ठाकुर घर - किशोरी चरण दास Thakur Ghar - Hindi book by - Kishori Charan Das
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ठाकुर घर

किशोरी चरण दास

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :127
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2172
आईएसबीएन :81-260-0107-6

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इन रचनाओं में मध्यवर्गीय मूल्यों के विशिष्ट अनुभव खंडों को अपने अविस्मरणीय पात्रों द्वारा प्रस्तुत किया गया है...

Thakur Ghar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

श्री किशोरी चरण दास का जन्म 1924 में हुआ। आप ओड़िया साहित्य में उस पीढ़ी के सम्मानित कथा-साहित्यकार हैं जो साठ के दशक के बाद ओड़िया कथा विद्या को उच्च शिखर पर ले गये। आपकी कहानियाँ मध्यमवर्गीय जीवन मूल्यों और पारिवारिक आदर्शों की टकराहट को एक नयी भंगिमा प्रदान करती हैं और जीवन के उन पहलुओं को छूकर चली जाती हैं जो अब तक अनदेखा या अनजाना रह गया था।

श्री किशोरी चरण दास ने अपनी चर्चित कृतियों भाँगा खेलना, गमन और ठाकुर घर की रचनाओं में मध्यमवर्गीय मूल्यों के विशिष्ट अनुभव खंड़ो को अपने अविस्मरणीय पात्रों द्वारा जिया है। ऐसी कहानियाँ हमें अपने चौगिर्द फैले अन्धेरों से लड़ने की प्रेरणा देती है। श्री दास को उनकी कहानियों के संकलन ठाकुर घर के लिए ओड़िया में लिखित श्रेष्ठ कृति के नाते साहित्य अकादेमी द्वारा वर्ष 1976 में पुरस्कृत किया जा चुका है।
इन कहानियों का अनुवाद श्री सिद्धार्थ मानसिंह महापात्र ने किया है।

रसगुल्ला

जहाँ धूप बिखरी हुई थी, अर्जुन दास वहीं बैठे। उन्हें छाया पाने के लिये एक दीर्घकाय सज्जन के पास बैठना पड़ा। सामने वाली सीट पर पत्नी सुमित्रा बैठ गयी थी। तभी अर्जुन दास ने वर्तमान की सामान्य घड़ी को छोड़कर भविष्य के बारे में सोचना शुरू किया। प्लेटफ़ार्म पर आते-जाते लोगों और सहयात्रियों को देखा और दबी हुई आवाज़ में खुद को सुनाया—रसगुल्ला !
धूप की वजह से उनके चेहरे पर पसीनें की बूँदें साफ चमक रही थीं। रूखे बाल सिर पर इधर-उधर लटक रहे थे। काली छोटी-छोटी आँखें उपयोगी ध्येय की तरह दिखाई दे रही थीं। सचमुच जैसे सूरज के शरीर में दो छेद हैं, जोकि किसी भी पल अग्नि पिण्ड में बदलकर पृथ्वी को ध्वस्त कर सकते हैं, होंठ ऐसे लग रहे थे, मानो देखते-देखते किसी को भी मुँह में समा लेंगें।
पत्नी सुमित्रा को पता है कि उनके पति एक क्रांतिकारी हैं। जो पति के चेहरे को चुपके से देखते हुए अपने को धन्य समझती है।

उन्हें लगा, पति कुछ कह रहे हैं, वे झुकीं और पूछा, ‘‘पानी दूँ क्या ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘और कुछ चाहिये क्या ?’’
‘‘नहीं।’’
सुमित्रा दास चुप हो गयीं, यह कोई नई बात नहीं है। उन्होंने अपने पति के व्यक्तित्व को विभिन्न रूपों में देखा है। कभी वे आधी रात को ‘मेरा घोड़ा कहाँ गया ?’ कहकर चिल्ला उठते तो कभी अनजानी भाषा में कुछ-कुछ कहते, फिर कभी बेमतलब ठहाका लगाकर हँसते। इन सबका मतलब क्या है ? यह क्रांतिकारी पृथ्वी का विशुद्ध विस्मय जान पड़ता है।

सुमित्रा दास ने बैग से ऊन और काँटे निकाले और ख़ामोशी से स्वेटर बुनने में लग गयीं।
अर्जुन दास के भीतर रसगुल्ले का स्वरूप उभरने लगा। यात्रा की शुरुआत से पहले उनके मुँह से जो निकला, (उसे कोई समझ नहीं सका) उसे उन्होंने अपने मन में ही छिपाये रखा।
सुमित्रा दास की बुनाई ज़ोरों पर चल रही थी। उनके पास फुरसत नहीं। वे चाह रही हैं दार्जलिंग पहुँचने से पहले यह स्वेटर पूरा हो जाये।
उनके बग़ल में बैठे हुए वृद्ध ऊँघ रहे हैं और दो किशोर आपस में बातें करते हुए हँस रहे हैं। उनके लिए कलकत्ता और दार्जलिंग में कोई फर्क नहीं है। वे लोग बीच-बीच में इधर-उधर ताक रहे हैं। मालूम होता है कि फर्स्ट क्लास की टिकटें नहीं ली हैं, और ज़रूरत पड़ने पर उतर सकते हैं।
सुमित्रा स्वेटर की बुनाई में व्यस्त है।

अर्जुन दास रसगुल्ले की कल्पना में खोये हैं।
इसी समय अर्थात् ठीक गाड़ी छूटने से पहले एक युवा दंपति अपने साथ बच्चे के लिये बिस्किट, ग्लूकोज़ के डिब्बे, झूलने वाला घोड़ा, कमोड सहित छोटा-सी कुर्सी, संतरे और केले लेकर पहुँचे। बाप के हाथ में संतरे थे, कुली को पैसे देते वक़्त उनमें से एक संतरा गिरकर सुमित्रा देवी के पैरों के पास पहुँच गया। उन्होंने देखा, सुगंध को महसूस किया। लेकिन किसी की चेतना पर आँच नहीं आयी। ठेठ दार्जलिंग के यात्री हैं। नई शादी हुई है, हाल ही में बच्चा हुआ है। चाल-चलन से मध्यमवर्गीय परिवार के मालूम होते हैं।

गाड़ी जैसे ही छूटी, किसी ने चेन खींची, गाड़ी कुछ समय के लिये फिर रुक गयी। बच्चे का बाप उस मोटे आदमी के बग़ल में बैठा और माँ उन दोनों किशोरों के पास बैठी। बच्चा अपनी माँ की गोद में पड़ा इधर-उधर हो रहा था।
गाड़ी की गति बढ़ने के साथ-साथ अर्जुन के मन की गति भी बढ़ने लगी। मन को उन्होंने कितना समझाया कि व्याकुल मत हो, मगर वो काहे को माने। वे सोच रहे थे, भला मैं और कितने दिनों का मेहमान हूँ। तीन बार जेल जा चुका और कितनी मरतबे जाना भाग्य में लिखा है कौन जाने ? क्योंकि पुलिस की गोली पर विश्वास नहीं है। इस रसगुल्ले को छोड़ देने से मुझे शांति मिलेगी। भूपेन समझेंगे कि मैं सिर्फ़ बक-बक ही नहीं करता क्योंकि झंडा पकड़कर चिल्लाना नहीं जानता, बल्कि मैं काम की चीज़ हूँ। अर्जुन दास के चेहरे पर कुटिल हँसी दिखाई दी। वे कुछ अन्यमनस्क से हो गये। उनकी आँखों के सामने एक छोटा-सा मांसल शरीर दिखाई दिया।

वित्त्व नहीं आया। उसे खींचकर लाना होगा। प्रोफ़ेसर बोस और उनके जैसे बुद्धिजीवियों को पार्टी से निकालना होगा। उन्होंने खुद देखा है, एक दिन प्रोफ़ेसर साहब शाम को अपने घर के सामने खड़े होकर बाँसुरी बजाते हुए आकाश की ओर देख रहे थे।
उन्हें बुजुर्वा नहीं कहें तो किसे कहें ? लेकिन उपाय नहीं है। भूपेन दा का उन पर पूरा भरोसा है।

ठीक है। अब अर्जुन दास की करामात देखिये।
इन सबों का विनाश। इन्हें ख़त्म कर दिया जाये। ध्वंस कर दिया जाये। इसी सोच में रहकर उन्होंने आदेश दिया—
‘‘बर्बाद कर दो। तबाह कर दो !’’
‘‘जी, खिड़की बंद कर दूँ ?’’ बग़ल में बैठे मोटे-तगड़े आदमी ने पूछा। जैसे कि उन्हें बाध्य होकर यह समाज सेवा करनी पड़ रही हो।

अर्जुन दास ने खिड़की बंद नहीं की। ‘‘आए एम सॉरी। मैं चाहता हूँ, इसलिए कह रहा था। नहीं, खिड़की बंद नहीं होगी। धूप आ रही है इसलिये शायद उन्हें कष्ट हो रहा है। क्या मैं उनकी तरह दार्जलिंग अपने को ठंडक पहुँचाने जा रहा हूँ ?’’
उसके बाद उन्होंने अपने सहयात्री की ओर एक बार गौर से देखा।
बग़ल में टेरीलीन की शर्ट पहने एक युवक बैठा है। शायद किसी कम्पनी में काम करता है। सामने की बेंच पर दो किशोर बैठकर चहचहा रहे हैं। वे अठारह वर्ष से कम आयु के हैं, उन्हें हड़ताल से दूर रखो। सुमित्रा के पास एक सुंदरी तरुणी बैठी है जो इस युवक की पत्नी है। बिल्कुल गुड़िया की तरह विलास के लिये, शय्या के लिये। दूध जैसे सफ़ेद चमड़े के भीतर समाज विरोधी ज़हर भरा हुआ है। उसकी गोद में उसका बछड़ा है। बिल्कुल माँ की तरह।
एँ, यह क्या, यह बच्चा तो सुमित्रा की गोद में खेल रहा है।
जो भी हो सुमित्रा दास पति के भौंहों की सिकुड़न देखकर समझ गयी। इसमें मेरी क्या ग़लती है, उन्होंने मन-ही-मन सोचा।

मैं क्या करूँ ? क्या मैं उसे बूला लायी हूँ ?
गाड़ी छूटने के बाद से वह पल भर भी शांत नहीं बैठा। पहले मेरे ऊनी गोले की खींचतानी की। उसके बाद डाँट खायी और उसकी माँ ने उसे बिस्किट खिलाकर उसके बाप के पास भेज दिया। वहाँ बैठकर लार टपकाकर तुम्हारी पैंट ख़राब कर दी। मैं तुमसे कहना चाह रही थी, मगर देखा कि तुम अपनी सोच में इस तरह डूबे हुए हो, कि तुम्हें जगाना मुश्किल था। हालाँकि यह दाग़ जब तुम्हें दिखाई देगा...

सुमित्रा दास चतुरता से हँसी। बड़ी जल्दी ही उन्होंने अपनी हँसी में काबू कर ली। और अपनी सफ़ाई में कहना शुरू किया...फिर क्या हुआ ना, बच्चे को ‘मऊ’ कहकर ये लोग पुकार रहे थे। इस परिवार से भला और नाम की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? फिर वह लकड़ी के घोड़े पर बैठा। बैठकर घोड़े के कान पकड़कर इतने ज़ोरों से झूलना शुरू किया कि उसका सिर घोड़े के सिर से टकरा गया। दूसरा कोई बच्चा होता तो तुरंत रोने लगता। किंतु उसने सिर्फ़ अपने होंठ फैला दिये, माँ ने उसका सिर सहला दिया और प्यार से कुछ बोली। वह खिलखिलाकर हँसने लगा। अब उसकी माँ ने उसे घोड़े के पास न छोड़कर हम दोनों के बीच में बैठा दिया। मगर क्या वह शांत बैठने वाला है, वह कभी अपनी माँ पर तो, कभी मेरी गोद में चढ़ा जाता। मैं भला क्या करूँ ? अभी फिर से वह घोड़े की पूँछ खींच रहा है। शैतान है...पूरा शैतान।
सुमित्रा दास की सफ़ाई काफ़ी है। मऊ ने क्या किया, न किया यह सब देखने की तुम्हें क्या ज़रूरत थी ? क्या तुम्हारे पास कोई काम नहीं है ?

मुझे क्या वह कुछ काम करने देता ? स्वेटर बुनते समय ऊनी धागा खींचने लगता। पुस्तक पढ़ते वक़्त उसे खींच रहा है, यह अगर तुम्हारे पास बैठता तो तुम जानते...।
अर्जुन दास अपने ख़यालों में सोच रहे हैं, रसगुल्ला छोड़ूँगा। शत्रुओं को मारूँगा। मैं उसे नहीं पहचानता। कि वो भी मुझे नहीं जानता। मगर वो मेरा दुश्मन है। क्योंकि उसका नाम प्रबोध पाल है। भूपेन दा का नाम सुनते ही दाँत किटकिटाने लगता है। लेकिन सभी डरपोक हैं। उन्हें कुछ कह नहीं पाते...
न कहें मगर मैं बोलूँगा। अगर पकड़ा गया तो मैं मरूँगा, लेकिन मैंने शपथ ली है। मेरे मरने पर क्या वे लोग रोयेंगे ?
मऊ उनके पास लौट आया था, सुमित्रा दास उसकी हथेलियां थामे पति के उद्देश्य से कह रही थीं, ‘‘मैंने तुम्हारी बात मानी, पार्टी की बात मानी है। मैं जानती हूँ, कम-स-कम दस वर्ष तक हमारा बच्चा नहीं होना चाहिये। जब तक विप्लव की नींव मजबूत न हो जाये। लेकिन अगर ग़लती से मऊ की तरह हमारा बच्चा हो जाये तो क्या तुम बाप बनने से इंकार कर दोगे ? मुझे पार्टी से विदा कर दोगे ?

...कौन रोयेगा ? सुमित्रा रोयेगी ? ऐसा सवाल मन में आने के बाद अर्जुन दास लज्जित हैं। छिः छिः, मैंने सर्वहारा को वचन दिया है। मेरे पास बुजुर्वा सेंटिमेंट और अश्रु मिश्रित तरल विलास के लिये कोई जगह नहीं है, नहीं, नहीं बिल्कुल नहीं। इसलिये मैं लक्ष्य पर नज़र रखूँगा। प्लान के मुताबिक काम करूँगा, प्रबोध बाबू पर बम डालूँगा, बम नहीं रसगुल्ला ! रसगुल्ला !
इस बीच गाड़ी काफी दूर निकल आयी। दक्षिणेश्वर से पहले चेन खींचकर कुछ देर लोगों ने रोक दी। लेकिन अब काफ़ी तेज़ गति से गाड़ी वर्धमान की ओर दौड़ रही है।
दोनों स्कूली बच्चे गपशप करने के बाद थक गये हैं। मेरे पति और बच्चे का बाप दोनों दार्जलिंग के बारे में जानते हैं, बतिया रहे हैं। मऊ की माँ शायद बाथरूम जाने की सोच रही हैं। और बृद्ध व्यक्ति सो गये हैं।
वर्द्धमान में गाड़ी पहुँचते ही भीड़ प्लेटफ़ार्म पर जमा हो गयी। मऊ को गोद में लेकर उसके पिता कोका-कोला खरीदने चले गये। मऊ की माँ बाथरूम गयीं। बच्चे दोनों चले गये। और हट्टे-कट्टे सज्जन ने उठकर जम्हाई ली तथा रामप्रसादी के पद गाने लगे।

अर्जुन दास को यह सब अच्छा नहीं लगा। साधारण लोगों का यह स्वार्थपूर्ण व्यवहार ! क्योंकि अगर वे चाहते तो सांसारिक कार्यों में खो गये होते, उनके पास समय नहीं होता। लेकिन इसके ऊपर इतिहास को बनाने का दायित्व है। क्या यह कोई समझ पायेगा ? उनकी एकमुखी निष्ठा—पार्टी, देश, विप्लव है। इसलिये वे स्थिर और ख़ामोश हैं। अकेले....अरे सुमित्रा इस तरह उदास क्यों दिखाई दे रही रही है ? मैं जो भी करूँ उससे क्या फ़र्क पड़नेवाला है ? मैंने सुमित्रा को अपनी योजना के विषय में कुछ नहीं बाताया है। ज़्यादा अनुगता, पतिव्रता बन रही है, रहने दो इतना ही रहने दो....
सुमित्रा के देखने का अंदाज ही कुछ ऐसा था, जैसे कुछ उदासी भरी बात सोच रही हो।

....इतनी प्रभुभक्ति अगर है तो पार्टी को पकड़े हुए कौमार्य व्रत का पालन नहीं करना था। मेरी पत्नी बनकर मेरी पूँछ पकड़ने की क्या जरूरत थी ? अर्जुन दास को पहली मुलाकात की बात याद आयी। यही तीन वर्ष पहले की बात है, मेरे घर में प्रवेश कर बोली, ‘‘माफ़ कीजिये, मैंने आपको कहीं देखा है, आपकी काफी प्रशंसा सुनी है, और आपको अपना गुरु मानती हूँ।’’ पच्चीस-छब्बीस बरस की लड़की ! उसे कभी कभार मैंने छात्रों के जुलूस में देखा था। उस वक़्त मैंने सोचा कि इसे नहीं छोड़ूँगा क्योंकि ये खुद आयी हैं। जो दूसरे लोग करते हैं, क्या मैं नहीं कर सकता ? क्या मैं पुरुष नहीं हूँ। इसलिये मैंने आश्वासन दिया, अपने पास बुलाया, उसके बाद बिस्तर पर लिटा दिया। उस दिन से वह मेरे पीछे पड़ी है। मैंने मज़बूर होकर उससे ब्याह किया। बाध्य होकर महीने में दो एक बार शरीर से शरीर जोड़ता हूँ, और फिर पछताता हूँ, कि क्यों किया। क्योंकि मैं उससे घृणा करता हूँ। नहीं, नहीं, घृणा नहीं करता, वह मेरी पार्टी की है, इसके अलावा वो मेरी पत्नी है।

मऊ के पिता कोकाकोला लेकर लौटे। अर्जुन दास की ओर बढ़ाया। अर्जुन दास ने दृढ़ता के साथ मना कर दिया। सुमित्रा देवी ने भी मना किया। लेकिन क्यों ? मुझे प्यास नहीं लग रही है, इसलिये क्या तुझे भी प्यास नहीं लगेगी। यह भी भक्ति का परिचय है ?

वर्द्धमान से गाड़ी छूटने के बाद दृश्य बदला।
मऊ बार-बार नाच रहा था, उसकी ओर सभी यात्रियों की नज़र थी। अर्जुन दास माँ बेटे की लीला देख रहे थे। इसके अलावा दूसरा चारा न था।

बेटा थक गया होगा, यह सोचकर माँ ने उसके लिए संतरा निकाला। उसे छिलके लेकर वो सभी के हाथों में रखने लगी। सिर्फ़ सोये हुए बूढ़े और अर्जुन दास की ओर नहीं गया।
सुमित्रा दास ने खुद कहा, ‘‘जा, वो जो मौसाजी बैठे हैं, उनको दे।’’
मऊ अर्जुन दास के पास गया। मगर छिलका न देकर उन्हें एक संतरे का टुकड़ा दिया। सभी अवाक् रह गये। सुमित्रा दास पति की ओर देखकर बोली, देखा आपने ? अब उसे अपने पास से निकाल सकेंगे ?

अर्जुन दास ने पत्नीकी ओर गुर्राकर देखा।

सुमित्रा देवी समझ नहीं पायी कि यह आक्रमक नज़रिया आ़खिर क्यों ? अर्जुनदास बताना चाह रहे थे सुमित्रा धन्यवाद। मैं सिर्फ इस लड़के को नहीं बल्कि उसकी माँ को भी लेना चाहता हूँ। एक सुंदर, कोमलांगी को पाना चाहता हूँ। अगर तू नहीं आयी होती तो मैंने ऐसी ही नारी पायी होती, लड़के का बाप बना होता। मेरी श्रेणी के आदमी भूपेन दा समझ पाते कि मुझे कामना से प्यार करना आता है। मैंने चाँद पर गुलाल मल दिया होता, सिर्फ़ एक रात के लिये, सिर्फ एक रात के लिये.....और तभी निडर होकर चिल्लाता—मैंने पाया पाया है ! मैंने तुम्हारे रस से भरे शरीर से जीवन को सोख लिया है।
दोपहर की छाँव लेकर गाड़ी शांतिनिकेतन पहुँची। वृद्ध ने अपनी आँखें खोलीं और अपने अभ्यास के मुताबिक ‘साधु, साधु’ कहकर पुकारा।

प्रेमनारायण


पोते के जन्म को इक्कीस दिन हुए। उत्सव सम्पन्न हुआ। निमंत्रित अतिथि खा-पीकर जा चुके हैं, लेकिन अपने घर के लोगों का काम अभी बाकी है। बच्चे खेल रहे हैं और कुछ औरतें गप्पेबाजी में लगी हैं। बच्चों के कमरे से किसी के चिल्लाने की आवाज़ अलग से पहचानी जा रही है।
फटे बाँस-सी हँसी की आवाज़ अनंत बाबू की मुद्रित चेतना में समा गयी। क्योंकि उस वक़्त अनंत बाबू लेटे हुए पत्नी को याद कर रहे थे।
ये लोग कब जायेंगे ? अनंत बाबू कोलाहल की ओर पीठ किये लेटे रहे। खुद सुलोचना उसी कमरे में ड्रेसिंग टेबिल के पास ख़ामोश बैठी है। यह वे देख नहीं पाये।
अनंत बाबू की चिकनी पीठ सुलोचना देवी की आँखों के सामने थी।

सुलोचना देवी मुँह नीचे किये, सामने के दरवाजे की ओर कान लगाये कुछ सुन रही थी—मैं क्या कह रही हूँ, सुनो, पुनि के ब्याह के बरस...फुस-फुस-फुस....तुम कौन-सी विदेश से आयी हो ? समवेत हँसी, टुप टुप टुप...फटे कंठ की हँसी.. हे भगवान ! अपने बेटे की उम्र का होगा, उसके साथ फिर ! धीरे-धीरे उस घर में सुनाई दे रहा होगा। फुस फुस फुस...मगर अनन्त बाबू छोड़ने वाले हैं नहीं। पकड़ लिया तो....समवेत हँसी...
सुलोचना देवी ने सिर ऊपर किया। चेहरे पर न क्रोध और न ही लज्जा का भाव उभरा। बल्कि अपनी लटों को सहेजते हुए ऐसा आभास दिया जैसे तुम्हारी गप्पबाजी की मैं परवाह नहीं करती और न ही मेरे पास सुनने की फुर्सत है। मेरे पास और भी कई काम हैं। केश-विन्यास, साज-श्रृंगार।

कहो, जो कहना है कहो। इसके अलावा तुम लोग कर भी क्या सकते हो ? मानु दीदी, मनि दीदी, मौसी, चाची, हेमा दुनियाभर की औरतों को एकत्रित होकर अपने विष को उद्गार करो। और भला कर भी क्या सकते हो ? मेरी सुंदरता क्या मुझसे छीन सकते हो ?
कहो जो कहना है। क्योंकि और ऐसी सुविधा नहीं मिलेगी ! पुनि का दूसरा बच्चा हुआ तो वो यहाँ कोई आयोजन नहीं करेगी। जो भी होगा उसके पति के पास दिल्ली में ही होगा।

हो सकता है वहाँ भी मैं परदे के पीछे से कितने मिसेस मिश्रा ! मेनन, मेहता की खुसर-फुसर सुनूँगी, मिसेस महांति की उम्र क्या है ? वे क्या पूर्णिमा की सगी माँ हैं ? कोई गोरा, लम्बा-चौड़ा दाढ़ी वाला दिल्ली का बाशिंदा मुझसे बार-बार चाय पीने के उद्देश्य से बातें करेगा। (सुलोचना देवी मन-ही-मन मुस्करायी) और ये मेरे ऊपर नाराज़ होंगे।
मेरे तीन बच्चे हैं। फिर भी मैं सुंदर हूँ। मेरे पति सुंदर हैं। मेरी दो बेटियाँ और एक बेटा। किसी में कोई कमी नहीं है।
इसी समय पति की खुली पीठ फिर से उनकी आँखों के सामने आ गयी। सुलोचना देवी उनके करीब आ गयीं।
शुभ्र जटाजूटधारी तपस्वी को छूने की तरह उनका अंतर पुलकित हुआ। उन्होंने एक हल्की-सी चादर पति के ऊपर डाल दी।




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