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अमृत और विष

अमृतलाल नागर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :478
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2310
आईएसबीएन :9788180311093

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अमृतलाल नागर का एक अत्यन्त रोचक उपन्यास...

Amrit aur Vish a hindi book by Amritlal Nagar - अमृत और विष - अमृतलाल नागर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सन् 61 में एक वृहद् उपन्यास रचने की योजना मन में आई। कई परिच्छेद लिख डालने के बाद यह लगा कि बढ़ती महँगाई के दिनों में अनेक वर्षों में पूरा होने वाला काम उठाना मेरे लिये सम्भव न होगा। उपन्यास रुक गया। लिखे हुए अध्यायों में से कुछ जो स्वतंत्र कहानियों का रूप ले सकते थे, आवश्यक फेर-बदल के बाद उपयोग में आ गये। इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं में वे कहानियाँ छप भी गई।

सन् ‘62-63’ के वर्ष उपन्यास-लेखन की दृष्टि से प्राय: खाली ही गये; कुछ लिखा पर बाद में उसे नष्ट भी कर दिया। सन् ‘63’ के अन्त में उपन्यास अपने प्रस्तुत रूप में प्रस्फुटित होने लगा। पुराने लिखे कुछ अध्यायों का नये रूप में उपयोग करना अनिवार्य हो गया। प्रायश्चित्त, सत्यनारायण की कथा, कीर्तन के शार्ट-हैण्ड नोट्स और पढ़े-लिखे बराती शीर्षकों से प्रकाशित कहानियाँ उचित परिवर्तन के साथ फिर से इसी कथा-क्रम में जुड़ गई हैं। विद्वान आलोचकों से मुझे इसके लिये क्षमा माँगनी ही चाहिये।

‘अमृत और विष’ धारा-प्रवाह रूप से अगस्त ‘64’ से पहले न लिखा जा सका। अक्टूबर’ 65 में यह पूरा हुआ। चि.गणेशशंकर त्रिपाठी ‘सारंग’ ने इसकी पाण्डुलिपि लिखी। अंत में पाँच अध्याय मैंने इलाहाबाद में बेटी सौ.अचला विमलकान्त के घर पर स्वयं लिखे।

उपन्यास का नामकरण श्रद्धेय सुमित्रानन्दन जी पंत ने किया। पुस्तक के कुछ फर्मे छपने के बाद पता चला कि उस नाम से ‘पाकेट बुक’ में कोई उपन्यास छप चुका है। बंधुवर नरेन्द्र जी शर्मा ने ‘नौ नगरी सौ गाँव’ सुझाया। यह नाम भी कई मित्रों को पसन्द आया परन्तु तब तक नाम-परिवर्तन करने में प्रकाशक को भी कुछ अड़चनें अनुभव हुई, और मैं स्वयं भी महाकवि से प्रसाद रूप में पाया हुआ नाम बदलने को राजी न हो सका। अत: यही नाम रहा।

उपन्यास के कई अंश आगरे में बंधुवर डॉ.रामविलास शर्मा के यहाँ, बम्बई में परमप्रिय डॉ.धर्मवीर भारती के यहाँ और प्रयाग में लोकभारती कार्यालय में आयोजित गोष्ठियों में सुनाये। पहली दो गोष्ठियों में पाये गये कुछ सुझावों का उपयोग भी किया।
आदरणीय भाई वाचस्पति जी पाठक और भाई जी ज्ञानचंद जैन मेरे शुभचिन्तक और सहायक रहे हैं। इनके प्रति हृदय से प्रेमविनत हूँ।
अन्त में यह सफाई देना भी आवश्यक है कि उपन्यास के सभी पात्र यथार्थ के प्रतीक होते हुए भी काल्पनिक हैं।
अमृतलाल नागर

एक

ऐन कानों के पास अलार्म इतनी जोर से घनघना उठी कि कानों ही के क्या, मेरे अन्तर तक के पर्दे दर पर्दे हिल उठे। आँखें खोलते ही माया का हँसता मुखड़ा देखा, बोली : ‘‘उठिये शिरीमान्, उमर के साठ बज गये।’’
इस मजाक और मजाक करने वाली की रसीली चितवन पर मैं रीझ गया। शरीर में जवानी की सी फुर्ती दौड़ गयी, उठकर बैठ गया कहा: ‘‘यह क्यों नहीं कहतीं साफ-साफ कि सठियाये बुड्ढे, हट, सेज से उतर।’’
माया झेंप गयी: ‘‘जाओ, बड़े वो हो।’’ फिर आप ही नयनों का रसवाण छोड़कर बोली : ‘‘साठा तो पाठा होता है।’’
मन अपनी और पत्नी की आयु भूलकर जवान हो गया। माया बोली: ‘‘अब जल्दी से तैयार हुइ जाओ। उमेशो कहत रहे कि भाभी, आज तुम्हाए-के-हियाँ बड़ी भीड़ आवैगी।’’
‘‘अँहँ, तुम क्या यह समझती हो, जिस भीड़ की बात उमेशो ने तुमसे कही है, वह लेखक अरविन्दशंकर को बधाई देने के लिए आयेगी ?’’
‘‘तो और किसके लिए आवैगी।’’
‘‘वो सरकारी दरबारी कांगरेसी भेड़ों की भीड़ होगी, जिन्हें नगर कांग्रेसाध्यक्ष महोदय मेरी खुशामद में हाँककर लायेंगे। उन्हें गलतफहमी है कि मैं पंडित जवाहरलालजी का दुलारा हूँ। इस जमीन वाली बात याद करो। अब समझीं ? और ये जो परसों मेरा षष्टिपूर्ति समारोह ये लोग धूमधाम से मनाने जा रहे हैं, उमेशो के द्वारा जिसके लिए मुझे इतना-इतना घेरा गया है-’’
‘‘अच्छा-अच्छा, अब आज के शुभ दिन अपने को इतना तपाओ न भाई। आज हमैं तुमरा हँसता चेहरा देखन को जी चाहत है।’’

जीवन-संगिनी जीवन-सर्वस्व पर अपना जादू मारकर चली गयी। मन मैदानी नदी-सा हल्के बहाव में उतर तो आया, पर दार्शनिक बन गया। इकसठवाँ जन्मदिवस भी उसके लिए मनोवैज्ञानिक आसन बिछाने लगा।...सौ वर्ष इस दुनिया में बिता दिये-अनुभवों का जुलूस दिल्ली में निकलने वाले गणतंत्र दिवस के रंगारंग दृश्यों की अविराम गति से चल पड़ा। एक विशाल कनवेस पर एक साथ अनगिनत चित्र उभर पड़े, वर्ष-ऋतुएँ गलियाँ-सड़क, पहाड़ कश्मीर का गुलमर्ग, सोवियत यूनियन के देश, जेल, चरखा, स्वयंसेविका-बाजी, कलकत्ता, कोल्हापुर, मद्रास, बम्बई, घर, माया-बच्चे, माँ-बाप-बाबा, नाते-गोतिये, दोस्त-अहबाब, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ-विविध अनुभवों भरे सारे जीवन ने एकाएक धावा बोलकर मेरे ध्यान का साम्राज्य जीत लिया। मन भर उठा। आदमी जनम से लेकर मरन के दिन तक इतना सारा दुख-सुख भोगता है, हजारों चेहरे, रूप, रंग, वातावरण देखता है, सुनता है, सहता है- आखिर किसलिए ? व्यक्ति के जीवन की ढेर सारी उपलब्धियाँ, जिन्हें प्राप्त करने के लिए वह जान लड़ाता है, अन्त में निकम्मी होकर नष्ट हो जाती हैं। उनमें कितनी ही उपयोगी भी होती हैं।...सोचता हूँ कि अपनी जीवन कहानी लिख डालूँ। जनम भर उपन्यास और कहानियों में दूसरों के देखे-सुने और अपने गढ़े हुए किस्से लिखे, एक अपना भी लिखकर रख जाऊँ !....लेकिन अभी तो एक उपन्यास लिखने का नैतिक भार भी पिछले दो वर्षों से मेरे ऊपर लदा है न, पहले उसे तो सिर से उतार दूँ। इधर मैं कुछ लिख ही नहीं पा रहा; मन पुरानी नदी के पाट-सा सूखा पड़ा है। सोचता हूँ, अपनी कलम को स्फूर्ति देने के लिए आज से कुछ लिखना शुरू कर ही दूँ। आत्म-कथा के संक्षिप्त नोट्स लिखते-लिखते सम्भव है, मेरी सरस्वती फिर से जाग उठें और उपन्यास भी आरम्भ हो जाए। बहरहाल आज से कुछ न कुछ लिखूँगा अवश्य-आत्मकथा, डायरी, उपन्यास। 8 मई को जन्म लेने वाले रवीन्द्रनाथ ठाकुर कितने गजब के मेहनती थे, सदा कुछ न कुछ लिखते ही रहते थे। आज उनकी जन्मशती का पुण्य दिन है। उसके उपलक्ष्य में आज सारे देश में उत्सव किये जायेंगे। मेरा षष्टिपूर्ति समारोह इसीलिए दो दिन बाद मनाया जा रहा है। उनके श्रीमन्त पुरखों का इतिहास एक प्रदेश के इतिहास का गौरव है...लेकिन मेरे पुरखों का इतिहास भी रोचक है, सुन्दर है, लिखने लायक है....।

दो

मलिका विक्टोरिया का राज था। उन्नीसवीं सदी बूढ़ी हो चली थी; बूढ़ा भारत देश गुलामी की नयी और कठिन बेड़ियों से जकड़कर भी जवान हो रहा था, एक नयी राह पर दौड़ रहा था। ‘लोहे की सड़कों’ का जाल धीरे-धीरे फैलता ही जा रहा था, उन पर ‘धुआँ-गाड़ियाँ’ भी माल-मुसाफिर लेकर दौड़ने लगी थीं। मगर चौपहियों, ऊँटगाड़ियों, शिकरमों और गोड़ा-गाड़ियों के दिन तब भी दोपहर की धूप से निखर रहे थे। मेरठ वाले गंगाराम की गाड़ियाँ आगरे तक दौड़ती थीं। आगरे के सोजीराम बस्तीराम का काम भी जोरों पर था।

फकीर मुहम्मद राधेलाल का काम भी बहुत ऊँचा जा रहा था। उन्होंने कलक्टर की सलाह से घोड़ों की डाकगाड़ियाँ और शिकरमें चलाने का नया बन्दोबस्त भी अपने पुराने काम के अलावा आरम्भ किया था। आगरा से मथुरा और मथुरा से कोसी तक डाक लाने-ले जाने की व्यवस्था की। एक बँगला किराये पर लिया। टिकट बाँटने, हिसाब-किताब रखने और तार पाकर सीट बुक करने के काम पर एक मेम को नौकर रखा। उसे चार सौ रुपया महीना दिया। पटने से एक अंग्रेजी पढ़ा-लिखा किरानी बंगाली बाबू आया। नौकर-चाकर-साईस सबके लिए वर्दी-बिल्ले बने। लाला राधेलाल ने इस नये धन्धे को फकीर मुहम्मद राधेलाल एण्ड कंपनी नाम दिया। अंग्रेजी ठाट-बाट से दफ्तर सजाया। अंग्रेजों से चालीस रुपया टिकट की दर बाँधी। मेम साहब का दफ्तर, यात्रियों को आरामगाह और अपना दफ्तर वाला कमरा इस ठाठ से सजाया कि देखकर लगता था, मानो आगरे में लन्दन का एक टुकड़ा लाकर रख दिया हो।

शेख फकीर मुहम्मद अधिकतर अपने गाँव ही में रहते थे। सूफी तबीयत के थे, साधु-संन्यासी और शाह-फकीर दोनों ही प्रकार के सन्त पुरुष उनके यहाँ आते थे। दिन-रात आध्यात्मिक चर्चे चला करते थे। दान-पुण्य करने में उनका हाथ खुला था, हिसाब-किताब देखने-सम्हालने चर्चे चला करते थे। दान-पुण्य करने में उनका हाथ खुला था, हिसाब-किताब समझाते और सलाह-सूत लेते थे। अंग्रेजी ठाठ का दफ्तर सजाने पर लालाजी ने एक जश्न मनाने का आयोजन किया। उसके लिए वे ‘बड़े भैया’ को आप जाकर गाँव से लाये। शेखजी ने नया दफ्तर देखा-भाला, सन्तोष प्रकट किया। लालाजी ने फोटोग्राफर को बुलवाकर उनकी और अपनी तस्वीर उतरवायी, एक फोटो पूरे स्टाफ के साथ भी खिंची। उन दिनों इसका चलन नया-नया ही चला था। अंग्रेज कलक्टर तथा हाकिम-हुक्कामों में और सेठ-साहूकारों में लाला राधेलाल की बड़ी आवभगत थी, इसलिए इस अवसर पर उन्होंने अंग्रेजों को एक शानदार दावत देने का आयोजन भी किया था। बहुत जोर देने पर भी वे अपने बड़े भैया को उस अवसर पर उपस्थित रहने के लिए राजी न कर सके। शेखजी बोले-‘‘यह सिर अब दिन-रात खुदा की बादत में ही झुकने का आदी हो गया है। मुझे इस जंजाल में मत फँसा।’’ नये दफ्तर वाले बँगले ही में लालाजी ने शेखजी के रहने का प्रबन्ध भी किया था; पर वे वहाँ न रहे, कहने लगे-‘‘यहां मेरा जी नई लगेगा। मैं गद्दी पे ही उतरूँगा। वाँ अपने हिन्दुस्तानी भाइयों का साथ है; सन्तों-फकीरों को भी यहाँ आते हुए अच्छा न लगेगा और हर घड़ी इंग्लिशों की सूरतें देखने से भी बचूँगा। सवारी मँगा दे। सूरज ढल रया है। मेरी नमाज का बखत हो रया हैगा।’’

उस अहाते में, जहाँ चौपहिये किराँचियों का कारबार चलता था, एक इमारत भी बनी थी ! उसके नीचे के खन में द्वारे के अगल-बगल दो बड़े-बड़े दालान थे, एक में आने वाले गाड़ीवान, ऊँटवान रैनबसेरा किया करते थे और दूसरे में एक धेला फी रात की दर से भाड़ा देने वाले यात्री। अन्दर एक टके से दो आने रोज तक के किराये वाली बारह कोठरियाँ थीं और इमारत के ऊपर वाले भाग में शेखजी ठहरा करते थे। इस बार भी वहीं आकर दम लिया।

पिछले सोलह बरसों से गाड़ियों के पहियों से घिसते-पिसते अहाते के अन्दर वाले बड़े मैदान की मिट्टी भुरभुरी हो गयी हैं; ऊँटों, बैलों और घोड़ों के खुर मिट्टी में धँस-धँस जाते हैं; अभी आयी-गयी गाड़ियों की लकीरों से रेखा-गणित के अजब-गजब नक्शे बने हुए हैं बायीं ओर कोने में तीन-चार ऊँट खूँटों से लम्बी डोरों में बँधे खड़े हैं। उसी ओर दूसरे छोर पर तबेलों में कुछ घोड़े और बैल भी नजर आ रहे हैं। दाहिनी ओर इमारत है। साँझ के बढ़ते धुँधलके में दस तरह के मानुस चेहरे वहाँ दिखाई दे रहे हैं। यहाँ के लगे-बँधे नाऊ-कहारों के चिरपरिचित चेहरे भी दिखलाई पड़ रहे हैं। अहाते के फाटक में फिटन के प्रवेश करते ही शेखजी का चेहरा खिल उठा, आँखों में जोत आ गयी। डाक स्टेशन यानी अपनी नयी कम्पनी के साथ ही साथ आये हुए बड़े मुनीम गुपालदास से कहा-‘‘हमारा तो ठिकाना येई हैगा भैया। याँ अपनापन तो लगे है। वाँपे वो सब लालम्हों वाले फिरंगी आवें जाँए हैं। और एक वो राँड़ की गोरे चामवाली सुफेद हथनी पाली है राधे ने। वो बार-बार सलाम करे है तो मैं शरम के मारे पानी-पानी हो जाऊँ हूँ। इस कौम के अगाड़ी झुक के सलाम करना ही सीखा था, और वो भी नादिर-शादिर ही। सदा बचताई रया इस कौम से। मैंने तो कह दीना राधे से कि तेराई जिगरा है भैया, तू निभा सके है। मैं तो अपनी गद्दी पे ही ठहरूँगा।’’

फिटन चबूतरे के पास आकर खड़ी हो गयी थी। नौकर-चौकीदार सब बड़े मालिक को देखते ही गाड़ी का दरवाजा खोलकर सलामें झुकाने की उतावली में बड़े मालिक और मुनीमजी की बात पूरी हो जाने तक खड़े रहे। शेखजी ने बात पूरी की और इन लोगों की तरफ, ‘कहो भाई, सब खैरसल्लाह तो है’ कहते हुए अपनी छड़ी और डग सम्हाले।

नये कारबार से, विशेष करके उस चार-सौ रुपये माहवार की सफेद हथनी से मन ही मन मुनीमजी को बड़ी-बड़ी शिकायतें थीं। दोनों मालिक तो उनका अदब करते थे; मगर वो कल की आयी मेम सदा हुकुम ही चलाती थी। मुनीम गुपालदास की शान में बट्टा लगता था। नयी कम्पनी के सारे बहीखाते विलायती थे। अस्सी रुपये महीना और क्वार्टर मुफ्त देकर पटना से एक बंगाली बाबू को बुलवाया गया था, उससे हर साल पाँच रुपये महीने की तरक्की का करार भी हुआ था। मुनीमजी को यह सब देख-देखकर खौलन होती थी, सोचते कि यहाँ तो सोलह बरस नौकरी करते हो गये और अभी तक पचपन रुपल्ली पर ही पड़े हैं। जान होमकर अपना काम समझकर दिन-रात इनका काम सम्हालते हैं। कभी एक कौड़ी का भी फरक नहीं डाला। उसका इनाम ये मिला कि अंग्रेजी के आगे अब उनकी कोई कदर ही नहीं रही। उनके मन ही मन में रह-रहकर बड़ा उबाल आता था। शेखजी फारिग होकर नमाजे-मगरिब अदा करने के बाद फुरसत से बैठे, तो मुनीमजी उनकी सेवा में पहुँच गये। घुमा-फिराकर बात छेड़ी, कहने लगे: ‘‘छोटे भैयाजी ने विलायती कारबार चलाया तो है...देखिए ! बँगले का भाड़ा, बैरा, अर्दली, धोबी, नाई, बंगाली बाबू और वो मेमसाब, सब मिला के सात सौ बयालिस रूपौं का खर्चा तो खाली दफ्तर का बँध गया है। घोड़े, गाड़ी, सहीस, नौकर, बग्घियों की टूट-फूट, मरम्मत के लिए मिस्त्री दाना-घास-रातिब वगैरे से कोई मतलब ही नहीं। छोटे भैयाजी ने मेरे अगाड़ी कम्पनी की आय-बै का नकमा जो रक्खा था, सो तो मेरी समझ में आया था, पर अब का हाल कुछ भी समझ के नई आवे हैं।’’

शेख फकीर मुहम्मद ने एक हाथ से तस्वीह के दाने और दूसरे हाथ से अपनी दाढ़ी पर कंघी करते हुए गुपालदास पर पैनी नजर डाली और पूछा: ‘‘तुम्हारी समझ में क्या खराबी हैगी ? क्या वजह है कि राधे का तखमीना और नए कारबार का खयाल तो तुम्हें उम्दा जँचा था और अब उसमें शिकायतें पैदा हो गयीं ?’’

मुनीमजी सावधान हो गये, कहने लगे-‘‘छोटे भैयाजी ने मुझसे कही थी कि गुपालदास, ये धंधा फसल के आमों जैसा है। आठ-दस बरस जब तक यहाँ पे रेलगाड़ी नई आवैगी, तभी तलक ये अपना पूरा कारोबार है, अब लग एक ही हाथ से दुह रये थे, अब दोनों हाथों से दुहेंगे; दस बर्स में डबल म्हैनत से बीस वर्षों की कमाई करेंगे। मैंने भी बात समझ के कही कि ठीक है। पर अब ये बात हैगी भैयाजी, कि बोई आपकी केहनावत कि मेम निगोड़ी से मुझे भी डर लगी हैगा।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘औअल तो बड़ी घमण्डन और चरबाँक है। सारा दिन जब मुसाफिरों से फुरसत पावे है, तो सीधे जाके छोटे भैयाजी के पास ही बैठ जावे है। बिलायती लिखत-पढ़त है-हर तरह सब कुछ उसी के काबू में है।’’
‘‘तुम समझते हो कि राधे की नजर में उसकी वजह से कोई ऐब आ रया हैगा ? मैं साफ-साफ सुनना चाहूँ हूँ।’’ शेखजी कहते-कहते तकिये से उठकर सीधे बैठ गये।

‘‘कृश्ना कृश्ना !’’ मुनीमजी ने दोनों हाथों से कान पकड़कर कहा-‘‘छोटे भैयाजी का मन तो स्यामा गौ के दूध जैसा हैगा, सो भी आँखों के अगाड़ी का कढ़ा हुआ। वे मेरे मालक हैं, झूठ बोल के मुझे नरक में नई जाना है।’’
शेखजी शान्त सन्तुष्ट मुद्रा में कहने लगे-‘‘गुपालदास, उम्र में तुम मेरे राधे से बड़े जरूर हो और अपने फन के उस्ताद भी हो। मगर बुरा न मानना, मेरे राधे का दिमाग बहुत ऊँची सतह पर दौड़े हैगा। तुम उस मेम पर चार सौ रुपये महीने का खर्च देखो हो। मगर आज मैं भी करीब-करीब सारा दिन राधे के दफ्तर ही में बैठा रहा, और जैसा कि तुम कहो हो, वह मेम भी ज्यादेतर वईं पै बैठी रही। राधे उसे अपने पास बिठला के जो काम करावे हैगा, वो इसलिए कि नजरों ही नजरों में उसके काम का तरीका भाँपे हैगा। विलायती व्यौपाराना तरीकों को समझे हैगा। चार सौ में ये तजर्वा हासिल करना कुछ भौंत म्हैंगा नई हैं। तुम मेरी आज की बात याद रखना मुनीमजी, बरस छै महीने ही में राधे उसे हवा कर देगा याँ से।’’
गुपालदास निरुतर हो, सिर झुकाये बैठे रहे। शेखजी ने भाँपा कि अभी कुछ और शिकायत है; पूछा-‘‘तुम्हें मेम से खास शिकायत क्या है ? वह तुम्हारा माकूल अदब नहीं करती ?’’
‘‘जी हाँ, यही बात है।’’ गुपालदास खुल पड़े।

दूसरे दिन सबेरे लालाजी के आने पर शेखजी ने उनसे गुपालदास को कारबार में चार आने का पत्तीदार और छोटे मुनीम को दो आने का पत्तीदार बना देने को कहा। लालाजी को भी यह राय पसन्द आयी।
राधेलाल मथुरा के एक सम्पन्न साहूकार परिवार में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता वल्लभ कुल के वैष्णव थे। किसी साथ के बहाने से कलकत्ते गये। वहाँ उन्हें सट्टा-फाटकर खेलने का रोग लग गया। उसके पीछे ऐसे दीवाने हुए कि कौड़ी-कौड़ी को मुहताज हो गये और उसके बाद ही संन्यासी होकर कहीं चले गये। लाला राधेश्याम को बचपन ही से कसरत-कुश्ती का बड़ा शौक था। उन दिनों भले घरों के लड़के भी दंगल में उतरा करते थे। शेख फकीर मुहम्मद के छोटे भाई दीन मुहम्मद भी उस समय पहलवानी में नये-नये उठ रहे थे और इस बात का बड़ा चर्चा था कि आगरा ही नहीं, आस-पास के तीन-चार जिलों में किसी भद्र परिवार का नौजवान उनकी जोड़ का न था। मथुरा के हिन्दुओं ने आगरे से मुसलमानों का मानमर्दन करने के लिए आगरे के एक दंगल में राधेलाल से उनकी जोड़ करा दी। राधेलाल ने दीन मुहम्मद को आसमान दिखा दिया। कलक्टर की मेम ने उन्हें सोने का तमगा दिया। बड़ी वाहवाही हुई। दीन मुहम्मद भी अपना जोड़ीदार पाकर ऐसे रीझे कि उसी दिन से दोनों आपस में गहरे दोस्त हो गये।

महीने दो महीने में एक बार मिले बिना दोनों को चैन नहीं पड़ता था। राधेलाल उनके गाँव जाकर हफ्तों रह आते थे, रसोइया और कहार साथ जाता था। दीन मुहम्मद को हराने के लिए मथुरा में लालाजी ने अपने घर वालों की आज्ञा से एक किराये का घर लिया था। दीन मुहम्मद का बावर्ची उनके साथ आता था। कलकत्ते से लालाजी के पिता एक अंग्रेजी पढ़े-लिखे बंगाली बाबू को एक बार अपने साथ मथुरा ले आये थे। वे राधेलाल को अंग्रेजी पढ़ाते थे, उनके साथ अन्य दो-चार सम्पन्न परिवारों के लड़के भी पढ़ते थे। राधेलाल की देखा-देखी दीन मुहम्मद को भी शौक लगा और फिर तो वे भी मथुरा ही में अधिकतर रहने लगे। शेख फकीर मुहम्मद कभी-कभी अपने भाई से मिलने के लिए मथुरा चले जाते थे। राधेलाल तभी से उन्हें दीनू की तरह ही ‘बड़े भैया’ कहने लगे।

सन् 1851 के अगस्त महीने में दीन मुहम्मद पन्द्रह दिनों के तेज बुखार के बाद अचानक स्वर्गवासी हो गये। कुछ समय के बाद ही उन्हें कलकत्ते से समाचार मिला कि पिताजी अपना दिवाला निकलने के कारण संसार का त्याग कर संन्यासी हो गये हैं। मथुरा में महाजनों ने इनकी जायदाद कुर्क करा ली। उन्नीस वर्ष की आयु में लाला राधेलाल खाली हाथ और खाली मन से अपनी माता, छोटी बहिन, पत्नी और गोदी के बच्चे को लेकर आगरा आ बसे। एक किराँची चौपहिये वालों की फर्म में आठ रुपये महीने पर नौकरी कर ली। बड़ी मेहनत से काम किया; मालिकों ने दो बरसों बाद इन्हें पन्द्रह रुपये देना शुरू कर दिया, क्योंकि इनका अंग्रेजी ज्ञान उन्हें लाभ कराता था। सन् 1857 के सिपाही विद्रोह में इन्होंने कई अंग्रेज परिवारों को अनाज के बोरों में छिपाकर अपने मालिकों को गाड़ियों पर सुरक्षित स्थान पर भिजवाया। गदर के बाद अंग्रेजों ने इन्हीं के कारण इनके मालिकों को मान दिया। उसके बाद इनका वेतन तीस रुपये मासिक कर दिया गया। रुपया रोज पाकर लाला राधेलाल बड़े सन्तुष्ट हुए; पर इनका सौभाग्य इस स्थिति से ही सन्तुष्ट होकर नहीं बैठना चाहता था।

मालिकों के यहाँ पितृ-पक्ष में श्राद्ध था। ये प्रबन्ध कर रहे थे। किसी काम से घर के अन्दर गये। कोई स्त्री कह रही थी कि बाह्मन जीम चुके,अब राधे को भी इसी पंगत में बैठा दो। मालिक के बेटे का उत्तर भी इनके कानों में पड़ा। उसने कहा कि उसकी चिन्ता छोड़ो, वो घर का ‘नौकर’ है।‘नौकर’ शब्द इनके मन में चुभ गया। उल्टे पाँवों लौट पड़े और सीधे अपने घर पर आकर ही दम लिया। प्रण कर लिया कि अब तो मालिक बनकर ही रहूँगा। उपाय चिन्ता के बीच में घूमते-घूमते इनके मन में अचानक अपने स्वर्गीय मित्र के बड़े भाई शेख फकीर मुहम्मद का ध्यान आया। दूसरे दिन बड़े तड़के ही गौरीगणेश मनाकर ये उनके गाँव की ओर चल पड़े।

भाई के मरने के बाद से शेखजी आधे विरक्त से रहने लगे थे। कोई सन्तान न थी, कामकाज की जिम्मेदारी तो किसी प्रकार उठा लेते थे, बाकी समय शाहों-फकीरों और साधु-सन्तों की संगत ही में बिताते थे। राधेलाल के प्रस्ताव को सुनकर शेखजी को लगा कि जैसे दीन मुहम्मद ही उनसे सहायता माँग रहा है। बोले-‘‘रुपया ले जाओ और खुदा का नाम लेकर काम शुरू कर दो। घाटा हो तो मेरा और नफा हम दोनों का होगा। मेरे लिए भी आमदनी का एक नया सीगा खुल जायेगा। जमींदारों में पता नहीं, ये अंग्रेज हमारे जीने की खातिर कुछ गुंजाइश रक्खेंगे भी या नहीं, कुछ समय में नहीं आवे हैगा। आबपाशी की दरें भी सुना है, बढ़ने वाली हैं। लगान वसूल करने में जो सख्तियाँ बरती जावे हैं, वो अब बर्दाश्त से बाहर होती जा रही हैं। मैं तो अपनी रैयत पर वो जुल्म हर्गिज नहीं कर सकूँ, जो दूसरे जमींदार कर रहे हैंगे। और अगर न करूँ तो घर से कहाँ तक लगान भरूँगा। कुछ समझ में नहीं आवे हैं मेरी। कभी-कभी तो लगान में बढ़ायी गयी रकम गाँव की पैदावार से भी ज्यादा हो जावे है। महकमा जंगलात जमीनों को दनादन हड़प रया हैगा। चरागाहों को भी नहीं छोड़ते। जानवर भूखों मरे हैं। किसान जमीनें छोड़-छोड़ के भाग रहे हैं। अकाल बार-बार न पड़ेंगे तो और भला क्या होगा ! खैर, जो खुदा की मर्जी।’’

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