नादान प्रेमम् - आरसु Nadan Premam - Hindi book by - Arasu
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नादान प्रेमम्

आरसु

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :73
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2308
आईएसबीएन :00000

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यह गाँव-देहात की मुहब्बत की एक दास्तान है.... एस.के. पोट्टेक्काट्ट की प्रथम रचना।

nadan premam S. K. Pottekkatt

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘नादान प्रेमम्’ एक प्रतिष्ठित कथाकार का प्रथम उपन्यास है। रासायनिक स्वादों से साहित्य को दूर रखने का ख़याल एस. के. पोट्टेक्काट्ट ने हमेशा रखा। आम आदमी के जीवन की परिस्थितियों को विषय-वस्तु बनाकर विशिष्ट कृतियाँ लिखने में वे सव्यसाची-सरीखे थे।
‘नादान प्रेमम्’  गाँव-देहात की मुहब्बत की दास्तान है। लेखक के लिए चिरपरिचित गाँव मुक्कम तथा उधर की इरूवषमि नदी का परिवेश उपन्यास की सहजता को बढ़ाता है। इक्कोरन और मालू इसके मुख्य पात्र हैं। छल-कपट से मुक्त प्रेमिका के दिल की धड़कन का वर्णन मार्मिक है। क्या नादान होना खतरनाक है ? यह संदेश भी उपन्यास पढ़ते समय पाठकों के मन में सहज ही उभर आयेगा।

रोचक कथानक, सहज परिवेश, ग्रामीण पात्र, पात्रानुकूल भाषा, लोकजीवन के बिम्ब आदि इस उपन्यास की खूबियाँ हैं। आलोचक प्रवर प्रो.के. एम. तरकन ने इस उन्यास का मूल्यांकन ग्रामांचल में घटित होने वाले ‘शाकुन्तल’ के रूप में किया है।
उपन्यासकार ने ‘नादान प्रेमम्’ को अपनी पहली सन्तान का दर्जा दिया है। गौण प्रसंगों में भी गम्भीरता के बीजों को तलाशने की प्रवृत्ति दृष्टव्य है। यह उपन्यास प्रेम की निष्ठा को उजागर करता है, लेकिन कभी निष्ठा का परिणाम धोखा भी होता है। मानवता के उत्कर्ष की वकालत करने वाले लेखक की एक अनुपम कृति है ‘नादान प्रेमम्’।

भूमिका

‘नादान प्रेमम्’ लघु उपन्यास का प्रणयन मैंने 1940 में किया था। सिनेमा को ध्यान में रखकर मैं उपन्यास नहीं रचा करता। लेकिन मेरा यह प्रथम उपन्यास इसका अपवाद है। 1939-40 के आसपास बंबई में एक लाख रुपये की लागत से एक सिनेमा का निर्माण सम्भव था। मैंने यह उपन्यास इस उद्देश्य से रचा था कि इसे चित्रपट पर उतारने के लिए बंबई के कुछ सम्पन्न मित्रों से आर्थिक सहायता मिलेगी। लेकिन यह आशा पूर्ण नहीं हुई, न प्रोत्साहन ही कहीं से प्राप्त हुआ। इस प्रकार यद्यपि यह प्रयास पराजित हुआ तो भी उपन्यास के रूप में यह कृति बहुत ही लोकप्रिय बन गई। इसके कई संस्करण निकले।

उपन्यास के क्षेत्र में यह मेरा प्रथम प्रयास था। मेरे लिए बहुत ही परिचित ग्रामीण जीवन के प्रसंग, रूमानी कल्पनाएँ और सामाजिक आचार-विचारों का आकलन इस उपन्यास में किया गया था। उपन्यास रचना के तकनीकी मार्गों से अनभिज्ञ होकर मैंने ऐसा किया था; लेकिन पता नहीं क्यों यह उपन्यास बहुत ही लोकप्रिय बन गया।
लोकभारती प्रकाशन (इलाहाबाद) ने जब मुझसे कहा कि वे मेरे एक उपन्यास का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करेंगे तो मैंने ‘नादान प्रेमम्’ को ही चुन लिया। अपनी प्रथम सन्तान से अधिक प्यार होना स्वाभाविक ही तो है। इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद अत्यन्त अल्प समय में डॉ. आर. सुरेन्द्रन (आरसु) ने किया है। उनके प्रति मैं आभारी हूँ।

एस.के. पोट्टेकाक्ट्ट

अनुवादक की हैसियत से


श्री एस.के. पोट्टेकक्काट्ट (1913-1982) अखिल भारतीय ख्यातिप्राप्त मलयालम के वरिष्ठ गल्पकार हैं। विभिन्न साहित्यिक विधाओं में उनकी लगभग पचास कृतियाँ प्रकाशित हैं। सभी प्रमुख भारतीय और विश्वभाषाओं में उनकी कहानियाँ अनूदित हो गयी हैं। विश्व के कोने-कोने में उन्होंने भ्रमण किया है । मानवता के शुभ-श्याम पक्षों के वे कुशल चितेरे हैं।
श्री पोट्टेकाक्ट्ट के कुछ कहानी संकलन हिन्दी में प्रकाशित हो गये हैं। हिन्दी भाषियों को उनके कुछ उपन्यासों का रसास्वादन करने का भी सौभाग्य मिला है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की आदान-प्रदान योजना के अन्तर्गत ‘विशकन्यका’ (विषकन्या) का हिन्दी रूपांतर किया गया है। केन्द्रीय साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा पुरस्कृत ‘ओरू देशत्तिण्डे कथा’ (कथा एक प्रान्तर की) का हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध है।

उपन्यास की विधा में उनकी और एक लोकप्रिय कृति है-‘नादान प्रेमम्’। यह उपन्यास एक भोली-भाली ग्रामीण कन्या के समर्पित प्रेम, उसके आह और हाहाकार का दारुण दास्तान है। ग्रामांचल का प्रेम छल-कपट की दुर्भावनाओं से प्रदूषित नहीं है। समीक्षक प्रवर प्रो. के. एस. तरकन के अनुसार यह उपन्यास, परिवर्तित युग का ‘शाकुन्तल’ है।

श्री पोट्टेकाक्कट्ट ने इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद तैयार करने का सौभाग्य मुझे प्रदान किया। सुधी पाठक ही अनुवाद की सफलता या असफलता के पारखी होंगे। उपन्यास की आत्मा को अक्षुण्य बनाये रखने की विनम्र कोशिश मैंने की है। डॉ. इकबाल अहम्मद (कालिकट विश्वविद्यालय) तथा अमर उपन्यासकार रवीन्द्र कालिया ने पाण्डुलिपि पढ़कर कुछ मूल्यवान सुझाव दिये। ‘लोकभारती’ ने इसके प्रकाशन का बीडा उठाया। अनुवादक की हैसियत से मैं इन सबके प्रति शुक्रगुज़ार हूँ।
हिन्दी विभाग
कालिकट विश्वविद्यालय
डॉ. आरसु

[1]


कोष़िक्कोड के स्टार क्लब में रात के दस बजे एक शानदार भोजन का आयोजन हो रहा है। एक बड़ी मेज पर विदेशी शराब की बोतलें, मछली और मांस के व्यंजन से सजी थालियाँ पड़ी हैं। छुरी, कांटे, और चम्मच आदि चीज़ें रखी गयी हैं। पास ही दो दर्जन युवक शराब के नशे में चूर नाच रहे हैं। मिस्टर रवीन्द्रन ने एक शानदार दावत दी है और वहाँ उपस्थित लोग दावत की प्रशंसा कर रहे हैं। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मिस्टर रवीन्द्रन धन्यवाद देने के लिए खड़े हुए।
शराब के नशे में उस दीर्घकाय, हँसमुख और सुन्दर युवक ने कहा-‘‘प्रिय मित्रों ! इस छोटी-सी दावत से आप लोग प्रसन्न और सुन्तुष्ट हो गये हैं-यह जानकार मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मगर कल सुबह आप सब लोगों को एक नयी विस्मयजनक खबर सुनाऊँगा। अगर आप लोग उसके बारे में अन्दाज़ा नहीं लगा सकते तो कल सुबह तक कृपया इन्तज़ार करें।’’
शराब के नशे में चूर वे सभी लोग दो-दो के गुट में परस्पर फुसफुसाने लगे, ‘‘वह नयी खबर क्या होगी ? क्या वह क्लब को एक बड़ी रकम देंगे ?’’

‘‘नहीं, क्या रवि का विवाह होगा ?’’ अनेक लोग उनकी बात की व्याख्या करते हुए अन्दाज़ा लगाने लगे।
अगले दिन सुबह स्टार क्लब की मेज पर एक चिट्ठी दिखाई पड़ी क्लब के सदस्यों के नाम था वह पत्र। सदस्यों ने उसे खोलकर उत्सुकता से पढ़ना शुरू किया-
‘‘मित्रों, समाचार यह है कि दो महीनों के लिए मैं अज्ञातवास के लिये जा रहा हूँ। जब तक आपको यह चिट्ठी मिलेगी मैं कोष़िक्कोड नगर से चल चुका हूँगा। मेरा गुप्त निवास स्थान आप में से कोई ढूँढ़ सके तो उसको मेरी नयी मॉरिस कार पुरस्कार में मिलेगी। गुडबाई
रवीन्द्रन
यह खबर पढ़कर क्लब के सदस्य आश्चर्यचकित हो गये। लोग अनुमान लगा रहे थे कि मित्रों के साथ हर दिन मदिरा पीकर चक्कर काटने वाले उस लखपति का अज्ञातवास सुखप्रद होगा या नहीं ? साथ ही साथ हर व्यक्ति ने अपने मन में दृढ़ निश्चय कर लिया था कि मॉरिस कार किसी प्रकार प्राप्त करनी ही है।

[2]


दोपहर ढल गयी। कोष़िक्कोड शहर के पूर्वी भाग का एक गाँव है, उधर की एक मटमैली, तंग घुमावदार ऊबड़-खाबड़ सड़क से होकर एक टैक्सी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। सड़क के दोनों ओर धान के विशाल खेत हैं। कटाई के बाद खाली पड़े उन खेतों की मेड़ों पर इधर-उधर हरी घास उग आयी है। गायें पूँछ हिलाती हुई चर रही हैं। इधर-उधर झोंपड़ों में दुकानें लगी हैं। उधर से चावल आदि चीज़ें खरीदकर वापस जानेवाली फटे-पुराने कपड़े पहने गरीब ग्रामीँण औरतें सड़क से हटकर खड़ी हो गयी हैं। शराबियों के समान झूमती हुई बैलगाड़ियों ने भी उस कार को रास्ता दिया।
नारियल के वृक्षों से भरे-पूरे टीले, चट्टान से बिन्दी लगाये कठोर ऊसर पहाड़, खेत के बीच ठीक नाप-जोख न रखने वाली कुछ ज़मीनें-उधर कुछ झोंपड़ियाँ, जीर्ण-शीर्ण मन्दिर, पीपल के नीचे वाले टूटे-फूटे चबूतरे, मन्दिर के बगल में तालाब, आम के बाग, हरे घास के मैदान, साग-सब्जियों की क्यारियाँ-इस प्रकार के अनेक दृश्यों को पारकर वह कार इरुवष़ंञिप्पुषा और चेरुपुष़ा1 के संगम स्थान मुक्कमघाट पर जाकर रुकी।
एक अधेड़ ग्रामीण ने आगे आकर कार में बैठे व्यक्ति का स्वागत किया।
‘‘क्या सब कुछ ठीक कर रखा है ?’’ उस व्यक्ति ने पूछा।

‘‘रहने की जगह का इन्तज़ाम हो गया है, नौकर भी है’’-ग्रामीण ने जवाब दिया।
‘‘ठीक है, आवश्यक सामान मैं कार में लाया हूँ।’’
‘‘सारी चीजें अभी उधर ले जायेंगे।’’
उस ग्रामीण ने ज़ोर से पुकारा, ‘‘कुंञन्,कु....ऊ...ऊ,’’ क्षण भर में एक मोटा
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1.    दो खास नदियों के नाम-पुष़ा़ का शाब्दिक अर्थ नदी।
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आदमी उधर दौड़ता हुआ आया।
‘‘ये सारी चीज़ें लेकर मेरे खलिहान में रख देना।’’
फिर रवीन्द्रन की ओर मुड़कर कहा-‘‘ये सारी चीज़ें कुंञन ले आयेगा और हम उधर चलें।’’
‘‘अच्छा’’
रवीन्द्रन ने किराया देकर टैक्सीवाले को विदा किया।
रवीन्द्रन और वह ग्रमीण उस नदी-छोर से होकर चलने लगे। रास्ते में कपड़े धोती और स्नान करती औरतें भी दिखायी दीं। बच्चे नदी किनारे बालू के टीले बनाकर, गड्डे खोदकर और बाँध बनाकर खेल रहे थे। कुछ ग्रामीण बैलों को नहला रहे थे।
वे नदी के छोर से हटकर एक तंग गली में आये। फिर एक छोटे खेत में पहुँचे। उधर से बाँस की सीढ़ी से उतर कर आये।
उधर एक छोटा-सा खलिहान आया। उसके ऊपर नयी घास बिछायी गयी थी। दीवारें पुती हुई हैं, गोबर से आंगन की सफाई की गयी है-इस प्रकार वह एक मनोहर दृश्य है।

रवीन्द्रन को खलिहान और उसके आसपास की ज़मीन जो खचाखच केले, आम और कटहल वृक्षों से भरी है, रास आयी। चहार दीवारी पर आसमान को छूनेवाले बाँस के झुण्ड, सामने बहुत दूर तक विस्तृत खेत और उत्तर दिशा में छोटे-छोटे टीले हैं-एक ओर नदी बह रही है।
रवीन्द्रन और ग्रामीण खलिहान में बनाये हुए घर में घुसे। उसमें दो विशाल कमरे हैं। उसके सिवा एक ओर एक नया रसोईघर भी है।
रवीन्द्रन ने बिस्तर, आराम कुर्सी और पेटियों को रखने के स्थान की ओर इशारा किया और वह आंगन के आम के पेड़ के नीचे लेटकर आराम करने लगा।

खुले हुए खेतों की ओर से ठंडी-ठंडी हवा आने लगी। उस मंद समीर ने रवीन्द्र को सिर से एड़ी तक स्पर्श किया। देहात के उस प्रथम स्वागत ने रवीन्द्रन को बेसुध कर दिया। उसे लगा कि शहर के निरंतर शोर-शराबे से परिचित वे कान इधर की अगाध शांति में डूबे जा रहे हैं।
रवीन्द्रन कोष़िक्कोड का एक लखपति है। वह लकड़ी काटने की कंपनियाँ तथा बुनाई शालाएँ चलाता है और बड़े पैमाने पर लकड़ी व्यापारी है। उसके प्रासाद तुल्य घर, दो मोटर कार, निजी बैंक तथा अमीर सगे संबंधी हैं। इन सबके अतिरिक्त अविवाहित, उदार, उत्तम, व्यवहार वाले एक सुन्दर युवक का श्रेय भी। दो महीने तक एक शांत अज्ञातवास बिताने के लिये उसने मुक्कम प्रदेश के इस सूने छोर को चुना है।

[3]


मीनम् का महीना है। धूप फीकी होने लगी है। नदी छोर के बालू-तट की ओर एक तरुणी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसके हाथ में एक पोटली भी है।
गर्मी में सूखी वह नदी किसी-किसी स्थान पर पानी के सिर्फ एक नाले के समान दिखाई देती है। दोनों ओर सफेद बालू से भरे विशाल किनारे हैं। सिर्फ नदी के दोनों पार्श्वों के पेड़ समूह से रह-रहकर चहकने वाले चिड़ियों के चिरौंटे उस अपराह्य के सन्नाटे को तोड़ रहे हैं।
यद्यपि धूप शांत हो गयी थी, तो भी बालू की गर्मी शांत नहीं हुई थी। उस तरुणी ने नदी जल को चरण से छुआ तो देखा कि नदी का पानी गुनगुना है।
उसने धीरे से अपनी पोटली को नीचे रखा और अपने बालों को खोलकर हाथ से संवारने लगी। यद्यपि वे घुंघराले नहीं हैं फिर भी समृद्ध लम्बे केशों में एक असाधारण कोमलता और चमक दिखायी पड़ती है। उसने केशों को सिर के पीछे बाँध लिया।

मज़दूरी से उसके अंग थके लग रहे थे। उसने नदी के उस पार नज़र दौड़ाई। पेड़ के बीच से दूर पर एक खाली खेत दिखाई पड़ा। उसने पीली धूप में स्वप्नवत एक मृगतृष्णा के झिलमिलाकर ओझल होने का दृश्य भी देखा।
उसकी सुस्त आँखें फिर एक बार चारों ओर दौड़ी। प्रकृति-सौंदर्य के आस्वादन का उसे परिचय तक नहीं है। फिर भी प्रकृति के मनोहर शांतिपूर्ण दृश्य ने उसे अपनी ओर आकृष्ट कर लिया।
गले में घंटी लटकाये दो बैलों को पानी पिलाने के लिए कलंतन माप्पिला नदी में आया। शहर से चावल आदि चीज़ें लेकर वापस आने वाली एक नाव नदी के उस मोड़ को पारकर पूर्व की ओर गयी। नदी से एक मछली को चोंच में लेकर एक चिड़िया ऊपर से उड़ी। कुछ देर पहले उस ओर से गयी नाव पानी के अभाव में बालू में धंस गयी और उसे निकालने के लिए मल्लाह ने आवाज़ लगाई।

चिल्लाहाट सुनकर दस-पन्द्रह मिनट में पांच-छः फटेहाल ग्रामीण उधर आ पहुँचे। उन्होंने पानी में उतरकर नाव को निकालने की कोशिश की, पर नाव हिली तक नहीं। स्थिति यह हुई कि नाव बालू में डूब जाती।
‘‘अहा ! इक्कोरन आया।’’ सारे लोग एक स्वर में चिल्ला उठे।
एक मोटा-नाटा आदमी। केवल घुटने का एक तौलिया पहनकर वह आदमी नदी से होकर नाव के समीप आया।
इक्कोरन को देखने पर सारे लोगों का उत्साह बढ़ गया। इक्कोरन ने नाव के अग्रभाग को दोनों हाथों से पकड़कर कंधे को झुकाया : ‘‘अरे, निकालो’’ कहा तो सबों ने एक साथ पूर्ण शक्ति से ज़ोर लगाया। नाव आगे बढ़ी नदी की ओर सिर पटक कर खड़ी हो गयी। फिर एक बार धक्का दिया तो नाव पूरे तौर पर पानी में आ गयी।

सब लोग सहर्ष चिल्ला उठे। मल्लाह नाव में चढ़कर खेने लगा। लोगों ने पानी में मुख और पैर धोये और एक-एक कर तंग गली से होकर चले गये। इक्कोरन गुनगुनाते हुए नदी तट पर होकर पश्चिम की ओर चला।
लड़की को उधर चिन्तामग्न खड़े देखकर इक्कोरन ने ऊँचे स्वर में पूछा :
‘‘क्या है मालू, आसमान पर गंधर्व है ?’’
निद्रा के स्वप्न से जागने की भाँति वह चौंक गयी, उसने इक्कोरन के चेहरे की ओर देखा। फिर नदी के दूसरे किनारे की ओर संकेत करके कहा, ‘‘मैं काञिरप्परंपुवालों1 के खलिहान की ओर देख रही हूँ। कटाई-पिटाई सब खत्म हो गयी है न ? तो अब उस खलिहान को क्यों ठीक-ठाक किया है ?’’
‘‘मैं बताऊँगा। सुना है कि शहर से कोई उधर ठहरने को आ रहा है।’’
मालू को इक्कोरन की बातों पर विश्वास नहीं आया, ‘‘शहर से लोग क्यों इधर आकर ठहरेंगे ?’’
‘‘आराम के लिए।’’
‘‘आराम के लिए ? यहाँ कौन-सा आराम है ?’’
‘‘तेरे समान सुन्दर लड़कियों को देखना भी एक प्रकार का आनन्द ही है न ?
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1.    एक जगह का नाम
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‘‘नहीं, अगर भद्दी बातें कहोगे तो--’’ वह नाराज हो गयी।
इक्कोरन ठहाका मारकर हँस पड़ा। वह एक लोकगीत गाते हुए पुनः पश्चिम की ओर चला गया।
मालू ने अपनी पोटली खोली, उससे एक धोती लेकर पानी में भिगो दी, साबुन लगाकर पाट पर पटकने लगी। फिर एक छोटा तौलिया लेकर अपनी पहनी हुई धोती और चोली उतारकर पानी में भिगो दी। सिर्फ एक छोटा तौलिया पहना और एक से माथे को आधा ढककर सिर पर बाँध दिया और कपड़े धोने लगी।

उसे यह बात नहीं मालूम थी कि शहर से आया आदमी इन सारे दृश्यों को बाँस के झुरमुट से देख रहा है।
थोड़ी देर के बाद रवि उस पानी के नाले को पारकर इस छोर पर आया। सभ्य, अच्छे कपड़े पहने एक शहरी युवक को आमने-सामने देखकर मालू परेशान हुई। एक भीगा वस्त्र लेकर उसने उरोजों को छिपाया और मुख मोड़कर खड़ी हो गयी।
रवि ने उसे आँख-भर देखा, ‘‘यौवन के नव परिमल को बिखरने वाला एक ग्रामीण कुसुम-’’ रवि ने मन ही मन कहा।
प्रथम दृष्टि में ही रवि के लम्बे कद, सुन्दर ढंग से संवार कर रखे घुंघुराले बाल तथा निर्निमेष दृष्टि ने उस युवती के हृदय में अमिट चित्र खींच लिया था। कुछ देर बाद रवि उस रास्ते से होकर पश्चिम की ओर चला गया। मुड़कर न देखने के लिए उस युवती ने कोशिश की, किन्तु वह नहीं सम्भल सकी। एक अज्ञात प्रेरणा से उसने मुड़कर देखा। उसका दुर्भाग्य ही कह सकते हैं, रवि भी उसे औऱ देखने के लिए मुड़ा था, तभी उसने भी उसे देख लिया। उनकी आँखें चार हो गयीं। यद्यपि वह लज्जावश काँपकर पीछे मुड़कर खड़ी हो गयी, तथापि एक क्षण दृष्टि ने उसे विवश कर दिया।

[4]


पर्वत श्रेणियाँ, हरीतिमा से आच्छादित मैदान, झरनों, द्वारा थपथपाने वाली तराइयाँ, काट-छांटकर साफ किये साग-सब्जियों के खेत, टीले, बाँस के जंगल, ताड़ के बाग, कालीमिर्च के बाग-मुक्कम इन सारे प्रकृति दृश्यों से भरा एक प्रदेश है-कोष़िक्कोड शहर से लगभग पचीस मील पूर्व में बसा छोटा गाँव।
इस कहानी की घटना घटते समय शहरीयता की हल्की तरंग भी इस छोटे गाँव में डूब जानेवाली थी। इधर के पूर्व भाग में घने जंगल हैं और वहाँ जंगली हाथी, बाघ, शाई बारहसिंघा, भील एक साथ रहते हैं। बाँस और घास-फूस से भरे रास्तों से होकर ही उधर जा सकते हैं। सिर्फ शिकार करने और पेड़ काटने के लिए विरले लोग उस पार जाया करते हैं। एक सड़क शहर से यहाँ तक आती है। शहरीयता के हृदय-स्पन्दन से सिर्फ एक बस इस ओर आती जाती है। यहाँ के मेहनतकश लोग अरुई, जमीकन्द आदि कन्द मूलों की कृषि और शिकार से जीवन-यापन करते हैं। स्वस्थ सुगठित तथा अल्प वस्त्रों में रहने को विवश इधर की ग्रामीण सुन्दरियाँ  भी खेतीबारी में निपुण हैं।

हर रविवार को यहाँ बाज़ार आयोजित होता है। दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तएँ एक स्थान पर ही मिल जाती हैं। नाव और बैलगाड़ी से कंधे तथा सिर पर ढो़कर पिछले दिन रात को ही सारी चीजें वहाँ आ जाती हैं। बड़े-बूढ़े का कहना है कि नमक से लेकर कपूर तक, हाँडी से लेकर अन्नानास तक, ‘माँ-बाप’ को छोड़कर सारी चीज़ें उधर मिल जाती हैं। हालांकि उन्हें किसी भी चीज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती, तो भी नमक, मिट्टी का तेल, तम्बाकू और सूखी मछली खरीदने के लिए उन्हें बाज़ार जाना ही पड़ता है। बाज़ार का दिन मुक्कम के निवासियों के लिए एक महोत्सव है। यह अनेक परिचित और अपरिचित लोगों की मुलाकात का शुभ अवसर भी है।

इसी दिन शहर की आकर्षक वस्तुएँ यहाँ आ जाती हैं। अतः यह उनके लिए पुण्य दिन है और अपनी वस्तुएँ बेचकर गाँठ भर रुपये तथा टोकरी भर चीज़ें लेकर वे अपने घर लौट जाते हैं। यह उनके लिए छुट्टी का दिन होता है। नारियल-छिलके के करछल से लेकर जापानी-केशफूल तक उधर बिक्री के लिये आ जाता है। उन सारी चीज़ों को उन्हें जाँचना है, ज़रूरत न होने पर भी सौदेबाजी करनी है।

लगभग ग्यारह बजे बाज़ार गर्म हो जाता है। क्रय-विक्रय के लिये लोग खचाखच भर जाते हैं। कोई भी स्टॉल खाली नहीं होता। भीड़-भाड़ बढ़ जाती है। कोलाहल, भीड़-भाड़ बेरोक-टोक व्यापारियों की पुकार और सिक्कों की झनझनाहट- ये सब तेज़ हो जाती हैं। सब कहीं गम्भीर चेहरे ही दिखायी पड़ते हैं। एक बुजुर्ग माप्पिला एक रुपये का सिक्का पत्थर पर पटक कर उसके खरेपन का परीक्षण करता है। एक दूकान के सामने खड़े होकर एक लड़का अपनी माँ से काफी पिलाने के लिए जिद्द करता है। एक पेड़ के नीचे जंगली लोगों का एक झुण्ड गोलाकार बैठा है। उन्होंने कुछ रंगीन पत्थर खरीद लिया है। वे उसकी शोभा परखते हैं
एक टोकरी लेकर मालू भी बाज़ार में आयी। उसने एक लाल छींट की चोली तथा काली झालर वाली एक धोती पहन रखी है। केशों को सुन्दर ढंग से संवार कर पीछे बाँध रखा है।

सामान खरीदने के लिए मामा के दिये हुए एक रुपये के अतिरिक्त स्वयं रस्सी बटकर कमायी अठन्नी भी उसके पास है।
नमक, मिर्च आदि वस्तुओं के अतिरिक्त अपने लिए एकाध चीज़ें खरीदने के उद्देश्य से वह बाज़ार की ओर रवाना हुई। किन्तु बाज़ार में पहुँचने पर उसने देखा कि इधर कई अन्य वस्तुयें हैं जिनके बारे में उसने नहीं सोचा था और उन चीज़ों को खरीदने की इच्छा उसके मन में उत्पन्न हो गयी।
वह बाज़ार में घूम फिर कर देखने लगी। वह चूड़ियों की दूकान के पास पहुँची और उसकी मनपसंद चूड़ियाँ वहाँ पर उसे दिखायी पड़ीं। उसने उधर से जड़ाऊ अंगूठियों को उठाकर देखा-परखा और फिर वहीं रख दिया। फिर एक कपड़े की दुकान पर जाकर वहाँ ठीक ढंग से रखे रंगीन कपड़ों को एक टक देखा। अन्त में हरे रंग का छपा हुआ जापानी कपड़े का दाम पूछा। गज का आठ आना-सुना तो वह ठगी सी रह गयी। निराश होकर मुड़ी तो सामने एक चेहरा दिखाई पड़ा। उसे देखकर वह आश्चर्यचकित हो गयी, क्योंकि वही आदमी वहाँ पर मौजूद था जिसने उसे बाँसों के झुरमुट के पीछे से देखा था।
अकारण आन्तरिक कंपन से वह एक-दूसरे मार्ग की ओर मुड़ी। अनेक जगहों पर घूम-फिरकर वह आखिर एक तंबाकू की दूकान पर खड़ी हो गयी।

भुना हुआ कन्द मुँह में ठूँसकर उसके साथ नारियल का टुकड़ा चबाता हुआ एक मोटा माप्पिला उस ओर आया और उसने तम्बाकू की दूकान से थोड़ा-सा तम्बाकू लेकर सूँघा और उसे छींक आ गयी। उसके मुँह से अर्ध चर्वित भोज्य पदार्थ इस प्रकार बाहर आ गया जैसे तोप से बारूद। व्यापारी के मुख पर उसकी छींटा पड़ा। इस दृश्य को देखकर मालू एकाएक हँस पड़ी, जैसे कोई बाँध टूट जाये। पीछे से और भी ज़ोर से हँसी सुनकर उसने मुड़कर देखा तो वही आदमी !
वह आदमी अपनी हँसी को रोक नहीं पा रहा था और उधर मालू भी मुँह छिपाकर हँसती रही।
वह बाज़ार से लौट रही थी तो एक लड़का उसके समीप दौड़कर आया और कागज़ का एक पैकेट उसकी ओर बढ़ायी।
‘‘यह किसने दिया ?’’ उसने सन्देह से उस लड़के से पूछा। वह बोला, ‘‘लम्बी रेशमी कमीज़ पहने एक मूँछवाले ने...’’
इसे लेना है ? वह दुविधा में पड़ गयी तो उस लड़के ने पैकेट उसकी टोकरी में डाल दिया और वह स्वयं नौ दो ग्यारह हो गया।
वह एक निर्जन स्थान पर गयी और उसने पैकेट खोलकर देखा। उसने जिस कपड़े़ का दाम पूछा था, तीन-चार गज का वही कपड़ा़ और एक सुगंधित साबुन-पुलिन्दे में यही चीज़ें थीं। उसे आनन्द से भी बढ़कर संभ्रम हुआ।
 


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