आस्था चिकित्सा शास्त्र - बी. एल. वत्स Astha Chikitsa Shastra - Hindi book by - B. L. Vats
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आस्था चिकित्सा शास्त्र

बी. एल. वत्स

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1751
आईएसबीएन :81-7457-188-4

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केवल आस्था से ही चिकित्सा हो सकती है? यह जिज्ञासा विदेशों के लिए नई है और वहाँ ‘फेथहीलिंग’ पर कई प्रयोग चल पड़े हैं किन्तु हमारा देश तो इस विद्या में विश्वगुरु है...

Aastha Chikitsa Shastra-A Hindi Book by B.L. Vats - आस्था चिकित्सा शास्त्र - बी. एल. वत्स

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


क्या केवल आस्था से ही चिकिस्ता हो सकती है ?
यह जिज्ञासा विदेशों के लिए नयी है और वहाँ ‘फेथहीलिंग’ पर कई प्रयोग चल पड़े हैं किन्तु हमारा देश तो इस विद्या में विश्व गुरु है। ‘अर्थर्ववेद’ आस्था चिकित्सा का विश्वकोष ही है। इसी का आधार ग्रहण करते हुए कठिन-कठिन रोगों का केवल आस्था, मंत्रो, यज्ञों द्वारा, अथवा विश्वविख्यात औषधियों के सेवन द्वारा उपचार किया जा सकता है। संसार का कोई रोग ऐसा नहीं जिसका आस्था द्वारा उपचार न हो सके। कृत्या, शाप-मुक्ति, महारोगों का उपचार एवं नये-नये रोगो का निदान भी आस्था द्वारा सम्भव है। लेखक ने इस कृति में अपने व्यवहारिक अनुभव जोड़कर कृति की उपादेयता बढ़ा दी है।

प्राक्कथन


आस्था चिकित्सा विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा विधि होने के साथ-साथ अधुनातम इसलिए क्योंकि ‘अर्थर्वद’ में इससे सम्बन्धित सैकड़ों सूक्तों में चिकित्सा विधि, मंत्र-प्रयोग, औषधि प्रयोग आदि का भी निर्देश है। रोगी इन सूक्तों का इतनी बार पाठ करे कि ये कंठाग्र हो जायें। किसी वेद-ऋचा से पूर्व ‘ॐ’ लगा देने से वह मंत्र बन जाती है। जहाँ आहुतियाँ देने की बात विशेष रूप से कही गई हो वहां मंत्र जाप संख्या का दशांश हवन भी करें और हवन करते समय हवन कुण्ड में आहुतियाँ ‘स्वाहा’ शब्द के साथ (स्वाहा बोलते हुए) डालें।

विश्वधर्मों का अवलोकन करने पर प्राचीनतम गायत्री मंत्र ही ऐसा मंत्र ठहरता है जो सृष्टि का प्रचीनतम मंत्र है इसमें युगों-युगों के लिए सुख, शान्ति सम्पन्नता, प्राप्ति के अगणित निर्देश सन्निहित हैं। इसे कल्याण निर्देश सन्निहित हैं। इसे किसी भी धर्म में सम्प्रदाय को अपनाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक कल्याणकारी पाठक इसे बेझिझक अपना सकता है और देवताओं के भारी बोझ से बचकर स्वास्थ्य लाभ कर सकता है।

आस्था केवल चिकित्सा में ही नहीं अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के लिए अनिवार्य है। हमने अपने स्वनुभव जोड़कर इस प्रणाली को सर्वोपयोगी औ व्वरिक बनाने का यथाशक्ति प्रयत्न किया है।
हम भगवती पॉकेट बुक्स के आभारी हैं कि उन्होंने इसे प्रकाशित करके लोकमंगल का अनुपम अनुष्ठान सम्पन्न किया है। पाण्डुलिपि तैयार करने में निशीथ वत्स ने बड़ा परिश्रम किया है, हम उनके कृतज्ञ हैं। जिन रचनाकारों एवं प्रकाशकों की कृतियों का इसके प्रणयन में उपयोग हुआ है हम उनके प्रति आभारी हैं।

ॐ मातरं भगवतीं देवीं, श्री रामञ्चजगदगुरुम्।
पादपद्मे तयोः श्रित्वा प्रणमामि मुहुर्भुहुः

डॉ० बी० एल० वत्स

1
क्या अनास्था रोगों के कारण हो सकती है ?


आस्था संकट ने आज समग्र विश्व को अशान्त, हताश, व्यग्र और तनावग्रस्त बना रखा है। आज के युग की प्रधान बीमारियां हैं- रक्तचाप, हताश, व्यग्र और तनावग्रस्त बना रखा है। आज के युग की प्रधान बीमारियाँ हैं- रक्तचाप, हृदयरोग कैंसर और डिप्रेशन। इन रोगों की उत्पत्ति में प्रधान रूप से अनस्था ही काम करती है उसने भौतिक सुविधाओं को भले ही बढ़ाया हो, आध्यात्मिक आस्था को दुर्बल बनाया है। विज्ञान ने जब मनुष्य को एक पेड़-पौधा मात्र बनकर रख दिया और उसके भीतर किसी आत्मा को मनने से इन्कार कर दिया, ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकृत किया, इन सृष्टि को सब कुछ अणुओं की स्वाभाविक गतिविधि के आधार पर स्वसंचालित बताया तो स्वभावतः विज्ञान को प्रत्यक्ष विज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर अतिप्रमाणिक मानने वाली बुद्धि वादी नयी पीढ़ी उसी मान्यता को शिरोधार्य क्यों न करेगी ? प्रत्यक्ष है कि विचार शील वर्ग अनास्थावान होता चला जा रहा है और यह एक भयानक परिस्थिति हैं क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग के पीछे जनता व अन्य वर्गों के चलने के लिये विवश होना पड़ता है। आज के थोड़े से अनास्थावान बुद्धिजीवी कल-परसो अपनी मान्यताओं से समस्त समाज को अच्छादित किए हुए होंगे।

अनास्थावाद की विभीषिका इतनी भयानक है कि इसकी भावी संभावनाओं का स्मरण करने मात्र से आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है। शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुँह ढंककर ‘खतरा टल गया’ ऐसा सोचना मूर्खता है। सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा ऐसी मान्यता वास्तविक से दूर है। अपने आप सब कुछ ठीक होने वाला होता तो सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक लाखों वर्षों में मनुष्य अपने आपको सभ्यता के उच्च स्तर तक ले आने में समर्थ हो गया होता। ऋषियों ने लाखों वर्षों तक तप, त्याग, मनन, चिन्तन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्त्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जनमानस में प्रविष्ट कराने के लिए अगणित साधु-महात्माओं ने तिल-तिल करके जीवन जलाया है, अगणित धर्म ग्रंथ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने समझाने तथा समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिए अगणित मानववादी परम्पराओं या रीतिरिवाजों, प्रतिक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्म-काण्डों का प्रचलन किया है। लगातार उस विचारधारा से समपर्क बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा तैयार किया है।

यदि ऋषियों द्वारा प्रादुर्भूत संस्कृति का अविर्भाव न हुआ होता तो अन्य प्रदेशों की जंगली जातियों की तरह जनसमाज पशु-प्रवत्तियाँ अपनाये होता और उसकी बौद्धिक विशेषता पतनोन्मुखी इस संसार में पैशाचिक कुकर्मों की आग जला रही होती। ईश्वर अपने आप सबकुछ कर लेगा यह सोचना ठीक नहीं। गत 80 वर्षों में संसार का 80 फीसदी भाग बौद्धिक एवं राजनैतिक स्तर पर साम्यवादी शासन के अन्तर्गत आ गया। जिस तीव्र गति चक्र घूम रहा है, उसे देखते हुए अगले 20 वर्षों में शेष 20% भाग भी उसी मान्यता के क्षेत्र में चला जा सकता है।

बुद्धिवाद और विज्ञान के द्वारा प्रतिपादित उन मान्यताओं के सम्बन्ध में हमें सतर्क होना होगा जो मनुष्य को अनास्थावान एवं अनैतिक बनाती हैं। विचारों को विचारों से, मान्यताओं से और प्रतिपादनों से काटा जाना चाहिये। समय-समय पर यह हुआ भी है। वाममार्गी विचारधारा को बौद्धों ने हटाया और बौद्ध धर्म के शून्यवाद का समाधान जगद्गुरु शंकराचार्य के प्रबल प्रयत्नों द्वारा हुआ। बाह्य संघर्षों की पष्ठभूमि में मूलतः यह विचारधारएँ काम करती हैं। देशों और जातियों का उत्थान-पतन उनकी आस्थाओं और प्रवृत्तियों के आधार पर ही होता है, होता रहा है और हो सकता है।

उत्कृष्ट आदर्शों के प्रति अनास्था उत्पन्न करने वाली आज की बुद्धिवादी और विज्ञानवादी मान्यता जिस तेजी से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती चली जा रही है उसकी भयंकरता की दुर्घर्ष संभावना का मूल्यांकन कम नहीं किया जाना चाहिये। उसके खिलाफ एक मोर्चा खड़ा नहीं किया जा सका, उसे सफलता न मिली तो परिणाम प्रत्यक्ष है। कुछ ही दिन हम जंगली संस्कृति के नागरिकता के पशु-प्रवृत्तियों के पूरी तरह शिकार हो जायेंगे और लाखों वर्षों की मानवीय संस्कृति आत्मदाह करके अपना करुण अंत प्रस्तुत करेगी।

प्रचीन काल में श्रद्धा, शास्त्र, आप्त वचन, जन मान्यता के आधार थे। अब यदि दिमाग, तर्क और प्रमाण उसके आधार बन गये हैं तो कोई कारण नहीं कि आज दिमाग, तर्क और प्रमाण उसके आधार बन गये हैं तो कोई कारण नहीं कि आज की जनमनोभूमि के अनुसार अध्यात्म-सिद्धान्तों का प्रतिपादन और कोई कारण नहीं कि आज कि जनमनोभूमि के अनुसार अध्यात्म-सिद्धान्तों का प्रतिपादन और समर्थन न किया जा सके।
आज अध्यात्म का प्रतिपादन जिन आदर्शों पर जिस ढंग से किया जाता है, वे जनमानस में गहराई तक प्रवेश नहीं करते। कथा-पुराणों, धर्मशास्त्रों किंवदन्तियों, परम्पराओं की प्रामाणिकता पर अब लोगों के मन में सन्देह उत्पन्न हो गया है। वे उन्हें किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों की ऐसी कल्पनाएं मानते हैं, जिसकी उपयोगिता एवं वास्तविकता प्रामाणिक नहीं होती। आज हर व्यक्ति तर्क, प्रमाण एंव विज्ञान को आधार मानता है। इस युग में कोई भी मान्यता केवल इन तीन आधारों पर ही प्रामाणिक एवं ग्राह्म बन सकती है। गत 40 वर्षों में विज्ञान ने अति तीव्र गति से प्रगति की है और उसका हर चरण अध्यात्म के समर्थन की ओर बढ़ा है। यदि यह प्रगतिक्रम जारी रहा तो अगले 50 वर्षों में अध्यात्म और विज्ञान दोनों इतने समीप आ जायेगे कि दोनों का एकीकरण एंव समन्वय असंभव न होगा। अणुविज्ञान के आचार्य आइंस्टीन की नवीन खोजों ने अणुसत्ता की पीठ पर एक सचेतन उत्कृष्ट सत्ता के (ईश्वर के) अस्तित्व को स्वीकार किया है और इस दिशा में बहुत कुछ काम हुआ है पर ये उतने ऊँचे स्तर के क्षेत्र में है कि सर्वसाधारण तक उसकी जानकारी लम्बे समय बाद पहुँचेगी और तब तक अनास्थावादी मान्यताएं इतनी प्रखर हो जायेंगी कि उन्हें हटाना तथा मिटाना संभव न होगा।

दर्शन और तत्वज्ञान के उदगम से ही कोई विचार पद्धति एवं आचार प्रक्रिया प्रादुर्भाव होती है। इसी के प्रतिपादन के लिये वेद, उपनिषद् दर्शन, ब्राह्मण, आरण्यक होती है। इसी के प्रतिपादन के लिये वेद, उपनिषद, दर्शन, ब्राह्मण आरण्यक आदि का आविर्भाव हुआ। ईश्वर जीव प्रकृति के विभिन्न भेद, उपभेदों की चर्चा रही। दर्शन ही विचार और आचार का मूल आधार है इसलिये ईश्वर, आत्मा, धर्म, स्वभाव, कर्मफल आदि के दर्शनिक सिद्धान्तों को सही ढंग से प्रतिपादित करना होगा। संसार कि दिशा मोड़ने वाले दार्शनिकों ने मानवीय आस्थाओं का मूलभूत विश्लेषण अपने ढंग पर किया है और यदि वह लोगों को ग्राह्म हुआ तो जनसमूह की गतिविधि भी उसी दिशा में सोचने, करने और बढ़ने के लिये प्रेरित प्रभावित होगी। हम अध्यात्म के दार्शनिक सिद्धान्तों का विज्ञान तर्क एवं प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादन कर सके तो निःसन्देह जनमानस को पुनः उसी प्रकार सेचने और करने को तत्पर किया जा सकता है जिस पर कि भारतीय जनता तक आरुढ रहकर समग्र विश्व का प्रकाश पूर्ण मार्गदर्शन करती रही है।


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