसा अज्ञात भय मुझे ग्रसे डाल रहा था।
हिना को चुप देखकर पुनः बोला मैं-जानती हो सबसे अज्ञात मुझे क्या देखकर लगा ?...तुम्हारा चेहरा देखकर ! मात्र तीन वर्षों में तुम इस तरह बुझ गयी हो यह बिना देखे विश्वास नहीं करता मैं।

अचानक मानो सोए से जाग उठी हिना। माथे पर झुक आई बालों की लट को पीछे करके बोली, तुम्हें सामने बैठकर अपना रोना रोने के लिए मैंने तुम्हे विलायत से वापस नहीं बुलाया पार्थ ! किन्तु विष मेरे गले तक पहुँच गया है, मुझे बचा लो पार्थ। फिर देखना मुझे कि मैं वही पहले जैसी हिना हूँ कि नहीं ! जिसे देखकर तुम चकित रह जाते थे ! मैं बुझ गयी हूँ किसने कहा ? बुझी नहीं हूँ पार्थ ! सम्मोहन के जाल में फँस गयी हूँ।

अत्यन्त क्षुब्ध हो गया हिना की बातें सुनकर। बोला। -छिः छिः, यह बातें सुनने में भी अच्छी नहीं लगती हिना। जीवन में कुछ नैतिक सिद्धान्तों को मानकर तो चलना ही पड़ता है, नहीं तो मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं रह जाता। जिस चीज को तुमने सर्वापेक्षा पवित्र मानकर ग्रहण किया है, स्वीकार किया है, एवं जीवन की सर्वोत्तम प्रतिज्ञा के रूप में जिसका वरण किया है, वह तुम्हारी कल्पना का खिलौना नहीं है हिना। जिस दिन मैंने यह खबर सुनी, सच मानो उस दिन मैं जितना खुश हुआ, संसार में कोई नहीं हुआ होगा। लेकिन यहाँ आकर तुम्हारे मुँह से सब सुनकर मैं चकित रह गया। तुम जिसे विष कह रही हो, मुझे तो वह अमृत दिखाई दे रहा है ! सम्मोहन के जाल की बात करती हो तो यह जाल किसके जीवन में नहीं है ? यह बन्धन है तो अनुराग और सौन्दर्य है !

बिना जवाब दिये उसी तरह सिर झुकाए बैठी रही हिना। ऐसी धूप तथा पथश्रम की वह अभ्यस्त नहीं थी; किन्तु स्वदेश लौटने पर पिछले हफ्ते भरसे मैं महसूस कर रहा था कि जैसे इसके सिर के ऊपर से अनेकों तूफान गुजर चुके हैं। लगता है, दीर्घकाल पर्यन्त दुख व निराशा में घिरी रहने के कारण वह टूट चुकी है। इतना अनुमान तो मुझे हो ही गया कि लेश मात्र इच्छा न होते हुए भी एक दुर्वह बोझा उसे निरन्तर ढोना पड़ रहा है और फलस्वरूप मेरे सदुपदेश का एक अक्षर भी उसके कानों में नहीं पहुँच रहा है।

थोड़ी देर बाद फिर मैंने चुप्पी तोड़ी-अब तो तुम्हारे साथ एकान्त में दो घड़ी बैठकर बात करने का भी कोई उपाय नहीं रहा। हमारे यहाँ तुम आना नहीं चाहती कि कभी कोई पूछ बैठे। अपने घर पर यह बाते करना नहीं चाहती और नवेन्दु के यहाँ तो बिल्कुल ही असम्भव है। अब भला बताओ कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ।
हिना ने फिर अपनी वही बात दोहरा दी-तुम्हारी नीति व उपदेश की बातें मेरे किसी काम की नहीं है पार्थ। अपना रास्ता मैं पहचानती हूँ, तुम नहीं बताओगे तो भी कोई दिक्कत नहीं आयेगी। लेकिन सिर से पाँव तक सोने की जंजीरों से बँधे रहना मेरे लिए असम्भव है। मैं मानती हूँ, मैंने भूल की है। लेकिन अब जिस तरह भी हो मुझे इस आत्मग्लानि से छुटकारा पाना ही है।

कैसे ?-मैंने प्रश्न किया। तुम लोगों ने बात को जितना दबाना चाहा, उतनी ही वह फैलती गई, यह जानती हो ? रायचौधरियों के वंश की लड़की होकर उनसे सामाजिक सम्मान व आभिजात्य को क्षुण्ण करोगी तुम ? तुम क्या जानती नहीं कि एक बार लड़की के चरित्र पर कलंक लगने के बाद इसका प्रतिकार कभी नहीं होता ?
झट से मुँह उठाया हिना ने और मेरे चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए पूछा-आखिर तुम समझाना क्या चाहती हो ?
यह विवाह तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिये। मैंने बहुत सोच-विचार कर देखा है हिना-
मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि हिना उठकर खड़ी हो गई। रुमाल उठाकर झाड़ा और मेरे हाथ में देकर बोली, चलो। अब मुझे पता चल गया है कि तुम भी नवेन्दु के हाथ की कठपुलती हो। यह विवाह मैं स्वीकार करती ही नहीं। बता सकते हो इस विवाह का कौन साक्षी था ? कहाँ बाध्यता है ? कहाँ बन्धन है ?

मैं भी उठकर खड़ा हो गया और बोला-कोई व्यक्ति उपस्थिति नहीं था, क्या केवल इस कारण तुम इस विवाह को अमान्य कर देना चाहती हो ? तो फिर कहाँ रही तुम्हारी साधुता और चरित्र-निष्ठा ? तुम विज्ञान शास्त्र में एम. एस-सी पास लड़की हो हिना –नाबालिक नहीं ! भले ही पाँच आदमी तुम्हारे विवाह में साक्षी नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि सबकी नजरों से छिपकर जो काम किया है आज सबके अगोचर उस बन्धन को काटकर फेंक दो ! तुम क्या समझती नहीं कि आजकल शिक्षित लड़कियों के सम्बन्ध में बहुतों के मन में संशय क्यों रहता है ! तुम्हारे सामाजिक दर्शन के साथ मेरा मेल नहीं बैठता, हिना !

कुछ देर और वहाँ बैठकर अपराह्न की उस धूप से बचा जा सकता था, किन्तु हिना के मन में आत्मग्लानि उसे चैन नहीं लेने दे रही थी। मछली  आराम से पानी के अन्दर ही अन्दर तैरती रहती है, लेकिन खाने के लालच में जब गले में काँटा फँस जाता है तो हिताहित-ज्ञान शून्य होकर इधर से उधर भागती है। न तो निगल पाती है और न ही काँटा छुड़ा पाती है। इसी प्रकार नवेन्दु के हाथों से कैसे मुक्ति मिले, यह चिन्ता इसे स्थिर नहीं बैठने देती। न जाने कैसी एक बेपरवाही उसकी आँखों से उतर आती थी। मानसिक यन्त्रणा से वह तिल-तिल करके जल रही थी। बैग उठाकर फिर उसके साथ लौट पड़ा। चलना काफी पड़ेगा, पर क्या किया जाये। और कोई चारा भी तो नहीं था। छात्रावस्था में न जाने कितना चले थे।

 लेकिन तब दो नहीं हम तीन थे-नवेन्दु भी साथ रहता था। पुरी का समुद्रतट, शिलांग का बोटेनिकल गार्डेन, गिरिडीह के उशीर वन के किनारे लखनऊ में गोमती के आस-पास, ताजमहल के पक्के चबूतरे पर काँशी में गंगा के किनारे-कहाँ नहीं गये हम तीनों ! एक मन, एक प्राण-और वही एकमन मानो तीनों नामों में विभक्त होकर हम तीनों के रूप में परिचित था। वह दोनों साइन्स के विद्यार्थी थे और मैं आर्ट का। लेकिन उस साल अचानक नवेन्दु एक बड़ा स्वार्थ त्याग बैठा। अस्वस्था एवं पारिवारिक असुविधा के कारण उसने फाइनल परीक्षा नहीं दी अर्थात् फर्स्ट क्लास फर्स्ट होने का सुयोग दे दिया। इसके बाद दोनों का मधुर सम्पर्क दुर्बोध नहीं रहा।

 उसी समय नवेन्दु के पिता का स्वर्गवास हो गया। उसके पिता बहुत बड़े व्यापारी थे और नवेन्दु  उनका एक मात्र पुत्र था। अतः दूसरे साल परीक्षा की बात मन से निकाल कर नवेन्दु को लालदिधि के एक बड़े आफिस में बैठना पड़ा। यौवन के पदार्पण में ही कर्त्ता की पदवी मिल गई उसे। एक अवसर प्राप्त आई. सी. एस. को उसने आफिस मैनेजमेंट के लिए रख लिया। जहाजों से माल भेजना व मँगाना-यही उसका बिजनेस था। गवर्नमेंट में इसी प्रतिष्ठान का बहुत सम्मान था ।
इन्हीं दिनों मुझे एक स्कालरशिप मिल गई और भगवान् का नाम लेकर जिस दिन मैं बम्बई से जहाज पर सवार हुआ-इन दोनों ने जेटी पर खड़े होकर रुमाल हिलाते हुए करुण नेत्रों से मुझे विदा किया।
काफी देर हो गई थी चलते-चलते। लेकिन अभी उत्तर की ओर करीब मील भर और चलना था, यहाँ से बस मिलने की आशा थी। पाँच बज रहे थे। हिना बोली तुम मुझे भला-बुरा कुछ भी कह ले पार्थ-किन्तु इससे मुझे कूल-किनारा मिल जाएगा क्या ? मेरी समस्या मिट जाएगी क्या ?

मैं प्रश्न कर बैठा, अच्छा हिना, इतने दिनों का घनिष्ट मित्र आज तुम्हारा पति बन गया तो तुम उसके प्रति इतनी कठोर क्यों हो गई ?
जवाब में हिना ने कहा-फूलों के बाग में सर्प छिपा हुआ था पार्थ, पहले नजर नहीं पड़ा। अब जब दिखाई दे रहा है तो उसे मार डालूँगी या बाग छोड़कर भाग जाऊँगी, लेकिन साँप के साथ गृहस्थी नहीं चला पाऊँगी।
कुछ देर चुपचाप चलता रहा, फिर बोला-ठीक है तो फिर सर्प को मारो और क्षमता का परिचय दो हिना।
हँस पड़ी हिना-सर्प कोई छोटा-मोटा सर्प नहीं है पार्थ। अजगर है। आसानी से नहीं मरेगा, वरन् मुझे पाश में बाँधकर धीरे-धीरे डसेगा।

बोला, तुमने अपने दोनों के बीच हुई घटनाओं के बारे में तो मुझे कुछ बताया ही नहीं। मुझे डर है कि अभी भी तुम्हारा मन मोहाच्छान्द्र है।
नहीं, यह बात बिल्कुल गलत है। यदि मुझे उसकी  पत्नी मान लिया जाये पत्नी की अपेक्षा पति को और कौन पहचान सकता है। बस, कुछ घटनाएँ ही तो इस सर्वनाश की जड़ हैं ! अच्छा पार्थ मैं बड़ी बेहया हूँ न ? क्यों ?
मुस्कराकर मैंने पूछा-भय, से जवाब दू या निर्भय होकर !
मेरी बात सुनकर उस भयंकर मानसिक उत्तेजना में भी हिना हँसते-हँसते दुहरी हो गई। हँसी को मुश्किल से रोककर कुछ ही देर में बोली-लज्जा का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता ! जानते हो क्यों ? हम तीनों बिल्कुल एक बराबर एक उम्र के हैं। याद करके देखों-तीनों छुटपन से नीचे के एक ही क्लास में साथ पढ़ते आये हैं ! मैं बोला उस वक्त क्या मुझे मालूम था कि लड़की लड़के की अपेक्षा जल्दी वयस्क हो जाती है !

फिर से हँसते–हँसते पेट में बल पड़ गये हिना के। वह हँसती रही और मैं चुपचाप बैग झुलाता साथ चलता रहा।
काफी देर बाद हिना बोली-लेकिन विश्वास करो पार्थ, मैं लड़की हूँ और तुम दोनों लड़के, यह चेतना तुम्हारे विलायत जाने से पहले तक कभी मेरे मन में नहीं आई। लड़की के स्वभाव के मूल बंधन की बात छोड़ दो-वहाँ हर लड़की सतर्क होती है, किन्तु बहुत से आदमी ऐसे भी होते हैं जिनके सामने उर्वसी-नृत्य करने में भी लड़की को हिचक नहीं होती। मैंने भी नाच गाना तुम दोनों के लिए ही सीखा था। रूठना-मनाना, हँसी-मजाक, कभी मैंने तुम दोनों से अपने को भिन्न नहीं समझा। एक बार भी मुझे खयाल नहीं आया कि मेरे पाव के घुँघरू नवेन्दु की हृदतन्त्री झंकृत कर देते हैं लेकिन इसमें अस्वाभाविक क्या था ?
तब यह थोड़े ही मालूम था कि नवेन्दु अन्दर ही अन्दर छुरी को सान पर चढ़ा रहा था।
तुम भी कमाल करती हो हिना ! जो स्वाभाविक है उसे मानती क्यों नहीं ? उल्टी बात क्यों करती हो- ? अच्छा छोड़ो यह सब बातें।

कुछ देर चुप रही हिना। फिर बोली-तुम्हें तो मालूम था पार्थ कि मेरे अन्दर कभी कोई दुर्बलता नहीं रही।
मुस्कुराकर बोला, अभी तक तुम्हारी अज्ञानता नहीं गई, हिना। दुर्बलता पैदा हो जाती है, बाँध अचानक टूट जाता है, तूफान भी अचानक आता है और फिर उस बाढ़ में सब बह जाता है, डूब जाता है। अब तक तुमने सब कुछ बातों में उड़ा दिया; जो मैंने सुनना चाहा था वह बताया ही नहीं।
फिर हँस पड़ी हिना। बोली, अब जब तुम लौट आये हो तो सब बताऊंगी तुम्हें। कुछ भी नहीं छोड़ूँगी। लेकिन पार्थ, एक बात सोचकर देखो–छात्र एवं छात्रा में जो एक प्रकार का प्रणय हो जाता है-वह चिरस्थायी होता है कि नहीं इसमें सन्देह है। तुमने ऐसा बहुत कम देखा होगा कि इस प्रकार सहपाठियों का एक दूसरे से विवाह जीवन भर के लिए सार्थक हुआ हो। शायद बहुत सी बातों में नहीं होता। तुम इसका क्या कारण समझती हो ?

पहली चीज तो यह है कि उम्र और उसके साथ प्रतिदिन की प्रतिद्वंद्विता, इसके अलावा एक उथलपुथल ! सहपाठी के साथ बहुत से बहुत थोड़ा-बहुत प्रणयासक्त हुआ जा सकता है, किन्तु विवाह निभाना असंभव है। मेरे अलावा सब लड़कियाँ इस ओर सचेतन रहती हैं। समवयसी तो चल भी जाये, पर सहपाठी के साथ जीवन भर के लिए बँधना बड़ा मुश्किल है। मित्र यदि अभिभावक बन जाये, तो इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है ? जनों के बीच विशाल स्वाधीनता दिखाई देती है, वह संकुचित, कुंठित होकर सम्पर्क को नित्यप्रति उपहास्य की ओर ले जाती है।
तो फिर सब कुछ समझते बूझते हुए भी तुमने यह किया ही क्यों ?

सब कहाँ समझ बूझ पाई ? बस, इतना ही तो जान पाई। यदि मेरी स्वाधीनता, मुक्त हो चली गयी तो बचा क्या ? प्यार ? राम भजो ! बाध्य-बाधकता के उस जंजाल में फँसकर दिन बिताना-ऐसा प्यार मुझे नहीं चाहिए पार्थ ! तुम्हारे उस परम रुपवान नवेन्दु के उस घृणित चेहरे की याद आते ही आज भी मेरा जी घिना जाता है।
बस-रूट की पक्की सड़क तक पहुँचने में काफी समय लग गया हमें। सड़क उत्तर की ओर से आकर पश्चिम की तरफ घूम गई थी। अब इतनी देर बाद मैंने एक प्रस्ताव रक्खा सुनो हिना, तुम्हारी इन असंगत व असंबद्ध बातों से तो कुछ होने जाने वाला है नहीं इसका कुछ न कुछ फैसला तो हो ही जाना चाहिये-अतः आओ एक दिन सब मिलकर बैठ जायें हिना ने जवाब दिया-ठीक है- लेकिन तुम्हें मेरी एक बात रखनी पड़ेगी-डरते-डरते मैंने कहा। क्या ?
बोलो-
नवेन्दु को मैं खुद बुला लाऊँगा। पर देखो, तुम किसी बात को लेकर उससे झगड़ न बैठना।
हँसकर हिना ने जवाब दिया-किस बात पर झगड़ूँगी ?
मैं जानता हूँ तिरस्कार या निन्दा से तुम घबराती हो इसलिए डरता हूँ कि कहीं तुम लोग समस्या सुलझाने की बजाय आपस में लड़ न बैठो। उसे क्या तुम्हारे यहाँ ही ले आऊँ फिर ? मजाक करते हुए हिना बोली-ऐसी ससुराल में वह आना चाहेगा ?                          



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