एक टुकड़ा शांतिरथ - शशिप्रभा शास्त्री Ek Tukda Shantirath - Hindi book by - Sashi Prabha Shastri
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एक टुकड़ा शांतिरथ

शशिप्रभा शास्त्री

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 1991
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1605
आईएसबीएन :00000

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यथार्थ की सतहों के अंश-अंश को खंगालती-उघाड़ती और उकेरती कहानियाँ

Ek Tukada Shantirath

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


कहानी को तनाव की देन कहा जाता है। मेरे लिए भी कहानी स्वयं को मुक्त करने का सिलसिला है। मेरी मन की आँखों ने पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, किसी भी क्षेत्र में जब भी किसी दाहक विसंगति को घटित होते देखा है, अनुभव किया है, तो उस खुबन ने मुझे दिनोंदिन चैन नहीं लेने दिया है—आक्रोश, वेदना, छटपटाहट मुझपर बराबर हावी रही है और यह स्थिति उस समय तक बनी रही है, जब तक शब्दबद्ध करके मैंने कलम की नोक से कागज की छाती पर उसे उतार नहीं दिया है। कहानी के यथार्थ के साथ-साथ काल्पनिक स्थितियों को भी मैंने उसी रूप में जिया है (कहानी में यथार्थ और काल्पनिक स्थितियाँ सम्मिश्रित जो रहती हैं) कहानी-रूप में इनकी निकासी तभी संभव हुई है।

‘रास्ता’ कहानी ऊपर से देखने में एक हास्य कहानी है, किंतु इसके अंतर में वृद्ध व्यक्ति की क्रियाएँ और उसका मानसिक सोच जिस प्रकार उसके युवा साथी के मन को क्षत-विक्षत करता है और उस असहनीय स्थिति से उबरने के लिए वह जो तरीका ढूँढ़ लेता है, यही वह रास्ता है, जिसने मार्ग को पार करते जाने की यथार्थ स्थिति को काफी मनोरंजक बना दिया है।

कहानी ‘तलघर में’ मनोतल में उमड़ते-घुमड़ते उन मनोभावों का एक पिटारा है, जिनको देखने से व्यक्ति खुद से भी बचना चाहता है पर स्थितियाँ हैं कि उसे बेचैन बनाए रखती हैं। ‘दुश्मनी की बातें’ उस बच्चे की अपने माता-पिता के प्रति आक्रोशपूर्ण अभिव्यक्ति की कहानी है, जिसके माता-पिता को एक के बाद एक संतान को जन्म देने में कोई संकोच अथवा चिंता नहीं है, परिवार-नियोजन की उपलब्धि से अनभिज्ञ होता हुआ भी बच्चा उन स्थितियों से क्षुब्ध रहता है।

‘फासले उजाले के’ उस युवती से संबंधित एक लंबी कहानी है, परिस्थितिवश अपने कड़े संघर्ष के बावजूद जिसने अपने में ही रुचि और रस लेना छोड़ दिया है, वह रुचि और रस व्यक्ति में कब विकसित होता है और कब और कैसे सूख जाता है—यह कहानी इसी प्रकार की स्थितियों का दिग्दर्शन कराती है; जबकि ‘काम रुकता है’ एक बिल्कुल भिन्न कहानी है, जिसमें शैक्षणिक संस्था की शोधपूर्ण गतिविधियों का लेखा-जोखा है। ‘राख हो चुका समय’ कहानी भी आज के शिष्यों की तिकड़मी मनोवृत्ति का प्रदर्शन करती है; गुरु-शिष्य के मध्य आज मानवीय नाते किस प्रकार चुकते जा रहे हैं—विस्मय होता है।

आज की भाग-दौड़, आपाधापी और जिंदगी के मध्य दांपत्य जीवन की मधुमय श्रृंखलाएँ चरमराकर टूटती चली जा रही हैं और यह सब स्वाभाविक प्रतीत होने लगा है, अस्वाभाविक प्रतीत होता है, वहाँ, जहाँ पति-पत्नी के मध्य पचास वर्ष का समूचा दांपत्य जीवनकाल दिनोंदिन आत्मीयता और सुकोमल भावनाओं की नसैनियों पर चढ़ता हुआ नितांत निश्छल, सात्त्विक, आडंबरविहीन हो और एकदम प्रेम ही प्रेम पगा हो, छिछोरे-पन से रहित अनजाने में ही जहाँ दोनों एक-दूसरे की रीढ़ बने हुए हों—ऐसे ही एक अस्वाभाविक परिदृश्य की कहानी है ‘रीढ़’; इसके एकदम विपरीत ‘चोट के नीचे’ कहानी पति-पत्नी के उस जोड़े की कहानी है जहाँ दोनों के मध्य संशय, अविश्वास और एक-दूसरे के प्रति घृणा की इतनी गहरी खाई खुदी हुई है कि एक-दूसरे के प्रति किसी प्रकार के लगाव का प्रश्न ही नहीं उठता प्रत्युत यही स्थिति पत्नी को दारुण अवस्था में भी खिलवाड़ और वासना की ओर उन्मुख करने का कारण बनती है।

‘टाँगों से बँधी आँखें बनाम कबाड़’ एक अपंग लड़की की मार्मिक कहानी है, जिसको अपनी अपंगता के कारण अपने निजी संबंधियों तक से तिरस्कृत होना पड़ता है जबकि वह अपंगता उसे उन्हीं लोगों से मिली है। ‘एक और एक’ उस अभागी युवती की कहानी है, जो अपनी गिनी-चुनी मधुयामिनियों के बाद ही पति की आकस्मिक मृत्यु के कारण वैधव्य को प्राप्त होती है। इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है उसकी ददिया सास को, जो बहुत छोटी उम्र में ही पतिविहीना हो चुकी थीं। युवती वधू स्वयं पेसोपेश में पड़ जाती है कि कहीं वैसा ही तो नहीं है, जैसा सब लोग कह/मान रहे हैं, पर अंततः कहानी क्या मोड़ लेती है, यह एक विचित्र सत्य है।

‘स्टैंडर्ड’ एक व्यंग्यपूर्ण हास्य कहानी है, जहाँ फैशन की चकाचौंध और आडंबर की चाह व्यक्ति को जीवन की असलियत समझने ही नहीं देती। ‘एक टुकड़ा शांतिरथ’ इस संग्रह की शीर्ष कहानी है। जिंदगी की आपाधापी, मारधाड़ और उखाड़-पछाड़ से त्रस्त हो व्यक्ति की एक छोटी-सी झलक मात्र पाने के लिए लालायित हो उठता है, पर वह लालसा उसे कितनी मँहगी पड़ती है, इसी का वृत्त है यह कहानी, जिस व्यथा को एक भुक्तभोगी ही समझ सकता है।

‘पहली बार/आखिरी बार’ कहानी का कथ्य एक ऐसी नारी-गाथा को लेकर चलता है, जो वृद्धावस्था में भी न अपना सौंदर्य खोती है, न अपनी चाहत—चाहत का यह सैलाब उसे किस हद तक ले जाता है, हैरानी होती है, क्या ऐसा भी हो सकता है, पर ऐसा हुआ है, उसी समय मानसिक ठहराव उसे इस हद से आगे बढ़ने पर रोक लेता है शायद पहली बार—हो सकता है लालसा की वह लहर बस आखिरी बार ही उठी हो !

संक्षेपतः ये सभी कहानियाँ तथा अन्य कथ्य में एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं। इनमें समानता है तो यह कि लेखिका ने इनकी सच्चाई को तन-मन से जिया है। इनके पात्रों की पीड़ा के दंश को अथवा उनके हास्य-विनोद को खुद महसूसा है और तब ये कहानियाँ मात्र स्याही और कलम से लिखी नहीं रह गई हैं, इनके अक्षरों के अंश-अंश में खून के जर्रे बिखरे हुए हैं—हर कहानी मेरे मनोद्वेग और प्रतिक्रिया का सही-सही दस्तावेज है।

रास्ता


छोटी बहिन के श्वसुर मुरारी बाबू के घर आने पर अविनाश के द्वारा उनकी काफी अभ्यर्थना की गई—सुबह शय्या-चाय, फिर भव्य नाश्ता, दुपहर को लजीज खाना, तीसरे पहर फिर बृहद् चाय और तदुपरांत रात्रि-भोज। अविनाश को यह सब करना अच्छा लग रहा था, मुरारी बाबू कब-कब उसके घर आते हैं; यह तो संयोग से उन्हें मसूरी में अपने मित्र के दो बच्चों से मिलने का काम था, सो वे मसूरी जाते हुए बीच में दो दिन उसके यहाँ डोईवाला में ठहर गए थे। अपने साथ मुरारी बाबू ने उसे मसूरी चलने की दावत दी, तब भी उसने सहर्ष स्वीकार लिया। मुरारी बाबू की किसी भी बात से इंकार करने या बहाना बनाने का प्रश्न ही नहीं था।

चलते हुए पत्नी ने सलाह दी—‘‘राधे को भी साथ ले जाओ। हो सकता है, तुम्हारे दोस्त के यहाँ, जहाँ तुम बाबूजी को ले जाकर ठहराओगे, वहाँ इन दिनों कोई नौकर न हो।’’ पत्नी की बात मान लेना अच्छा ही हुआ; मसूरी में दुर्गानाथ के यहाँ उन दिनों नौकर छुट्टी पर गया हुआ था, पत्नी मायके चली गई थी और सबसे ऊपर, मित्र स्वयं बुखार के कारण शय्याग्रस्त थे।

पहुँचते ही राधे ने चाय तैयार की, नाश्ता सजाया और पहुँचने के एक डेढ़ घंटे बाद ही अविनाश मुरारी बाबू को लेकर उनके बताए स्कूल में बच्चों से मिलाने ले चला। यह स्कूल घर से पास पड़ता था, पर इस समय रास्ता लम्बा प्रतीत हो रहा था, क्योंकि पहाड़ों पर अँधेरा जल्दी ही उतर आता है। इस मार्ग में सड़क टूटी हुई थी और खड्ड की तरह नीचे की ओर कुछ नए मकानों का निर्माण चल रहा था, साथ ही बोर्ड लगा था—प्लॉट फॉर सेल।

‘‘क्यों न यहाँ एक प्लॉट ले लिया जाए और इधर ही मकान बनवाया जाए !’’ मुरारी बाबू ने प्रस्ताव किया।
‘‘विचार अच्छा है, पर इतनी तबालत मोल ली जाए, इससे अच्छा है कि जब आए, कोई होटल या मकान किराए पर ले लिया। जितने अर्से रहना हो, रहे और फिर छोड़कर चल दिए, रख-रखाव की कोई चिंता नहीं !’’—अविनाश ने सुझाव रखा।
‘‘यह भी ठीक है !’’ मुरारी बाबू ने समर्थन किया।

पहाड़ी-धुंध में जब तक मकान बनते नजर आए, उतनी देर उसी सिलसिले की बातें चलती रहीं; अँधेरे के कारण दृश्य गुम हो जाने पर उस संदर्भ की बातें गुम हो गईं। अब चारों ओर विराट् ऊँचे पहाड़ खड़े थे, पैरों के नीचे ऊबड़-खाबड़ जमीन थी और सड़क पर इक्के-दुक्के लैंपपोस्ट अपनी मरगिल्ली रोशनी फेंक रहे थे। सामने से आते हुए किसी आदमी से स्कूल के बारे में पूछा तो उसने बताया कि पास ही है।
मुरारी बाबू ने कहा—‘‘पास होगा पर पहाड़ों में मुकामों की यह सिफत होती है कि जगह पास नजर आती है, पर उस तक पहुँचने के लिए रास्ते बड़े घुमौवल होते हैं, तब कहीं जाकर मंजिल मिल पाती है। हमें तजुरबा है, हमारी काफी जिंदगी पहाड़ों पर ही कटी है।’’—वे अपनी छड़ी ठकठकाते हुए धीरे-धीरे बढ़ रहे थे।
‘‘जिंदगी की मंजिल को पाने की भी शायद यही सच्चाई है !’’—अविनाश ने ओठों ही ओठों में बुदबुदाया।
‘‘आपने कुछ कहा ?’’—मुरारी बाबू बढ़कर साथ आ गए थे।

अविनाश ने अपनी बात नहीं दोहराई, कहा—‘‘अब दूर नहीं है, बस आ ही पहुँचे !’’
‘‘चलिए अच्छा है ! जिस बच्ची से हम मिलने जा रहे हैं, वह करीब ग्यारह साल की है।’’—मुरारी बाबू बच्चों के बारे में बताने लगे थे, ‘‘दोनों बच्चे थाइलैंड से इधर आए हैं। बच्ची शिखा इसी साल आई है, इसका भाई मसूरी में पहले से ही पढ़ रहा है। बच्ची थाई जबान बोलती है; मालूम नहीं, अभी उसने इधर की जबान सीखी होगी या नहीं !’’
‘‘बच्चों की भाषाई पकड़ काफी तेज होती है। अब तक उसने काफी कुछ सीख लिया होगा, आप देखेंगे !’’ अविनाश ने यों ही उत्तर दिया।
‘‘हो सकता है !’’—बातें किन्हीं दूसरे मुद्दों पर भी हुईं और बातों ही बातों में दोनों ने देखा—वे स्कूल की बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़े हैं। लैंपपोस्ट की रोशनी में घड़ी को पढ़ा—पौने सात बज रहे थे। पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि बच्ची शिखा दो-चार मिनट पहले ही अपनी अध्यापिकाओं और दूसरी लड़कियों के साथ पास की ही एक दूसरी बिल्डिंग में किसी फंक्शन में सम्मिलित होने ले जाई गई है।

‘‘चलिए, अब इतनी दूर आए हैं तो उधर ही चले चलते हैं।’’—अविनाश ने सुझाव दिया। बच्चों से मिलने का कार्यक्रम वह जल्दी-से-जल्दी खत्म करवा देना चाहता था। मुरारी बाबू ने बात मान ली, पर चपरासी के साथ कुछ दूर चलने पर ही पता लगा कि पासवाला रास्ता बेहद बेढब और ढालू है। चारों तरफ फैले हुए विकराल अँधेरे और बीहड़पन को देखते हुए मुरारी बाबू ने कहा—‘‘इस वक्त लौट चलना ही बेहतर होगा। ऐसी भी क्या जल्दी है, कल चले आएँगे !’’
‘‘जी हाँ, आप लोग कल सवेरे नौ बजे आ जाइए, हम लड़की से कह रखेंगे।’’—चपरासी ने मुरारी बाबू की ढलती उम्र की परेशानी को भाँप लिया था।

अगले दिन सवेरे नौ बजे तक बच्चों के स्कूल पर फिर पहुँच जाना था, पर मुरारी बाबू आठ बजे तक सोए पड़े थे। जगाने की हिम्मत नहीं हुई। काम उन्हीं का है, उन्हें ही इसकी चिंता होनी चाहिए; पर चिंता अविनाश को ही विशेष थी, वह सिर्फ दो दिन की छुट्टी लेकर आया था और दो दिन में ही मुरारी बाबू का सब काम समाप्त करवाकर वह उन्हें वापस ले जाना चाहता था। राधे से उसने कुछ नाश्ता बनाने के लिए कह दिया, साथ ही कहा कि वह चुपके से देख ले कि मुरारी बाबू उठे या नहीं। राधे ने देखा कि मुरारी बाबू जगे पड़े थे।
‘‘साहब, चाय लाऊँ ?’’ मौका देखकर उसने पूछ लिया।

‘‘ले आओ !’’—मुरारी बाबू ने स्वीकृति दे दी तो राधे और अविनाश दोनों को खुशी हुई। आज राधे को भी साथ चलना था, मसूरी देखने का यह उसका पहला सबका था, इसलिए सब काम जल्दी ही निबटाने थे, मित्र को पथ्य इत्यादि देने का काम भी राधे का ही था।
मुरारी बाबू की शय्या-चाय निबटाने के उपरांत उन्हें नाश्ते से निवृत्त करा लेने के लिए पर्याप्त कौशल और धैर्य अपेक्षित था, क्योंकि किसी भी काम को मुरारी बाबू हड़बड़ाहट में करने के पक्षधर नहीं थे—सब काम वे धीरे-धीरे ही करते। चाय पी लेने के बाद नाश्ता तैयार होता देखने के लिए वे रसोईघर में पहुँच गए और दस तरह की नुक्ताचीनी करके राधे को नए-नए सुझाव देने लगे। राधे के साथ उनके प्रश्नोत्तर कुछ इस प्रकार थे—
‘‘नाश्ते में क्या बना रहे हो भाई ?’’

‘‘साहब ने भरवाँ पराँठे, टोस्ट और चाय तैयार करने के लिए कहा है, बिस्कुट हैं ही। आप चाहें तो दूध भी ले सकते हैं।’’
‘‘पराँठें में क्या भरोगे ?’’
‘‘फूलगोभी, मूली, आलू—जो भी आप कहें, वई भर दें।’’
‘‘फूलगोभी है ?’’
‘‘जी साब, है !’’
‘‘चलो, वही भरो !’’
‘‘ठीक है साब !’’

‘‘गोभी का पराँठा कैसे बनाते हो, या कोई भी भरवाँ पराँठा ?’’ राधेश्याम चुप रह गया, गोभी के पराँठे बनाने की अपनी प्रक्रिया पर वह विचार करने लगा, फिर बोला—‘‘जैसे बनते हैं साब, वैसे ही बनाते हैं।’’
‘‘आखिर कैसे—क्या करते हो ? एक लोई में भरते हो या दो में ?’’
‘‘साहब दो में ! आटे की लोई बनाकर रोटी की तह में रखकर बेलते हैं, फिर दोनों के बीच कद्दूकस की हुई फूलगोभी की तह लगाकर मिला-कर बेल लेते हैं।’’
‘‘शाब्बाश ! अब हम तुम्हें बढ़िया पराँठा बनाने की तरकीब बताते हैं।’’—जबान को चटखारा देते हुए मुरारी बाबू बताने लगे—‘‘जो दो लोइयाँ तुम बेलते हो, उनमें भी घी भरो और तब बेलो, और तब उन दोनों के बीच जो कुछ भी भरना हो, उसमें भर दो। ठीक, समझ गए न !’’
राधे ने सिर हिलाया—‘‘समझ गया सरकार !’’
‘‘बस तो अब नाश्ता तैयार करो !’’

नाश्ते के समारोह से निवृत्त हो जाने के बाद आज की यात्रा का श्री-गणेश जिस समय हुआ, उस समय दस बजने में दस मिनट शेष थे। सड़क पर पहुँचकर अविनाश ने याद दिलाया—‘‘कल स्कूलवालों ने नौ बजे तक पहुँचने के लिए कहा था।’’
‘‘ठीक है, जल्दी क्या है, पहुँच ही जाएँगे !’’—कलवाली सड़क पर राधे सहित वे दोनों धीरे-धीरे बढ़ते चले जा रहे थे। राधे के हाथ में थमे झोले में मिठाई के दो डिब्बे थे।

स्कूल पहुँचने पर बच्ची से मिलने की समस्या आज भी उसी रूप में सामने खड़ी थी, यानी नाश्ते के बाद तमाम लड़कियाँ आज चर्च के सनडे स्कूल के लिए जा चुकी थीं। मुरारी बाबू और अविनाश खेल के मैदान में पत्थर की बेंच पर बैठे इंतजार कर रहे थे, राधे कुछ दूर पेड़ के नीचे बैठा—एक घंटा, दो घंटे, ढाई घंटे-प्रतीक्षा करते-करते सूरज ऐन सिर के ऊपर चढ़ आया था और तरह-तरह की बेतुकी बातें करते हुए दोनों बेहद थक चुके थे, तभी बच्ची शिखा हकबकाई-सी भागती आई और मुरारी बाबू से सट गई। मिठाई का डिब्बा थामे हुए शिखा ने अंग्रेजी में आभार प्रकट किया, कहा—‘‘मुझे मिठाई अच्छी लगती है।’’
‘‘तुम्हें अंग्रजी में बात करना आ गया है; हिन्दी में भी बोल लेती हो क्या ?’’

‘‘थोरा-थोरा !’’ शिखा कहकर मुस्करा दी। मुरारी बाबू ने अविनाश की तरफ देखा, कि तुमने ठीक कहा था ! उसकी पीठ थप-थपाते हुए बच्ची से उन्होंने बाजार चलने का आग्रह किया—‘‘तुम हमारे साथ चलो, हम तुम्हें बाजार घुमाएँगे, चीजें खिलाएँगे, दिलवाएँगे।’’
‘‘अंकल, आज जूनियर क्लासों का फंक्शन है, आइ वांट टू अटैंड दैट।’’
‘‘ठीक है, तब कल सही ! कल अपनी मिस से परमीशन ले लेना।’’

‘‘अंकल मैंने मसूरी देख ली है। अब नहीं देखूँगी।’’—शिखा टूटी-फूटी हिन्दी में बोली थी।
मुरारी बाबू हँसे, बोले—‘‘तुम्हारा मन नहीं है तो ठीक है !’’ बच्ची के सिर पर उन्होंने हाथ फेरा और फिर वे अपने साथियों के साथ मुड़ चले। अपने मिशन में असफल होने पर भी वे निराश नहीं थे।
‘‘अब आपको विनय से मिलना है न ?’’—इतनी देर में अविनाश दूसरे बच्चे का नाम भी जान गया था।
‘‘हाँ, वही तो करना है। अब स्कूल कितनी दूर है ?’’

‘‘इसी जगह से एकदम दूसरी दिशा में—तमाम कुलड़ी बाजार पार कर हम मालरोड पर पहुँचेंगे और फिर पूरी माल पर चलकर किताबघर आएगा। वहाँ पहुँचकर मालूम करना होगा कि वह स्कूल कहाँ है।’’
‘‘हूँ !’’—मुरारी बाबू छड़ी टेकते हुए बराबर मुस्तैदी से चलते चले जा रहे थे। लगता था, अब तक की यात्रा में वे कतई नहीं थके थे। कुलड़ी बाजार पार कर उन्हें एक शॉल की दुकान नजर आई, वहाँ शोकेस में कुछ सुन्दर शॉलों का प्रदर्शन किया गया था। मुरारी बाबू वहीं ठिठक गए—‘‘आइए शॉल देखें !’’ उन्होंने अविनाश को भी सम्मिलत किया।
‘‘क्या देखेंगे यहाँ ?’’—दुकान की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अविनाश ने आश्चर्य प्रकट किया।
‘‘अजी साब, शॉल देखेंगे, कहा न !’’—मुरारी बाबू ठठाकर हँसे थे। दुकानदार भी मुस्कराया। वह उन्हें सम्मानपूर्वक दुकान में ले आया और तरह-तरह की डिजाइन के बेशकीमती शॉल दिखाने लगा।
‘‘कहिए, कैसे हैं शॉल ?’’—मुरारी बाबू ने शुरू किया।

‘‘अच्छे ही दिख रहे हैं। अभी वाइफ दो-तीन शॉल लुधियाने से लाई थी—।’’ अविनाश अटक गया।
‘‘कैसे हैं वे शॉल ?’’
‘‘मैंने अभी उन्हें ठीक तरह नहीं देख है, अच्छे ही होंगे।’’
‘‘कैसे शख्स हैं आप ! वाइफ इतनी दूर से शॉल लाई हैं और आप हजरत देख तक नहीं रहे हैं।’’

‘‘बात दरअसल यह थी—’’
‘‘चलिए, बात कुछ नहीं थी; यह बताइए, यह शॉल कैसा लगा ?’’—मुरारी बाबू ने अपने सामने फैलाए गए शाल को संकेत करते हुए पूछा।
‘‘साहब, यह शॉल आपने खूब पसन्द किया है। यह रिवर्सेबल है, दोनों तरफ से ओढ़ा जा सकता है।’’ जवाब शॉलवाले ने दिया; वह शॉल की खूबियाँ समझाने लगा था।

‘‘देखिए, आप भी देखिए !’’—अविनाश को फिर समेटा गया। मुरारी बाबू ने बड़ी रुचि से शॉल देखना आरम्भ किया था, फिर वे उसकी कीमत पूछने लगे, थोड़ी देर कीमत पर बहस हुई और फिर मुरारी बाबू यह कहकर दुकान से निकल आए कि लौटने पर शॉल ले जाएँगे।
अविनाश को पूरे समय झूँझल छूटती रही—इस तरह तो अपनी मंजिल पर शायद शाम तक भी नहीं पहुँच सकेंगे। दुकान से बाहर निकलकर मुरारी बाबू बताने लगे—‘‘आपने तो शॉल में कोई रुचि नहीं ली, पर मैं कीमत का अंदाजा लगा रहा था। हमारे आगरे में शॉल की कई दुकानें हैं, एक तो अपने दोस्त की ही है।’’
‘‘तब आप वहीं से लें, दोस्त होने के नाते वे आपको सस्ते में दे देंगे।’’
‘‘जरूरी नहीं है, कभी-कभी दोस्त भी कान काटते हैं। आपने उस शॉल के किनारों पर बने काम को देखा, कितना खूबसूरत था !’’

शॉल जैसी चीजों की उस तरह की खूबसूरती को परखने की बुद्धि और चाह अविनाश में नहीं थी। न उसके पास इतना अलल-बलल पैसा और समय था। पर भाग्य की विडम्बना, आज उसे चींटी की चाल रेंगते चलना पड़ रहा था, देह और मन में ऊब और थकान भरती चली जा रही थी।
कुछ आगे चलकर मुरारी बाबू एक अखबार की दुकान में घुस गए, अविनाश बाहर लगी पत्रिकाओं को पढ़ता-देखता रहा, एकाध पत्रिका उसने खरीद भी ली। राधे एक रिक्शा खींचनेवाले पहाड़ी के पास बैठा बतियाता रहा। इस दुकान में मुरारी बाबू ने पच्चीस-तीस मिनट ही लगाए। पोस्ट-ऑफिस के पास से जो सड़क ऊपर की ओर जाती थी, उसी से गुजरते हुए तीनों मालरोड बच्चा पार्क पर निकल आए थे। शरदोत्सव के उपलक्ष्य में यह स्थान खूब सजाया गया था। पहाड़ों पर भी चित्र-रचना की गई थी—तरह-तरह के फव्वारे, फूल, पहाड़ के ऊपर-नीचे ले जानेवाली ट्रॉली—कुल मिलाकर दृश्य मनोरंजक था। कुछ देर तीनों देखते रहे, फिर अविनाश ने याद दिलाया—‘‘हम अपना खास मुद्दा विनय से मिलने का तो भूले ही जा रहे हैं। चलिए, पहले वह काम निबटा लिया जाए।’’ 


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