कैसे सँवारे बच्चों का भविष्य - श्यामा चोना Kaise Sanvaren Bachchon ka Bhavishya - Hindi book by - Shyama Chona
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कैसे सँवारे बच्चों का भविष्य

श्यामा चोना

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :134
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1719
आईएसबीएन :00000000

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प्रस्तुत है कैसे सँवारे बच्चों का भविष्य...

Kaise Savarey Bachho ka Bhavisya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस पुस्तक में अभिभावकों, छात्र-छात्राओं की समस्या, मार्गदर्शन, शिक्षकों की अहम भूमिका तथा पारिवारिक वातावरण से संबंधित अनुभवों का रोचक वर्णन है। इसमें नकारात्मक स्वभाव, अपने साथी से ईर्ष्या एवं द्वेष-भावना और अनुशासनहीनता आदि बच्चों के स्वाभाविक विकारों को दूर करने के लिए क्या करना चाहिए, बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास के लिए किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए तथा साथ ही किस अनावश्यक नियंत्रण का त्याग करना चाहिए-इस बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

भूमिका

बचपन और अभिभावकता इस जीवन के दो ऐसे पहलू हैं, जिनसे होकर गुजरना ही पड़ता है। इसी सफल यात्रा के लिए कुछ पहलुओं के अनुभव आधारित विचारों की प्रस्तुति की गई है।
यह संभव नहीं कि अभिभावक अपने बच्चों की समस्याओं के निवारण हेतु विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करें, बल्कि कुछ व्यावहारिक, मौलिक, वैयक्तिक और तर्कसंगत तथ्यों को अपने जीवन में आत्मसात् किया जाए।
यह निर्विवाद है कि बच्चों के विकास व उत्थान के लिए अभिभावक को प्रेम और आधारभूत व्यावहारिक ज्ञान की आवश्यकता है, जिससे उनके नन्हे भविष्य को अपना व्यक्तित्व निखारने में मदद मिलती है। मैं व्यक्तिगत रूप से ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘दैनिक हिंदुस्तान’ का आभार प्रकट करती हूँ, जिसने उन अनुभव आधारित लेखों को अपने नियमित स्तंभ के अंतर्गत छापा है। साथ ही, मेरे दिल्ली पब्लिक स्कूल में तीस साल के शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यकाल का ही यह प्रतिफल है और इसका श्रेय उन्हें मिलता है जिन छात्र व अभिभावकों के निरंतर संपर्क ने उनकी समस्या, गंभीरता और संबंध की सार्थकता जैसे विचार-मंथन को समझने के लिए प्रेरित किया।

इन लेखों में अभिभावकों, छात्र-छात्राओं की समस्या, मार्गदर्शन, शिक्षकों की अहम भूमिका तथा पारिवारिक माहौल से संबंधित-शोधित अनुभव का वर्णन है, जो सफलता और आनंद के पट को खोलने में मदद करता है।
हमें इस विचार-मंथन को पढ़कर यह जानकारी मिलती है कि बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास के लिए किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए साथ ही किस अनावश्यक नियंत्रण का त्याग करें।
यहाँ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी कि सही अभिभावकता के लिए उचित समय प्रयोग और निरंतर प्रयास नितांत आवश्यक है। माता-पिता के सुखद व सामंजस्यपूर्ण व्यवहार और अचार-विचार से बच्चों में अनोखे व्यक्तित्व का विकास होता है, जिसकी खुशबू हर पल आनंद प्रदान करती है।
यह अतिशयोक्ति नहीं है कि माता-पिता एक सुदृढ़ परिवार का निर्माण कर सकते हैं, जो उन्हें बच्चों के प्रखर व्यक्तित्व बनाने से ही प्राप्त होता है। इसके लिए बच्चों के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, वैचारिक और सामाजिक-सभी पहलुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
-डॉ. श्यामा चोना


अपने बचपन की कहानी से बच्चे को उत्साहित करें

आप अपने बचपन की कहानी बच्चे को सुनाएँ, क्योंकि वे बचपन की कहानियों को बहुत ही दिलचस्पी के साथ सुनते हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि आज की दुनिया में भी कोई बात आराम और सुकून देती है। खासकर बच्चे अपने पिता के बचपन की कहानियों को सुनकर अपने आपको उसी समान बनाने लगते हैं, जो उनके लिए प्रेरणादायक साबित होता है। बच्चे अपने माता-पिता और दादा-दादी के बचपन के सुंदर कार्यों के बारे में सुनकर काफी प्रभावित होते हैं। वे अपने आपको पिता के समान उत्साही तथा दादी की तरह उदार बनाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा, जब अभिभावक अपने बच्चे को बचपन की कहानी सुनाते हैं तो इसका प्रभाव बच्चे की मानसिकता तथा कार्यशैली पर अधिक गहरा पड़ता है। आप अपने बच्चे को कहानियों के माध्यम से इस प्रकार प्रभावित करें, जिससे कि उनकी प्रतिदिन की समस्या स्वतः सुलझ जाए।

पारखी बनें

जब कभी आप बच्चे के साथ किसी चीज की साझेदारी करें तो खुश होकर करें। आप बच्चे को हर समय डाँटते नहीं रहें और न ही दादी ने जो बैगन की सब्जी बनाई है, जो बच्चे को पसंद नहीं है, फिर भी उसे जबरदस्ती खिलाने की कोशिश करें, या उसकी बहन को आपातकालीन स्थिति में डालें और बच्चे को जबरन किसी नर्सरी स्कूल में डालकर परेशान करें।

अपने बचपन की कहानियों को मधुर बनाकर प्रस्तुत करें

अगर आप बचपन में स्कूल के पहले दिन डरे हुए नहीं थे, फिर भी अपने बच्चे के डर को दूर करने के लिए बताएँ कि किस प्रकार आपने इस संकट को दूर किया था। आप यह भी सुनाएँ कि स्कूल के पहले दिन आपका कोई भी मित्र नहीं था, लेकिन धीरे-धीरे किस तरह आपके कई अच्छे मित्र बन गए और पाँचवें जन्मदिन के अवसर पर उनके इकट्ठे होने पर कितनी खुशी हुई थी। अपने बच्चे को यह बताएँ कि आप किस तरह स्कूल के पहले दिन रो पड़े थे; लेकिन बाद में आप स्कूल जाना पसंद करने लगे थे, क्योंकि वहाँ के सभी शिक्षकों से आपको प्यार हो गया था। इस प्रकार आपके बचपन की कहानियाँ बच्चे की समस्या और डर को दूर करने के साथ-साथ उन्हें सही प्रेरणा देंगी।

प्रसन्नतापूर्वक समझाएँ

आप अपने बच्चे को प्रसन्नतापूर्वक कहानी सुनाएँ और यह बतलाएँ कि वे किस तरह प्रतिकूल स्थिति का सामना करके आज तक सही मार्ग पर चलते रहे हैं। कई बार आपको वैसी कहानियाँ भी सुनानी पड़ेंगी जो सुखद नहीं हों। इस संदर्भ में आपको अपने बंधुओं की दुःख भरी दास्ताँ को भी बतलाना होगा। उदाहरणस्वरूप, अर्जुन जिसकी अँगुली कार के दरवाजे में चिपक गई थी, अस्पताल लेकर जाने से ही ठीक हुई। लेकिन यह उचित है कि आप बच्चे को ऐसी कहानियों को सुनाने के बजाय प्रेरणादायक बातें ही बतलाएँ, जिससे उनके अंदर छिपा डर निकल जाए।

जो आपने कहा वह याद रखें

हमेशा याद रखें कि जो कहानी आज आपने बच्चे को सुनाई है वह दो महीने बाद बच्चे के अनुरोध पर फिर से सुनानी पड़ेगी। आप कभी अपने बच्चे को झूठी कहानी नहीं सुनाएँ, जैसे कि आप स्कूल के पहले दिन से ही शेर की तरह आते-जाते थे।
याद रखें कि आपके बच्चे की मानसिकता और सोच पर इस कहानी का बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

बच्चों के साथ धैर्य बरतें

बच्चों के साथ धैर्य रखना एक कठिन कार्य है; लेकिन अगर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अनुशासित रहें तो यह संयम आवश्यक है। आप जो कुछ भी उनसे कहें, कार्य रूप में स्पष्ट जरूर करें। माता-पिता सिर्फ अपने कथन द्वारा ही नहीं वरन् कार्यशैली से भी बच्चों की सोच और व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि वे बच्चों के साथ धैर्य और सकारात्मक व्यवहार रखें। बच्चो के साथ निरंतर प्रयास और धैर्य रखने से ही उनके व्यक्तित्व में निखार आ सकता है। ऐसा देखा गया है कि अधिकतर माता-पिता इसी गुण से वंचित रहते हैं।

जबकि बच्चे कई बार एक ही तरह की गलती करते हैं, फिर भी माता पिता को उनके साथ समरूप व्यवहार और धैर्ययुक्त प्रयास करते रहना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा गलतियों को सुधारने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। जब आप अपनी बेटी को पाँच बजे शाम तक घर वापस आने का आदेश देते हैं तो इस पर अडिग रहें। कई अभिभावक बच्चे के तनिक देर हो जाने से उनके साथ झंझट करना पसंद नहीं करते हैं, बल्कि वे यह सोचते हैं कि यह कोई बड़ा अपराध नहीं है। लेकिन यह बात सही नहीं है, क्योंकि जो समस्या चाहे छोटी हो या बड़ी, कल पर टाल दी जाती है वह वास्तव में टलती नहीं है। जब आप किसी एक बच्चे के साथ सख्ती से बरताव करने लगते हैं तो दूसरे बच्चे भी इस व्यवहार को देखकर सीखते हैं। दिल्ली पब्लिक स्कूल में शिक्षिका के रूप में जुड़ने के एक साल के बाद की एक घटना का मैं जिक्र करना चाहती हूँ कि मैं एक बार बच्चों से भरी एक बस लेकर पिकनिक के लिए गई। इसी बस में रवि नाम का एक लड़का भी था, जो थोड़ी देर के बाद कुछ हरकत करने लगा। कई बार रवि को चेतावनी दी गई। लेकिन उसने मानने से इनकार कर दिया। अंत में शिक्षिका ने कहा कि अगर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा तो बस वापस चली जाएगी और फिर उसे घर वापस जाना पड़ेगा। परिणामस्वरूप, रवि की हरकतों से तंग आकर शिक्षिका ने बस को आधे रास्ते से ही लौटा दिया। इस निर्णय से सबसे पहले यह प्रभाव पड़ा कि रवि ने अपनी हरकत बंद कर दी और उसके बाद वह शिक्षिका से अनुनय-विनय करने लगा कि वह आगे से कोई भी अनावश्यक व्यवहार या हरकत नहीं करेगा। लेकिन शिक्षिका एक घंटे का रास्ता तय करके रवि को उसके घर ले गईं और फिर एक घंटा उस जगह से पिकनिक स्थल पर वापस आने में लगा। लेखिका का मानना है कि वह दो घंटे उनके जीवन काल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समय था।

शिक्षिका द्वारा सिर्फ रवि के साथ किए गए इस व्यवहार ने अन्य वच्चों के दिल-दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि प्रत्येक साल पिकनिक यात्रा में बच्चों ने शालीनता और सजगता के साथ व्यवहार किया। जब कभी भी बच्चा दुर्व्यवहार करता है तो उसके साथ तुरंत पेश आएँ। अगर आप ऐसे मौके को जाने देते हैं तो भविष्य में आपको इस बात की कीमत चुकानी पड़ेगी। आप अपने मित्र, पड़ोसी तथा दादा-दादी को किसी प्रकार से अपने बच्चों के प्रति लिये गए निर्णय या विचार को प्रभावित नहीं होने दें। यह नहीं सोचें कि चलो, इस बार इस बात को छोड़ देते हैं, वैसे तो लड़का ठीक है, सिर्फ अभी कुछ ज्यादा उत्तेजित हो रहा है। माता-पिता अपने बच्चें के भविष्य के बारे में खुद सोचें और प्रयास करें। बच्चे माता-पिता की प्रतिक्रिया को समझेंगे, अगर उनके वचन और कार्य में समरूपता होगी। अतः माता-पिता का बच्चों के साथ निरंतर प्रयास और मिलनसार व्यवहार उन्हें अनुशासित और बुद्धिमान बनाता है।

बच्चों की विभिन्न समस्याओं के लिए अभिभावक कितने जिम्मेदार हैं
‘स्नेह से वंचित बच्चे को सँभालना कोई आसान काम नहीं हैं।’ यह एक बच्चे के पिता की अभिव्यक्ति और अनुभवी कथन है। जबकि व्यक्ति पिता बनने के शौक से आनंदित हो जाता है और बच्चे के साथ जुड़े कई मनसूबे साकार होते हुए उसे नजर आने लगते हैं, क्योंकि वह अपने पिता के साथ बीते पलों को याद करके अपने पुत्र को उसी तरह देखना पसंद करता है।
लेकिन जब बच्चा बड़ा होता है तो मानो पिता के सारे सपने टूटते नजर आने लगते हैं और वह बच्चे के साथ खेलना, नाव खेना तथा पतंग उड़ाने जैसी बातों को पसंद नहीं करता है। अंततः वह इस स्थिति से काफी क्षुब्ध होता है, जब उसे अपने बच्चे के तूफानी व्यवहार को झेलना पड़ता है।

पिता के इस बयान में रूखापन है, लेकिन यह सत्य है कि आजकल इस समस्या से अधिकतर अभिभावक पीड़ित हैं। जब बच्चा छोटा होता है तो उसके माता-पिता उससे काफी उम्मीदें बाँध लेते हैं और अपने बच्चे को स्वयं से अधिक कुशाग्र, सफल तथा खुश देखना चाहते हैं। अभिभावक अपने बच्चे को सभी प्रकार से सुखी और गुणवान देखना चाहते हैं।
खासकर, जब अभिभावक अपने बच्चे के लिए विभिन्न सुंदर नामों के चयन की प्रक्रिया में व्यस्त रहते हैं और उन्हें इसके अंतर्गत बच्चे की मानसिक स्थिति में कुछ गड़बड़ी की संभावना दिखती है तो उनके सामने एक विषम संकट सा छा जाता है कि अब क्या करें ? शायद अभिभावक इस परिस्थिति को वातावरण का दोष समझकर ढाढ़स रख लेते हैं, क्योंकि इसमें उनका कोई दोष नहीं होता है।

लेखिका कई ऐसे अभिभावकों से मिल चुकी है जो इस स्थिति के लिए अपने वैवाहिक बंधन के टूटने की वजह को कारण मानते हैं, जबकि दूसरे अभिभावक का मानना है कि समय के साथ बच्चे में आई हुई मानसिक गड़बड़ी स्वतः ठीक हो जाएगी।
अगर माता-पिता का अनियमित प्यार और स्नेह इस बीमारी का कारण है तो अच्छा परिवेश बच्चे को इस संकट से दूर भी कर सकता है। कई लोग ऐसी धारणाओं पर विश्वास करते हैं; लेकिन दुर्भाग्यवश यह सच नहीं है।
न ही अभिभावक बच्चे की मानसिकता में गड़बड़ी पैदा करते और न ऐसी बीमारियों का निदान कर सकते हैं। लेकिन अभिभावक इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि बच्चे को उनके द्वारा शुरू से ही मानसिक तथा अन्य प्रकार की सलाह मिलनी चाहिए। जैसे ही बच्चे को डॉक्टरी सलाह तथा उपचार मिलने लगते हैं, वे एक सुखी तथा संतोषप्रद जिंदगी जीने लगते हैं, जो प्रत्येक माता-पिता की हार्दिक इच्छा होती है।

बच्चे की कुशाग्रता अभिभावक के हाथ में है

मैं हमेशा अभिभावकों से बच्चों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए तत्पर रहती हूँ, खासकर वे बच्चे जो कक्षा में काफी ऊँचा स्थान हासिल करते हैं। बच्चों की प्रखरता विकास से संबंधित जानकारियों को जानने में मुझे काफी दिलचस्पी रही है। बच्चों में बुद्धिमत्ता का विकास कैसे होता है और उन्हें किस तरह प्रभावित किया जा सकता है, क्योंकि कुशाग्रता का विकास सिर्फ आनुवंशिक ही नहीं माना जा सकता है। एक बच्चे के पिता ने कहा है कि जब उसकी बेटी अपनी माता के गर्भ में थी तो वह काफी पढ़ाई करते थे, जिसका प्रभाव वस्तुतः उस बच्चे पर पड़ा। और वह लड़की प्राची आज इनसाइक्लोपीडिया तक पढ़ लेती है तथा छह साल की उम्र में ही इंटरनेट से भलीभाँति परिचित हो गई है।

हाल के शोध से यह पता चला है कि जो बच्चे विशिष्ट रूप से कुशाग्र हैं उनके बचपन में घर का माहौल बहुत ही लाभकारी और सुखद रहा था। यह सही है कि बच्चे का किसी भी क्षेत्र में विशेष उपलब्धि पाना उसके माता-पिता के असीम सहयोग से ही संभव हो पाता है, चाहे वह क्षेत्र पढ़ाई का हो, कला का हो या खेल का। बच्चों के सर्वोन्मुख विकास में माता-पिता का बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। बच्चों में शुरू से ही बुद्धि के विकास के लिए किए गए प्रयास उनकी बुद्धि की क्षमता तथा उन्नति में सहायक होते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि बच्चों के मस्तिष्क पर अभिभावक के सकारात्मक व्यवहार का असर पड़े, जिससे बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानें। बच्चों में विशेष गुणों के प्रादुर्भाव के लिए माता-पिता ही जिम्मेदार हैं और इस दिशा में किसी तरह के विशिष्ट प्रयोग के तरीकों को समझना जरूरी है। सबसे महत्त्वपूर्ण है कि बच्चे और अभिभावक के बीच मधुर और घनिष्ठ संबंध हो। अगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही प्रयास जारी रहा तो शायद पूरे विश्व में एक अनोखा और अद्भुत माहौल कायम हो जाएगा।

बच्चे वास्तव में इस विश्व की धरोहर हैं और उन्हें आगे बढ़ाने में माता-पिता का सहयोग तथा प्रयास ही उन्हें सक्षम बना सकता है। माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चे को प्यार, मार्गदर्शन और उचित सलाह देते रहें। बच्चों के खान-पान, रहन-सहन सुरक्षा का विशेष ध्यान लगातार वर्षों तक रखें। माता-पिता अपने प्रेम और स्नेह द्वारा बच्चों में जागरूकता और सीखने की प्रवृत्ति को विकसित करते हैं। जब बच्चों को शुरू से ही प्रेम की शिक्षा दी जाती है तो वे जवानी में भी प्रेम से ओत-प्रोत रहते हैं और अगर कुछ भी इसके विपरीत है तो इसका उनके व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कई बार माता-पिता के प्रेम और विशेष ध्यान देने पर भी बच्चों में सामान्य विकास नहीं हो पाता है।

माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे अपने बच्चों को सामाजिक गतिविधियों द्वारा समाज के एक उन्मुक्त और उत्तरदायी नागरिक बनाने में सहायक होते हैं। लड़के और लड़कियाँ बड़े होकर अपने माता-पिता की तरह ही जीवन की भूमिका को निभाने में योगदान देते हैं।

जबकि प्रत्येक बच्चा अपने विभिन्न गुणों, बुद्धि-विवेक, शारीरिक क्षमता एवं स्वभाव के साथ पैदा होता है और यही कारण है कि वे कुशाग्रता व्यक्तित्व और अन्य गुणों में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। यद्यपि माता-पिता बच्चों के विकास और भविष्य निर्माण में काफी सहायक होते हैं, लेकिन उनकी क्षमता या कमजोरी के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं। इसके अलावा बच्चों में और कई गुण होते हैं, जिन पर माता-पिता के मार्गदर्शन तथा स्वभाव का असर पड़ता है। शिक्षक, बड़े-बुजुर्ग तथा टी.वी. का भी बच्चों के विकास और उन्नति में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

अभिभावक का स्वरूप पहले से ही काफी बदला है, साथ ही बच्चों के स्तर में भी बदलाव आया है। आजकल माता-पिता अपने बच्चों के स्तर को उठाने में काफी पैसा खर्च करते हैं। इस आधुनिक युग में महिलाएँ भी विभिन्न कामों में लग गई हैं और नौकरी करने लगी हैं। कई महिलाएँ इसलिए काम कर रही हैं, क्योंकि वे अपनी आर्थिक स्थिति सुधारना चाहती हैं; जबकि कुछ महिलाएँ काम करना इसलिए पसंद करती हैं जिससे कि वे सिर्फ बच्चा पैदा करने तथा घर के कामों में ही उलझी नहीं रहें। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चों का सही ढंग से लालन-पालन नहीं हो पाता है।
पुराने समय में नए माता-पिता अपने बच्चों के पालन के लिए अपने बड़े बुजुर्ग से सलाह और मार्गदर्शन लेकर आगे बढ़ते थे। अब इस तरह की मदद का अभाव तथा आधुनिक समाज के कुछ प्रतिबंधों ने कुल मिलाकर माता-पिता पर विशेष बोझ डाल दिया है।

लेखिका कहती हैं कि वे ऐसे माता-पिता, जो बच्चों की समस्या में उलझे हैं, उनकी मदद करने में सहायक हो सकते हैं। आगे वह कहती हैं कि उनके तैंतीस सालों में माता का अनुभव और छत्तीस साल के शिक्षण अनुभव ने ऐसी क्षमता और विशिष्ट गुणों को जगाया है, जिसके माध्यम से वे नए माता-पिता को उनके बच्चों की समस्या का समाधान करने में मदद कर सकती हैं। वह कहती हैं कि ऐसे माता-पिता, जिनके विकलांग बच्चे हैं, को मदद करने में ज्यादा तत्पर रहती हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य ही है-विकलांगों को सहारा देना और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना।

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