अनबीता व्यतीत - कमलेश्वर Anbita Vyatit - Hindi book by - Kamleshwar
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अनबीता व्यतीत

कमलेश्वर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2303
आईएसबीएन :00000

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इसमें 1947 के बाद सामन्ती युग का पतन,पर्यावरण पक्षियों से प्रेम तथा सहज मानवीय कोमल सम्बन्धों का वर्णन किया गया है...

Anbita Vyatit

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘देखिए मैं आपकी पत्नी जरूर हूँ लेकिन मैं एक औरत भी हूँ...जिस दुनियां में आप रहते हैं, वह भी सही है और जिस दुनियाँ में मैं रह सकती हूँ वह भी सही है...मेरा शरीर संतृप्त होता रहे और मेरा मन तृप्त होता रहे, यह मुझे आप के साथ बहुत दूर तक नहीं ले जा सकता...मैं जानती हूँ, पंछियों के कैमीकल से युक्त भूसा भरे शरीरों के करोड़ों रूपये के बिजनेस को छोड़ना या बन्द करना आपके लिए मुमकिन नहीं होगा...लेकिन मेरे लिए यह मुमकिन होगा कि मैं मुर्दो की इस दुनिया से बाहर चली जाऊँ।’’ (इसी उपन्यास से)

1947 के बाद सामन्ती युग का पतन, पर्यावरण, पक्षियों से प्रेम तथा सहज मानवीय कोमल सम्बन्धों की यह कहानी बरबस ही आपको अपनी ओर आकर्षित कर लेगी। ‘‘कुँवर जी, एक बात आप अच्छी तरह समझ लीजिए।’’ समीरा ने बहुत ही सीधे-सपाट लहजे में कहा, ‘‘यह तो ठीक है कि आपके साथ मेरा विवाह हुआ है और इस सच्चाई से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि मैं आप के कुँवर विक्रम की माँ हूँ। लेकिन कुँवर जी, संसार के जितने भी रिश्ते-नाते हैं, भले ही वह रिश्तेदारी हो, दोस्ती हो या भाईचारा, पति-पत्नी के संबंध हों या माता-पिता और सन्तान के...हर संबंध, हर रिश्ते और नाते का एक आधार होता है, एक-दूसरे की भावनाओं की अनकही लय...जैसी लहरों में होती है। अपनी-अपनी तरह से उठने-गिरने और साथ जुड़ पाने का रिश्ता...उसी पानी को आप अलग कर ले तो उस बन्द पानी में लहरे नहीं उठतीं, मुझे लगता है, मैं उसी बन्द पानी की तरह रह गई हूँ...बंद पानी की अपनी कोई जिंदगी या मर्जी नहीं होती...’’

अनबीता व्यतीत

दो शब्द

करुणा, दया और सह-अस्तित्व का भारतीय सिद्धांत सदियों पुराना है। यह कोई आज का राजनीतिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता ने इसे जीव और जीवन, प्रकृति और परा-प्रकृति के लिए सदियों पहले स्वीकार किया था। जीवन और वनस्पति के, वनस्पति और जीव-जन्तुओं के आपसी संतुलन को खोजा था।
दुःख की जगह करुणा, दर्द की जगह दया और सह-अस्तित्व के लिए जीवन को स्वीकारा था। हमारी सभ्यता ने किसी भी तरह की मृत्यु का विरोध किया था।

इस सर्वमागंलिक निष्ठा ने बौद्धकालीन और जैनकालीन अहिंसा को जन्म दिया था।
लेकिन आधुनिकीकरण के दौर में प्रकृति और पर्यावरण को शोषण का जरिया बनाया गया...प्रकृति पर विजय को ज्यादा सराहा गया और इस विजय में मानवता की कितनी बड़ी पराजय हुई-इसे अब दशकों बाद पहचाना गया है।
इसी प्रकृति में तरह-तरह के जीव हैं-इनमें से सबसे मासूम और सुन्दर हैं वे पंछी जो हमारी वन्य-संस्कृति की सम्पदा भी हैं। अपने मखमली पंखों को लहराते, अपनी मधुर आवाजों से संगीत पैदा करते, ये पंछी बरसों-बरस मन की शांति को जीवन देते हैं...

और इन्हीं पंछियों में आ मिलते हैं, वे परदेसी पंछी जो सर्दियों में सायबेरिया और उत्तरी गोलार्द्ध से उड़कर हर वर्ष भारत आते हैं। यहाँ बसेरा करते हैं ये सुन्दर और मासूम पंछी लगभग 11,000 वर्षों से भारत आते हैं-हजारों मील का सफर तय करते हैं, हिमालय को पार करते हैं और सर्दियों में भारत को अपना घर बना लेते हैं।
लेकिन इन मासूम पंछियों के पीछे भी मृत्यु पड़ी रहती है...जगह-जगह इन्हें पकड़ा या मारा जाता है और इनका व्यापार किया जाता है।

इसी यथार्थ को उजागर करती है और इसी सत्य को उद्धाटित करती है, वह नीली झील, जहाँ वे परदेशी पंछी जीवन पाने के लिए आते हैं-बसेरा करते हैं....
परन्तु शिकारी बन्दूक की एक गोली छूटती है और सारा वातावरण कोलाहल से भर जाता है...इसी दारुण मृत्यु परम्परा के अंधे अभियान से मुक्ति का एक आख्यान है यह उपन्यास !
116, ब्लॉक-5,
इरोज गार्डन, सूरज कुण्ड रोड,
08.06.2004
नई दिल्ली-110044

कमलेश्वर

(1)

दूर-दूर तक फैली अरावली पर्वतमाला की गोद में एक ऊँची समतल-सपाट पहाड़ी पर बने सुमेरगढ़ की दुर्गनुमा कोठी पर रात तेजी से उतरती चली आ रही थी। सुमेरगढ़ की इस प्राचीन दुर्गनुमा कोठी में लाल-पत्थरों तथा संगमरमर से बने महलों और विशाल सूने प्रकोष्ठों और गलियारों में अंधेरा भरता जा रहा था।

सुमेरगढ़ के विशाल दुर्ग में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। सुमेरगढ़ राज्य भारत देश में विलीन हो चुका था। इसलिए अब दुर्ग की वह आन-बान, शान और चहल-पहल नहीं रही थी। भारत में विलय हो जाने के बाद ही दुर्ग के सैनिकों और पहरेदारों को ही नहीं, दर्जनों दास-दासियों को भी छुट्टी दे दी गई थी। नाम मात्र की जागीरों से गुजारा होता न देख राज-परिवार के लोग सुमेरगढ़ छोड़कर अन्य नगरों में चले गये थे और उनके तलवार उठाने वाले हाथों ने तरह-तरह के व्यवसाय करने आरम्भ कर दिए थे। तलवार छोड़कर तराजू उठा लेने वाली कहावत यथार्थ में परिवर्तित हो गई थे।
नानी माँ महारानी राजलक्ष्मी अपने महल की सबसे ऊपरी छत पर इस छोर से उस छोर तक बड़ी बेचैनी से चक्कर लगा रही थीं। उनके सुन्दर और तेजस्वी चेहरे पर पीड़ा की गहरी रेखाएँ स्पष्ट उभरी दिखाई दे रही थीं। बड़ी-बड़ी आँखों में भय तथा विषाद की छाया झाँक रही थी। आज उनका मन बहुत ही अशान्त था। रह-रहकर वह इस तरह चौंक पड़ती थीं जैसे कोई देखा हुआ भयानक दृश्य उनकी आँखों के आगे एक बार फिर साकार हो उठा हो।

सचमुच बहुत भयानक दृश्य था वह। विशाल दीवान खाने के संगमरमर के सफेद फर्श पर दूर-दूर तक खून फैला हुआ था। महल के जोहड़ में कई आकार-प्रकार के छोटे-बड़े पक्षियों के मृत शरीर पड़े थे। एक कोने में एक बड़ी-सी मादा हिरणी की रक्त रंजित लाश पड़ी थी। उसका मुँह दीवान खाने की छत की ओर उठा हुआ था। उसकी बेजान आँखें शून्य से टिकी हुई थीं। उन आँखों की पथरीली पुतलियों पर उदास इंतजार झलक रहा था। एक अजीब-सा दर्द चमक रहा था उन बेनूर आँखों में।
नानी माँ महारानी राजलक्ष्मी देर तक हिरणी की उन पथराई आँखों को नहीं दे सकीं, क्योंकि उनकी आँखों से उमड़ते आँसुओं की चादर ने पुतलियों को ढँक दिया था। वह जैसे देखने की शक्ति खो बैठी थीं। उनका सिर बुरी तरह चकराने लगा था।
अपने चकराते सिर को थाम कर वह कुछ देर दीवान खाने की एक दीवार के साथ पड़ी संगमरमर की उस चौकी पर बैठ गईं, जिस पर मखमल का गद्दा बिछा था।
‘‘हे भगवान ! जब तूने इन जीव-जन्तुओं को जीवन दिया था तो इन्हें इतनी शक्ति भी देता कि ये बेचारे अपने जीवन की रक्षा कर पाते।...तेरी दी धरोहर को उन निर्दयी हाथों से बचा पाते जो तूने इन्हें दी थी। विचित्र है तेरी माया,...जीवन-मृत्यु का यह दुःखदायी संयोग...काश इन्सान इसे समझ पाता...।’’
दर्द की तेज लहरों से बेचैन होकर उन्होंने आँखें मूँद लीं। खून में डूबी पशु-पक्षियों की लाशें देख पाने का साहस उनमें नहीं रह गया था। अपने पिता के राजमहल में ऐसे वीभत्स दृश्य उनकी आँखों के आगे से कभी नहीं गुजरे थे।
एक लम्बी सांस छोड़ती हुई वह उठीं और अपने शयनकक्ष की ओर चल पड़ीं।

 अमावस की अँधियारी और काजल-सी काली रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। अरावली पर्वत पर श्रेणियों की ऊँची समतल पहाड़ियों पर बने सदियों पुराने सुमेरगढ़ दुर्ग के सिंहद्वार पर लटका विशाल घड़ियाल काफी देर पहले रात के बारह बजने की सूचना दे चुका था। सुमेरगढ़ दुर्ग जितना प्राचीन और विशाल था, सिंहद्वार पर लटका घड़ियाल भी उतना ही प्राचीन और विशाल था। उसकी आवाज कई मिनट बीत जाने के बाद भी अभी तक दुर्ग की प्राचीरों को लाँघ कर अरावली पर्वत के चारों ओर खड़ी पहाड़ियों से टकरा कर गूंज रही थी। सुमेरगढ़ दुर्ग में बने हुए बेशुमार राजमहलों की इमारतों की छतों और दीवारों से टकरा कर आती हुई अनुगूंज अभी तक महारानी राजलक्ष्मी के कानों से टकरा रही थी।
घड़ियाल की आवाज ने महारानी नानी माँ की सोने की कोशिश एक बार फिर विफल कर दी थी। तंग आकर वह उठकर अपने बिस्तर पर बैठ गईं। उन्हें जैसे विश्वास हो गया था कि आज रात उन्दें नींद नहीं आयेगी, क्योंकि सोने की कोशिश में जब भी वे आँखें मूँदतीं, शाम का वीभत्स दृश्य उनकी आँखों की सतह पर साकार हो उठता था। वे बार-बार यही सोचने लगती थीं कि आखिर इन्सान इतना निर्दयी, इतना बेरहम और इतना जालिम कैसे बन जाता है ?
सोचते-सोचते उनकी नजर अपनी नातिन समीरा के बिस्तर की ओर घूम गई। समीरा अभी तक सोयी नहीं थी। वह आँखें मूँदें बिस्तर पर करवटें बदल रही थी।
‘‘क्या बात है समीरा, तुम अभी तक सोयी नहीं !’’
रानी माँ राजलक्ष्मी ने समीरा को बिस्तर पर करवटें बदलते देखकर पूछा और अपने बिस्तर से उठकर समीरा के बिस्तर पर आईं।
‘‘आज नींद नहीं आएगी नानी माँ !’’ समीरा ने धीरे से उत्तर दिया और फिर करवट बदल ली।
महारानी राजलक्ष्मी समीरा को इस तरह करवटें बदलते देख बेचैन हो उठीं। उन्होंने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया और उसे सहलाती हुई बोलीं, ‘‘तुम्हारी तबियत तो ठीक है न बेटी कहीं सिर-विर में दर्द तो नहीं है ?’’
‘‘जी नहीं !’’
‘‘फिर नींद क्यों नहीं आ रही ?’’ नानी माँ ने चिन्ता भरी आवाज में पूछा और एक पल रुककर बोलीं, ‘‘सारे दिन दिव्या के साथ धमा-चौकड़ी मचाती रहती हो। पता नहीं दिन भर में तुम दोनों नीली झील के कितने चक्कर लगा डालती हो ? पढ़ने के समय के अलावा मैंने तुम्हें आराम से बैठे कभी नहीं देखा...।’’
‘‘आजकल नीली झील पर परदेसी पंछी आ रहे हैं नानी माँ, उन्हीं को देखने चली जाती हूँ।’’ समीरा ने कहा और उठकर बैठ गई।
‘‘अभी तो सर्दियाँ शुरू भी नहीं हुई है लेकिन परदेसी पंछियों ने आना शुरू कर दिया है। रंग-बिरंगे, भाँति-भाँति के पंछी...कुछ तो नानी माँ चुनमुन चिड़िया से भी छोटे और कुछ सारस से भी बड़े।’’
‘‘अच्छा...!’’

‘‘कल आप हमारे साथ नीली झील पर चलिए न नानी माँ...। ऐसे रंग-बिरंगे और अनोखे पंछी आए हैं इस बार कि उन्हें देखकर आप खुशी से झूम उठेंगी। मेरा तो जी चाहता है नीली झील के किसी घाट की छतरी में जाकर रहने लगूँ और रात-दिन उन परदेसी पंछियों को देखती रहूँ...उनमें से हर एक की आवाज अलग-अलग है। जब वे एक साथ चहचहाने लगते हैं तो ऐसा लगता है जैसे आर्केस्ट्रा बज रहा हो ! जैसे अनगिनत कलाकार मिल कर एक साथ अलग-अलग साज-समवेत स्वर में बजा रहे हों।’’
‘‘तू भी मेरी तरह ही पगली निकली समीरा।’’ नानी माँ ने उसके बालों पर हाथ फेर कर उसे प्यार कर लिया, ‘‘तू इतना पसन्द करती है इन पंछियों को...तेरी माँ को तो पशु-पक्षियों के नाम से जैसे चिढ़ थी। मैं रंग-बिरंगे पंछी बहेलियों से माँगकर सोने के पिंजरों में रखती, लेकिन विजया को जब भी मौका मिलता, मेरी और दास-दासियों की नजरें बचाकर वह पिंजरों के दरवाजे खोल देती और पंछियों को उड़ा देती थी...मैं नाराज होती तो कहती-माँ साब, चिड़ियाँ पिंजरों में नहीं पेड़ों और आकाश में उड़ती हुई ही अच्छी लगती हैं...।’’

‘‘तब तो माँ साब चिड़ियों से नफरत नहीं प्यार करती हैं’’, समीरा ने अपनी नानी के सामने अपनी माँ का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘नानी माँ उसका मतलब है कि हम तीनों को ही पशु-पक्षियों से बेहद प्यार है।’’
‘‘विजया की वह बात कि ‘पंछी आकाश और पेड़ों पर ही अच्छे लगते हैं’, मुझे बहुत अच्छी लगी थी। इसलिए मैंने काकातुआ का जो जोड़ा पाला है उसके लिए पिंजरे नहीं, सोने के झूले बनवाए हैं। उन्हें उड़ने, चलने-फिरने की पूरी-पूरी आजादी दी है, फिर भी वे दोनों राजमहल से बाहर नहीं जाते। उड़ते हुए इस कमरे से उस कमरे में चक्कर काटते रहते हैं। काकतुआ मुझे अपने...।’’
‘‘नानी माँ, काकातुआ पुराण न सुनाकर आप मुझे कोई मजेदार कहानी सुनाइए ! जब से दाई माँ अपने गाँव गई हैं, कहानी सुने बिना बोर हो गई हूँ।’’
नानी माँ राजलक्ष्मी कुछ देर खामोश बैठी रहीं। फिर खंखार कर गला साफ करती हुई बोलीं, ‘‘बचपन में मैंने अपनी दाई माँ से एक कहानी सुना थी। शायद मेरी दाई माँ को बस एक यही कहानी याद थी, वह इसी को बार-बार सुना देती थीं और सच पूछो समीरा तो यह कहानी मुझे भी बहुत अच्छी लगती थी और इसीलिए मुझे अभी तक याद है वह कहानी...।’’
‘‘तो फिर वही कहानी सुनाइए न नानी माँ’’, समीरा ने अपनी नानी के दोनों हाथ थाम कर आग्रह किया।
‘‘अच्छी बात है’’, महारानी ने कहा और कुछ देर रुककर कहानी सुनाने लगीं...सुनो समीरा बहुत दिन की बात है। एक राज्य में एक राजकुमार रहता था। एक दिन राजकुमार अपने साथियों के साथ शिकार खेलने जंगल में गया। शिकार की तलाश करते हुए वह अपने साथियों से बिछुड़ गया और एक बहुत ही घने जंगल में जा पहुँचा।

बहुत देर हो गई थी, रात का अँधियारा चारों ओर फैल गया था। जंगल बहुत ही घना था। घोड़े पर सवार राजकुमार का सिर और बदन पेड़ों की डालियों से टकरा जाते थे। कंटीले पेड़ों की डालियों से उसके चेहरे और बदन पर जहाँ-तहाँ खरोंचें आ गई थीं। उनसे बचने के लिए वह घोड़े से उतर पड़ा और उसकी लगाम पकड़कर जिस ओर खुली पगडंडी दिखाई दी, धीरे-धीरे बड़ी सावधानी से बढ़ने लगा।
अभी उसे पगडंडी पर चलते हुए थोड़ी देर ही हुई थी कि अचानक चारों-ओर छाये अँधेरे में उसे हल्का-हल्का सा उजाला फैलता दिखाई दिया और फिर कुछ देर बाद ही सामने का जंगल रोशनी से जगमगा उठा। उसके साथ ही लोगों की आवाजों का कोलाहल भी उसके कानों से टकरा उठा।
वह तेजी से उस रोशनी की ओर चल दिया।
यह रोशनी एक विशाल प्राचीर की तरह दिखती मजबूत दीवार की मुडेरों पर जलते हुए दीपकों की रोशनी थी। शायद वह किसी विशाल नगर के परकोटे की दीवार थी। जैसे-जैसे राजकुमार दीपकों से जगमगाती दीवार की ओर बढ़ता गया, सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगा। उस दीवार के पीछे से आती हुई आवाजें भी साफ-साफ सुनाई देने लगीं।
परकोटे में एक विशाल फाटक था, जिसके बीच से एक चौड़ी सड़क अन्दर की ओर जा रही थी।
उस सड़क के दोनों ओर स्त्रियाँ, पुरुषों और बच्चों की भीड़ लगी हुई थी।

दीपावली का त्यौहार न होने पर भी दीपावली और लोगों की भारी भीड़ को देखकर राजकुमार ने एक आदमी से इसका कारण पूछा तो वह हैरानी से उसकी ओर देखते हुए बोला, ‘‘लगता है तुम इस राज्य के रहने वाले नहीं हो ! अगर होते तो तुम्हें जरूर मालूम होता कि आज हमारी राजकुमारी जी पूरे सोलह वर्ष की हो गई हैं। आज वह पहली बार अपने विशेष महल से बाहर निकली हैं और भवानी माँ के मन्दिर में पूजा करने जा रही हैं। उन्हीं के दर्शन के लिए नगर निवासी और राज्य के लोग इकट्ठे हुए हैं। राजकुमारी के जन्म के सोलह वर्ष के बाद आज नगर और राज्य के निवासी ही नहीं, महाराज और महारानी भी पहली-पहली बार उन्हें देखेंगे।’’
‘‘यानी सोलह वर्ष तक राजकुमारी को किसी ने नहीं देखा ?’’ राजकुमार ने हैरान होकर पूछा।’’
‘‘जी हाँ !’’ एक दूसरा व्यक्ति जल्दी से बोल उठा। ‘‘राजकुमारी की कुण्डली बनाने वाले महापंडित और राज्य के अन्य सभी ज्योतिषियों ने बताया था कि राजकुमारी के जीवन पर अनिष्ट और महाकाल की छाया है...इससे यह राज्य भी नष्ट हो सकता है, अत:, आवश्यक है कि जब तक राजकुमारी की उम्र सोलह वर्ष की न हो जाए, उनके माता-पिता और परिवार के लोग उन्हें न देखें। उन्होंने बहुत सोच-विचार के बाद केवल धाय माँ और कुछ दास-दासियों के नाम ही बताए थे कि वे ही सोलह वर्ष तक राजकुमारी की सेवा देखभाल करें और यह कि उन्हें भी राजकुमारी की सेवा और देखभाल करें और यह कि उन्हें भी राजकुमारी की ही तरह अपने परिवार तथा दुनिया के दूसरे लोगों से दूर एकान्त महल में ही पूरे सोलह वर्ष बिताने पड़ेंगे।’’

‘‘इसका मतलब है कि राजकुमारी के साथ उन दास-दासियों को भी अपनी जिन्दगी के सोलह साल कैद में बिताने पड़े ?...कमाल है।’’ राजकुमार की हैरानी और बढ़ गई।
‘‘अरे भाई, उन्होंने मुफ्त में यह सोलह साल की कैद थोड़े ही काटी थी !’’
तीसरे आदमी ने कहा, ‘‘महाराज ने उनके परिवार वालों को मालामाल कर दिया था।...खैर आपकी बातों से पता चल गया है कि आप परदेसी हैं। राजकुमारी का रथ आ रहा है। आप एक ओर हट कर खड़े हो जाइए।’’
‘‘क्या राजकुमारी सचमुच बहुत सुन्दर है ?’’ राजकुमार ने उत्सुकता से पूछा।
‘‘सुना तो यही है कि राजकुमारी बहुत सुन्दर है। हम सब भी आज ही तो उन्हें देखेंगे।’’
‘‘सब यही अनुमान लगाते हैं कि जैसे वह निश्चय ही स्वर्ग की कोई अप्सरा होगी जिसे किसी ऋषि के शाप के कारण धरती पर जन्म लेना पड़ा होगा।’’
‘‘अगर राजकुमारी अप्सरा जैसी सुन्दर है तो मैं उसे जरूर देखूँगा। देखूँगा ही नहीं बल्कि उसे प्राप्त भी करूँगा।’’ राजकुमार के शब्दों में दृढ़ता थी।
‘‘ऐसी डींग हाँकने से पहले सोच लो परदेसी, कहीं खुद तुम्हें जान के लाले न पड़ जाएँ ?...राजकुमारी के अंगरक्षक तुम्हें पकड़कर किसी काल-कोठरी में ठूँस देंगे।’’ एक युवक ने चेतावनी दी।
‘‘मैं इसकी चिंता नहीं करता...’’ राजकुमार ने कहा और अपने घोड़े को एड़ देकर उस ओर चल दिया, जिधर से राजकुमारी का रथ आने वाला था।

लोगों ने उसे आगाह भी किया कि जब तक राजकुमारी को महाराज और महारानी नहीं देख लेते, तब तक किसी को देखने की आज्ञा नहीं है, पर राजकुमार का घोड़ा तो हवा के पंख लगाकर उड़ चुका था।
राजकुमारी का रथ चारों ओर से सशस्त्र अश्वारोहियों और पैदल सैनिकों से घिरा हुआ आ रहा था। राजकुमार को तेजी से रथ की ओर आते देख उन्होंने अपने तलवारें निकाल लीं और उसे रोकने के लिए उसकी ओर झपटे। लेकिन राजकुमार असाधारण योद्धा था। उसने तलवार निकाली और राजकुमारी के अंगरक्षकों को चीरता हुआ उसके रथ के पास पहुँच गया।
रथ पर पर्दे पड़े हुए थे। राजकुमार ने सैनिकों के खून से भीगी तलवार की नोक से पर्दे फाड़ दिए।
सच कहा था नगर निवासियों ने ! राजकुमार की आँखें आश्चर्य से फैली रह गईं। इतना रूप-सौन्दर्य उसने केवल सुना और पुस्तकों में पढ़ा भर था। आज रूप-सौन्दर्य की सजीव और प्रतिमा को इतने निकट से देख पाने का सौभाग्य पाकर जैसे वह पागल हो उठा।

परदेसी राजकुमार की अभद्रता और राजकुमारी के दर्जनों अंगरक्षकों की पराजय का समाचार जैसे पंख लगाकर सारे नगर में फैलता हुआ महाराज के कानों तक पहुँच गया। परदेसी राजकुमार की अभद्रता पर जहाँ उन्हें क्रोध आया, वहीं अपने इतने सशस्त्र सैनिकों की पराजय का समाचार सुनकर महाराज ठहाका मारकर हँस पड़े।
दरबार में बैठे सभी लोग आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगे। उन्हें तो आशा थी कि अपने सैनिकों की पराजय की खबर पाते ही महाराज क्रोध से फट पड़ेंगे और राजकुमारी के सोलहवें जन्मदिन पर नगर की सड़कें खून से लाल हो जायेंगी।
‘‘महाराज !’’ प्रधानमंत्री ने अपने आश्चर्य को दबाते हुए कुछ कहना चाहा।
‘‘मंत्री जी जाइए, और उस परदेसी राजकुमार को सम्मान के साथ यहाँ ले आइए।’’ महाराज ने आदेश दिया। ‘‘हमें अपनी बेटी के लिए ऐसे ही वर की इच्छा थी, जो इतने सशस्त्र सैनिकों को चीरता हुआ आगे बढ़ सकता हो !...वह भले ही कोई भी क्यों न हो ?..हमने निश्चय कर लिया है कि हम इसी के साथ अपनी पुत्री का विवाह करेंगे।’’



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