झंझा भवन - एमिली ब्रॉण्टे Jhanjha Bhawan - Hindi book by - Emily Bronte
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झंझा भवन

एमिली ब्रॉण्टे

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :320
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2182
आईएसबीएन :81-260-0647-1

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एमिली ब्रॉण्टे लिखित कालजयी उपन्यास वुदरिंग हाइट्स का हिन्दी अनुवाद....

Jhanjha Bhawan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

1847 में प्रकाशित एमिली ब्रॉण्टे का एकमात्र उपन्यास, जिसका कथा-विन्यास, चरित्र-संयोजन, स्थापत्य और भाषिक वैविध्य यॉर्कशायर ‘लोकेल’ का ऐसा सटीक और सघन बिम्ब प्रस्तुत करता है कि हीथक्लिफ़ कैथी के जटिल स्नेह-बंध के ठोस भौतिक और गहरे अर्थ में आधिभौतिक आयाम पाठक के मन में आजीवन गूँजते रहते हैं। प्रमा (इंसटिंक्ट) को नैतिक और सामाजिक आयोजनों के ऊपर प्रतिष्ठित करने के शुद्ध रूमानी दर्शन और ऊहापोह-भरे क्लिष्ट कथानक के बावजूद यह उपन्यास मेलोड्रैमेटिक नहीं बनता : क्लासिक भाषिक विनियोग और भिन्न कथावाचकों के आयोजन तथा मुख्य एवं गौण पात्रों द्वारा तरह-तरह के दृष्टिकोणों के सूक्ष्म संयोजन की विशिष्ट तकनीक के कारण। यह अंग्रेजी की एक ऐसी कालजयी औपन्यासिक कृति है, जिसे सॉमरसेट मॉम ने विश्व के दस सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में एक माना था।

प्रस्तुत उपन्यास झंझा भवन एमिली ब्रॉण्टे लिखित कालजयी उपन्यास वुदरिंग हाइट्स का हिन्दी अनुवाद है।
अस्तर पर छपे मूर्तिकला के प्रतिरूप में राजा शुद्धोदन के दरबार का वह दृश्य, जिसमें तीन भविष्यवक्ता भगवान बुद्ध की माँ-रानी माया के स्वप्न की व्याख्या कर रहे हैं, इसे नीचे बैठा लिपिक लिपिबद्ध कर रहा है। भारत में लेखन-कला का सम्भवतः सबसे प्राचीन और चित्रलिखिति अभिलेख।

1


मैं अपने मकानमालिक के यहाँ की यात्रा से अभी-अभी लौटा हूँ—वह मेरा एकाकी पड़ोसी है जिससे मेरी शान्ति सन्दिग्ध हो सकती है। यह है एक सुन्दर देहात। पूरे इंग्लैण्ड में, समाज की हलचल से इस क़दर दूर, कोई और परिवेश मैं ढूँढ़ लेता, ऐसा मुझे नहीं लगता। आदमी से भरपूर नफरत करने वालों का स्वर्ग : निर्जनता को आपस में बाँट लेने वाला उपयुक्त जोड़ा-मैं और मि. हीथक्लिफ़। कमाल का आदमी ! उसने शायद ही कल्पना की होगी कि उसकी ओर मेरा हृदय किस तरह उमड़ रहा था—ख़ासकर तब से जब से मैंने उसकी काली आँखों को भौंहों के नीचे सन्देह से सिमटते देखा और अधिकार-सजग संकल्प से उसकी अँगुलियाँ जैकेट के भीतर दूर से दूरतर जाकर ही थम सकीं।
‘‘श्रीमान्....हीथक्लिफ़ !’’....मैंने छेड़ा।
जवाब में सिर्फ़ सिर हिला।

‘‘महाशय, मैं लौकवुड हूँ, आपका नया किरायेदार। आने के बाद आपके पास पहुँचना अपनी प्रतिष्ठा समझता हूँ और अपनी आशा व्यक्त करना चाहता हूँ कि थ्रशक्रॅश चक में टिकने की मेरी कोशिश से आपको कष्ट न हो : मैंने सुना कल आप....’’

‘‘थ्रशक्रॅस मेरा अपना है, हज़रत’’, उसने नज़र चढ़ाते हुए बीच में ही टोक दिया, ‘‘कोई मुझे तकलीफ़ दे, यह मुझे गवारा नहीं....अन्दर आइए !’’

यह ‘अन्दर आइए’ दाँत पीसकर कहा गया था—कुछ ऐसे जैसे कहते हैं—‘जहन्नुम में जाओ।’ शब्द के साथ सहानुभूतिपरक गतिशीलता उस फाटक ने भी नहीं दर्शाई जिस पर वह झुका था; और मैंने सोचा उस घटना ने मुझमें आमन्त्रण स्वीकार कर लेने की निश्चयात्मकता ला दी। मुझे वैसे आदमी में दिलचस्पी हुई जो मुझसे भी कहीं ज़्य़ादा एकान्तपसन्द था।

जब उसने देखा, मेरे घोड़े की छाती चहारदीवारी को कभी-कभी ठेल रही है तो उसे बेलगाम करने को उसने हाथ फैला दिये, और तब अचानक पगडण्डी पर वह मुझसे आगे हो गया। हमारे सहन में दाख़िल होते-होते उसने पुकारा—‘‘जोसिफ़, मि. लौकवुड का घोड़ा थामो और थोड़ी शराब लाओ।’’

इस दुहरी आज्ञा से यही झलकता था कि हीथक्लिफ़ के यहाँ पूरे निकम्मे दास-दासियों का डेरा-डण्डा है। इसलिये कुछ आश्चर्य नहीं कि राह के चौरस चौकोर पत्थरों के बीच घास उपजती है और झुरमुटतराश हैं सिर्फ़ मवेशी।
         जोसिफ़ एक बुज़ुर्ग, नहीं बूढ़ा आदमी था : शायद बहुत बूढ़ा, फिर भी तन्दुरूस्त और मज़बूत। ‘‘भगवान भला करे’’—मेरा घोड़ा मुझसे लेता हुआ, चिड़चिड़ाहट भरी नाखुशी के साथ दबी ज़बान वह अपने आप से बोला—बीच ही में मेरे चेहरे पर ऐसी खरास-भरी नज़र डालता हुआ कि मैंने दरियादिली से अटकल लगाई कि अपना खाना हज़म करने के लिए भी उसे खुदाई मदद की ज़रूरत ज़रूर होती होगी। और, उसके पवित्र उद्गार का मेरे औचक आ जाने से कोई वास्ता नहीं था।

‘झंझा भवन’ यानी ‘वुदरिंग हाइट्स’1 मि. हीथक्लिफ़ के निवास का नाम है। ‘वुदरिंग’ है एक सार्थक प्रान्तीय विशेषण, ‘वुदरिंग’ है ब्योरा उस वायुमण्डलीय उथल-पुथल का जो उस भवन को तूफ़ानी मौसम में निरावरण रखती है। शुद्ध स्वास्थ्यप्रद समीर उन्हें निश्चय ही सर्वदा ऊपर मिलता होगा; मुँडेरों के ऊपर लहराती हुई उत्तराई की शक्ति का अनुमान किसी को भी हो सकता है : मकान के अन्त में अवरूद्ध ऊँचाई वाले देवदारू के अत्यधिक झुकान से और सूर्य से भीख माँगते हुए दृढ़ कंटकों के एक तरफ़ फैलाव से। भाग्यवश इस हवेली के शिल्पी में इसे सुदृढ़ बनाने की दूरदर्शिता थी : सँकरी खिड़कियाँ दीवार में गहराई तक धँसी हैं और कोने रक्षित हैं, निकले हुए बड़े-बड़े पत्थरों से।

         मुख्य द्वार के ईर्द-गिर्द प्रचुर विचित्र नक्का़शी की आभा परखने के लिए दहलीज़ पार करने के पहले मैं रूका। उसके भी ऊपर विलक्ष्ण श्वानों और निर्लज्ज छोटे छोकरों की बिखरती चित्र-चर्या के बियावान में मैंने एक तिथि देखी—1500 और नाम पाया –हेयर्टन अर्नशॉ’। मैंने कुछ टिप्पणी की होती, और इस मकान मालिक से उस स्थान के संक्षिप्त इतिहास के लिए अनुरोध किया होता, किंतु दरवाजे पर के उसके दृष्टिकोण से तुरन्त अन्दर चले आने के लिए अविलम्ब प्रस्थान करने का आभास मिलता था। अन्दर की सबसे अधिक दूरी के मुआइने के पहले ही मकान मालिक की व्यग्रता को बढ़ा देने की मेरी  इच्छा नहीं थी।

         किसी प्राथमिक प्रवेश-मार्ग से रहित पारिवारिक बैठक में हमलोग एक ही पग में चले आये। लोगबाग इसे ही ‘घर’ कहते हैं। सामान्यतः यह रसोईघर और दालान को शामिल करता है। लेकिन ‘झंझा भवन’ में चौका एकदम दूसरी जगह टल जाने को बाध्य हो गया है। कम-से-कम मैंने जीभों की चर्र-चर्र और बहुत भीतर में चौके के बर्तन-बासनों की टन-टन पहचानी और विशाल अँगीठी के नज़दीक तलने,
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1.वुदरिंग का मानी आँधी के थपेड़ों से मुर्झाया हुआ हो सकता है। यह शब्द ‘विदरिंग’ का स्थानीय प्रयोग है। विदर का मानी मुर्झाना होता है। हाइट्स माने ऊँचाई। सीधा मतलब हुआ आँधी के थपेडों से  आक्रान्त ऊँची हवेली यानी झंझा भवन।–अनुवादक ।

उबालने या पकाने के चिह्न नहीं देखे और न दीवारों पर ताँबे की तश्तरी तथा टिनही छलनी की चमक ही देखी। एक किनारा सचमुच शानदार ढंग से झलकाता था बेहद भूरे रंगवाली कसकुट की रकाबियों की पाँतियाँ जिनके बीच-बीच में एकदम छत तक विस्तृत बलूत की दराज़ों वाली मेज़ पर क़तार के ऊपर क़तार से ऊँची उठती हुई चाँदी की झारियाँ और कठौतियाँ थीं। झारियों और कठौतियों को कभी नहीं खिसकाया गया था, इनकी पूरी शरीर रचना खोज-बीन करनेवाली आँखों के आगे स्पष्ट थी। सिर्फ़ वहीं यह स्पष्ट नहीं थी जहाँ काठ का एक फ्रेम जई की टिकिया और गोमांस के पदसमूहों, भेड़ के मांस और सुअर के नमक-भरे सूखे मांस से ढँके होने के सबब से इन्हें छिपा देता था। धुआँकश के ऊपर दुर्जनता-भरी विभिन्न पुरानी बन्दूक़ें और एक जोड़ी घोड़-पिस्तौल थी। सजावट की ख़ातिर धुआँकश के किनारे-किनारे भड़कीले से चित्रित तीन कनस्तर पड़े थे। चिकने उजले पत्थर का फ़र्श था : पुरातन बनावटवाली पीठ-उठी कुर्सियाँ हरे रंग से रंगी थीं : दो-एक भारी काली कुर्सियाँ साये में छिपी थीं। ताखोंवाली मेज़ के नीचे मेहराब में लगातार डर से कूँ-कूँ करते पिल्लों के एक झुण्ड से घिरी, कलेजी के रंग की शिकार बतानेवाली भारी-भरकम एक कुतिया आराम कर रही थी और दूसरे-दूसरे कुत्ते अलग-अलग जगहों पर मँडरा रहे थे।

घुटनों तक चुस्त पायज़ामे और पैर ढँकने की पट्टी में अदम्य मुखाकृति और सुदृढ़ कायावाले वैसे सरल किसान के अधिकार में दिखाये जाने पर भी यह कमरा और लकड़ी के सामान ज़रा भी असाधारण नहीं मालूम पड़ सकते थे। यदि आप ठीक समय पर भोजन के बाद जाइए तो इन पहाड़ियों के बीच किसी भी पाँच-छह मील की लपेट में ऐसा व्यक्ति बाँहोंवाली कुर्सी पर अपने सामने उफन शराबवाले जाम को गोल मेज़ पर रखे बैठा हुआ देखा जा सकता है। लेकिन मि. हीथक्लिफ़ अपने घर और जीवन-शैली में निराली विषमता बरतते हैं। देखने में वे गाढ़ी चमड़ी वाले बनजारे हैं, पोशाक और व्यवहार से भलेमानुस। मतलब यह कि उतने ही बड़े भलेमानुस जितने बहुतेरे देहाती जमींदार, शायद थोड़ा फूहड़ फिर भी अपनी असावधानी के कारण ख़राब नहीं लगनेवाले, इसलिये कि तनी और सुन्दर शारीरिक गठन मिली है। पर वे हैं कटु असामाजिक तबीयत वाले। संभवतः उनमें कुछ लोग अभद्र अहंकार का संदेह करें। मेरे भीतर का संवेदनशील तार कहता है बात ऐसी कुछ भी नहीं। प्राकृत ढंग से मैं जानता हूँ उनकी संयमशीलता उत्पन्न होती है भावनाओं की दिखावटी उछलकूद की घृणा से, परस्पर दयार्द्रता के प्रकटीकरण से। वे छद्म रूप से प्रेम करेंगे; वैसे ही घृणा करेंगे; फिर प्रेम तथा घृणा किये जाने को शोखी का नमूना मानेंगे। नहीं, मैं ज़रूरत से ज़्यादा तेजी के साथ भागा जा रहा हूँ, मैं उन पर अपने गुणों की खुले हाथों से बौछार कर रहा हूँ। बीते दिनों में किसी भावी परिचित से मि. हीथक्लिफ़ की किनाराकशी शायद वैसी वजहों से होती हो जो मुझे चालित करने वाले कारणों से एकदम दूसरी हों। मुझे ऐसा समझ लेने दीजिए कि मेरी बनावट विचित्र-सी है : मेरी प्यारी माँ कहा करती थी मुझे कभी आरामदेह गृहस्थी नहीं मिलेगी और बस पिछली गर्मी ही में मैं एक के लिये बिल्कुल अयोग्य सिद्ध हुआ।

समुद्र किनारे सुखद ऋतु के एक माह का आनन्द उठाता हुआ मैं एक अभिरूप प्राणि की संगति में खो जाने को मानों फेंक दिया गया था। जब तक उसे मेरा भान नहीं था, वह मेरी दृष्टि में वास्तविक देवी रही। मैंने कभी मुँह खोलकर अपना प्रेम नहीं जतलाया, फिर भी अगर निगाहों की भाषा होती हो तो बज्रमूर्ख भी मेरा स्नेह में आकण्ठ डूबा रहना भाँप गया होगा। आखिरकार उसने मुझे समझा और जिस मधुरतम दृष्टि की कल्पना की जा सकती है, वह मेरी ओर फेर दी। और मैंने क्या किया ? शर्मिन्दगी से स्वीकार करता हूँ—घोंघे की तरह अपने में ही बर्फ़ीली ठण्डक से सिकुड गया, उसकी हर निगाह पर शीतलहर, दूरतर होता चला गया; यहाँ तक कि अन्त में उस बेचारी बेक़सूर को अपने दिमाग़ पर शक होना लाज़िमी था। अपनी ही काल्पनिक ग़लती की उलझन में सराबोर वह अपनी अम्माँ को चले चलने के लिए निहोरे करने लगी। चाहों के इस अनोखे फेरबदल से मैंने अनाकस्मिक हृदयहीनता की ख्याति प्राप्त की, लेकिन किस क़दर नामुनासिब, इसे सिर्फ़ मैं समझ सकता हूँ।

जिस अँगीठीवाले पत्थर की ओर मेरा मकान मालिक बढ़ा, उसके ठीक सामने मैं शिलान्त पर बैठा, और मौन के एक मध्यान्तर को मैंने कुत्तों की माँ को अंक में ले लेने के प्रयत्न से भरा। यह श्वानभार्या बच्चों के निवासस्थान से अलग हो चुकी थी और मेरे पैरों के पीछे भेड़िया-ढंग से छिपी थी, उसके होंठ ऊपर चढ़े हुए और एक कट्टा झपट लेने को उसके उजले दाँत लार टपकाते हुए। मेरे आलिंगन ने एक लम्बी कण्ठ से फूटी गुर्राहट उकसाई।
‘‘बेहतर होता, आप कुत्ते को उसकी मर्जी पर छोड़ देते’’, उस गुर्राहट में अपनी गुर्राहट मिलाते हुए मि. हीथक्लिफ़ गरजे—अपने अधिक नृशंस प्रदर्शनों को पैर पटककर रोकते हुए। ‘‘वह बिगाड़ दी जाने की आदी नहीं- पालतू बनाने के लिये नहीं रक्खी गई है।’’ बग़ल के किवाड़ की ओर लम्बे डग भरते हुए वे दोबारा गरजे—‘‘जोसिफ़ !’’

तहख़ाने के बहुत भीतर से अस्पष्ट तौर पर जोसिफ़ भुनभुनाया, पर ऊपर चढ़ने की कोई सूचना नहीं दी। इसलिये उसका मालिक मुझे शैतान कुत्ती और भेड़ पर निगरानी करने वाले क्रूर जबड़े वाले कुत्तो के जोड़े के आमने-सामने छोड़ता हुआ उसकी ओर अन्दर बैठा। यह श्वान समुदाय मेरी हर हरकत और हिलने-डुलने पर ईर्ष्यालू अभिभावकत्व रख रहा था। मुझमें उनके जबड़ों के सम्पर्क में आने की व्यग्रता नहीं थी। मैं निश्चल बैठा रहा; लेकिन ऐसी कल्पना करके कि वे छिपे अपमान को शायद ही समझ सकें, मैं दुर्भाग्यवश उन तीनों पर पलक गिराने और मुँह बनाने में लग गया और मेरी मुखाकृति के कुछ पहलू ने उस मादा को इतना झल्ला दिया कि वह अचानक गुस्से की सनक में आ गई और मेरे घुटनों पर छलाँग मार आई। मैंने उसे पीछे धकेला और मेज़ को अपने बीच डालने के लिये लपका। इस लपक ने उसके पूरे कुनबे को भड़का दिया : मुख्तलिफ़ उम्र और बड़ाई-छोटाई के आधे दर्जन चौपाये दैत्य गुप्त माँदों से केन्द्रीय रंगस्थली पर निकल पड़े।
मैंने अनुभव किया, मेरी एड़ियाँ और कोट के नपेल उनके आक्रमण के विचित्र लक्ष्य थे। बड़े लड़ाकुओं के वार को चिमटे से जितनी कामयाबी से रोका जा सकता था, रोकता हुआ मैं दुबारा शांति स्थापित करने के लिये कुछ चिल्लाकर घर वालों की मदद माँगने को बाध्य हुआ।

तंग पैदा करने वाली सुस्ती से हीथक्लिफ़ और उसका आदमी तहखाने की सीढ़ियाँ चढ़े। मैं नहीं समझता वे अपनी सामान्य गति से एक सेकेण्ड भी तेज़ चले होंगे यद्यपि घर बदहवासी और भूँकों का नितान्त बवण्डर बन चुका था। सौभाग्यवश, चौके के एक प्राणी का तुरत आगमन हुआ : ऊपर खोंसी हुई गाऊन, खुली बाँहें, आग से लाल गाल, एक स्वस्थ सुदृढ़ स्त्री भुननेवाले तवे को घुमाती हिलाती हम लोगों के बीच दौड़ पड़ी : अपनी जिह्वा और उस अस्त्र का ऐसा व्यवहार किया कि छू-मन्तर से वह बवण्डर दब गया और जब उसका मालिक इस दृश्य पर अवतरित हुआ तो वह थी आँधी की वापसी के बाद समन्दर की तरह हाँफती हुई।
‘‘यह कैसी जहन्नुमी हाय-तौबा है ?’’ उसने सवाल किया, मुझ पर इस अन्दाज़ से ताकते हुए कि मैं बड़ी मुश्किल से भी तिरस्कारपूर्ण व्यवहार ज़ब्त न कर सका।
‘‘दरअसल, जहन्नुम ही तो !’’ मैं भुनभुनाया। ‘‘जनाब, आपके इन जन्तुओं से ज़्यादा ख़राब रूह भूतसवार सुअरों के झुण्ड की भी नहीं होगी। किसी अजनबी को आप बाघों के गिरोह में भले छोड़ दे सकते थे।’’
‘‘छेड़-छाड़ नहीं करनेवालों से वे नहीं लगते’’, हटाई हुई मेज़ को उसकी जगह पर रखकर, बोतल मेरे सामने करते हुए उसने टिप्पणी की।

‘‘कुत्ते चौकस रहते हैं, सो ठीक ही करते हैं। एक गिलास शराब लीजिएगा ?’’
‘‘नहीं, शुक्रिया।’’
‘‘काटा नहीं न ?’’
‘‘अगर मुझे काटा होता, तो काटनेवाले पर मैं अपना अभिज्ञान टाँक देता।’’
हीथक्लिफ़ का चेहरा बनावटी हँसी से ढीला पड़ा। उसने कहा, ‘‘आइए आइए, मिस्टर लौकवुड, आप परेशान हैं। लीजिए, थोड़ी शराब पीजिए। मुझे क़बूल करने में कोई एतराज़ नहीं है कि मेहमान लोग इस घर में इतने कम आते हैं कि मैं और मेरे कुत्ते उनकी खातिरदारी शायद ही जानते हैं। महाशय, यह रहा आपकी सेहत की ख़ातिर।’’

मैं झुका और मैंने भी इसकी ताईद की। मैं समझने लगा था कि पिल्लों के दल की बदतमीजी के सबब तुर्शी से किनाराकशी करते हुए बैठना बेवकूफ़ी है। वह आदमी मेरी ज़ात से ज़्यादा मज़ाक कर ख़ुश हो, यह मैं गवारा नहीं कर सकता था। शायद उसे चतुर समझदारी ने जीत लिया था कि एक अच्छे किरायेदार को नाखुश करने की ग़लती नहीं करनी चाहिए। सर्वनामो और सहायिका क्रिया के टुकड़े चीरनेवाली अति संक्षिप्त शैली को उसने थोड़ा ढीला किया और उसकी समझ से जिसमें मेरी दिलचस्पी हो सकती थी, उस विषय की अवतारणा कर दी। बातचीत मेरे ठहराव के नफ़ा-नुकसान पर होने लगी। जिन प्रसंगों को हम उठाते, उन पर मैंने उसे ख़ूब तेज़ पाया। निवास पर लौटने से पहले इतना बढ़ावा पाकर मैंने कल आने की इच्छा प्रगट कर दी। प्रकटतः, उसने मेरे अनियन्त्रित प्रवेश की पुनरावृत्ति नहीं चाही। फिर भी मैं जाऊँगा। अचरज है, उसकी तुलना में मैं अपने को कितना मिलनसार समझ रहा हूँ।

2



कल ठण्डा और कुहरा-भरा अपराह्न था। झाड़ी और कीचड़ से गुज़रकर ‘वुदरिंग हाइट्स’ तक जाने के बदले मेरा आधा मन इसे पढ़नेवाली बैठक की अंगीठी के पास बिता देने का था। लेकिन खाना खाने के बाद मैं ऊपर आया। (नोट-मैं बारह और एक के बीच खाना खाता हूँ। पर किराया लेने के साथ ही व्यवस्था में मुझे जो गृहकाज करने वाली एक निरीक्षिका-सी महिला मिली थी, वह शायद न समझ सकती थी, न समझना चाहती थी कि मुझे पाँच बजे अपनी सेवाएँ मिलनी चाहिए।) उस रुक जानेवाले आलस-भरे उद्देश्य से जीने की सीढ़ियाँ चढ़ते और कमरे में पाँव रखते हुए मैंने एक बालिका नौकरानी को झाड़नों और कोयले की टोकरियों से घिरी, घुटनों के बल चलते देखा। जले कोयले के ढेर छोड़ती, जहन्नुम की गर्द उड़ा-उड़ाकर वह आग की लपटें बुझा रही थी। इस नज़ारे ने मुझे तुरत पीछे फेर दिया। मैंने अपना टोप उठाया और चार मील चलकर हीथक्लीफ़ महोदय के फाटक पर बर्फ़ीली बारिश के प्रथम श्वेत झाग से बचाव के एन वक़्त पर पहुँचा।

उस धुन्ध-भरी पहाड़ी की चोटी पर काले पालों की वजह से ज़मीन कड़ी थी। हवा ने मुझे हर अंग से कँपकँपा दिया। सिकड़ी को हटा सकने में नाकामयाब रहा, कूद पड़ा : झरबेर की पसरी झाड़ियों के हाशिये लगी चौरस चट्टानी पगडण्डी पर दौड़कर प्रवेश के लिये बेकार ही खटखटाता रहा, धक्के मारता रहा जब तक कि पोर-पोर टनकने न लगी और कुत्ते भूँकने न लगे।
मैंने मन में कहा—‘अभागा कुनबा ! अपनी वहशी ग़ैरमेहमानदारी की वजह से तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिये आदमी की ज़ात से अलग कर देना मुनासिब है। कम-से-कम मैं दिन में अपना दरवाजा बन्द नहीं रख सकता। मुझे किसी की परवाह नहीं—मैं अन्दर बैठूँगा।’ यों ठानकर मैंने कुण्डी कसकर पकड़ी और ख़ूब ज़ोरों से झकझोरा। खलिहान की एक गोल झिलमिल से सिरके-से तीखे चेहरेवाले जोसिफ़ ने अपना माथा सरकाया।
‘‘क्या हौ जनाब, क्या माजरो हौ ?’’ वह चिल्लाया। ‘‘मैलिक नीचे खेत में हौं। मोरी के आख़िरी हिस्से की तरफ़ से घूमकर जाइए अगर बातें करनी हौं !’’

‘‘अन्दर क्या दरवाज़ा खोलने को कोई नहीं है ?’’ अनुकूल होते हुए मैंने हंकार लगाई।
‘‘मालकिन के सिवा कोई नहे हौ, और अगर रात तक आप ख़ाल उधेड़नेवाला हल्ला करते रहो तो भी वह नहीं खोलेगी।’’
‘‘क्यों ! ओह, तुम, जोसिफ़, उनसे कह नहीं सकते मैं कौन हूँ ?’’
‘‘नेईं नेईं मौ नेईं ! इन सब में मेरो हाथ नहीं होगा।’’—माथा छिपाते हुए बोला।

बर्फ़ मोटी तह में पड़ने लगी। एक और कोशिश के लिये मैंने कुण्डी कसकर थामी। और तब बिना कोट का, कन्धे पर भूसा झाड़ने का डण्डा रखे पीछे सहन में एक युवक सामने आया। मुझे उसने अपने पीछे आने को आजिज़ी से कहा और हम हमाम, कोयला-टालवाले रकबे, एक पम्प, एक कबूतर-दरबा पार करते हुए अन्त में हम विशाल, सुखद, गर्म दालान में पहुँचे जहाँ मैं पहले मिला था। कोयला, पीट और लकड़ी की मिली-जुली भरपूर आग की चमक में यह दालान खुशी से दमक रहा था, और कबल इसके जिस व्यक्ति के वहाँ रहने का मैं कभी अनुमान भी नहीं कर सकता था उसी, ‘मालकिन’ को शाम के पूरे भोजन से सजी मेज़ के नज़दीक देखकर झूम उठा; यह सोचता हुआ कि वह मुझे कोई एक जगह ले लेने को कहेगी। मैं नवा और ठहरा रहा। अपनी कुर्सी में पीछे उठँगते हुए उसने मुझे ताका और निश्चल-निःशब्द बनी रही। ‘‘मौसम बेरहम और बेनरम है।’’—मैं बोल उठा—‘‘मिसेज़ हीथक्लिफ़, मुझे डर है, आपके नौकरों के फेंकैती-भरे व्यवहार से दरवाज़े पर उसका असर होगा। वे सब मुझे सुन पाते, यह मेरे लिए बहुत भारी साबित हुआ।’’

उसने मुँह नहीं खोला, कभी नहीं। मैं निहारता रहा, उसने भी निहारा। कुछ भी हो, उसने मुझ पर अपनी निगाह डाले रक्खीं—उदासीन और तटस्थ रीति से, जो बेहद बेचैन करनेवाली और अप्रिय थीं।

‘‘बैठें’’, उस युवक ने रुक्षता से कहा, ‘‘वे अन्दर आ ही रहे हैं।’’ मैं बैठा। मैंने गला खँखारा फिर दुष्टा जूनो को पुकारा। उसने इस दूसरे साक्षात्कार के समय मेरे साथ परिचय स्वीकार करने के प्रमाण में अपनी दुम के आखिरी सिरे को हिलाने का अनुग्रह किया।

‘‘सुन्दर जानवर !’’ मैं पुनः कुछ जड़ गया, ‘‘इन छोटे-छोटे बच्चों को दे सकती हैं दूसरो को ?’’
‘‘वे मेरे नहीं’’, आकर्षण-भरी मेज़बान ने इस विकर्षण से जवाब दिया कि हीथक्लिफ़ भी मात हो जाता।
‘‘आह, आपके मनचाहे इन्हीं में तो होंगे ?’’—मरे बिल्लीनुमा गद्दे की ओर मुड़ता हुआ मैं कहता गया।
‘‘पसन्दीदों का क्या ही कमाल चुनाव !’’ घृणा से उसने व्यक्त किया।
दुर्भाग्यवश, वह मरे खरहों का ढेर था। मैं फिर गला खँखारने लगा, अँगीठी के और पास चला गया, संध्या की विकरालता पर अपनी टीका-टिप्पणी करता रहा।

‘‘आपको बाहर नहीं निकलना चाहिए था’’, उसने कहा और उठकर सामने से दो रंगे कनस्तर उतारने लगी।

पहले उसकी जगह रोशनी से ढँकी थी, अब उसकी सम्पूर्ण देह-यष्टि और मुखमण्डल का स्पष्ट दृश्य मेरे आगे था। वह तन्वंगी थी, और बाह्यतः बालापन से आगे रंच भी बढ़ी नहीं थी : एक श्लाघ्य रूप-आकार, सर्वतोसुन्दर लघु मुखड़ा, जिसे देखने का सुख शायद ही कभी अनुभव किया हो, नन्हे-नन्हे अंग ख़ूब गोरे, स्वर्णिम कुंचित कुन्तलजाल सुकुमार गर्दन पर लरज़ते हुए; और आँखें—अभिव्यंजना में यदि अनुकूल होतीं, सर्वविजयिनी रहतीं : मेरे ग्रहणशील हृदय के सौभाग्य से उनसे केवल एक भाव निःसृत होता था—और यह मँडराता था घृणा तथा एक प्रकार की ऐसी मानसिक विक्षुब्धता के बीच जिसका उनमें ढूँढ़ा जाना नितान्त अनैसर्गिक था।
कनस्तर उसकी पहुँच के लगभग बाहर थे। उसकी सहायता को मैं गति के साथ बढ़ा, वह मेरी ओर ऐसे ही मुड़ी जैसे कोई मक्खीचूस अपना सोना गिनते वक़्त किसी मदद की कोशिश पर तड़प उठे।

‘‘मैं आपकी मदद नहीं चाहती’’, उसने झटक दिया, ‘‘मैं उन्हें ख़ुद ले सकती हूँ।’’
‘‘माफ़ी चाहता हूँ’’, जवाब देने में मैंने जल्दी बरती।
‘‘आपको चाय पर बुलाया गया ?’’ उसने पूछा, ‘‘स्वच्छ काले फ्रॉक पर लबादा बाँधते हुए। और चायदानी के ऊपर पत्ती को स्थिर किए खड़ी हो गई।
‘‘एक प्याला पाकर मैं प्रसन्न होऊँगा’’, मैंने जवाब दिया।
‘‘आपको बुलाया गया था ?’’ उसने दुहराया।
‘‘नहीं’’, मैंने अर्द्धमुस्कान से कहा, ‘‘पूछने की ख़ातिर आप ही उपयुक्त व्यक्ति हैं।’’
फेंक दिए उसने चाय, चम्मच, सब कुछ और गुस्से से फूलकर अपनी कुर्सी में धम्म से सिमट गई। उसका लाल, आकुंचित रक्तिम अधर आगे बढ़ा हुआ, जैसे कोई शिशु रोने को अधीर।


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