झाँसी की रानी - वृंदावनलाल वर्मा Jhansi ki Rani - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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झाँसी की रानी

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :349
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1717
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है झांसी की रानी के जीवन पर आधारित उपन्यास...

Jhashi Ki Rani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

झाँसी की रानी के अमर बलिदान की प्रामाणिक तथा इतिहास सम्मत कहानी जिसे लिखकर वर्माजी की लेखनी भी धन्य हो गई। इसमें झाँसी की रानी के जीवन पर प्रकाश डाला गया है।


‘पर ‘वाह’ ‘वाह’ नहीं निकली ?’ राजा ने पूछा।
खुदाबख्श जरा झेंपा। झेंप को दबाने के लिए मुसकराकर बोला, ‘हुजूर, उसके लिए कोई जगह नहीं पाई।’
राजा इस बात को पीकर रह गए। खेल की समाप्ति पर दर्शक नाटकशाला के बाहर और गंगाधरराव श्रृंगार-कक्ष में। मोतीबाई अब भी मलिन वेश में थी। अभिनय के विषय में सम्मति सुनने के लिए प्रणाम करती हुई राजा के सम्मुख आई। उन्होंने उसकी पीठ पर थपकी देकर शाबाशी दी। कहा, ‘‘तुम्हारा आज का अभिनय बहुत अच्छा और स्वाभाविक रहा। कालिदास महान् हैं। उन्होंने उस समय शकुंतला के हृदय को जो आँसू दिए थे, तेरे बड़े नेत्रों में ब्याज के साथ लौटा दिए।’ मोतीबाई प्रसन्नता के मारे फूल गई। बिना पुष्पों के, पुष्पों से लदी जान पड़ी।
राजा ने उसको एक बड़ा बाग जागीर में दे दिया।*

दूसरे दिन राजा गंगाधरराव ने खुदाबख्श को राजदरबार से अलग कर दिया और घोषणा करवाई कि यदि खुदाबख्श फिर कभी झाँसी शहर में दिखाई पड़ा तो उसके नंगे शरीर पर कोड़े लगाए जाएँगे।
लोगों को इस आज्ञा पर आश्चर्य था, परंतु लोग राजा का सुलभकोपी स्वभाव को जानते थे, इसीलिए किसी खास कारण को जानने की लालसा जनता के मन में नहीं हुई।

दीवान रघुनाथसिंह और राव दुल्हाजू के मन में असली कारण के विषय में जो शंका थी, उन्होंने किसी पर प्रकट नहीं की। उन्होंने सोचा कि इस नाटकशाला से दूर ही रहना चाहिए, परंतु राजा के निमंत्रण की अवज्ञा भी कैसे कर सकते थे ?
मोतीबाई सावधानी और लगन के साथ नाटकशाला में काम करती रही। परंतु दर्शकों में खुदाबख्श को उसने फिर कभी नहीं देखा। और न कभी गंगाधरराव ने मोतीबाई को किसी विशेष दर्शक पर आँखों को केंद्रित करते पाया। इच्छा रखते हुए भी मोतीबाई रंगमंच पर फिर कभी बड़े-बड़े आँसू नहीं निकाल सकी।

इन दिनों नाटकशाला में जूही नाम की एक अल्पवयस्का नर्तकी और आई। परंतु उसको अपने घर पर नाचने-गाने की और अधिक तालीम पाने की अनुमति मिल गई थी। जूही उन्नाव दरवाजे के भीतर मेवातीपुरा के सिरे पर रहती थी। इसका भवन राव भिंडे के बाग से लगा हुआ था। उसने अभी अल्हड़पन से बाहर कदम नहीं रखा था। रंगमंच पर इसका नृत्य और गायन अधिक होता था, अभिनय कम।
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*यह बाग ओरक्षा दरवाजे के भीतर, दरवाजे से लगा हुआ था। आजकल इसके एक सिरे पर सड़क के किनारे मसजिद है। बाकी में साग-भाजी की खेती होती है।

उदय
:1:


वर्षा का अंत हो गया। क्वार उतर रहा था। कभी-कभी झीनी-झीनी बदली हो जाती थी। परंतु उस संध्या के समय आकाश बिलकुल स्वच्छ था। सूर्यास्त होने में थोड़ा विलम्ब था। बिठूर के बाहर गंगा के किनारे तीन अश्वारोही तेजी के साथ चले जा रहे थे। तीनों बाल्यावस्था में। एक बालिका, दो बालक। एक बालक की आयु 16 वर्ष, दूसरे की 14 से कुछ ऊपर। बालिका की 13 साल से कम।
बड़ा बालक कुछ आगे निकला था कि बालिका ने अपने घोड़े को एड़ लगाई। बोली, ‘‘देखूँ कैसे आगे निकलते हो।’ और वह आगे हो गई। बालक ने बढ़ने का प्रयास किया तो उसका घोड़ा ठोकर खा गया और बालक धड़ाम से नीचे जा गिरा। सूखी लकड़ी के टूकड़े से उसका सिर टकरा गया। खून बहने लगा। घोड़ा लौटकर घर की ओर भाग गया। बालक चिल्लाया, ‘‘मनू, मैं मरा।’

बालिका ने तुरन्त अपने घोड़े को रोक लिया। मोड़ा, और उस बालक के पास पहुंची। एक क्षण में तड़ाक से कूदी और एक हाथ से घोड़े की लगाम पकड़े हुए झुककर घायल बालक को ध्यानपूर्वक देखने लगी। माथे पर गहरी चोट आई थी और खून बह रहा था। बालिका मिठास के साथ बोली, ‘‘घबराओ मत, चोट बहुत गहरी नहीं है। लोहू बहने का कोई डर नहीं।’

मझला बालक भी पास आ गया। उतर पड़ा और विह्वल होकर अपने साथी की चोट को देखने लगा। ‘नाना, तुमको तो बहुत चोट लग गई।’ उस बालक ने कहा।
‘नहीं, बहुत नहीं है, ‘बालिका मुसकराकर बोली, ‘अभी लिए चलती हूँ। कोठी पर मरहम पट्टी हो जाएगी और बहुत शीघ्र चंगे हो जाएँगे।’
‘कैसे ले चलोगी, मनु ?’ बड़े लड़के ने कातर स्वर में कराहते हुए पूछा।
मनू ने उत्तर दिया, ‘तुम उठो। मेरे घोड़े पर बैठो। मैं उसकी लगाम पकड़े तुम्हें अभी घर लिए चलती हूँ।’
‘मेरा घोड़ा कहाँ है ?’ घायल ने उसी स्वर में प्रश्न किया।

मनू ने कहा, ‘भाग गया। चिंता मत करो। बहुत घोड़े हैं। मेरे घोड़े पर बैठो। जल्दी। नाना, जल्दी।’
नाना बोला, ‘मनू, मैं सध नहीं सकूँगा।’
मनू ने कहा, ‘मैं साध लूंगी। उठो।’
नाना उठा। मनू एक हाथ से घोड़े की लगाम थामे रही, दूसरे से उसने खून में तर नाना को बैठाया और बड़ी फुरती के साथ उचटकर स्वयं पीछे जा बैठी। एक हाथ से घोड़े का लगाम सँभाली, दूसरे से नाना को थामा और गाँव की ओर चल दी। पीछे-पीछे मँझला बालक भी चिंतित, व्याकुल चला। जब ये गांव के पास आ गए तब कई सिपाही घोड़ों पर सवार इन बालकों के पास आ पहुँचे।
‘चोट लगी तो नहीं ?’
‘ओफ बहुत खून निकल गया है।’
‘आओ, मैं लिए चलता हूँ।’

‘घर पर घोड़े के पहुँचते ही हम समझ गये थे कि कोई दुर्घटना हो गई है।’ इत्यादि उग्दार इन आगंतुकों के मुँह से निकले। इन लोगों के अनुरोध करने पर भी मनू नाना को अपने ही घोड़े पर सँभाले हुए ले आई। कोठी के फाटक पर पहुँचते ही एक उतरती अवस्था का और दूसरा अधेड़ वय का पुरुष मिले। दोनों त्रिपुंड लगाए थे। उतरती अवस्थावाला रेशमी वस्त्र पहने था और गले में मोतियों का कंठा। अधेड़ सूती वस्त्र पहने था। उतरती अवस्था वाले को कुछ कम दिखता था। उसने अपने अधेड़ साथी से पूछा, ‘क्या ये सब आ गए, मोरोपंत ?’
‘हाँ, महाराज।’ मोरोपंत ने उत्तर दिया। जब वे बालक और निकट आ गए तब मोरोपंत नामक व्यक्ति ने कहा, ‘अरे ! यह क्या ? मनू और नाना साहब दोनों लोहूलुहान हैं !’
जिनको मोरोपंत ने ‘महाराज’ कहकर संबोधन किया था, वह पेशवा बाजीराव द्वितीय थे। उन्होंने भी दोनों बच्चों को रक्त से सना देखा तो घबरा गए।
सिपाहियों ने झपटकर नाना को मनु के घोड़े से उतारा। मनू भी कूद पड़ी।
मोरोपंत ने उसको चिपटा लिया। उतावले होकर पूछा, ‘मनू, चोट कहाँ लगी है बेटी ?’
‘मुझको तो बिलकुल नहीं लगी, काका,’ मनू ने जरा मुसकराकर कहा, ‘‘नाना को अवश्य चोट आई है, परंतु बहुत नहीं है।’
‘कैसे लगी मनू ?’ बाजीराव ने प्रश्न किया।
कोठी में प्रवेश करते-करते मनू ने उत्तर दिया, ‘ऊँह, साधारण-सी बात थी। घोड़े ने ठोकर खाई। वह संभल नहीं सके। जा गिरे। घोड़ा भाग गया। घोड़ा ऐसा भागा, ऐसा भागा कि मुझको तो हँसी आने को हुई।’

मोरोपंत ने मनू के इस अल्हड़पने पर ध्यान नहीं दिया। नाना को मनू अपने घोड़े पर ले आई, वे इस बात पर मन ही मन प्रसन्न थे।
बाजीराव को सुनाते हुए मोरोपंत ने पूछा, ‘तू नाना साहब को कैसे उठा लाई ?’
मनू ने उत्तर दिया, ‘कैसे भी नहीं। वह बैठ गए। मैं पीछे से सवार हो गई। एक हाथ में लगाम पकड़ ली, दूसरे में नाना को थाम लिया। बस।’
नाना को मुलायम बिछौने पर लिटा दिया गया। तुरंत घाव को धोकर मरहम-पट्टी कर दी गई। घाव गंभीर न होने पर भी लंबा और जरा गहरा था। बाजीराव चिंतित थे।
मोरोपंत को विश्वास था कि चोट भयप्रद नहीं है तो भी वह सहानुभूति के कारण बाजीराव के साथ चिंताकुल हो रहे थे।
जब मनूबाई और मोरोपंत उसी कोठी के एक भाग में, जहाँ उनका निवास था, अकेले हुए, मनू ने कहा, ‘इतनी जरा-सी चोट पर ऐसी घबराहट और रोना-पीटना !’
‘बेटी, चोट जरा-सी नहीं है। कितना रक्त बह गया है !’
‘आप लोग हमको जो पुराना इतिहास सुनाते हैं, उसमें युद्ध क्या रेशम की डोरों और कपास की पौनियों से हुआ करते थे ?’
‘नहीं, मनू ! पर यह तो बालक है।’
‘बालक है ! मुझसे बड़ा है। मलखंब और कुश्ती करता है। बाला गुरु उसको शाबाशी देते हैं। अभिमन्यू क्या इससे बड़ा था ?’
‘मनू, अब वह समय नहीं रहा।’
‘क्यों नहीं रहा, काका ? वही आकाश है, वही पृथ्वी। वही सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्र। सब वही हैं।’
‘तू बहुत हठ करती है।’
‘जब मैं सवाल करती हूँ तो आप इस प्रकार मेरा मुँह बंद करने लगते हैं। मैं ऐसे तो नहीं मानती। मुझको समझाइए, अब क्या हो गया है !’
‘अब इस देश का भाग्य लौट गया है। अंग्रेजों के भाग्य का सूर्योदय हुआ है। उन लोगों को प्रताप के सामने यहाँ के सब जन निस्तेज हो गए हैं।’
‘एक का भाग्य दूसरे ने नहीं पढ़ा है। यह सब मनगढंत है। डरपोकों का ढकोसला।’
‘तू जब और बड़ी होगी तब संसार का अनुभव तुझको भी यह सब स्पष्ट कर देगा।’
‘मैं डरपोक कभी नहीं हो सकती। आप कहा करते हैं—मनू, तू ताराबाई बनना, जीजाबाई और सीता होना। यह सब भुलावा क्यों ? अथवा क्या ये सब डरपोक थीं ?’
‘बेटी, ये सब सती और वीर थीं; परंतु समय बदलता रहता है। बदल गया है।’

‘यह तो हेर-फेरकर वही सब मनमाना तर्क है।’
‘फिर कभी बतलाऊँगा।’
‘मैं ऐसी गलत-गलत बात कभी नहीं सुनने की।’
‘तो सोएगी भी या रात-भर सवाल ही करती रहेगी !’ अंत में खीजकर परंतु मिठाश के साथ मोरोपंत ने कहा। मनू खिलखिलाकर हँस पड़ी। बोली, ‘काका, आपने तो टाल दिया। मैं इस प्रसंग पर फिर बात करूँगी। अभी अवश्य करवट लेते ही सोई, यह सोई।’ फिर एक क्षण उपरांत मनू ने अनुरोध किया, ‘काका, देख आइए, नाना सो गया या नहीं। आपको नींद आ रही हो तो मैं दौड़कर देख आऊँ।’ मोरोपंत ने मनू को नहीं जाने दिया। स्वयं गए। देख आए। बोले, ‘नाना साहब सो गए हैं।’
मनू सो गई। मोरोपंत जागते रहे। उन्होंने सोचा, मनू की बुद्धि उसकी अवस्था से बहुत आगे निकल चुकी है। अभी तक कोई योग्य वर हाथ नहीं लगा। दक्षिण जाकर देखना पड़ेगा। इसी विचार के लौट-फेर में मोरोपंत का बहुत समय निकल गया। कठिनाई से अंतिम पहर में नींद आई।

:2:


मनूबाई सवेरे नाना को देखने पहुँच गई। वह जाग उठा था, पर लेटा हुआ था। मनू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। स्निग्ध स्वर में पूछा, ‘नींद कैसी आई ?’
‘सोया तो हूँ, पर नींद आई-गई बनी रही। कुछ दर्द है।’ नाना ने उत्तर दिया।
मनू-‘वह दोपहर तक ठीक हो जाएगा। तीसरे पहर घूमने चलोगे न ? संध्या से पहले ही लौट आएँगे।’
नाना- ‘सवारी की धमक से पीड़ा बढ़ने का डर है।’
मनू- ‘आरंभ में कदाचित् थोड़ी-सी पीड़ा हो; परंतु शीघ्र ही उसको दाब लोगे और जब लौटोगे, याद न रहेगा कि कभी चोट लगी थी।’

नाना- ‘यदि पीड़ा बढ़ गई तो ?’
मनू- ‘तो सह लेना, फिर कभी गिरोगे तो चोट कम आँसेगी।’
नाना- ‘और यदि आज ही फिर फिसल पड़ा तो ?’
मनू- ‘तो मैं तुमको फिर उठा लाऊँगी। चिंता मत करो।’
नाना- ‘और जो तुम खुद गिर पड़ीं तो ?’
मनू- ‘तब मैं फिर सवार हो जाऊँगी। किसी की सहायता नहीं लेनी पड़ेगी और घर आ जाऊँगी।’
नाना- ‘मेरे बस का नहीं।’
मनू- ‘लड्डू खाओगे ?’
नाना- ‘मुझे चुपचाप पड़ा रहने दो !’
मनू- ‘कब तक ?’
नाना- ‘तीन-चार दिन लग जाएँगे।’
मनू- ‘किसने कहा ?’
नाना- ‘काका कहते थे। वैद्य ने भी कहा था।’
मनू- ‘वैद्य तो लोभवश कहता होगा, पर दादा क्यों कहते थे ?’
नाना- ‘उनसे ही पूछ लेना। मेरा सिर मत खाओ।’
मनू हँस पड़ी। फिर दाईं ओर का ओठ थोड़ा-सा-बिलकुल जसा-सा-दबाकर बोली, ‘तुम कहते थे—बाजी प्रभु देशपांडे की कीर्ति से बढ़कर कीर्ति कमाऊँगा, तानाजी मालसुरे को पछाड़ूँगा, स्वर्गवासी छत्रपति शिवाजी को अपने कृत्यों से फड़का दूँगा, श्रीमत पंत प्रधान प्रथम बाजीराव की बराबरी करूँगा,...’
इतने में वहाँ बाजीराव आ गए। मनू इतनी तीक्ष्णता के साथ बोल रही थी कि बाजीराव ने उसका अंतिम वाक्य सुन लिया।

बोले, ‘तेरी चपलता न जाने कब खत्म होगी ? यह सब क्या बके जा रही है ?’
मनू रंचमात्र भी नहीं दबी। बोली, ‘इसको दादा, आप बकना कहते हैं ? आप ही हम लोगों को छुटपन से सुनाते आए हैं। मैं उसी को दुहरा रही हूँ। अब आप इसे बकवास समझने लगे हैं। ! यह क्यों दादा ?’
बाजीराव ने कहा, ‘बेटी, क्या आज उन बातों के स्मरण से जीवन को चलाने का समय रहा है ? महाभारत की कथाएँ सुनो और अपने पुरखों की बातें सुनो। अच्छी-भली बनो। मन बहलाओ और जीवन को पवित्र सुख से सुखी बनाओ। नाना को चिढ़ाओ मत।’
मनू ने मुसकराकर होंठ जरा-सा दबाया, थोड़ी-सी त्योरी संकुचित की और बाजीराव के बिलकुल पास आकर बोली, ‘क्या हम लोगों को अब सोकर, खाकर ही जीवन बिताना सिखलाइएगा, दादा ?’
बाजीराव को हँसी आई। कुछ कहना ही चाहते थे कि मोरोपंत कहते हुए आ गए, ‘नाना साहब को हाथी पर बैठकर थोड़ा-सा घूम आने दीजिए। बाहर तैयार खड़ा है।’

बाजीराव ने प्रश्न किया, ‘हाथी की सवारी में चोट को धमक तो नहीं लगेगी ?’
मोरोपंत ने उत्तर दिया, ‘नहीं, पलकिया में बहुत मुलायम गद्दी-तकिए लगा दिए गए हैं और हाथी बहुत धीमे चलाया जाएगा।’
मनू हाथी को देखने बाहर दौड़ गई। नाना निस्तार इत्यादि के लिए उठ गया। मनू ने हाथी पहले भी देखे थे, फिर भी वह इस हाथी को बार-बार चारों ओर से घूम-घूमकर देख रही थी और उसके डीलडौल पर कभी मुसकरा रही थी, कभी हँस रही थी।
थोड़ी देर बाद बाजीराव नाना को लिए बाहर आए। साथ में छोटा लड़का भी था, मोरोपंत पीछे-पीछे। हाथी पर पहले नाना को बिठा दिया गया, फिर छोटे को। महावत ने हाथी को अंकुश छुलाई, हाथी उठा।
मनू ने मोरोपंत से कहा, ‘काका, मैं भी हाथी पर बैठूँगी।’ बाजीराव के घुटनों से लिपटकर बोली, ‘दादा, मैं भी बैठूँगी।’
नाना हौदे में महावत के पास बैठा था। उसने महावत को अविलंब चलने का आदेश किया। मनू की ओर देखा भी नहीं। बाजीराव ने नाना से कहा, ‘लिए जाओ मनू को !’

नाना ने मुँह फेर लिया ! तब बाजीराव ने दूसरे बालक से कहा, ‘रावसाहब, मनू को ले लेते तो अच्छा होता !’
महावत कुछ ठमका तो नाना ने उसकी पसलियों में उँगली चुभोकर बढ़ने की आज्ञा दी। वह नाना साहब और रावसाहब—दोनों को लेकर चल दिया। मनू की आँखों में क्षोभ उतर आया। मोरोपंत का हाथ पकड़कर बोली, ‘हाथी लौटाओ काका। मैं हाथी पर अवश्य बैठूँगी।’
बाजीराव कोठी में चले गए।
मोरोपंत को भी क्षोभ हुआ, परंतु उन्होंने उसको नियंत्रित करके कहा, ‘वह चला गया बेटी।’
मनू मोरोपंत का हाथ पकड़कर खींचने लगी, ‘महावत को पुकारिए, वह रुक जाएगा। मैं बिना बैठे नहीं मानूँगी।’
मोरोपंत का क्षोभ भड़का। उन्होंने उसका फिर दमन किया। मनू ने फिर हाथी पर बैठने का हठ किया। मोरोपंत ने क्रुद्ध स्वर में मनू को डाँटा, ‘तेरे भाग्य में हाथी नहीं लिखा है। क्यों व्यर्थ हठ करती है ?’

मनू तिनककर सीधी खड़ी हो गई। तमककर कुछ कहना चाहती थी। एक क्षण होंठ नहीं खुल सके।
मोरोपंत ने शांत करने के प्रयोजन से, भरसक धीमे स्वर में परंतु क्रोध के सिलसिले में कहा, ‘सैकडों बार कहा कि समय देखकर चलना चाहिए। हम लोग न तो छत्रधारी हैं और न सामंत सरदार। साधारण गृहस्थों की तरह संसार में रहन-सहन रखना है। पढ़ी-लिखी होने पर भी न जाने सुनती-समझती क्यों नहीं है। कह दिया कि भाग्य में हाथी नहीं लिखा है। हठ मत किया कर।’
मनू के होंठ सिकुड़े। चुनौती-सी देती हुई बोली, ‘मेरे भाग्य में एक नहीं दस हाथी लिखे हैं।’
मोरोपंत का क्रोध भीतर सरक गया। हँस पड़े। मनूबाई को पेट से चिपका लिया। कहा, ‘अब चल, कोई शास्त्र-पुराण पढ़। तब तक वे दोनों लौट आते हैं।’
मनू मचली। बोली, ‘मैं अपने घोड़े पर बैठकर सैर को जाऊँगी और उस हाथी को तंग करूँगी।’
मोरोपंत सीधे शब्दों में वर्जित करना चाहते थे, परंतु इस उपकरण में सफलता के चिह्न न पाकर उन्होंने तुरंत बहाना बनाया, ‘घोड़े से यदि हाथी चिढ़ गया तो तू भले ही बचकर निकल आए, पर नाना साहब, रावसाहब तथा महावत मारे जाएँगे।’
वह मान गई।
‘तब तक कुछ और करूँगी,’ मनूबाई ने कहा, ‘पुस्तकें तो नहीं पढ़ूँगी। बंदूक से निशानेबाजी करूँगी।

:3:


थोड़ी देर में घंटा बजाता हुआ हाथी लौट आया। मनू दौड़कर बाहर आई। एक क्षण ठहरी और आह खींचकर भीतर चली गई। नाना और राव, दोनों बालक, अपनी जगह चले गए। बाजीराव ने नाना को पुचकारकर पूछा, ‘दर्द बढ़ा तो नहीं ?’
‘नहीं बढ़ा,’ नाना ने उत्तर दिया, ‘अच्छा लग रहा है। मनू कहाँ गई ?’
बाजीराव ने कहा, ‘भीतर होगी।’
रावसाहब- ‘उसे बुरा लगा होगा। नाना ने साथ नहीं लिया, मैंने तो कहा था।’
नाना- ‘वह मुझको सवेरे से चिढ़ा रही थी।’
बाजीराव- ‘क्या ? कैसे ?’
नाना- ‘उसका स्वभाव है।’
कुछ क्षण उपरांत मनू आ गई।
नाना ने हँसते हुए कहा, ‘छबीली, तुम क्या कोई ग्रंथ पढ़ रही थीं ?’
मनू जल उठी। बोली, ‘मुझसे छबीली मत कहा करो।’

नाना ने और भी हँसकर कहा, ‘क्यों नहीं कहा करूँ ? यह तो तुम्हारा छुटपन का नाम है।’
मनू की आँखें लाल हो गईं। बोली, ‘मुझको इस नाम से घृणा है।’
नाना गंभीर हो गया। बोला, ‘मुझको तो यही नाम सुहावना लगता है। छबीली, छबीली।’
‘इस नाम को कभी नहीं सुनूँगी।’ कहकर मनू वहाँ से जाने को हुई। बाजीराव ने उसको पकड़ लिया। मनू ने भागना चाहा। न भाग सकी। तब नाना ने भी पकड़ लिया।
‘क्या मनू बुरा मान गई ?’ नाना ने स्नेह के साथ पूछा।
मनू होंठ सिकोड़कर, रुखाई के साथ बोली, ‘अवश्य। आगे इस नाम से मेरा संबोधन कभी मत करना।’
इसी समय पहरेवाले ने बाजीराव को सूचना दी, ‘झाँसी से एक सज्जन आए हैं। नाम तात्या दीक्षित बतलाते हैं।’
नाना बोला, ‘मनू, एक से दो तात्या हुए।’

मनू का क्षोभ घुला। बाजीराव ने प्रहरी से झाँसी के आगंतुकों को बैठाने के लिए कह दिया।
मनू ने कहा, ‘झाँसीवाला कुश्ती लड़ता होगा ?’
रावसाहब- ‘झाँसी में कोई बाला गुरु होंगे तो कुश्ती का भी चलन होगा ! वह तो राज्य ठहरा।’
नाना- ‘बड़ा राज्य है ?’
बाजीराव- ‘बड़ा तो नहीं है, पर खासा है। हमारे पुरखों का प्रदान किया हुआ है, जानते होगे।’
रावसाहब- ‘अपने को फिर नहीं मिल सकता ?’
मनू- ‘दान किया हुआ फिर कैसे वापस होगा।’

बाजीराव- ‘हाँ, वापस नहीं हो सकता। झाँसी के राजा हमारे सूबेदार थे। इस समय अपना बस होता तो झाँसी में हम लोगों का काफी मान होता। परंतु झाँसी तो बहुत दिनों से अंग्रेजों की मातहती में है।’
मनू-‘ग्वालियर, इंदौर, बरोदा, नागपुर, सतारा इत्यादि होते हुए भी थोड़े से अंग्रेजों ने आप सबको दबा लिया !’
बाजीराव- ‘यह मानना पड़ेगा कि वे लोग हमसे ज्यादा चालाक हैं। हथियार उनके पास अधिक अच्छे हैं। शूरवीर भी हैं और भाग्य उनके साथ है। और आपसी फूट हमारे साथ।’
मनू- ‘दादा, क्या भाग्य में शूरवीर होना लिखा रहता है ? यदि ऐसा है तो अनेक सिंह सियार होते होंगे और अनेक सियार सिंह।’
बाजीराव- ‘जब सियार पागल हो जाता है तब सिंह भी उससे डरने लगता है।’
मनू- ‘वह भाग्य से पागल होता है अथवा और किसी कारण से ?!’
बाजीराव हँसने लगे।
इसी समय मोरोपंत ने आकर कहा, ‘दादा साहब, तात्या दीक्षित झाँसी से आए हैं।’
बाजीराव बोले, ‘मैंने उनको बिठला लिया है। यहीं ठहरने, भोजन इत्यादि का प्रबंध कर दिया जावे।’


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