अवधी लोक कथाएँ - जगदीश पीयूष Avadhi Lok Kathayein - Hindi book by - Jagdish Piyush
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अवधी लोक कथाएँ

जगदीश पीयूष

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :108
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2290
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है अवधी लोक कथाएँ...

Avadhi Lok Kathayein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

के टकटोरै छान छपरिया एक ठू रही सास पतोह। पतोहिया बड़ी चंचल रही त अपने यार का कहिस कि राति के बारह बजे कोठा पै आई जाया औ छान्हि पै खुटखुटाइ दिह्या तो हम आई जाब। ऊ जल्दी आइ गै औ छान्हि खुटखुटाइ दिहिसा। सासु अब ही जागतै रही। त ऊ बहू बोली।
के टकटोहै छान छपरिया के खुटकावे छानि।
सासु तो सोई जागति बाटी लोटि जाहु बिरथा मानि।
औ सास से कही कि सासू जी, एकर अरथ बताइ दया हमकी कहनी के। वहर त दोहा से सनेस दै दिहिस यार का ऊ चलागै। अब सासु बोली कि बहू अपनी कहनी का अर्थ सुन-
ऐसा खेला बहुतै खेलेन जब ले रही जवानी।
अपने यार क राहि बतावै, हमसे बूझि कहानी।
बाभन अगिन मुखी
एक ठू नाऊ औ एक ठू पण्डित कहुँ तिलक चढ़ावै जात रहे।
नउवा के तमाखू कै तलब लागि !
चारौ ओर ताकिस कहुं आगि नाय।
लावै कैसे जाय ? तिलकै कै सर सामान लगे रहा औ पंडित महाराज सोवत रहे।
अचानक नउआ कै याद आय कि ऊ सुने रहा कि बाभन अगिन मुखि होय।
भ कण्डा बीन कै लाय। मीजि कै पंडित के मुंह मा ठूसि दिहिस। पंडित घबराय कै उठि बैठे कि ई का करत हये।
अरे महाराज। हम सुना रहा कि बाभन अगिन मुखी होये। त तनी सुलगाय दया हमका चिलम पीयैक है।

अपनी बात


लोक कथाओं के प्रकाशन का कार्य इधर काफी देखने को मिला है। पाकेट बुक्स के प्रकाशकों ने भिन्न-भिन्न नामों से ऐसी तमाम पुस्तकें बाजार में उतारी हैं, जिन पर आम पाठकों का ध्यान गया भी।

हमारा उद्देश्य भिन्न है हम इन कथाओं की मूल भाषा संरक्षित करना चाहते हैं, क्योंकि इन्हीं कथाओं में बोलियों का गद्य साहित्य सुरक्षित है। और यही लोक गद्य आज की हिन्दी कहानी का भी प्राणतत्व है।

अवधी लोक कथाएं यहाँ अपने मूल रूप में ही प्रस्तुत हैं। अवधी में ऐसी हजारों कथाएं हैं, जिनमें संसार का ज्ञान विज्ञान भरा पड़ा है। ये कथाएं लोग भूलते जा रहे हैं, बच्चे दादी-नानी से कहानियाँ सुनने के बजाय दूरदर्शन पर तरह-तरह के दिल-फरेब कार्यक्रम देखने में व्यस्त हैं, जिससे हमारे इस श्रुति साहित्य के अस्तित्व पर ही संकट है।

डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित की प्रेरणा-प्रोत्साहन एवं सहयोग के हम आभारी हैं और उन्हीं के परामर्श से इन कथाओं को पहले ‘बोली-बानी’ में और अब यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके संग्रह में योगदान के लिए आदरणीय डॉ. विद्या बिन्दु सिंह, आद्या प्रसाद अन्मत्त, भोलानाथ अधीर, अंजनी कुमार शेष, अनीता ठाकुर, सुश्री सुशीला मिश्रा, भाई राम बहादुर मिश्र, सुशील सिद्धार्थ, कुसुम द्विवेदी व पं. कमल नयन पाण्डेय के आभारी हैं। डॉ. बाबूराम सक्सेना जी ने सर्वप्रथम अपने शोध ग्रन्ध ‘अवधी का विकास’ में इन कथाओं का नमूना प्रस्तुत किया था। हम शीघ्र ही अवधी के श्रमगीतों, लोक गाथाओं का भी संग्रह सम्पादित, प्रकाशित करना चाहते हैं, इस हेतु लोक मनीषियों का सहयोग अपेक्षित है।
जगदीश पीयूष

अवध अंचल की लोक कथाओं के प्रमुख प्रकार

प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित

लोक कथा लोक साहित्य की रोचक और उपयोगी विधा है। लोक कथाओं में समाप्त लोक जीवन, लोक तत्व या यों कहें कि लोक वार्ता के सभी अंग अपनी सम्पूर्ण छवि के साथ समविष्ट रहते हैं। मौखिक रूप में परम्परा से चली आ रही इन लोक कथाओं का संसार बड़ा विस्तृत और व्यापक है। समस्त लोकानुभूतियाँ और सृष्टि का सम्पूर्ण व्यापार लोक कथाओं की परिधि में सिमट गया है। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के शब्दों में ‘मानव के सुख-दुख, प्रीति-श्रृंगार, वीर भाव और बैर इन सबने खाद बनकर लोक कथाओं को पुष्ट किया है। रहन-सहन, रीतिरिवाज, धार्मिक विश्वास, पूजा उपासना इन सबसे कहानी का ठाठ बनता और बदलता है।’ लोक कथाओं द्वारा सम्पूर्ण मानव जीवन आच्छादित है। विषय और भावानुसार लगभग सारे विश्व की कहानियां एक सी ही हैं, तथापि देश विशेष, क्षेत्र विशेष का परिवेश, वहाँ की लोक चेतना के प्रभाव से सर्वथा सम्पृक्त रहता है। बैसवारे की लोक कथाओं के समृद्ध संसार में पर्याप्त विविधता है। उनकी विविधताओं को लक्ष्य कर सुविधा की दृष्टि से अवधी लोक कथाओं के निम्नांकित प्रकार किये जा सकते हैं :

1. धार्मिक कथायें : इनके अन्तर्गत व्रतपूजा एवं लोकानुष्ठानिक कथायें आती हैं।
2. पुराण एवं इतिहास सम्बन्धी कथायें : स्थानीय वीर पुरुषों एवं स्त्रियों की कथाओं की परिगणना इसी के अन्तर्गत की जा सकती है।
3. लोकानुरंजन की कथायें : इन कथाओं का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। इसके अन्तर्गत राजा रानी की कथायें, सौतेली माँ की कथायें, परी कथा, तिलिस्म एवं जादूगरी की कथायें, प्रेम अथवा श्रृंगार की कथायें, हास्य कथायें, भाग्य एवं प्रारब्ध की कथायें, सती कथायें आदि सम्मिलित हैं।
4. मानवेतर जाति की नाग कथायें
5. पशु पक्षियों की कथायें
6. शिक्षा एवं नीति सम्बन्धी कथायें
7. बाल कथायें 8. प्रतीक कथायें

अवध लोकांचल में कही जाने वाली इन कथाओं का सामान्य परिचय अनपेक्षित न होगा। सर्वप्रथम विचारणीय हैं-धार्मिक कथायें।

धार्मिक कथायें :

धार्मिक कथाओं की पृष्ठभूमि में जनजीवन की धार्मिक आस्था विद्यमान रहती है। इन कथाओं में देवी देवता का समावेश अनिवार्य है। इनके अभाव में ये मात्र लोकानुरंजन की ही कथा कहीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि देवी देवताओं की उपस्थिति इन कथाओं में कथानक रुढ़ि के रूप में आई हो, प्रत्युत देवी देवता के वृत्त से ये कथायें संगुम्फित होती हैं।

भारत धर्मप्राण देश है। यहाँ वर्ष के बारहों महीने में व्रत-पर्व तथा उनसे सम्बद्ध देवी देवताओं की पूजा होती रहती है। कुछ पूजा अथवा धार्मिक कृत्य किसी विशेष मनोवांछा की पूर्ति के लिये अनुष्ठान रूप में की जाती है। उन अवसरों पर लोक जीवन इनसे सम्बद्ध देवी देवताओं की कथा, उनके महात्म्य के रूप में कहता और सुनता है। अवध लोकांचल भी इसका अपवाद नहीं है। यहां व्रत, पूजा तथा लोकानुष्ठानिक कथायें धार्मिक कथाओं के रूप में कही जाती हैं। इनका विवरण यहाँ प्रस्तुत है।

व्रत एवं पूजा सम्बन्धी कथायें : अवध लोक जीवन जिस धार्मिक विश्वास से अभिप्रेरित होकर व्रत एवं पूजा सम्बन्धी कथायें कहता है, उनकी परिगणना वर्ष में प्रतिमास के अनुसार इस प्रकार है :

चैत्र मास में- जगन्नाथ स्वामी की कथा। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में सोमवार के दिन अवध लोकांचल बड़ी निष्ठा से जगन्नाथ स्वामी की पूजा करता है, उनके नाम घी मटकी भरता और कथा कहता है। यहां दो कथायें जगन्नाथ स्वामी के महत्व पर कही जाती हैं-1.दुरबिले ब्राह्मण, 2. सोमनाथ की तलैया।

ज्येष्ठ मास में- वटसावित्री पर्व पर वट वृक्ष का पूजन और सत्यवान सावित्री की कथा कही जाती है।

सावन मास में- न्यूरी नावे की पूजा और कथा इसी नाम से कही जाती है।

भादौं मास में- बहुला चौथ और हलषष्ठी की पूजा एवं कथा। बहुरा चौथ को कपिला गऊ की कथा तथा हरछठ की छः कथायें यहां प्रचलित हैं-1. राजा का सगरा, 2. हसन तरकिया, 3. सियाई माता, 4. निरही की पांति, 5. नारि भंइसिया, 6. कपिला गऊ। इसी मास (भादौं) में ही हरतालिका व्रत की कथा प्रसिद्ध है।

कार्तिक मास में- करवा चौथ की चार कथायें यहां प्रसिद्ध हैं। अहोई आठे में अहोई माता की कथा। दीपावली पर्व में दूसरे दिन प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा, चिरैया गौर तथा इसके अगले दिन भैया दूज की कथा इस अंचल में इस नाम से चर्चित हैं : सताना बहिन, जमुना और जमराज, साले-बहनोई, जमराज की कथा आदि। इसी मास (कार्तिक) में आवंली अष्टमी और अक्षय नौमी की पूजा में स्त्रियां आंवला वृक्ष की पूजा करती तथा कथा कहती हैं। (आंवला पूजा की कथा)।

माघ मास की संकट चौथ जो अवध में संकट का पर्व कहलाता है, में चार कथायें प्रचलित हैं। ये चारों कथायें सकट माता से सम्बद्ध हैं। उन्हीं के नाम से अभिहित हैं।

फाल्गुन मास में होलिका दहन पर होलिका और प्रहलाद की कथा कही जाती है। परन्तु आधुनिकता के व्यामोह ने इनका रंग अवश्य धूमिल कर दिया है। यहां पर भी स्मरणीय है कि किसी भी मास में अमावस्या सोमवार के दिन पड़ने पर स्त्रियां पीपल वृक्ष की फेरी देती हैं और सोना धोबिन की कथा कहती है। यह व्रत-पूजा उनकी सोमवारी अमावस्या के नामसे जानी जाती है।

उपर्युक्त धार्मिक कथाओं में से मात्र एक-एक कथा प्रतिनिधि स्वरूप प्रत्येक व्रत एवं पूजा की संक्षिप्त रूप में यहां प्रस्तुत है, जिनमें जनपदीय सौन्दर्य आबद्ध है।

कथा जगन्नाथ स्वामी की

दुरबिले ब्राह्मण : एक दुर्बल ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी और एक पुत्र था। निर्धनता के कारण उनका परिवार भर पेट भोजन भी न पाते थे। मांग जांच कर अपना काम चलाते थे। दिन भर मागै तो दिया भर पावैं, रात भर मांगैं तौ दिया भर पावैं। ब्राह्मणी उपलब्ध आटे से रोटी बनाकर तरे रख दे। खोलैं तो तीनैं रहि जांय। वह अपने पुत्र और पुरखा को खिला दे, स्वयं संतोष करके रह जांय। किसी तरह पुत्र का विवाह हुआ, बहू घर आई। उसके आगे भी यही हाल चलता रहा। गरीबी का यह रूप देखकर वह बहुत दुखी हुई। उसने अपनी सास से कहा, ‘का अम्मा जगन्नाथन की पूजा, उनकी रोटियां कोचिया घर मां नहीं होत, उनके नाम की मटकी नहीं भरी जात।’ उनकी सास ने कहा, ‘बहुरिया घर मा ना जानी कउन सनीचर का बास है, रोटी बनाओ तो तीनैं रहि जांय, बरक्कतै नहीं ना। पूजा कउन करी।’ बहू ने सुझाव दिया, अम्मा जाओ मांग जांच के ही सही जगन्नाथ स्वामी का नाम लेकर उनकी पूजा घर में करो। और पिताजी से कहो जगन्नाथ स्वामी की यात्रा कर आवें। सास ने विधि पूछी, बहू ने कहा एक सोमवार को उनके नाम की ‘रोटिया कोचिया’ करे और दूसरे सोमवार को यात्रा पर जाये। सास ने ऐसा ही किया। जंगल से कुसुम का फूल (बर्रे का फूल) ले आई, अंबिया और गेहूं-जौ की बाली मांग कर लाई किसी तरह उनके नाम की मटकी भरी। उनके पति दुर्बल ब्राह्मण जगन्नाथ स्वामी की यात्रा को तैयार हुये। कहने लगे, रास्ते में अपनी लड़कियों से मिलकर कह दें, जगन्नाथ जी जा रहे हैं जो कुछ सन्देश कहना हो कह दो और जगन्नाथ के भोज का निमन्त्रण दे दें।

पहले वह बड़ी लड़की के यहां गये। वह घर नहीं थी। गरीबी के कारण (मजूरी) मजदूरी करके पेट पालती थी। लड़के बाहर खेल रहे थे। ब्राह्मण ने उन बच्चों से कहा, जाओ अपनी मां को बुला लाओ कह दो नाना आये हैं। बच्चे बड़े खुश हुए, वह दौड़े गये अपनी अम्मा को बुला लाये। वह प्रसन्न हो घर आई। जो कुछ गहना था ‘गिरों’ रखकर सीधा सामान लाई (खाने का सामान राशनादि) और बड़े प्रेम से अपने पिता के भोजन का प्रबन्ध किया। कहा, ‘‘बप्पा या खाय का बना रखा है खाय लिह्यो हम काम पर जा रहिन हैं, लउटि के आउब।’ और चली गयी। उस ब्राह्मण ने भोजन किया, बच्चों को कराया और कुछ भौंरी कठौती के नीचे मूँद कर रख दिया। बच्चों से कहा इन्हें अपनी अम्मा को खिला देना हम जगन्नाथ यात्रा पर जा रहे हैं। तुम सब भोज में आना। वह अपनी यात्रा पर चले गये। इधर वह लड़की आई। लड़कों ने उससे नाना का समाचार कहा, किन्तु लड़के फिर भोजन का आग्रह करने लगे। उसने कठौती खोली तो वह सब भौरियां सोने की हो गईं थीं। वह बहुत खुश हुई। उनके घर लक्ष्मी आई।

ब्राह्मण आगे अपनी छोटी लड़की के यहां गये। वहां भी उन्होंने वैसा ही कहा। किन्तु छोटी लड़की ने उनका सम्मान नहीं किया, और कुवाच्य भी कहे। खैर ब्राह्मण संतोष कर आगे बढ़ गये और जाते समय जगन्नाथ के भोज का न्यौता दिया। रास्ते में नदी नाले मिले जो भारी वर्षा में भी मिलते न थे। उन्होंने पूछा, ब्राह्मण देवता कहां जा रहे हो ? उन्होंने कहा ‘जगन्नाथ’। कहा अरे हमारौ सन्देश कहि दिह्या, भरी बरखौ मां हमार संगम नहीं होत, हम भरित है उमड़ाइत है तबौ अलगै रहित है।’ ब्राह्मण ने कहा, अच्छा। आगे चले तो बाल का बंधा हाथी मिला। उसने कहा, विप्र हमारा भी संदेश कह देना। इतना भारी शरीर और बंधा बाल से है। आगे चले तो एक जने थे जिनके पाटा चिपका था। उन्होंने भी अपना संदेश कहा। और आगे चले तो एक आम का पेड़ मिला, वह फलता फूलता पर पकने के समय कीड़े लग जाते। उसने कहा, महाराज कहां जा रहे हो। विप्र ने अपना गन्तव्य बताया, कहा हमारा भी संदेश कह देना। विप्र ने कहा अच्छा। सभी संदेश ले वह जगन्नाथ जी पहुंचे। वहां जगन्नाथ स्वामी की माया से विप्र को उनका द्वार ही न मिले, आगे ‘भार’ जल रहा था। वह बहुत दुखी हुए, रास्ते में एक ब्राह्मण मिला पूछा बाबा कहां जा रहे हो। कहा, हम तो जगन्नाथ स्वामी के दर्शन करने आये हैं। परन्तु हमें राह नहीं मिल रही है। विप्र रूप में आये देवता ने कहा, यहां तो ‘भार’ जल रहा है। मंदिर कहां है। इतने में दुर्बल ब्राह्मण ने कहा, ‘हम तो अब दर्शन करिन के जाब’ और उसी ‘भार’ में गिर पड़ा। उनको स्वयं जगन्नाथ स्वामी ने आगे बढ़कर उठा लिया। कहने लगे कि यही जगन्नाथ पुरी है हम जगन्नाथ स्वामी हैं। ब्राह्मण उनके चरणों में गिर पड़े, अपने अपराधों की क्षमा मांगी, अपना सारा दुख कह सुनाया। जगन्नाथ स्वामी ने उनके पांच बेंत मार दिये और कहा, अच्छा अब जाओ। वह दुखी मन लौट पड़े, सोचने लगे, हमको तो जगन्नाथ स्वामी ने कुछ भी नहीं दिया। लौटने लगे तो वह गूंगे, बहरे और अन्धे हो गये। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था। फिर वही जगन्नाथ स्वामी ब्राह्मण देवता के रूप में आगे खड़े हो गये। बोले तुम कहां जा रहे हो। दुर्बल ब्राह्मण ने कहा, हम तो जगन्नाथपुरी गये थे, लौटने में हमारी यह दशा हो गयी। ब्राह्मण के रुप में जगन्नाथ स्वामी ने कहा, तुम कुछ भूल तो नहीं रहे हो। दुर्बल ब्राह्मण ने कहा, अरे हमसे बड़ी भूल हो गई, बहुतों ने हमसे अपने संदेश कहे थे। विप्र देवता ने कहा, चलो फिर उनके संदेश कहो। जगन्नाथ स्वामी की कृपा से उन्हें सब कुछ दिखने लगा, वहां पहुंच कर उन्होंने पहले अपना ही हाल कहा फिर सभी की दशा और संदेश सुनाया। जगन्नाथ स्वामी ने कहा, हमने तुम्हारे पांच बेंत मार दिये हैं, उसी से सब अपराध क्षमा हो गये, और जिनके संदेश तुम लाये हो उनके पांच-पांच बेंत मार देना और ये अक्षत छिड़क देना, अपराध क्षमा हो जायेंगे। और सबका कारण समझाने लगे।

पूर्व जनम की ये नदी-नाले देवरानी-जिठानी हैं। इन्होंने परस्पर प्रेम नहीं किया, एक दूसरे का बायन नहीं लौटाया। इसीलिए इस जनम में नदी नाले बनकर अलग-अलग हैं। बाल का बंधा हाथी : ये फूहड़ स्त्रियां हैं जो बाल झाड़ते समय कंघा साफ करके नहीं रखती थीं। इसलिये इस दिशा में हैं। बोझ से लदा आदमी : पूर्व जनम का अभिमानी। इसने अपने अहंकार में दूसरे को कुछ नहीं समझा। पाटा चिपका आदमी : इसने बड़ों का सम्मान नहीं किया। बड़ों के आने पर बैठा रहता था। इसलिये इनका यह हाल है। आम का पेड़ : पूर्व जनम के ये सम्पन्न लोग कभी दूसरों को छाया नहीं दिया। अपनी सम्पत्ति का दान नहीं किया।

अब दुर्बल ब्राह्मण वहां से लौटे। सभी के पांच-पांच बेंट मार दिये, अक्षत छिड़क दिये। कह दिया तुम्हारे अब सब अपराध क्षमा। अब वह अपनी बड़ी लड़की के यहां आये, उनको जगन्नाथ स्वामी का प्रसाद दिया और न्यौता दिया। बड़ी लड़की को धनधान्य से सम्पन्न देखकर बड़े खुश हुये। छोटी लड़की के यहां जाकर यही व्यवहार किया। परन्तु उसे अपनी गृहस्थी में परेशान लाकर दुखी हो गये। लौट कर घर आये, ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई। जगन्नाथ स्वामी की कृपा से उनके बुरे दिन मिट गये। उन्होंने धूम से जगन्नाथ स्वामी की पूजा और भोज किया। दोनों लड़कियां आयीं। बड़ी लड़की के सामने जो कुछ परोसा जाय वह अच्छा अच्छा रहे। छोटी लड़की के पत्तल में सब राख मिट्टी हो जाय। छोटी लड़की बहुत कुछ चिंतित हुई। उसने कहा, हमारे पिता हमारे साथ दुर्भाव करते हैं। ब्राह्मण बहुत दुखी हुये। उन्होंने लड़की को समझाया पर वह न मानी। विदा का समय आया। दोनों का समान मान सम्मान हुआ, परन्तु छोटी लड़की को जो सामग्री विदा के समय दी गई। वह राख मिट्टी हो गई। इस पर वह फिर बुरा भला कहने लगी। हमारे पिता हमारे साथ कपट व्यवहार करते हैं। ब्राह्मण को बहुत बुरा लगा। वह दुखी हो जगन्नाथ स्वामी से प्रार्थना की, भगवन ! इनके भी अपराध क्षमा करो। उनके पांच बेंत मारे और अक्षत छिड़क दिये। वह सुखी हो अपने घर गई। ब्राह्मण अपने घर में सुखपूर्वक रहने लगे। ‘जैसे उनके दिन लौटे भरे पुरे हुए वैसे सब के हों।’ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की प्रतिध्वनि !

वट-सावित्री कथा

यह एक पौराणिक आख्यान है, जिसमें सावित्री ने अपनी अखण्ड साधना से अपना अखण्ड सौभाग्य प्राप्त किया था।
न्यूरी नावों की कथा : न्यूरी नावों का व्रत पुत्रवती मातायें करती हैं। दीवाल पर इसका चित्र आलेखित करती हैं और पूजोपरांत न्यूरी नावों की कथा कही सुनी जाती है, जिसका संक्षिप्त रूप इस प्रकार है :

एक ब्राह्मणी थी। अपने पुत्र को नहला-धुलाकर सुलाकर पानी भरने गई। वह कुंये पर पानी भर रही थी। नेवला बार-बार उनके आगे आवे और फिर उनके घर को चलने लगे उस नेवला के मुंह में खून लगा हुआ था। वह बार-बार उसी प्रकार चक्कर काट रहा था। यह देखकर ब्राह्मणी को क्रोध आ गया। उन्होंने जल भरा घड़ा उसी नेवले पर पटक दिया। नेवला मर गया। जब वह घर आईं तो उन्होंने देखा कि बालक खाट पर सो रहा है। खाट के नीचे एक सर्प कटा पड़ा है। यह देखकर ब्राह्मणी बहुत दुखी हुईं। वस्तुस्थिति को वह समझ कर पश्चाताप करने लगी। नेवले ने सर्प को काट कर उस बच्चे की रक्षा की थी। वह रक्त नेवले के मुंह में लगा था।

रात को सोते समय उसी स्त्री को स्वप्न हुआ, नेवले ने स्वप्न दिया कि आज से पुत्रवती मातायें हमारा व्रत रखें, पूजा करें। (नेवले में जीवमह की परिकल्पना और विश्वास पुष्ट हुआ। न्यूरी नेवले का ही तद्भव है। नावैं से अभिप्राय नौमी तिथि से है। नेवले में देवत्व की प्रतिष्ठा की गई है।)
(कष्णपक्ष) को पुत्रवती मातायें मंगल कामना से भरकर यह व्रत करती और कथा कहती हैं।

एक कपिला बगुला गऊ थी, वह पहाड़ों पर रहती थी। नदी का ठंडा जल पीती थी, हरी दूब खाती थी और तंदुरुत थी। बगुला गऊ खेतों, मेड़ों में घूमा करे। वह बड़ी दुबली थी। एक दिन कपिला गऊ को बगुला गऊ मिली। उन्होंने कहा, तुम तो बहुत दुबली हो। चलो हमारे साथ पहाड़ पर, वहां हरी दूब खाओ, नदी का ठंडा पानी पियो और सुख से रहो। बगुला गऊ उनके साथ पहाड़ पर चली गई। कुछ ही दिनों में वहां के वातावरण में वह भी स्वस्थ हो गई। एक दिन बगुला गऊ नदी किनारे पानी पी रही थी। दूसरी तट पर बाघ खड़ा पानी पी रहा था। बगुला गाय की लार बहकर उस तट पर पहुंची। बाध के मुंह में लार लगी, उसे बड़ी मीठी जान पड़ी। सोचने लगा, जब इसकी लार इतनी मीठी है तो इसका मांस कितना मीठा होगा। यह सोचकर उसने गर्जना की, हे बगुला हम तुमको खायेंगे खड़ी रहो। बहुला गाय ने प्रार्थना की, हमारे छः बच्चे खूंटे में बंधे हैं, वह भूखे प्यासे हैं हम उन्हें दूध पिलाकर आयें तब तुम हमें खा लेना। बाघ को विश्वास न हुआ। बगुला ने वचन दिया। वह कांपती डरती अपने बछड़ों के पास आई। बछड़ों ने पूछा, आज क्या बात है। मां तुम क्यों कांप रही हो। गाय ने कहा, कुछ नहीं तुम दूध पी लो। बच्चों ने जिद की। बताओ तभी हम दूध पियेंगे। उन्होंने बताया और उन्हें समझाया, ‘द्याखौ तुम कुहू के खेतन म्याड़न पर न जायो, अपैं, खूंटा रह्यो।’ उन बच्चों ने कहा, मां हम भी तुम्हारे साथ जायेंगे। और वह आगे-आगे ‘कोढ़ात, गेरांव टुरावत वही नदी पर पहुंचे जहां बाघ रहै।’ बाघ उन्हें देखकर गरजे, मन में बड़े खुश थे। गाय तो बहुत जनों से आई थी। आज भर पेट भोजन मिलेगा। इतने में सारे बछड़े आये, आगे आकर कहने लगे ‘मामा मामा पांय छुई’। बाघ कहने लगा, अरे हम तो तुम सबका खाय का दउड़ेन रहै, तुम हमही का छलि लिहेउ। अच्छा चलौ तुम सब जने अपैं बायें पांव के अंगूठा से हमका यहीं मां (नदी) ठेलि दियो हम तर ताई। हम मामा तुम भइने।’ उन्होंने वैसा ही किया, बगुला गाय बच गई।

‘जइसे उनके दिन बहुरे वैसे सबके बहुरैं।’ कथा के अंत में यह स्वस्ति वाचन कह दिया जाता है।

भादौं कृष्ण पक्ष छठ को सम्पन्न होने वाला पर्व हरछठ (हल षष्ठी) की कथा : राजा का सगरा

एक राजा थे, उन्होंने सागर खुदवाया, घाट बनवाये, परन्तु उसमें पानी ही नहीं आया। इससे राजा चिंतित हो गये, क्या किया जाय। गांव के पुरोहित को बुलाकर उपाय पूछा, किस प्रकार सागर में पानी भरे। पंडित ने विचार कर कहा, राजा उपाय तो बड़ा कठिन है, जिससे सगरा भर सकता है। राजा ने कहा, बताओ। पंडित ने कहा, राजा जो तुम अपने बड़े लड़के के लड़की की बलि दे दो तो जल सगरा मा भर जाय। सुनकर राजा और चिंतित हो गये। ‘भला कउन महतारी अइसी होई जो अपैं लरिका का बलि देई।’ राजा विचार करने लगे। सोच में पड़े हुये थे। यह देखकर पंडित ने कहा, राजा बात तो बड़ी कठिन है पर उपाय तो निकालना ही पड़ेगा। हे राजन यदि तुम अपनी बहू को यह कहकर मायके भेज दो कि तुम्हारी मां की हालत बहुत खराब है-‘उनका होब जाब हुइ रहा है’ जाओ जल्दी देख आओ। राजा ने ऐसा ही किया। सुनकर बहू दुखी हुई कि आज हरछठ का दिन यह कौन परेशानी आ गई। रोती-पीटती वह अपनी मां को देखने दौड़ गई। मायके पहुंची, उनकी मां ने उसे इस तरह व्याकुल देखा तो चौंक गई, कहने लगी, ‘अरे हमरे का भा हम तौ ठीक हन। आजु हलछठ का दिन, ख्यातन की मेंड लरिकन की महतारी का ना नांघै का चही, न ख्यात मंझावै का चही। तुम भला रोवती पीटत ख्यात मंझावत कइसे आजु चली आइउ। जरूर कउनो छलु है।’ उनकी पुत्री ने कहा, अम्मा हमसे तो कहा गा ‘तुम्हार होब जाब हुइ रहा’ हम तुमका द्याखै सुनै आयेन।’ बहू की मां ने कहा, बिटिया हम तो सुना है तुम्हरे ससुर सगरा बनवाइन है वहिमा पानी नहीं आवत, कउनो का बलि दीन्ह जाई तो पानी आई। बिटिया तुम्हरेन साथे घात कीन्ह गा है तुम जल्दी लउटो।’

बहू दिन भर से हरछठ व्रत थी। वह रोती पीटती हरछठ मां की मनौती करती भागी चली आई। रास्ते में उसने देखा जिस सगरा को उनके ससुर ने बनवाया था वह जल से भरा लहरें ले रहा है। पुरइन पात लहरा रहे, वहीं एक बालक खेल रहा है। वह उसी सगरा की ओर दौड़ती हुई गई देखा तो यह तो उन्हीं का पुत्र था। उन्होंने उसे उठा लिया, चूमने लगी। हरछठ माता को मनाने लगी। उन्हीं की कृपा से आज उनका पुत्र बचा था। वह घर आई, घर का दरवाजा बन्द था। द्वार खुलवाया और कहने लगी,‘आजु तो सब जने हमरे लरिका का बलि चढ़ाय दीन्हेउ, हमका बहाने से मइके पठै दिह्यो। मुला आजु हमरे सत से औ हरछठ माता की दया से हमार गोदी फिर हरी भै। हमार लरिका तो वही सगरा मां खेलत रहा।’ सास ससुर यह देख सुनकर बहुत खुश हुये। बहू के पैरों में गिर पड़े और कहने लगे, आज तुम्हारी गोदी का बालक और हमारे कुल का दिया जगा। हरछठ माता ने जैसे हमारे दिन लौटाये वैसे ही सब का मंगल करें।


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