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अमरबेल तथा अन्य कहानियाँ

जया मित्रा

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :138
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2128
आईएसबीएन :81-8143-350-5

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प्रस्तुत है कहानी-संग्रह...

Amarbel Tatha Anya Kahaniyan a hindi book by Jaya Mitra - अमरबेल तथा अन्य कहानियाँ - जया मित्रा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हाल से बाहर निकलते वक्त प्रमा के मन में अचानक उस कलाकृति के प्रति तीव्र आकर्षक महसूस हुआ। उसने पीछे मुड़कर शिशु की बगल में उसके प्रति सम्पूर्ण समर्पित उस माँ को देखा। मूर्तिकार ने उसके सारे कोनों को घिसकर उसकी पूरी देह में भरपूर लावण्य को उभार दिया था। गोलाकार सृष्टि की तरह सारी रेखाओं को पूर्णता प्रदान करने वाला फॉर्म। कितना नन्हा शिशु था। जैसे वह माँ के शरीर में खो गया था। शिशु तो उपलक्ष्य मात्र था। मातृत्व का यही सर्वश्रेष्ठ रूप था। सीढ़ियों से उतरते वक्त अपना क्षोभ, दूर खड़े रहने का कष्ट सुपर्ण छिपा नहीं पाया।

क्या सोच रही थी ? पहले यहाँ कभी आ चुकी हो, क्या उस बारे में ?
साँझ ढलनेवाली थी। सदर्न एवेन्यू से होकर उनका स्कूटर आगे बढ़ रहा था। माँ और उसकी गोद में उसका नन्हा बच्चा। कितना निश्चित। प्रमा को इतनी देर बाद लगा जैसे वह भी उस बच्चे की तरह हो। उसे अपनी माँ बेहद याद आयी। और उस वक्त सुपर्ण के सीने से तेज हवा टकरा रही थी,  उसने दोनों हाथ स्कूटर के हैण्डिल को कसकर जकड़े हुए थे, तब सुपर्ण की पीठ कर प्रमा अपना चेहरा छिपाये अपने अनजाने सन्तान के वियोग में अपनी उमड़ती हुई रूलाई को किसी तरह सँभाल नहीं पा रही थी।


अमरबेल


साँझ ढलने के वक्त कौसानी के गाँधी आश्रम के आहाते-नीचे टूरिस्ट बसों का पहुँचना शुरू हुआ। सुसज्जित महिला-पुरुष सैलानी बसों से बाहर निकलकर उस छोटी ढलवी चढ़ाई को पार करके आश्रम के अहाते में एकत्र होने लगे। टूरिस्ट एजेंसियों के विज्ञापनों में वहाँ के सूर्योदय और सूर्यास्त का विशेष उल्लेख होता था। इसलिए कण्डक्टेड टूर के अतिथियों को वहाँ के सूर्यास्त और सूर्योदय को दिखलाने के कार्यक्रम का उन्हें पालन करना पड़ता था। सौन्दर्यपिपासु यात्रीगण सौन्दर्य के सूचीपत्र को गिनकर देखने के बाद ही उन्हें रुपये देते थे, लिहाजा बादलों के कारण सूर्यास्त नजर न आने पर या बरसात के कारण सूर्योदय न देख पाने पर कंडक्टेड टूर के यात्रियों को अक्सर गाइड पर दोषारोपण करते हुए अनसूया ने सूना था। यहाँ तक कि वहाँ से दो सौ चालीस किलोमीटर विस्तृत जो बर्फीले शिखर नजर आते थे, उनमें एवरेस्ट या कंचनजंघा न होने के कारण एक दिन एक प्रौढ़ सज्जन को बेहद नाराज होते हुए भी देखा था। उनकी बातों से लग रहा था जैसे किसी ने उन्हें धोखा दिया हो मगर वह गाइड था या कौसानी या फिर हिमालय यह ठीक से समझ में नहीं आया। अगर किसी को एवरेस्ट और कंचनजंघा नजर न आये तो फिर हिमालय का क्या मतलब ! पंचोली, गोथूनी, त्रिशूल, देवीस्थली, चौखम्बा—भला यह सब देख कर क्या होगा ? इन शिखरों का कोई नाम भी जानता है ?

इसीलिए साँझ ढलने के ठीक पहले टूरिस्ट बसें वहाँ आती थीं। उस दिन का सूर्यास्त तथा अगले दिन का सूर्यास्त दर्शन कराने के बाद वे अल्मोड़ा के डीयर पार्क या रानीखेत के व्यू पाइण्ट का नजारा दिखलाने के लिए रवाना हो जाती थीं। एक रात के ऐसे टूरिस्टों को गाँधी आश्रम में रहने की जगह नहीं दी जाती थी। आश्रम के विशाल बगीचे में खड़े होकर सूर्यास्त और सूर्योदय देखने के बीच की रात में विश्राम के लिए ज्यादातर बस वाले अपने यात्रियों को वहाँ से लगे प्रशान्त होटल में ठहरा देते थे। वहाँ पर सामने के बगीचे में स्थित बार-बे-क्यू का मजा भी अन्य उपलब्ध मौज-मजे के साथ बोनस के रूप में प्राप्त हो जाता था।

सूर्यास्त देखने की मुग्धता में उनके ‘‘बेहद एक्सलेण्ट, हाउ नाइस’’ की पुलक और तालियों की आवाज़ से जैसा माहौल बनता था, उसमें आश्रम के पेड़ों पर बसेरा करने वाले पंक्षी गप्प गोष्ठी करके देर से घर आने वाले लड़कों की तरह अपने ठिकाने पर लौटते थे। अपने थोड़े दिनों के प्रवास में अनसूया ने भी ऐसा ही किया। दिन भर बगीचे में पड़े रहकर सूर्यास्त होने के कुछ क्षण पहले, बूढ़े फर की छाया जब लम्बी होकर नीचे भोजन कक्ष की ऊँचाई तक पहुँचती थी और पहाड़ी हवा में एक विचित्र-किस्म की खामोशी उतर आती थी, तब अनसूया धीरे-धीरे आश्रम की चौहद्दी छोड़कर बगल के सड़क पर चली आती थी। उस सड़क से कुछ दूर ढलान पर पैदल चलने के बाद नीचे एक गाँव पड़ता था। वहाँ से हर सुबह तरुणियों का झुण्ड, कभी-कभी बूढ़े लोग भी चढ़ाई पार कर ऊपर चले आते थे। अक्सर उनकी पीठ पर छोटा या बड़ा गोई गट्ठर होता था। ठीक साँझ ढलने के पहले वे सब अपने गाँव जाने के लिए उस झलवा सड़क पर उतर जाते। अनसूया उतनी दूर नहीं जाती थी। उस सड़क के दो घुमावदार मोड़ पार करके नीचे एक जगह जाकर बैठ जाती थी। फिर जब सूरज डूबने को होता तो वह उठकर ऊपर चली जाती थी।

गाँधी आश्रम के विपरीत दिशा में सड़क के उस पार एक मकान की छत नजर आती थी। सड़क के समानान्तर। वह मकान सड़क से नीचे था, पहाड़ की ढाल पर। सड़क के दो हाथ लम्बे एक तख्त से होकर उस मकान की छत पर पहुँचा जा सकता था। वहाँ पर स्कूल की तरह लम्बी बेंच और लम्बी मेज रखकर अलग से एक चाय की दुकान खोल ली गयी थी। तीन-चार लड़के मिलकर उसे चलाते थे। क्या उनमें से कोई ढलान पर बने उस मकान का मालिक था और बाकी उसके दोस्त, जो कहीं और रहते थे, जिन्होंने उस छत को किराये पर लेकर दुकान खोली थी, अनसूया ने यह जानने की कोशिश नहीं की। वह इन चार-पाँच दिनों से वहाँ आकर बैठने लगी थी, वह इस बारे में इनसे पूछ सकती थी, मगर उसका मन ही नहीं हुआ। टूरिस्टों के ‘वाह-वाह’ के शोर से बचने के लिए अपने कमरे से निकल कर शाम ढलने के वक्त जब वह इस दुकान से चाय का गिलास लेकर यहाँ बैठती थी तब उसकी निगाहें बीच की विस्तृत खुली जगह को पार करके सीधे त्रिशूल तक पहुँच जाती थी तब उसके और उस हिममण्डिक शिखर माला के बीच में जैसे उसका सबकुछ विलीन हो जाता था—
कभी-कभी शिखरों के गले के पास तथा ऊपर हल्के गुलाबी रंग के एक टुकड़े को देखकर अनसूया के गले के पास तथा ऊपर हल्के गुलाबी रंग के एक टुकड़े बादल को देखकर अनसूया के गले में भी एक नामालूम-सी पीर उठने लगती थी। कुछ ही महीनों के लिए खुलने वाले इस चाय की दुकान की घुन खायी मेज के आड़े-तिरछे निशानों को देखकर ऐसा लगता था कि बारीक अक्षरों में खुदी हुई कोई प्राचीन लिपि हो।

थोड़ा धैर्य रखकर कोशिश करने पर शायद उन्हें पढ़ा जा सकता है। अनसूया हाथ में चाय का गिलास लेकर चुपचाप बैठी रहती थी। इसके बाद सूरज डूब जाने पर आसमान में बची-खुची लालिमा के भी मिट जाने के बाद वह उठकर सड़क के उस पार के छोटे ढलवाँ रास्ते से होती हुई आश्रम के भोजन कक्ष से लगे उस लम्बे-चौड़े अहाते में पहुँचती थी। वहाँ पर कुछ सन्तरे के पेड़ थे, जिसके नीचे बिना पीठ की बेंच पड़ी हुई थी। रसोई में काम करनेवाले लोग दोपहर के थोड़े फुर्सत के समय वहाँ आकर बैठते थे। वहाँ से पहाड़ से होती हुई एक बेतरतीब सीढ़ी आश्रम के उस विस्तृत बगीचे तक पहुँचती थी। उस खुले मैदान जैसे अहाते में लोगों के रहने के लिए कमरे, प्रार्थना घर, दफ्तर वगैरह बने हुए थे। वहाँ से पूर्व की ओर देखने पर पहाड़ों की कतारें नजर आतीं थीं। बीच की काफी खुली जगह के उस पार पहले गहरा हरा रंग नजर आता था, इसके बाद नीला। उसके पीछे इस पार से उस पार तक सफेद पर्वत शिखर चमकते रहते थे—पता नहीं किसकी यह उक्ति थी कि ये पृथ्वी के मेरुदंड हैं।

इस वक्त  कृष्णपक्ष की शुरुआत थी। अभी भी चाँदनी में सबकुछ नजर आता था। इसके अलावा इन कुछ ही दिनों में पैरों के नीचे की सड़क का भी थोड़ा बहुत अन्दाज़ हो चुका था। अनसूया को पता था कि वह छोटी-सी चढ़ाई सन्तरे के पेड़ के नीचे जहाँ जाकर खत्म होती थी, ठीक वहाँ दाहिनी ओर एक पत्थर के बगल में एक जंगली पेड़ था। उसके पत्ते काफी हद तक पालक के पत्तों की तरह लगते थे लेकिन वे काफी खुरदरे थे। वह पेड़ भी देखने पर पालक के पौधे की तरह ही लगता था। उसके बीच में फुट भर ऊँची डण्ठल पर एक कली सिर उठाये हुए नजर आती थी। अकेली वह देखने में काफी पुष्ट और गोल-मटोल थी लेकिन अभी तक वह हरेपन से ही आच्छादित थी। अनसूया ने पहले उस पर ध्यान नहीं दिया था, बाद में रोज आते-जाते उस कली पर निगाह जरूर पड़ती। बाद में उसके मन में एक कौतूहल या आग्रह पनप गया था कि देखें कि उस कली में किस रंग का फूल खिलता है। जाने क्यों उसे लगता था कि उस कली में या तो हल्के पीले रंग का या आसमानी नीले रंग का फूल छिपा है किसी बड़े पाउडर पफ की तरह रोयेंदार।

हालाँकि ऐसा कोई भी फूल उसने पहले नहीं देखा था। वैसे उसने अभी तक देखे ही कितने फूल थे। भागमभाग मची रहती। बचपन में स्कूल जाने, फिर कॉलेज पार करके नौकरी ढूँढ़ते फिरने, पिताजी की पेंशन लेने, इस तरह ऑफिस जाने का सारा समय ही तो सुबह की भागमभाग और दिनभर की भागदौड़ के बाद शाम को थककर चूर होकर लौटने में ही बीत गया। अंजन कहा करता, कलकत्ता शहर में साहबों द्वारा लाकर लगाये गये कितने ही दुर्लभ फूलों के पेड़-पौधे हैं। उसने अनसूया को विक्टोरिया मैदान तथा डलहौजी मुहल्ले में स्थित जॉब चार्नक के कब्रखाने के पास बैठने या पैदल चलने के दौरान ऐसे ही कितने फूल दिखलाये थे। उसके नाम या उन फूलों में से उसने सबको देखा भी था या नहीं, यह भी उसे याद नहीं। वे सारे पेड़ सड़क के किनारे घावों के निशान की तरह खड़े थे।

ये सारी बातें अब वह सोचना नहीं चाहती थी। उन्हें अपनी यादों से मिटाने के लिए ही वह अपनी सारी परिचित जगहों और लोगों को छोड़कर यहाँ चली आयी थी। एक ऐसी सुन्दर जगह में। निरंतर जगह-जगह भ्रमण करते हुए वह खुद को यही दिखाना चाहती थी कि यह दुनिया कितनी बड़ी है, यहाँ पर कितने प्रकार के लोग हैं, उनके तरह-तरह के सुख-दुख हैं। आखिर वह अपनी यन्त्रणा को क्यों नहीं स्वीकार कर पा रही है। इतना समय बीतने के बाद भी उसके घाव क्यों इतने हरे हैं ? इस भागमभाग के युग में जब क्षण भर के लिए रुककर अपने प्रिय व्यक्ति के चेहरे की ओर देखने की भी फुर्सत किसी को नहीं है, ऐसे समय किसी को भुलाने के लिए दो साल का समय क्या कम होता है ?

2


सूर्योदय के आध घण्टे बाद ही गाँधी आश्रम का विशाल बगीचा धूप से भर जाता था। बायीं ओर के दुमंजिले घर के पीछे के एकमंजिले में एकत्र टूरिस्ट, जिनमें से ज्यादातर सूर्योदय की शोभा निहारने के बाद फिर से अपने कमरों में जाकर सो गये थे, उनमें से कुछ लोग पहाड़ी सड़क पर सुबह की सैर करके लौटे थे, ऐसे सभी लोग अब एक-एक करके अपने कमरों से बाहर निकल रहे थे। बगीचे के एक तरफ दो बड़ी-बड़ी केटलियाँ लेकर फौजी अभी आता ही होगा। ठण्डी हवा में सिहरते हुए सभी लोग उस पेड़ के नीचे जमा होंगे। फिर अपने-अपने बर्तनों में चाय लेकर लोग इधर-उधर बिखर जाएँगे। इस कार्यक्रम में अब ज्यादा देर नहीं थी। अनसूया बगीचे के एकदम किनारे, जहाँ एक नीची मुँडेर पहाड़ की ढलान और होकर बगीचे के छोर को विभाजित करती थी, वहाँ खड़ी अपने सामने के दूर शिखरों को देख रही थी। वहाँ से पीछे मुड़कर भीतर आते वक्त उसने मैंनेजर दुबेजी को देखा, जिनके हाथ में एक पुरानी गन्दी बाल्टी थी, जिसमें वे पेड़ के नीचे पड़े सूखे पत्तों और टूटी डालों को बड़ी एहतियात से रखते जाते। वे इस वक्त उस बाल्टी में बगीचे में पड़ी कॉच की बोतलों और हवा में गिरकर बिखर गये जूठे पत्तलों को उठाकर रख रहे थे। उनके चेहरे पर गुस्सा तो नहीं, मगर वेदना जरूर थी। यह सब उन उत्साही ही टूरिस्टों की कृपा थी जिनकी मौज-मस्ती की शुरूआत शराब से होती थी।

 वह भी अगर किसी ऐसे आश्रम में जहाँ माँस-मदिरा निषिद्ध हो, वहाँ पर शराब अगर गोश्त के साथ पी जाए तो इससे ज्यादा रोमाँचकारी स्थिति और क्या हो सकती थी। लेकिन अनसूया इस तरह की मानसिकता को समझ नहीं पाती थी। लोगों को जाने क्यों वे ही बातें अच्छी लगती हैं, जो गलत होती हैं या जिसे करने में औरों को तकलीफ होती है। कुछ विशेष लोगों की ऐसी ही मानसिकता होती है। मगर किसी ताकतवर व्यक्ति या संस्थान से टकराने की ऐसे लोगों में हिम्मत नहीं होती। वे उनके अन्याय को भी पी जाते हैं। लेकिन जो कमजोर होते हैं, जिन्हें पीड़ा सहने की आदत होती है, जो किसी प्रकार का बदला नहीं ले सकते, उनके जतन से सहेजे फूलों के बगीचे में गोश्त की हड्डियाँ किसी हँसमुख किशोरी से गंदी बातें करके, दस साल पुराने किसी विश्वस्त कर्मचारी बिना किसी संकोच के अपने व्यंग्य वचनों से आहत करके उन्हें क्या हासिल होता है !

दुबेजी ने आँखें उठाकर अनसूया की ओर देखा। उन्होंने अपनी बाल्टी और कुदाली को नीचे रखकर अपने दोनों हाथ जोड़कर उसे नमस्कार किया। अनसूया को याद आया कि पहले दिन दुबेजी ने उससे कैसा रूखा व्यवहार किया था। कलकत्ता से वह अपने कई परिचितों के साथ घूमने निकली थी। उसके साथ के बाकी लोग दिल्ली चले गये थे। वे वहाँ से मथुरा, वृन्दावन, देहरादून, रानीखेत, नैनीताल घूमते हुए दस दिन बाद कोसानी पहुँचने वाले थे। यहाँ एक रात बिताकर यहाँ से सूर्योदय का दृश्य देखकर फिर एकसाथ काठगोदाम से ट्रेन पकड़कर वापस लौटने की उनकी योजना थी। अल्मोड़ा से बस से यहाँ अकेली आते वक्त अनसूया के मन में एक क्षीण विश्वास था कि वह चूँकि पहले ही आश्रम में एक पत्र लिख चुकी थी, इसलिए उसके लिए यहाँ एक कमरा जरूर सुरक्षित होगा मगर दिन में ग्यारह बजे पहुँचकर अपना सूटकेस ढोते हुए बस स्टैण्ड से यहाँ की इतनी चढ़ाई पार करने के बाद, जब वह यहाँ पहुँची तो पाया कि उसकी चिट्ठी दफ्तर के एक कोने में जमीन पर पड़ी हुई थी।

‘‘वहाँ पर चिट्ठी भेज देने से आरक्षण नहीं होता। यह कोई होटल या होली डे होम नहीं है।’’ आश्रम के प्रबन्धक ने भावविहीन चेहरे से कहा था। बाद में जरूर उन्होंने एक बड़े कमरे में अन्य दो महिलाओं के साथ उसके रहने का इन्तजाम कर दिया था।
‘‘आज यहीं रहिए, कल दूसरी जगह खाली हो जाने पर मिल जाएगी।’’ उन्होंने यह भी कहा था कि आश्रम में रहने वालों से वो लोग वहाँ के कुछ नियमों का पालन करने की अपेक्षा रखते हैं। सामान्य कुछ व्यावहारिक नियम, किसी प्रकार की धार्मिक आचारसंहिता नहीं, जैसे कि निरामिष भोजन करना, अगर स्वास्थ्य सम्बन्धी विविशता न हो तो सभी के साथ भोजन कक्ष में बैठकर खाना हो सके तो शाम को उनके साथ भजनसंगत में शामिल होना इत्यादि-इत्यादि। इनमें से कुछ भी अनसूया के लिए असुविधाजनक नहीं था। वहाँ पर भोजन न मिलने पर भी वह दो दिन यूँ ही कुछ रूखा-सूखा खाकर गुजार सकती थी। उसने किसके साथ बैठकर क्या खाया, यह उसके लिए कोई समस्या नहीं थी। अपनी प्रतिदिन की उबाऊ दिनचर्या से निकलने के लिए ही तो वह घर से निकली थी।

नियमित दिनचर्या और अर्थहीन कोलाहल को पीछे छोड़कर एकदम निरर्थक सभी सम्पर्कों से परे कुछ दिन सिर्फ अपने साथ बिताने के लिए ही इतनी लम्बी दूरी तय करके वह यहाँ चली आयी थी। उसे ठीक से याद नहीं कि कौसानी का नाम उसे किसने सुझाया था लेकिन विभिन्न जगहों के बहुचर्चित और कम चर्चित नामों के बीच उसने यहीं आना क्यों बन्द किया, यह कहना मुश्किल है। यहाँ पर क्या बात थी, उसने यहाँ सात-आठ दिन बिताने की बात क्यों सोची थी, अनसूया को खुद नहीं पता। उसे इतना ही पता था कि यहाँ पर रहने के लिए एक गाँधी आश्रम है, जहाँ से करीब ढाई सौ किलोमीटर लम्बी बर्फीली पर्वत श्रृंखला नजर आती है। इधर से गुजरने वाले सैलानी वहाँ एक दिन जरूर रुकते हैं। इसके अलावा यहाँ लोगों की उतनी भीड़ भी नहीं होती।

अल्मोड़ा तक तो बेहद भीड़ रहती है। यह पर्वतीय शहर जैसे कदमों में लिपटता आगे बढ़ता ही जा रहा है। वह मन ही मन आशंकित भी थी कि कहीं ऐसा न हो कि यहाँ भी इस यात्रा के अन्त में कोई उससे गलत उम्मीद लगाये न बैठा हो।
यहाँ आकर उसे बहुत अच्छा लगा था। शायद इसीलिए पहले दिन उसे नया कमरा देते वक्त दुबेजी ने कहा था, ‘‘यह होटल नहीं है कि यहाँ जब तक चाहे कोई पड़ा रहे। हम लोग यहाँ सिर्फ तीन दिनों के लिए ही किसी को ठहरने की इजाजत दे सकते हैं। यहाँ पर लोग अपनी छुट्टियाँ बिताने नहीं, मन की शान्ति के लिए आते हैं।’’
तभी उसके मुँह से ऐसी एक बात निकल गयी थी जिसके बारे में उसने क्षण भर पहले भी सोचा नहीं था, ‘‘और अगर कोई ऐसा अभागा हो जिसे तीन दिनों में भी शान्ति न मिल पाए तो ?’’
दुबेजी कुछ देर तक उसे देखते रह गये थे।

‘‘फिलहाल दो दिन तो रहिए।’’
कौसानी में रहते हुए चार दिन बीत चुके थे। उनके साथ मिल-जुलकर रहना उसे अच्छा लग रहा था। सुबह के वक्त वह सन्तरे के पेड़ के नीचे बैठकर रसोई के लिए टोकरी भर सब्जी काट देती थी। रसोई में सिर्फ चार लोग ही काम करते थे। वे चाय बनाते थे साथ ही नाश्ता भी वितरित करते थे। आश्रम में इन दिनों रोज करीब सौ मेहमानों की भीड़ हो जाती थी। वे लोग परेशान हो जाते थे। अनसूया दूसरे ही दिन से थोड़ा-थोड़ा करके उनका हाथ भी बँटाने लगी थी। अकेले रहने का मतलब क्या हाथ-पाँव समेटकर चुपचाप बैठे रहना होता है ? ऐसी आदत उसकी कभी थी भी नहीं। अभी भी रोज दफ्तर निकलने से पहले उसे कमरे में अरणि के बिखरे कपड़े उठाकर व्यवस्थित करना पड़ता था। रसोई के ढेरों बाहरी फुटकर कामों में उसे माँ की मदद करनी पड़ती थी। इसके पहले उसने कभी अकेले इतनी दूर की यात्रा नहीं की थी। दो-तीन दिनों के लिए दोस्तों या दफ्तर के सहकर्मियों के साथ कहीं घूमने जरूर जाती थी, मगर वह भी लम्बे अन्तराल के बाद। और कहीं नजदीक ही। लेकिन इस बार का निकलना अनसूया के लिए महज घूमने जैसा नहीं था।

वह अन्दर ही अन्दर बेहद थक चुकी थी। उसने पिछले दो वर्षों से सारी पुरानी स्मृतियों को मिटाकर जीवन को सहजता से जीने की पूरी कोशिश की थी। लेकिन क्या यह इतना आसान था ? बाईस से चौंतीस—कितने साल हुए ? इसके अलावा पुरानी यादों के सिवा उसके पास था भी क्या। वैसे शायद था सभी–घर-गृहस्थी, माता-पिता का स्नेह, पुंटली-दीदी की बेटी, अरणि के लिए उद्वेग। ये सभी उससे प्यार करते हैं। वह तो लगभग हर रोज ही एक लड़की को देखती आ रही है जो गृहस्थी के लिए तिल-तिल कर अपने को जलाती रहती है, पर दिन भर के मीठे बोल बोलने के लिए भी तो उसका कोई नहीं है। वह शादी-शुदा लड़कियों को भी देखती रहती थी, जिनसे कभी प्रेम करके तमाम वादे करके उनसे शादी की जाती थी, उनकी खुद की बनायी गृहस्थी किस तरह उन्हीं के लिए माया-ममताहीन, निस्संग और निरुपाय बन जाती थी। वह तो तब भी बेहतर स्थिति में थी। लेकिन मन समझाने से मानता कहाँ है ? अब उसे बीच-बीच में महसूस होता है कि कलकत्ता से बाहर कहीं नौकरी मिलने पर वह जरूर चली जाती। शायद यही बेहतर होता। इस शहर के हर कोने से जुड़ी पिछले दस सालों की असंख्य यादें उसे हर समय सुई की तरह बेधती न रहतीं।

यहाँ इन कुछ ही दिनों में कितने ही प्रकार के लोगों से उसका परिचय हो गया था। कुछ लोग यहाँ सिर्फ नयी जगह घूमने के इरादे से आये थे। कई ऐसे भी थे जो अपना गम, अपनी तकलीफ भुलाने के लिए बाहर निकले थे। उसे कभी-कभी लगता था कि किसी माँ बाप के अपने जवान बेटे के खो देने के दर्द या फिर जायदाद के बँटवारे को लेकर अपने ही संग भाई से अपमानित प्रौढ़ बड़े भाई के दुख से तो उसकी तकलीफ ज्यादा असहनीय नहीं थी, लगभग सारे समय बगीचे की मुँडेर के उसे बड़े चीड़ के पेड़ के नीचे ही बैठी रहीं। वे अन्धी थीं, मगर जन्म से नहीं। एक जमाने में उन्होंने इस दुनिया का रंग-रूप देखा था। सत्रह साल की उम्र में वे एक दुर्घटना में अन्धी हो गयी थीं। अब वे जरूर साठ से ज्यादा उम्र की थीं। मगर आश्चर्य, उनके चेहरे पर क्षोभ का कोई चिह्न नहीं था।
अनसूया उनसे पूछे बिना नहीं रह पायी—

‘‘आपने यहाँ कि इतनी लम्बी यात्रा तय की है, पहाड़ की ओर मुँह करके आप बैठी हुई हैं, मगर आपको तो कुछ नजर नहीं आता।’’
अपने जवाब में उन्होंने बड़े शान्त भाव से कहा, ‘‘यह जो बर्फीले पहाड़ की ओर से ठण्डी हवा आ रही है, उस हवा से ही मुझे सब कुछ दीख रहा है।’’
वे कल सुबह यहाँ से चली गयीं थीं। परसों शाम को उनके पास बैठकर अनसूया ने उन्हें एक के बाद एक कई गीत सुनाए थे। शायद उसकी आँखें भर आयी थीं या उसके गले के स्वर ने उस कानों से देखने वाली महिला को सबकुछ कह दिया होगा। वे गाना खत्म हो जाने के भी बहुत देर तक बरामदे की हल्की रोशनी में अनसूया की पीठ पर हाथ रखकर चुपचाप बैठी रहीं।
उनके चले जाने बाद अनसूया को बार-बार उनका चेहरा और उनकी दृष्टिहीन आँखें याद आती रहीं।
   

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