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नूरजहाँ

अनन्त पई

प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :31
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1921
आईएसबीएन :1234567890123

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नूरजहाँ

अनेक इतिहासकारों के कथनानुसार मुगलकालीन भारत के इतिहास में नूरजहाँ का व्यक्तित्व बड़ा ही मनमोहक रहा है। प्रशासन और राजनीति, दोनों में उसने अपनी कुशलता सिद्ध की थी। जहांगीर को अपनी बेगम पर अनन्य विश्वास था। वह राज-दरबारियों के साथ राज्य के मामलों पर विचार-विनिमय किया करती थी। शाही फरमानों पर उसके दस्तखत होते थे। उस काल के इतिहासकार, मतमद खां के अनुसार, 'उसकी सत्ता उस जगह पहुंच गई थी जहाँ बादशाह तो सिर्फ नाम का रह गया था।'

नूरजहाँ की सुंदरता और बुद्धि, दोनो ही चर्चा के विषय थे। वह बड़ी सुंदर कविता भी करती थी। गुलाब का इत्र नूरजहाँ की माँ ने ईजाद किया था. पर उसे लोकप्रिय नूरजहाँ ने बनाया। कसौदाकारी में उसका हाथ बहुत ही सधा हुआ था और उसके बनवाये हुए कपड़े और पोशाके वर्षों फैशन की दुनिया पर छाये रहे।

जैसा अब्दुल रशीद ने कहा है, 'तथ्यों और कल्पना ने इस बहुरंगी व्यक्तित्व के चारों ओर रुमानी जाल बुन दिया है। जिन प्रचलित कथाओं से प्रस्तुत रचना तयार की गई है, उनके अनुसार नूरजहां और जहांगीर बचपन में साथ खेले थे। किन्तु जो प्रामाणिक सामग्री मिलती है उसके अनुसार दोनों की पहली भेट मीना बाजार में हुई थी। यह बाजार हर वर्ष बादशाह अपने महल में अपने परिवार के लिए लगवाया करता था।

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