दादा और पोता - दिनकर कुमार Dada aur Pota - Hindi book by - Dinkar Kumar
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दादा और पोता

दिनकर कुमार

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2138
आईएसबीएन :81-260-2043-1

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प्रस्तुत है असमिया बाल कहानियों का हिन्दी अनुवाद...

Dada Aur Pota

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस पुस्तक में असमिया से हिन्दी अनुवाद करके इन बाल कहानियों का वर्णन किया गया है। इसमें कुल 29 कहानियाँ है। जो बच्चों को मनोरंजक लगेगी।

पहला क़िस्सा

सर्दी के मौसम की एक शाम के वक़्त दादाजी को अलाव के पास आग सेंकते हुए देखकर पोता उनके कंधों से लटक गया और बोला, ‘‘दादाजी, एक क़िस्सा सुनाइए न।’’ दादाजी ने मुस्कराकर कहा, ‘‘नहीं कहूंगा, जा यहाँ से।’’
पोता, क्यों नहीं कहेंगे दादाजी ? कहना ही पड़ेगा। तभी मैं छोड़ूँगा।
दादा, ‘‘क़िस्सा सुनना है तो तू अच्छा लड़का क्यों नहीं बनता ? शरारतें क्यों करता है? पढ़ाई-लिखाई क्यों नहीं करता ?’’
पोता, ‘‘आज से मैं अच्छा लड़का बनूँना दादाजी। शरारत नहीं करूंगा। पढ़ाई-लिखाई करूँगा। आप क़िस्सा सुनाइए।’’
दादा, ‘‘सच कह रहा है न ?’’

पोता, ‘‘सच कह रहा हूँ। आप आज एक क़िस्सा सुनाकर देख लीजिए, मैं सच कह रहा हूँ। मगर आपको रोज़ अलाव के पास बैठकर मुझे एक क़िस्सा सुनाना पड़ेगा।’’
दादा, ‘‘ठीक है। हम दोनों के बीच यह करार हुआ-मैं रोज़ एक क़िस्सा सुनाऊँगा, और तू रोज़ पढ़ेगा-लिखेगा, शरारत नहीं करेगा, अच्छा लड़का बनेगा। आज का क़िस्सा सुन।’’-

पतरस चिड़िया और ब्राह्मण


एक जगह ग़रीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। एक दिन ब्राह्मण गाँव जा रहा था, तब एक पतरस चिड़िया एक रोहू मछली पकड़कर एक खेत में खाने की तैयारी कर रही थी। ब्राह्मण ने चिड़िया की चोंच से मछली छीन ली। मुँह का आहार छिन जाने पर निराश होकर चिड़िया ने आकाश की तरफ़ देखते हुए कहा, ‘‘दूसरे को तकलीफ़ देना अच्छी बात नहीं है।’’
उस दिन के बाद चिड़िया काम-काज छोड़कर केवल मछली के बारे में सोचती रहती और ब्राह्मण को शाप देते हुए अपने आप से कहती, ‘‘जिस तरह तूने मुझे निराश किया, तू भी उसी तरह निराश होगा।’’

मछली के बारे में सोचते-सोचते पतरस चिड़िया सूखकर दुबली हो गई और एक दिन मर गई। जबकि ब्राह्मण मछली को घर ले गया और खुशी के साथ मछली को खाया। कुछ दिनों के बाद ब्राह्मण के घर बेटा पैदा हुआ। लड़का देखने में इतना सुन्दर था कि जो उसे देखता, गोद में उठा लेता था। माँ-बाप उसे देखकर भूख-प्यास भूल जाते।
धीरे-धीरे लड़का बड़ा हो गया। रूप-गुण से भरपूर लड़के को देखकर माँ-बाप की खुशी का ठिकाना नहीं था। लड़का इतना प्यारा था कि माँ-बाप उस पर जान छिड़कते थे। लड़का जब सुदर्शन युवक बन गया तभी विधाता की विडंबना के चलते निष्ठुर काल ने ब्राह्मण-ब्राह्मणी की खुशी छीन ली। जिस दिन लड़का मरा, उसके बाद माँ-बाप के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। दोनों ने खाना-पीना छोड़ दिया और दिन-रात दोनों छाती पीटते हुए अधमरे हो गए।

‘‘पत्थर दिल यम ने हमें जीते जी जला दिया, अगर सुबह शाम उसे कूटा जाए तो उसे कैसा लगेगा।’’ यह कहकर ब्राह्मण रोज ऊखल में मूसल पटकते हुए कहने लगा कि यम का कलेजा कूट रहा है।
ब्राह्मण को इस तरह रोते-झींकते मूसल पटकते देख एक रात यम ने सपने में ब्राह्मण से कहा, ‘‘तुम जो मूसल पटकते हुए लगातार बेटे के लिए रो रहे हो। उस बेटे को देख पाओगे, सिर्फ़ तुम्हें मेरी बात माननी होगी-कल तुम भीतर से दरवाजा बंद कर अपने पूजाघर में सोना और तीन दिन तक किसी को भी वहाँ जाकर जगाने नहीं देना।’’

अगले दिन ब्राह्मण ने सपने के बारे में विस्तार से ब्राह्मणी को बताया और उसी के अनुसार पूजाघर के भीतर जाकर सो गया। जब ब्राह्मण को गहरी नींद आई, तब एक यमदूत ब्राह्मण का शरीर वहीं छोड़कर उसकी आत्मा को यमपुरी लेकर चला गया। यमपुरी में ब्राह्मण ने न जाने कितने सारे नज़ारे देखे, कहीं पापी को यमदूत कूट-कूटकर चटनी बना रहे थे। तो कही भयंकर पापी की जीभ में काँटा घुसेड़कर उन्हें घसीटकर नरककुंड में डाल रहे थे। झुंड बनाकर यमदूत घूम रहे थे, शोर-गुल मचा रहे थे। इस तरह जगह-जगह अजीब-अजीब मंज़र देखकर ब्राह्मण के होशो-हवास उड़ गए और हवा में पीपल के पत्ते की तरह डर के मारे वह काँपने लगा।

यमदूत उसे यमराज के पास ले गया। डर के मारे थरथर काँप रहे ब्राह्मण को देखकर यमराज ने उससे कहा, ‘‘पुजारी डरो मत। तुम जरा उन नौजवानों की तरफ देखो, क्या उनमें तुम्हारा बेटा भी है ?’’
ब्राह्मण ने उधर देखा तो अपने बेटे को मौजूद पाया। बेटे को देखकर ब्राह्मण ने खुश होकर यमराज से कहा, ‘‘जी महाराज, वह है मेरा बेटा।’’
ब्राह्मण का जवाब सुनकर यमराज ने कहा, ‘‘उसे यहाँ बुलाओ, अगर न आए तो वहां जाकर बुला लाओ।’’
ब्राह्मण ने बेटे को पुकारा, मगर वह नहीं आया, तब उसके पास जाकर बोला, मेरे बच्चे मैं आया हूँ, न तू मेरे साथ चल।’’
ब्राह्मण ने तीन-चार बार इस तरह कहा, मगर बेटे ने उसकी तरफ़ देखा ही नहीं तब उसे हाथ से पकड़कर ब्राह्मण ने कहा, ‘‘मेरे बच्चे, इधर देखो तो, मैं हूँ तेरा बाप !’’

यह सुनकर बेटे ने बाप की तरफ़ देखकर झुँझलाकर कहा, ‘‘तू मुझे बेटा क्यों कह रहा है ? मैं तेरा बेटा नहीं हूँ। कभी तूने पतरस चिड़िया को तकलीफ़ पहुँचाकर उसके मुँह का आहार छीन लिया था, उसी का बदला लेने के लिए मैं तेरा बेटा बनकर पैदा हुआ था। अब याद आया न ? तूने जिस तरह मेरे मन को तकलीफ़ पहुँचाई थी, उसी तरह मैं तेरे मन को तकलीफ़ पहुँचाकर चला आया।’’
बेटे का जवाब सुनकर ब्राह्मण उदास हो गया और यमराज के पास आकर बोला, ‘‘वह मेरा बेटा नहीं है।’’
ब्राह्मण की बात सुनकर यमराज ने उससे कहा, ‘‘तुम लोग बेवजह मुझे कोस रहे थे, अब पता चल गया न, किसका कसूर था ?’’

इतना कहकर यमराज ने दूत को इशारा किया और दूत ब्राह्मण की आत्मा लेकर फौरन उसके पूजाघर में पहुँच गया। ब्राह्मण के शरीर में उसकी आत्मा डालकर यमदूत चला गया। जागते ही ब्राह्मण ने ब्राह्मणी के सपने का सारा हाल बता दिया और उसके बाद ब्राह्मण-ब्राह्मणी ने दिवंगत बेटे की याद में आँसू बहाना बंद कर दिया।

दूसरा क़िस्सा


पोता, ‘‘दादाजी, कल का क़िस्सा बढ़िया था। आज भी एक सुनाना पड़ेगा न।’’ दादा, ‘‘तू सुनेगा ही। मैं बात का पक्का हूं, तू भी बात से मुकरना नहीं।’’

एक हाथी और उल्लू


एक नदी के किनारे एक पेड़ के खोह में एक उल्लू रहता था। उस पेड़ के नीचे गजेन्द्र नामक हाथी हमेशा पानी पीने के लिए आता था। एक दिन वह पेड़ पानी की तरफ़ झुक गया। जिस पेड़ पर उल्लू का बसेरा था। लाचार होकर उल्लू ने हाथी से दोस्ती करके उसकी मदद से पेड़ को सीधा करवा लिया। उस दिन से हाथी और उल्लू में गहरी दोस्ती हो गई। एक दिन पार्वती के बाघ ने सपने में देखा कि वह गजेन्द्र हाथी का सिर खा रहा है। स्वप्न फल के बारे में जब उसने महादेव से पूछा तो महादेव बोले, ‘‘जब सपना देखा ही है, तुझे गजेन्द्र का सिर खाने के लिए मिलेगा। जा, खा ले।’’

महादेव की बात सुनकर बाघ नदी के किनारे आ गया और हाथी की राह देखने लगा। उधर से जब हाथी पानी पीने के लिए आया तब बाघ ने हाथी से कहा, ‘‘भैया, सपने में तेरा सिर खाया था, हकीकत में भी खाऊँगा या नहीं, जब महादेव से पूछा तो उन्होंने मुझे खाने की आज्ञा दे दी है, इसीलिए अब मैं तुझे खाऊँगा। तुझे जो करना है जल्दी कर ले।
बाघ की बात सुनकर हाथी डर गया और कुछ बोले बगैर खड़ा रहा। उल्लू ने दोस्त को डरा हुआ देखकर बाघ से कहा, ‘‘ठीक है, जब महादेव ने तुम्हें खाने के  लिए कहा है तो खा लेना, इसमें कोई बात नहीं है, मगर यह सच है या झूठ, हमें एक बार महादेव से पूछना चाहिए। इसीलिए, चलो, हम तीनों महादेव के पास जाते हैं।’’

बाघ उल्लू की बात से सहमत हो गया और तीनों महादेव से मिलने रवाना हो गए। मगर उल्लू दोनों को पीछे छोड़कर सबसे पहले महादेव के पास पहुँच गया और वहाँ सोने का ढोंग करके सिर नचाने लगा।

महादेव ने पूछा, ‘‘उल्लू तुझे क्या हुआ है ?’’ उल्लू ने नींद से चौंककर जागने का नाटक करते हुए कहा, ‘‘प्रभु मैं अभी सपने में पार्वती से ब्याह रचा रहा था, क्या हकीकत में भी ब्याह रचा पाऊँगा ?’’
महादेव ने कहा, ‘‘सपने में ब्याह कर लिया तो क्या हुआ ? ब्याह नहीं होगा।’’

उल्लू ने कहा, क्यों ? तो बाघ ने जो सपने में गजेन्द्र का सिर खाया, फिर हकीकत में उसे खाने का मौका कैसे मिल गया ?’’
महादेव बोले, ‘‘ओह, बाघ भी गजेन्द्र को खा नहीं सकता।’’
तभी बाघ और हाथी आ गए। जब बाघ ने सुना कि वह हाथी को खा नहीं सकता तो उदास हो गया। हाथी उल्लू के साथ खुश होकर लौट आया।

तीसरा क़िस्सा


पोता, ‘‘दादाजी, कल आपने छोटा-सा क़िस्सा सुनाकर पीछा छुड़ा लिया। आज लंबा क़िस्सा सुनाना पड़ेगा, नहीं तो छोड़ूँगा नहीं।’’
दादा,‘‘ठीक है सुन, आज लंबा क़िस्सा सुना रहा हूँ।’’

महाचोर


किसी देश में कुछ चोर रहते थे। उनके बीच एक माहिर चोर था। उसे छोटे चोर ‘महाचोर’ कहकर पुकारते थे। उसका एक बेटा था। वह भी उस विद्या में बाप के बराबर हो गया था। बाप ने एक दिन सोचा, ‘‘मेरे मरने के बाद मेरा बेटा मेरा नाम रोशन कर पाएगा या नहीं, इसकी जाँच करनी चाहिए।’ यही सोचकर एक दिन बेटे को पास बुलाकर कहा, ‘‘बेटे, अब मेरी उम्र खत्म होती जा रही है, क्या मेरे बाद तू मेरा नाम रोशन कर पाएगा ? और अपने वंश की इज़्ज़त को क़ायम रख पाएगा ?’’
बेटे ने जवाब दिया, ‘पिताजी, आपने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया है, इसीलिए आपकी विद्या की लाज रखनी पड़ेगी। नहीं तो लोग आपको भी भूल जाएँगे और मुझ पर भी हँसेगे।’’
यह सुनकर खुश होते हुए बाप ने कहा ‘‘मेरे बच्चे, मुझे उम्मीद है तू मेरे नाम की लाज रख पाएगा। मगर इसके लिए तुझे परीक्षा देनी होगी, तभी मेरे मन का संदेह दूर हो पाएगा।’’

एक दिन बाप ने बेटे की परीक्षा लेने के लिए अपने घर के तमाम बरतनों में पानी भर दिया। बेटे को घर से बाहर कर दिया और भीतर से दरवाज़ा बंद कर सो गया। जब आधी रात का वक़्त हुआ तो बेटा चोरी करने के लिए तैयार हुआ। उसने घर की तरफ देखकर सोचा, सेंध मारने के सिवा कोई चारा नहीं है। सेंध मारेगा भी तो बाप खुद ही चोर है, अगर जाग गया तो उसका भागना मुश्किल हो जाएगा। यही सोचते हुए दूसरे उपाय पर विचार करते हुए वह पास के जंगल से लंबा सरकंडा ले आया। सरकंडे को लेकर वह धीरे-से छत पर चढ़ गया और जहाँ बरतन रखे हुए थे, उसी जगह एक सुराख बनाकर सरकंडे की सहायता से बरतनों का पानी चूसने लगा। बाप की नींद नहीं खुली, तो उसने सुराख की चौड़ाई बढ़ा दी और उसमें घुसकर दीवार के सहारे घर में पहुँच गया। धीरे-से दरवाज़ा खोलकर वह बरतनों को बाहर ले गया। इसके बावजूद बाप की नींद नहीं टूटी तो एक रस्सी लाकर उसने बाप के हाथ-पैर बाँध दिए और इस तरह उठाकर बाहर ले आया कि बूढ़े को पता ही नहीं चला कि वह बिस्तर पर सो रहा था या कहीं और था। जब उसने बूढ़े को जमीन पर पटक दिया, तभी बू़ढ़े की नींद खुली और बेटे की तारीफ़ करते हुए सामान भीतर ले जाकर सो गया।

इस तरह बाप-बेटे मिलकर अपना काम करने लगे। एक दिन बाप-बेटे ने राजा के महल से रानी के ज़ेवर चुराने के लिए सेंध लगाया। बहुत दूर से सेंध खोदते हुए वे तेज़ी से रानी के पलंग के नीचे से बाहर निकले। पलंग के नीचे से बाप-बेटे ने देखा कि रानी की दोनों बेटियाँ सो चुकी थीं, दीए का तेल ख़त्म हो चुका था और वह बुझनेवाला था, रानी भी सोने की मुद्रा बना रही थी। उधर कोई पहरेदार भी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी पलंग के नीचे से निकलकर बाप ने रानी के शरीर से ज़ेवर सरकाकर बेटे को दिया, मगर गले का हार निकाल नहीं पाया। हार खींचने के लिए उसने हाथ बढ़ाया, रानी जाग गई और ‘कौन है, कौन है’ कहकर चिल्लाने लगी।

बाप-बेटे परेशान हो गये। पहरेदार दौड़ते हुए वहाँ पहुँच गए। बूढ़ा भागने के लिए सेंध में घुस गया, मगर पहरेदारों ने उसका पैर पकड़ लिया। जब उन लोगों ने बूढ़े का पैर पकड़ लिया, तब बेटा काफ़ी सोच-विचार कर बूढ़े का सिर काटकर ले गया। राजा के पहरेदारों ने जब पैर खींचकर बूढ़े का शरीर सेंध से बाहर निकाला तो उसका सिर नदारद पाया। इसीलिए चोर की पहचान करना कठिन हो गया। उसी पल राजा को सारा हाल बताया गया।
राजा ने सिपाहियों को बुलाकर हुक्म दिया ‘तुम लोग चारों तरफ जाओ, कहीं आदमी रो रहा हो, कहीं कोई आग जला रहा हो, खबर करना। जहाँ किसी को लकड़ी में आग लगाते देखना या किसी को रोते हुए देखना, फौरन पकड़कर मेरे पास ले आना।’’ यह सुनते ही सिपाही आदेश का पालन करने के लिए चले गए।

उधर महाचोर का बेटा बाप का सिर लेकर माँ के पास पहुँचा और सारा हाल सुनाया। यह सुनते ही माँ जोर-जोर से रोने लगी, तभी बेटा माँ के पैर पकड़कर कहने लगा, ‘‘माँ, अब मैं पितृहंता हूँ। तुम अगर ज़ोर सो रोओगी तो राजा के सिपाही आएँगे और मेरी जान ले लेगें। फिर भी अगर तुम रोना चाहो तो रोओ।’’
यह सुनकर माँ ने किसी तरह रुलाई रोकी और बेटे से बोली, ‘‘बेटा मेरे दिल में इतनी तकलीफ़ है कि कुछ देर नहीं रोऊँगी तो चैन नहीं पा सकूँगी।’’
बेटे ने माँ को समझाते हुए कहा कि वह बाद में भी रो सकती है और अगर उसे रोना ही है, तो मौके को देखकर रोए। इस तरह दोनों ने अपनी तकलीफ़ को छिपाने की कोशिश की।

अगले दिन माँ ने गुड़ और चावल का भार बनाया, जिसे बेटे के कंदे पर रखा और उसके पीछे-पीछे लकड़ी बटोरने के बहाने चलने लगी। तभी बेटा फिसल गया और गुड़की गगरी टूट गई। इस बात के लिए माँ ने बेटे की पिटाई की और इसी बहाने दोनों जोर-जोर से रोने लगे। इस बीच रुलाई की आवाज़ सुनकर राजा के सिपाही आ गए। रुलाई का कारण पूछने पर उन्हें पता चला कि किसी की मौत की वजह से वे रो नहीं रहे थे। वे गरीब लोग थे, गुड़ की गगरी टूट गई, इसीलिए वे रो रहे थे। सिपाहियों ने माँ-बेटे पर तरस खाते हुए उन्हें दो कौड़ी दे दी और चले गए।

तीसरा दिन हो गया। मगर बेटा बाप की अंतिम क्रिया नहीं कर पाया था। वह दुविधा में फँसा था। आग जलाएगा तो राजा के सिपाही पकड़ लेंगे। काफ़ी सोच-विचार कर उसने तय किया कि आग लगाने के साथ-साथ वह पिंड भी देगा। यही सोचकर वह बाप का सिर जंगल के बीच ले गया, काफ़ी लकड़ियों के नीचे बाप के सिर को रख दिया और ऊपर दो पात्रों में मूँग दाल, जोहा चावल रखकर नीचे आग लगा दी।

जब सिर जलने लगा, तब इंसानी मांस जलने की गंध चारों तरफ फैल गई। गंध पाकर सिपाही पहुँच गए। आते ही उन्होंने देखा, वहाँ किसी आदमी को नहीं जलाया जा रहा था, बल्कि एक संन्यासी शरीर पर भस्म लेपकर चिलम पीते हुए आग के पास बैठा हुआ था। उन लोगों ने भक्तिभाव के साथ संन्यासी को प्रणाम किया। संन्यासी ने भी उन्हें आशीर्वाद देते हुए करीब बुलाया और चिलम का कश लगाने के लिए कहा, फिर प्रसाद खाने के लिए कहा।
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  जोहा चावल-एक तरह का ख़ुशबूवाला चावल।

जब बाप का सिर जल गया तब सिपाहियों को संन्यासी ने भात खिलाकर भेज दिया। इसके बाद घर लौटकर बेटे ने माँ को सारा हाल सुनाया तो मां ने राहत की साँस ली।
बाप के श्राद्ध करने का समय आ गया। इसके लिए उसने सारी तैयारी की और महीने के अंत में रात में श्राद्ध करने का निश्चय किया। राजपुरोहित को रतौंधी की बीमारी थी। श्राद्ध के दिन रात में वह ब्राह्मण को कंधे पर उठाकर ले आया। ब्राह्मण के घर से महाचोर के घर तक आने में एक नदी और एक गड्ढा पार करना पड़ता था।

बेटे ने ब्राह्मण को सात बार नदी और ग़ड्ढे को पार करवाया और हर बार नदी तथा गड्ढा का अलग-अलग नाम बताया। उसके बाद घर पहुँचकर ब्राह्मण के हाथों श्राद्ध करवाकर राजा के घर से चुराए गए ज़ेवर ब्राह्मण को देकर कंधे पर उसे लादकर राजमहल के दरवाज़े पर छोड़ गया। अगले दिन वह खुद भी राजमहल के बाहर एक कोने में जाकर चुपचाप बैठ गया।
सुबह राजा के पहरेदारों ने देखा, राजा का पुरोहित राजा के महल से चुराए गए गहने पहनकर महल के दरवाज़े पर बैठा हुआ था। यह ख़बर राजा को दी गई। राजा ने फौरन आकर देखा, बात सच थी। पुरोहित ने बताया कि रात में कौन उसे वहाँ छोड़कर चला गया, वह नहीं जानता था।

राजा ने भंगियों की बैठक बुलाई।
आखिरकार चोर को खोजने का कोई उपाय नहीं सूझने पर राजा ने चोर की तारीफ़ करते हुए कहा, ‘‘अगर मुझे वह चोर मिल जाए, तो मैं सचमुच कहता हूँ उसे अपना महामंत्री बना दूंगा।’’ यह सुनते ही महाचोर का बेटा धीरे-से उठा और राजा को दंडवत् प्रणाम करते हुए बोला, ‘‘महाराज ! काटिए या मारिए मैं ही वह चोर हूँ।’’
सारे दरबारी चकित हो गए, राजा अवाक् रह गया। मगर अब वह क्या कर सकता था ? वचन दे चुका था, इसीलिए उसे महामंत्री बनाना पड़ा।

चौथा क़िस्सा


दादा, ‘‘कल का क़िस्सा कैसा लगा ? लंबा था न ?’’
पोता, ‘‘अच्छा लगा, मगर आज कुछ और लंबा क़िस्सा हो तो और अच्छा लगेगा। आज उससे भी लंबा क़िस्सा सुनाना होगा।’’
दादा, ‘‘सुनाता हूँ, सुनो।’’

बूढ़ा-बूढ़ी ने बेर का बीज बोया


एक बूढ़ा था और एक बूढ़ी थी। एक दिन दोनों भिक्षा के लिए गए तो बूढ़े को एक बेर का बीज मिला और बूढ़ी को एक कौड़ी मिली। घर लौटकर दोनों ने एक जगह जमीन खोदकर बेर के बीज और कौड़ी को गाड़ दिया। आखिरकार कौड़ी गल गई, बेर के बीज से पौधा अंकुरित हुआ जो पेड़ बना और बाद में बेर लगने लगे।
बूढ़ा बेर की रखवाली करने के लिए किसी को ढूंढ़ रहा था तभी ऊपर से एक कौवे को उड़कर जाते देख बूढे ने पूछा, ‘‘अरे कौवे अरे कौवे तू मेरे बेर की रखवाली करेगा ?’’
उसने फौरन जवाब दिया, ‘‘बेशक।’
बूढ़े ने कहा, ठीक है तू ज़रा अपनी आवाज़ तो सुना।’’

तब वह काँव-कांव करने लगा। उसकी आवाज़ सुनकर बूढ़े को गुस्सा आ गया और बोला,-‘‘जा जा, जा, तू तो मेरे बेर ही खा जाएगा।’’
उसके जाने के बाद एक बगुले को ऊपर से उड़ते हुए देखकर बूढ़े ने पूछा, ‘‘अरे बगुले, तू मेरे बेर की रखवाली कर पाएगा ?’’
बगुले ने उत्तर दिया, ‘‘कर पाऊँगा, न करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।’’
बूढ़े ने कहा, ‘‘ठीक है, तू ज़रा अपनी आवाज़ तो सुना।’’
तब बगुला ‘कक कक’ की आवाज़ सुनाने लगा। पहले की तरह बूढ़े ने कहा, ‘‘तू तो मेरे बेर खा ही जाएगा।’’ इतना कहकर बूढ़े ने उसे खदेड़ दिया।
आखिरकार एक उल्लू को ऊपर से उड़कर जाते हुए देखकर बूढ़े ने उससे पूछा, ‘‘अरे उल्लू तू मेरे बेर की रखवाली कर पाएगा ?’’
उल्लू ने कहा, ‘‘अगर तुम कहो तो मैं रखवाली कर सकता हूँ।’’

बूढ़े ने कहा, ‘‘ठीक है, तू जरा अपनी आवाज़ तो सुना।’’ उल्लू बोलने लगा-
‘‘कहते हैं मुझे उल्लू लोग।
मुझसे डरे सारे लोग।।’’
उसकी आवाज़ सुनकर बूढ़े ने उसे रखवाली का काम सौंप दिया। उल्लू बेर की रखवाली करने लगा।
एक दिन एक राजा हिरण का शिकार करने गया। जब वह उस पेड़ के नीचे पहुँचा तो उसने अपने आदमी को पेड़ पर चढ़कर बेर तोड़ने के लिए कहा। राजा के आदमी बेर के पेड़ के ऊपर आधा ही चढ़ पाए थे, तभी उल्लू ने झपट्टा मारकर उनकी आँखें फोड़ दीं। लोग लाचार होकर नीचे गिर पड़े।
जब राजा ने यह देखा तो अपने लोगों से कहकर उस उल्लू को पकड़वाया और रानी के हवाले करते हुए बोला, ‘‘आज शाम मुझे यह भूनकर देना होगा।’’

राजा फिर शिकार करने चला गया। राजा की सात रानियाँ एक साथ बैठकर हंसी-मजाक कर रही थीं। उन्हें वैसा करते देख उल्लू ने भी धीरे से आवाज़ लगाई, दीदी मैं बहुत मीठा गीत गा सकता हूँ। नाच भी सकता हूँ।
यह बात सुनकर मनोरंजन के लिए रानियों ने उल्लू को आजाद कर दिया। उल्लू देर तक उनके सामने घूम-घूमकर नाचता रहा। जब रानियाँ नाच का लुत्फ उठा रही थीं, तभी वह उड़कर भाग गया।
तब रानियाँ परेशान हो उठीं। किसी तरह एक मेंढ़क की खोज कर उन्होंने उसे भूना और शाम के वक़्त राजा को भात के साथ खाने के लिए दिया।
सुबह उठकर राजा लोटे में पानी लेकर मुँह धो रहा था, तभी उल्लू उड़ता हुआ आया और राजा से बोला, ‘‘अरे राजा, कल तू मुझे खा नहीं पाया, मेंढ़क भुना हुआ खा पाया।’’
चकित होकर राजा ने एक-एक कर सभी रानियों से पूछा, मगर छोटी रानी के सिवा किसी ने सच्ची बात नहीं बताई। राजा को ग़ुस्सा आया और उसने बड़ी रानियों को हाथी से कुचलवाकर मरवा दिया और छोटी रानी को महारानी का दर्जा दे दिया।

पाँचवा क़िस्सा


पोता, ‘‘दादाजी, कल आपने मुझे बुद्धू बनाया। लंबा क़िस्सा सुनाने के नाम पर छोटा-सा क़िस्सा आपने सुना दिया। उसी क़िस्से के बराबर आज अगर मैंने पढ़ाई की होती तो आपको कैसा लगता ?’’
दादा, ‘‘कैसा नादान लड़का है तू रे ! क़िस्सा छोटा होने से क्या उसकी अहमियत कम हो जाती है ? थोड़ा-सा सोना बहुत सारे लोहे के बराबर होता है। खैर सुन, आज एक लंबा क़िस्सा ही सुनाता हूँ।’’

राक्षस पंडित


सतयुग में एक राक्षस था। वह मनुष्य का वेष धारण कर ‘पंडित’ नाम रखकर एक राजा के नगर में गया और एक पाठशाला की स्थापना की। राक्षस पंडित उस पाठशाला में सभी विद्यार्थियों को पढ़ाता था, मगर विधवा के लड़कों को नहीं पढ़ाता था। उस नगर में एक विधवा का एक लड़का था। विधवा बेटे को पढ़ाना चाहती थी, मगर पंडित के नियम के बारे में सुनकर वह उदास हो गई।





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