कासों कहों मैं दरदिया - ऋता शुक्ल Kason Kahon Main Dardiya - Hindi book by - Rita Shukla
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कासों कहों मैं दरदिया

ऋता शुक्ल

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1662
आईएसबीएन :81-7315-209-8

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ कहानी संग्रह...

Kason kahan Mai dardiya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बहुचर्चित कथाकार ऋता शुक्ल की कहानियों में समाज का संत्रास आँखों देखी घटना के रूप में उभरता है। तभी तो उनकी कहानियाँ संस्मरण, रेखाचित्र और कहानी का मिला-जुला अनूठा आनंद प्रदान करती हैं। उनकी हृदयस्पर्शी कहानियों का संकलन है-कासों कहों मैं दरदिया।

कासों कहों....


शब्द प्राणवान् हों, अनुभूति आत्मा की कसक से भरी-पूरी हो, जड़-चेतन जगत् के आँसुओं की रसद हर क्षण साँसों के आस-पास हो, तब भी कहने सुनने के लिए कुछ शेष रह जाता है क्या ?
जीवन के समस्त घटित-अघटित आत्मा के पहिरन में नित्य नई गाँठें बनकर सिमटते चले जाते हैं।
मनोयंत्रणाएँ रिक्त कांस्य-पात्रों को ही दमामा बनाती हैं।
झूठ, कपट और स्वार्थ से भरे संसार की दी हुई अशेष मनोवेदनाओं का सिरा सहज मानवीय अनुभूतियों से जुड़ा हो, तो वे गाँठें विष-वारुणी नहीं सहेजतीं, जीवितों के वध का कठोर दुराग्रह भी नहीं देतीं—‘रहिमन आफ ठगाइए...’ वाली भंगिमा में चिरमौन संवेदना की थाती सहेजती परिपक्व होती रहती हैं।

धरती-सा अथाह धीरज, व्योम-सी निपट निस्संगता, नदी-सी उमंग, पर्वत-सी अडिगता और वनश्री-सा उछाह लेकर जो अपने भरे-पूरे मन को आस्था और जिजीविषा की चित्र-वीथी बना सकें, ऐसे अनुभवसाधित प्राणों को अनिद्रा का सूतक कभी नहीं लगता।
जीवन सुख-सुविधाओं की बलि न चढ़े, कलम को मिलनेवाली अमृत-बूँदों का नैरंतर्य कभी शेष न हो, शायद इसीलिए प्रभु कष्टों की छोटी-बड़ी सौगातें देते रहते हैं।
शक्तिप्रमत्त और शक्तिहीन की अवधारणाएँ भौतिक विभ्रम के क्रोड़ से उपजती हैं। मनुष्य के भीतर बैठा आदि भ्रमण उस भ्रमजाल से कोसों दूर अपनी सरल-तरल भावनाओं का शुद्ध समर्पण करने के लिए सन्नद्ध होता है। निर्मल बुद्धि से प्रसूत आत्मज्ञान की अनश्वर आभा ही कलम का वरदान बनकर फलती है।

किस चंदन-वन में व्यालों का व्यास नहीं होता ? अपनी समस्त देह-शिराओं में दिव्य सुरभि का अक्षय कोष समेटे मलय वृक्ष सतत सुरभित, एकाकी साधनारत रहता है। ऐसे ही, विदेह भाव से निरंतर संघर्षरत मनोदशाएँ मानवीय पीड़ाओं की प्रतिध्वनियाँ हो जाती हैं, तब कलम उनके लिए चिरसुवासित मुक्ति-द्वार बनती है।
सच कहूँ, तो बाबुल की अँगनाई में लुकाछिपी घो-घो रानी, रुमात्न चोर खेलनेवाली उम्र को असमय सयानापन सौंपनेवाली नियति बहुत कुछ दर्द की इस बयानबंदी के लिए जिम्मेदार ठहराई जा सकती है।
विगलित मन का प्रलाप शब्दों के सार्थकत्व का प्रयोजन कदापि नहीं हो सकता।
संवेदना की छेनी प्राण-भित्तियों पर अहर्निश चोट करती रहती है। स्मृतियों के चकमक पत्थर सुलगते हैं और भीतर की गहन गुफा से कढ़ती ढेर सारी मूरतें अपने आधे-अधूरे वजूद के साथ सामने आ खड़ी होती हैं। छेनी तराशना भूलकर एकटक देखती है...

कौन हैं ये चेहरे... ?
क्या कहना चाहती हैं ये मूरतें...?
और वह अनकहा बयान दर्द की तासीर बनकर भीतरी सन्नाटे को चीरता हुआ कलम को नोंक से रिसता जाता है।
नारी की चर्चा मात्र सुनने से वधिर होने की रूढ़ि से त्रस्त इस धरातल पर शब्द को जलती हुई शहतीर बनानेवाली मीरा ने ‘दरद न जाने कोय’ कहकर किसी से अपना दर्द परखने की याचना कतई नहीं की होगी। उस अनहद साधिका का स्वाभिमान संवेदना की अकूत सामर्थ्य से भरा-पूरा था। अंततः उस भाव-सत्य ने काल की विराट् संस्तुति पाई।
...वह दर्द आज भी पिघल रहा है। उस गंगोत्री को आँचल में समेटकर मुझ जैसी न जाने कितनी संज्ञाएँ माटी की मरजाद निभाती, आकाश का भींगापन थाहती अपनी चेतना की कोख में सदानीरा संवेदना का तप ढालती जा रही हैं। अनुभूतियों का मौन अर्घ्य देती, अभिशप्त शिलाखंडों का मनस्ताप सहेजती वे सब-की-सब चिरआस्थामयी हैं। असमय रेत हो जाने का आतंक उन संज्ञाओं को नहीं व्यापता, क्योंकि वे अकुँठ भाव से कर्मरत हैं।
राशि-राशि प्राणों की यह अनहद कथा कभी शेष भी होगी ? कौन...?

कल्पांतर


इस शहर की नौकरी या यह जिंदगी, अविनाशचंद्र को दोनों में से कौन रास नहीं आया था, इस निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले ही उन्होंने अपने मानसिक शैथिल्य के आगे हथियार डाल दिए थे। आषाढ़ के उमड़ते हुए बादलों की तरह एक विचित्र-सी अनुभूति ने उन्हें मोहाविष्ट कर दिया था।
अरुणा ने उन्हें पितृत्व की गरिमा दी थी। उस छोटे से कस्बे का सरकारी अस्पताल वाला कमरा उनके लिए आनंद की स्वर्गिक उपलब्धि का प्रतीक बन बैठा था।
कितनी गंदगी है यहाँ...चारों ओर से कैसी बदबू आ रही है...आप इंदिरा बहनजी से कहिए न, वे हामी भर दें तो हम आज ही नाम कटाकर अपने घर....

महज दस घंटे पहले ही प्रसवजनित मर्मांतक वेदना की अवशिष्ट लकीरें अरुणा के चेहरे पर साफ-साफ पढ़ी जा सकती थीं—आँखों के नीचे स्याह अर्धवृत्त, मुँदी हुई पलकों पर बीहड़ रास्ते की थकान झेलने वाले पदयात्री-सा शैथिल्य भाव।
गुलाब की मुरझाई हुई पंखुड़ियों जैसे उसके होठों पर उन्होंने धीरे से अपनी उँगलियाँ फिरानी चाही थीं—
तुम्हें बहुत तकलीफ हुई न; लेकिन अब जैसे भी हो, कुछ दिन तो यहाँ और रहना ही होगा। डॉक्टर ने कहा है, बच्ची कमजोर है; वे इसे अपनी देखभाल में...

वे धीरे से अस्पताल के शिशुगृह की ओर बढ गए थे। खिड़की के किनारे वाले पालने में संसार की सभी दुश्चिंताओं से मुक्त, अपने गुलाबी गालों पर बंद मुट्ठियाँ टिकाए वह निर्द्वन्द्व सो रही थी...अरुणा और अविनाश के जीवन की नई सृष्टि, आठ वर्षों तक दो जोड़ी आँखों में सहेजकर रखे गए एकमात्र स्वप्न की साकार सिद्धि। उन्होंने चाहा था—सबकी आँखें बचाकर एक बार उसे पालने से उठा लें और अपने कलेजे से भींचकर उसे खूब दुलारें—इतना की वह जागकर रोने लगे—उआँ-उआँ...!

कैसा लग रहा था अपनी बच्ची की वह पहली रुलाई सुनकर ? आनंद की इससे भी विह्वल कोई प्रतीति होगी क्या ? परिचारिका ने सफेद रोएँदार तौलिए में लिपटा हुआ वह नवजात मुख उन्हें दिखाया था—कैसी गुड़िया-सी प्यारी बच्ची है, साहब ! हमें तो अच्छी बख्शीश चाहिए, कहे देती हैं।
उनके पैरों में हर्षजनित आवेग की विलक्षण थरथराहट थी। न जाने क्यों, उस क्षण उसका मन धारासार वर्षा के पहले ही मेघसंकुल संभावनाओं से घिरता चला जा रहा था—परिचारिका की, अस्पताल के दूसरे लोगों की आँखें बचाकर उन्होंने अपना चेहरा दूसरी ओर मोड़ लिया था।

उत्फुल्लता की प्रतिक्रिया में आँखों का यह भीगापन क्यों....? क्या पुत्री के जन्म से कोई मनस्ताप मिला है उन्हें ? या कि अरुणा की असह्य यंत्रणा की बात सोचकर....?
नहीं...सच तो यह था कि मोम की उस पुतली को अपनी बाँहों में सँभालते ही वे आठ वर्ष पुरानी दुनिया की ओर लौट गए थे।
घने अमलतास की वासंती छाँह, आधी गुँथी चोटी के निचले सिरे को उँगलियों में लपेटती हुई वह उनके सामने खड़ी हो गई थी—आप ही अविनाशचंद्र हैं न ....?
हाँ...लेकिन आप...?
समाजशास्त्र के प्राध्यापक डॉ. विकास वर्मा मेरे बड़े भाई हैं। उन्होंने बताया कि आपके पास भारतीय नागरिक संहिता पर कुछ महत्त्वपूर्ण सामग्री....

उन्हें याद आ गया था—व्याख्यान कक्ष से निकलते हुए डॉ., वर्मा ने उन्हें आवाज दी थी—
अविनाश, मेरी छोटी बहन स्थानीय महिला महाविद्यालय की छात्रा है। पिछले दो महीने पीलिया रोग में रहने के कारण उसकी पढ़ाई पर बुरा असर पड़ा है। यदि असुविधा न हो तो तुम उसकी मदद...
उस समय डॉ. वर्मा का प्रस्ताव उन्हें बहुत नहीं रुचा था। सारा विभाग जानता था, अविनाश ने अपनी पढ़ाई लिखाई में कभी किसीको भी साझीदार नहीं बनाया था; स्नातकोत्तर छात्रावास के एक ही कमरे में रहनेवाले अपने अभिन्न शिवेंद्र को भी नहीं...।
उनके निर्विकार मौन को झेलने में असमर्थ डॉ. वर्मा की बहन एकबारगी विचलित हो उठी थी—शायद आप किसी असमंजस में पड़ गए हैं। यदि ऐसी बात है तो रहने दें....मैं...।

उस दिन उन बड़ी-बड़ी आँखों के तरल खिंचाव में अविनाश ने एक सर्वथा नए बोध की परिचिति पाई थी—नहीं, नहीं, कोई असमंजस नहीं। आप बैठिए तो सही....
शिवेंद्र ने उन दोनों को आम्रकुंज की ओर जाते हुए देख लिया था—अपने विभाग में यह नई मेनका कहाँ से अवतरित हुई, अवि ? जिसके मुँह से सुनो, एक ही चर्चा है—किसी योगी का योग बस खंडित होने ही वाला है।
उनके नेत्रों की मौन चेतावनी को नजरअंदाज करता हुआ शिव अपनी रौ में कहता जा रहा था—
मान गए गुरु, इसे कहते हैं गहरे पानी में गोता लगाना। हम तो कल की संगोष्ठी में खुला ऐलान करने जा रहे हैं—भारतीय संविधान और आदर्श नागरिक के अधिकार या कर्तव्य जैसे मसले अब हमारे संघ के अध्यक्ष महोदय से हल होने वाले नहीं हैं। दो आँखों के मानसरोवर में डूबकर यह हंस बेचारा न जाने किस मोती की आस लगाए बैठा है....
उन्होंने आगे बढ़कर शिवेंद्र के मुँह पर हथेली रख दी थी—
अपनी ढिठाई से बाज आओ, शिव। मैं शपथ लेकर कह सकता हूँ—मेरे और अरुणा के बीच ऐसी कोई बात नहीं...। तुम जानते नहीं, वह डॉ. वर्मा की छोटी बहन है, और उन्होंने...

तुमसे यह कहा है कि हमारी इस लाजवंती बहना ने आम्रकुंज नहीं देखा, अमलतास के बगीचे में कभी नहीं गई...तुम मदद कर दो तो....
उनके डपटने पर शिवेंद्र क्रत्रिम गंभीरता ओढ़कर मेज के सामने व्यस्त भाव से बैठ गया था—लेकिन उस रात उनकी अपनी मनःस्थिति तेज हवा में उड़ते हुए तिनके की तरह हो उठी थी। बी.ए. के बाद की अगली पढ़ाई इस शहर में पूरी करनी थी। छात्रावास में रहने के लिए गाँव से बिदा लेकर चले थे तो दालान की ओट में खड़ी बड़ी भावज ने चुहल-भरी चेतावनी दी थी—
शहर जा रहे हो, बबुआ ! सुनने में आया है कि वहाँ जनाना-मरदाना सब एक साथ...ऐसे में मेल-मिलाप का जोखिम तो होगा ही। देखना, अपने कुल-खानदान की आबरू बचाकर...कहीं ऐसा नहीं हो कि जात-धरम का विचार किए बिना तुम किसी ऐरी-गैरी को हमारी देवरानी बना लाओ...
यह सच था कि अरुणा उनके जीवन में आनेवाली पहली और एकमात्र ऐसी शख्सियत थी, जिसके आकर्षण को वे अस्वीकार नहीं कर सके थे।
साधारण लड़कियों से अलग, उसकी प्रखर बैद्धिकता और उसके तौर-तरीकों ने उन्हें बाध लिया था। यह भी सच था कि अरुणा से मिलने के बाद राजनीति शास्त्र जैसा शुष्क विषय भी उन्हें रोचक और सुंदर प्रतीत होने लगा था—कठिन-से-कठिन संदर्भों को एक बार समझ लेने के बाद उनके सरल विश्लेषण की क्षमता अरुणा में पाकर वे अनायास उत्साहित हो उठे थे—

कल की संगोष्ठी में तुम्हें बोलते हुए सुनकर ऐसा लगा, अरुणा, जैसे गार्गी और मैत्रेयी का युग एक बार फिर से लौट आया हो। सच-सच बताओ, पिछले जन्म में महामना कौटिल्य के घराने से तुम्हारा कोई संबंध तो नहीं...?
बातें बनाना तो कोई आपसे सीखे....यह क्यों नहीं कहते कि आपकी बदौलत ही हर कठिनाई मेरे लिए आसान हो सकी है। आपसे परिचय नहीं हुआ होता तो...
कृतज्ञता के बोझ से झुकी जा रही है उन ताँबई पलकों की मनुहार ने कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ समझा दिया था। अनकही अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का वही पहला क्षण था—अमलतास की झुकी हुई टहनियों की सारी कोमलता अरुणा के अंग-प्रत्यंग में उतर आई थी—उनकी दोनों हथेलियों के बीच बँधी उसकी उँगलियों के प्रकंपित आवेश ने जीवन के शाश्वत सत्य का उद्घाटन किया था—
तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, अरु। सच-सच बताना, क्या मैं तुम्हें....?

सारे संसार का संकोच जैसे उसकी आँखों में सिमट आया हो। अपने मुँह से उसने भले ही कुछ भी न कहा हो; लेकिन उन्होंने अपना मनचाहा उत्तर पा लिया था। धीरे से लरजकर मौन हो गए उसके अधर, लाज के पहले अनुभव से रक्ताभ हो गया उसका चेहरा—अपने गाँव की तलैया में खिले हुए पीले कमल के फूलों को सौंदर्य के भार से उन्होंने इसी तरह नाल पर झुकते हुए देखा था।
स्नातकोत्तर परीक्षा का अंतिम पत्र देकर गाँव लौटने की तैयारी करने लगे थे तो डॉ. वर्मा की एक चिट उन्हें मिली थी—आज शाम मेरे घर आओ, तुमसे कुछ जरूरी बातें...
चाय की मेज पर वर्मा साहब ने उन्हें कुरेदना चाहा था—अब आगे क्या इरादा है...?
बड़े भैया चाहते हैं कि मैं प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठूँ...
और तुम्हारी अपनी राय...?
मैंने अभी तक इस विषय में कुछ नहीं सोचा, सर, दरअसल परीक्षा की धुन में....
साँझ के झुटपुटे में उनसे बिदा लेकर निकले तो फाटक के पास अरुणा खड़ी मिल गई थी—
फिर पटना कब आइएगा ?
देखो, हो सकता है महीने-भर बाद या संभव है, और भी देर लगे।
उसकी आँखों का उदास भाव उन्हें भीतर तक आहत कर गया था—अरुणा, तुम रो रही हो ?...मैं जल्दी ही लौटकर आऊँगा। जाते ही तुम्हें पत्र दूँगा—अब तो खुश...

गाँव पहुँचकर बाबूजी और बड़े भाई की गुपचुप बातचीत में अपने लिए किसी बड़ी साजिश की गंध पाकर वे चौकन्ने हो उठे थे—
मुझे सच-सच बताओ, भौजी, बात क्या है ?
बड़ी भाभी ने जीभ काट ली थी—राम कहो, बबुआ,  हमारी हिम्मत कहाँ कि मरद-मानुख की बात में दखल दें। सुना है, कोई रामपूजन शास्त्री हैं...उनकी बड़ी बिटिया संस्कीरत पढ़ी, सलीकेदार, धान-पान सी नाजुक है—शास्त्रीजी खरमास से पहले वरिच्छा करना...
उन्होंने बड़े भाई को अकेले में टोका था—मेरी पढ़ाई अधूरी है। बिना कोई अच्छी नौकरी किए मैं इन पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता। और फिर—घर में छोटी बहन है, सुनंदा का ब्याह हुए बगैर...
बड़े भैया का तर्क दूसरा ही था—तुम्हारी पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आएगी, इसका जिम्मा हमारा...! रही सुनंदा की बात....शास्त्रीजी की यही एक बेटी है, जी खोलकर दान-दहेज देंगे। एक कन्या, दो-दो सुनंदा पार लग जाएँ, इतनी औकात भगवान ने उन्हें....
अब वे स्वीकार करते हैं—उस रात उन्होंने पलायन किया था। यह सच था कि बाबूजी, बड़े भैया और अपनी भावज की खुली अवज्ञा का दुस्साहस वे नहीं जुटा पाए थे। लेकिन यह भी सच था कि रातोंरात गाँव छोड़ देने के अपने निर्णय पर उन्हें कभी पछतावा नहीं हुआ, आज भी नहीं...।
दूसरी सुबह अपना सामान रेलवे प्रतीक्षालय में रखकर वे डॉ. विकास वर्मा के घर पहुँचे थे—
अरे अविनाश, तुम इतनी जल्दी लौट आए ? भई, बात क्या है ? घर में सब कुशल-मंगल तो हैं ? तुम्हारा चेहरा देखकर लग रहा है जैसे तुम किसी बड़े तनाव से गुजर रहे हो।

संक्षेप में उन्हें सारी बातें बताकर वे चुप हो गए थे। उनकी दशा उस फरियादी की सी थी, जो अपने लिए सुनाई जानेवाली सजा की प्रतीक्षा में जड़ हो गया हो...।
सबकुछ जानकर डॉ. वर्मा ने थोड़ी देर के अपलक मौन के बाद उनके कंधे पर धीरे से अपना हाथ रखा था—जीवन के ऐसे निर्णय इतनी जल्दबाजी में नही लिये जा सकते, अविनाश। मुझे तुम दोनों की मनःस्थिति का अनुमान था। मुझे दो दिन की मोहलत दो, भाई...
डॉ., विकासचंद्र वर्मा ने आशातीत लहजे में अपनी स्वीकृति प्रदान की थी—समाजशास्त्र का पुराना विद्यार्थी हूँ। उम्र और अनुभव दोनों में तुमसे बड़ा। जातिवादिता के खिलाफ व्याख्यान देकर, रचनाएँ लिखकर मैंने रूढ़िमुक्त समाज के नए ढाँचे को अपनी कल्पना में सहेजा अवश्य है; लेकिन अविनाश, तुमसे झूठ नहीं कहूँगा—आज जब अपने ही जीवन में अपनी मौलिक अवधारणाओं के प्रयोग का सुयोग मिला है, तब न जाने क्यों, मेरी आत्मा किसी अज्ञात भार से दबी जा रही है। सैकड़ों वर्षों से बंद अर्गलाओं को खोलना निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि होगी; तब फिर मन-प्राण को जकड़नेवाला यह संकोच कैसा...?

उनकी प्रश्नविकल आँखों के कातर भाव को थाहकर डॉ. वर्मा ने आश्वस्ति दी थी—
घबड़ाओ मत, अविनाश ! अरुणा का एकमात्र अभिभावक होने के नाते उसके भविष्य की, उसके सुख-दुःख की चिंता करने का पूरा दायित्व मेरा है। और वही दायित्व-बोध इस समय मुझे प्रताड़ित कर रहा है। तुम्हारे परिवारवालों की ओर से घोर आपत्ति होगी, ऐसा मैं मानता हूँ। तुम आत्मनिर्भर होते तब भी...खैर, ये सारी दुश्चिंताएँ मेरे जिम्मे...अरुणा की प्रसन्नता के लिए मैं कोई भी चेष्टा बाकी नहीं रखूँगा।
डॉ. विकास वर्मा ने किसी को बताए बिना निर्णय लिया था। अरुणा नहीं बताती तो शायद वे कभी नहीं जान पाते—अविनाश के बडे़ भैया और बाबूजी से मिलकर उन्होंने अपना विनम्र प्रस्ताव उनके सामने रखा था—एक बार मेरी बहन को देख भर लें, मिश्रजी, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, उसकी सौम्यता का प्रभाव...
बड़े भैया ने दोटूक जवाब दिया था—हमारे गाँव में हर बरन के लोग रहते हैं। मजाल नहीं कि एक बिरादरी दूसरी बिरादरी के निजी मामलों में दखल दे। हम शुद्ध संस्कारी ब्राह्मण हैं, प्रोफेसर साहब। हमारे घर आकर ऐसी बेजा बात करने की हिम्मत आपको कैसे हुई ? कान खोलकर सुन लीजिए, अविनाश को हमने आज से मरा हुआ मान लिया। अब आप जो चाहें, करें; हमारा आपसे या उससे कोई भी वास्ता नहीं...।

कई दिनों की जटिल ऊहा-पोह के बाद डॉ. वर्मा ने  निश्कृति पाई थी—
अविनाश, यदि तुम सहमत हो तो वैदिक रीति से यह विवाह इसी लग्न में होगा, मुझे अपने सगे-संबंधियों की भी कोई परवाह नहीं....इस शहर के, विश्वविद्यालय के पुराने बंधु-बांधव मेरे सहयोगी होंगे, मेरा अटूट विश्वास है।
वह दिन और आज का दिन...उन्होंने गाँव की ओर मुड़कर नहीं देखा था। बाबूजी की आग्नेय आँखों का क्रूर भाव, बड़े भैया का कटूक्तियों और टोले-मुहल्ले के व्यंग्य-शर झेलने की सामर्थ्य उनमें नहीं थी, ऐसी बात नहीं...लेकिन वे नहीं चाहते थे कि अरुणा की कोमल संवेदनाओं को उनके परिवारवालों के किसी भी आचरण की कचोट मिले।
उसने तो कई बार कहा था—एक बार गाँव चलिए तो सही...मुझे विश्वास है—वे लोग हमें माफ....

नहीं, अरु, वर्जनाओं की आंच में तपाई गई रूढ़ियों से जिनकी संरचना हुई हो, उन्हें तुम्हारी निर्दोषता का कभी अनुमान तक नहीं हो सकता...मेरी आत्मा ने तुम्हारा वरण किया है—जाति-धर्म का निषेध बेशक मेरे लिए नहीं है, लेकिन घर के ऊँचे आले में पड़े बाबूजी के कुलदेवता अब भी अपवित्रता के खतरे से हर क्षण आशंकित रहते हैं। कान पर जनेऊ चढ़ाकर तीन बार गीली मिट्टी से हाथों की शुद्धि करनेवाले ब़डे भैया कभी यह गवारा नहीं करेंगे कि तुम्हारी छाया तक उनके लिए परसी हुई थाली पर पड़े। वहाँ तुम्हारे स्वागत की नहीं, अपमान की संभावनाएँ मात्र हैं और मैं हरगिज नहीं चाहता कि...
बड़ी भाभी की पहली बेटी हुई थी तो बाबूजी ने पूरे गांव को पक्की रसोई का निमंत्रण दिया था—दो पुश्त के बाद हमारे घर में कन्या आई है, साक्षात् लक्ष्मी है हमारी पोती...इसके जन्म की खुशी तो बेटे के जन्म से बढ़कर...
मन को कुरेदती हुई एक गहरी कसक निःश्वास में ढलती गई थी—

आज बाबूजी, बड़े भैया और भाभी यहाँ होतीं तो...उनके जीवन का इतना बड़ा अवसर यूँ ही चुपचाप निःशेष हो जाता ? बाबूजी भागते हुए ज्योतिषी के पास जाते---अच्छी तरह शोधकर ग्रह-विचार कीजिए, पंडितजी हमारे अविनाश का पहला जातक है यह। बड़े भैया आमंत्रित अतिथियों की फेहरिश्त तैयार करने बैठ जाते—अविनाश, ये निमंत्रण-पत्र रख अपने यार-दोस्तों को...देखना, कोई छूटने नहीं पाए...बड़ी भावज अस्त-व्यस्त होकर मेवे-मसाले से भरी अछवानी कुटवातीं, उल्लास में उमगती हुई सोहर से बोल कढ़ातीं—
            राजा दशरथ लुटावेले सगरे भवनवा
            रानी लुटावेली हाथ के कंगनवा...


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