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धर्म एवं दर्शन >> कर्मविपाकसंहिता भाषा टीका सहित

कर्मविपाकसंहिता भाषा टीका सहित

शिव गोविन्द दीक्षित सामवेदी

प्रकाशक : तेजकुमार बुक डिपो प्रा. लिमिटेड प्रकाशित वर्ष : 1983
पृष्ठ :365
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15984
आईएसबीएन :000000000

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कर्म सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन

प्रथम पृष्ठ

भूमिका

हे महाशय !

मेरी यह प्रार्थना है कि आप लोग इस संसार में सब मनुष्यों को देखते हैं कि एक पैदा होकर सुख भोगता है, दूसरा दुःख भोगता है, तीसरा कुछ काल तक सुख भोगकर पीछे दुःख भोगता है और चौथा दुःख भोगकर पीछे सुख भोगता है। इसी तरह से नाना प्रकार के मनुष्यों को जो क्लेश होता है, वह पूर्वजन्म के पाप से होता है। इसका प्रायश्चित्त कराने से-जप, तप, व्रत, दान और होम कराने से, सब पूर्वजन्म के पाप छूट जाते हैं। अपने पूर्वजन्म में जो जिस तरह पुण्य-पाप करता है वह उसके फल को भोगता है। कर्म ही प्रधान होता है।

इसी से आनन्दकन्द परमानन्द व्रजचन्द श्रीकृष्णचन्द्रजी ने गोवर्धन पूजा के विषय में पिता नन्दजी से कहा है कि :

कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते ।
सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवानिपद्यते ॥

कर्म से प्राणी पैदा होता है और कर्म से ही नष्ट हो जाता है। सुख, दुःख, भय और क्षेम ये कर्म ही से प्राप्त होते हैं। इसलिए कर्मविपाक की संहिता कही गई है। इसमें १०८ अध्याय हैं। ये १०८ कानून हैं। इनके खिलाफ जो कर्म करेगा अथवा जिसने किया है वही अपराधी होगा। यह कर्मविपाक संहिता धर्मराज के अधीन है, जिसका प्रकाश चित्रगुप्त करते हैं। यह मृत्युलोक है, इसमें भारतवर्ष कर्मक्षेत्र है। इसमें जैसा मनुष्य कर्मरूप खेती करेगा वैसा ही यहाँ पर भोग करेगा। इस वैदिक और पौराणिक कर्मविपाक को सज्जनों के उपकारार्थ प्रकाशित किया है।

इसके मूल श्लोक अच्छी तरह से हिन्दी भाषा में सरल किये गये हैं, इसके देखने से पूरा-पूरा भावार्थ समझ में आ सकता है। और विद्वज्जनों के देखने योग्य मूल भी शुद्ध किया गया है। यदि कहीं दृष्टि चूक से रह गया हो उसे विद्वज्जन क्षमा करें।

इति शिवम् ।

भवदीय

शिवगोविन्द दीक्षित सामवेदी।

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