प्रिय विदूषक - जगन्नाथ प्रसाद दास Priya Vidushak - Hindi book by - Jagannath Prasad Das
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प्रिय विदूषक

जगन्नाथ प्रसाद दास

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1560
आईएसबीएन :81-88267-14-7

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मानवीय संबंध काफी जटिल हैं सहज नहीं है, अकसर सीमाबद्ध या दुःखप्रद हैं। सबसे दृढ़ तब होते हैं, जब उनके विरोधाभास अधिकतम होते हैं, जिनके न होने पर वे समाप्त हो जाते हैं।

PRIY VIDUSHAK

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जगन्नाथ प्रसाद दास की इन बारह चुनिंदा कहानियों के पात्र कुछ ऐसे संबंधों से बंधे हुए हैं, जिनपर न उनका नियंत्रण है और न ही वे उन्हें पूर्णतः समझते हैं। ढलती उम्र के एक प्रोफेसर, जो अपने को अभी भी सक्षम समझते हैं, लेकिन फिर भी एक युवा विद्यार्थी के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं।

एक पति की खोज उसे दुविधा में डाल देती है कि वह अपनी पत्नी को भलीभाँति समझ पाया या नहीं; एक बेटी का विवाह उस दरार को मजबूत करता है, जिसकी शुरुआत माता-पिता ने उसके जीवन पर नियनत्रण करने के लिए प्रयास किया था।
एक कथाकार प्रतिष्ठा की चाहत का सामना करते हुए सही मायने में सफलता की परिभाषा पर विचार करता है। ये कहानियाँ कुछ ऐसे ही विषयों को सामने लाती हैं और मानवीय संबंधों के कथा लेखन में पूर्व-स्वीकृति रूढ़िवादी धारणाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

एक बेरोजगार एवं बेघर पुस्तक विक्रेता अपने जीवन को सफल बनाने की कोशिशों को नकारता है। एक फौजी जब छुट्टियों में घर आता है, तो महसूस करता है कि उसकी औरों से जो दूरी है वह सिर्फ भौतिक नहीं हैं, एक पति का अपनी पत्नी के कैरियर को प्रोत्साहित करना उसकी दूरी को बढ़ाता है मानवीय संबंध काफी जटिल हैं सहज नहीं है, अकसर सीमाबद्ध या दुःखप्रद हैं। सबसे दृढ़ तब होते हैं, जब उनके विरोधाभास अधिकतम होते हैं, जिनके न होने पर वे समाप्त हो जाते हैं।


सब है, कुछ नहीं है



हर बार तारापद सोचता है कि अब वह फिर कभी ऐसी सभा-समितियों में नहीं आया करेगा; लेकिन आमंत्रण पाते ही हामी भर दिया करता है। अभी वह खाली मंच पर बैठा सामने वाली कतार की खाली कुर्सियों को देखकर मन-ही-मन बड़ा-बड़ा रहा था। इसी बीच बिजली वाले ने आकर उसके सिर के ऊपर वाले बल्व को छोड़कर सारे बल्बों को बुझा दिया। कहीं इस अंधेरे में उसके पास खड़ी बंधुआ मजदूर लड़का उसे अकेला छोड़कर भाग न जाए, इस डर से तारापद ने उस लड़के को बैठने को कहा और स्वयं अपनी कुरसी से उठकर सभापति के लिए रखी सिंहासन जैसी कुरसी पर जा बैठा। सभा के समाप्त होने के आधा घंटे के पश्चात् भी गाड़ी उसे लेने नहीं पहुँची थी।

हर बार उसके साथ ऐसा ही होता था। कस्बे के कॉलेज के वार्षिक उत्सव के लिए जो छात्र उसे बुलाने आते, इतनी मीठी-मीठी बातें करते कि तारापद उत्सव में जाने के लिए तैयार हो जाता। सभी में कितने लोग बुलाए गए हैं, कौन-कौन से मुख्य अतिथि आएँगे, उनके आने-जाने की कैसी व्यवस्था होगी इत्यादि बातों के बारे में कितना बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था, इससे तारापद भली-भाँति परिचित था। लेकिन जब लड़के उससे आकर यह कहते हैं कि उसके इलाके के लोग उसके जैसा अच्छा साहित्यिक भाषण सुनने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, तो तारापद न चाहते हुए भी जाने के लिए उत्सुक हो उठता। हर बार हामी भर देने के पश्चात् एवं निमंत्रण-पत्र पर नाम छप जाने के बाद बेचारे अतिथि महोदय का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं रह जाता परिस्थिति के ऊपर। और परिणाम हमेशा लगभग एक ही जैसा ही होता। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।

जिस समय उसके घर गाड़ी पहुँचाने के लिए कहा गया था, उसके ठीक एक घंटे देर से एक खटारा टैक्सी उसके दरवाजे पर पहुँची। बहुत देर से तारापद तैयार होकर गाड़ी का इंतजार कर रहा था। वह मन-ही-मन झुँझलाता जा रहा था।
देर से पहुँचने के लिए क्षमा माँगने के बजाय टैक्सी ड्राइवर ने कहा, ‘‘सर अब और देर मत करिए, रास्ता बहुत खराब है।’’
तारापद ने सोचा था कि उसे लेने के लिए कॉलेज के कुछ छात्र आएँगे; लेकिन ड्राइवर ने उसे जो चिट पकड़ाई उसमें लिखा था कि ‘‘सभी छात्र सभा के आयोजन में व्यस्त होने की वजह से उन्हें लेने कोई नहीं जा सकता है, जैसे भी हो, कृपया ठीक समय पर पहुँच जाएँ।’ तीन पँक्तियों की इस चिट्ठी में में भी तारापद का ध्यान तीन गलतियों पर चला गया। उस चिट का गोला बनाकर फेंकते हुए गाड़ी में जा बैठा।

वास्तव में रास्ता बहुत खराब था। थोड़ी दूर चलने के बाद ही गाड़ी खराब हो गई। तारापद पहले से ही जानता थी कि गाड़ी अवश्य खराब होगी। अक्सर गाड़ी तब खराब होती है जब तेज धूप होती है और ऐसे स्थान पर होती है जहाँ आस-पास कोई भी छायादार वृक्ष नहीं होता। ऐसी हालत में पहले तारापद बहुत झल्ला जाया करता था, ठीक एक दार्शनिक की तरह। अखबार के पन्नों से पंखा झलता, माथे पर रुमाल बाँधकर गाड़ी से उतरकर बड़े ही धैर्यपूर्वक गाड़ी के ठीक होने का इंतजार कर रहा था। खटारा गाड़ी और गाड़ी के मालिकों को गालियाँ देता हुआ ड्राइवर समस्या का समाधान करने में लगा हुआ था। उस रास्ते से गुजरते हुए कुछ दूसरी गाड़ी के ड्राइवर भी उसकी मदद के लिए आ रुके थे। खैर, कुछ समय बाद खटारा गाड़ी किसी तरह चलने लायक हो गई।

सभास्थल पर देर से पहुँचने की चिंता तारापद को एकदम नहीं थी; क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि इस तरह की सभाएँ कभी अपने निर्धारित समय पर आरंभ नहीं होतीं। उस दिन भी ठीक ऐसा ही हुआ। उसने सभास्थल पर पाया कि गिनती के कुछ लोग ही वहाँ अभी तक पहुँचे थे। उनमें से कुछ लोग मंत्री के स्वागत के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े थे। तारापद को जो छात्र बुलाने घर पर आया था, उसे वहाँ देखते ही उसने अपने पास बुलाकर दो-चार जरूरी बातें पूछ लीं—सभा के आस-पास मूत्रालय कहाँ है, भाषण के पहले पीने के पानी की व्यवस्था है या नहीं इत्यादि। इन बातों की जानकारी लेने के पश्चात उसने चेतावनी दी कि उसकी वापसी के लिए एक अच्छी गाड़ी का इंतजाम होना चाहिए।
आखिर क्यों वह ऐसी सभाओं में आता है ? तारापद ने स्वयं से सवाल किया। क्या अपनी ही आवाज सुनने के लिए ? अपनी प्रसन्नता या लोकप्रियता के लिए ? या फिर अपने भाषण के जाल में श्रोता मंडली को बाँधकर रखने की आत्मसंतुष्टि ? या तालियों की गड़गड़ाहट ? या फिर कुछ और ?

इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह साहित्यक जगत् में बहुत प्रसिद्ध व्यक्तियों में गिना जाता था। कोई-कोई तो व्यंग्य करके उसे ‘पंडितजी’ पुकारा करते थे और ऐसे उपनाम सुनकर वह आनंदित होता था। उसे विभिन्न प्रकार के साहित्यिक पुरस्कार भी मिल चुके थे। समालोचना प्रबंध एवं सृजनात्मक साहित्य से संबंधित उनकी अनेक पुस्तकें छप चुकी थीं। वह विभिन्न साहित्यिक संस्थानों का कार्यकर्ता था। देश-विदेश में उसके पास बुलावे आते थे। कई संस्थाएँ उसे अपने यहाँ रखना चाहती थीं।

इन सबके बावजूद वह क्यों आता है ऐसी छोटी-मोटी सभाओं में ?
उस दिन की सभा में वह पूर्ण रूप से संतुष्ट था अपने भाषण से। सभा के आरंभ में जिस तरह से उसका परिचय दिया गया, वह अत्यन्त प्रभावशाली था। बहुत पहले जब भी उसका परिचय दिया जाता था तब या तो उसकी लिखी किताबों के नाम गलत बोले जाते या उसकी शिक्षण योग्यता आदि गलत होती। इसलिए अब वह बहुत सतर्क हो गया था। अब उसे जब कभी सभा में बुलाया जाता, वह पहले से ही अपना छपा हुआ परिचय-पत्र उन्हें दे देता, जिससे गलतियाँ दुबारा न हो सकें। अब तो सभा के उद्घोषक बहुत बढ़ा-चढ़ाकर उसका परिचय देकर उसे संतुष्ट और प्रफुल्लित करते।
आज की सभा की एक विशेष घटना थी—शिक्षामंत्रीजी का योगदान। एक शिक्षक होने के नाते पहले कभी तारापद शिक्षामंत्री को बहुत ऊँची चीज समझा करता था; लेकिन अपनी साहित्यिक प्रतिभा एवं प्रतिष्ठा के कारण अब वह शिक्षामंत्री पद को अपने बराबर समझने लगा था। इसके अलावा एक बात यह भी थी कि शिक्षामंत्री एक महिला थी और वह तारापद की सहपाठिनी रह चुकी थी, इसलिए वह सभा में अचानक उन्हें देखकर अलग हट गया। कॉलेज के दिनों में सुखदा एक बहुत ही गंभीर स्वभाव की लड़की हुआ करती थी। ज्यादा किसी से मिलती-जुलती भी नहीं थी। कॉलेज के उन चार वर्षों में तारापद की दो-चार बातें भी उससे हुई हों, इसमें भी उसे शक है। कॉलेज छोड़ने के बाद भी सुखदा के साथ कभी उसकी भेंट नहीं हुई थी; लेकिन तारापद को सुखदा के राजनीतिक जीवन की सारी खबरें मिलती रहती थीं। अचानक इस समारोह में सुखदा को देखकर तारापद में उसे अपना पुराना परिचय नहीं दिया था।

आज तारापद अपने इस व्यवहार से संतुष्ट था, क्योंकि सभा में सर्वसाधारण को तारापद के साथ अपना पहला परिचय सुखदा ने स्वयं ही दिया। सभा में चर्चा का विषय था—‘साहित्य में सामाजिक न्याय’। भाषण देते हुए सुखदा ने कहा, ‘‘यदि समाज में न्याय होता रहता तब शिक्षा विभाग की मंत्री मैं नहीं होती बल्कि उन्हें होना चाहिए जो एक प्रवीण शिक्षक, प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं सबसे बड़ा परिचय तो यह है—जिसके लिए मैं गर्व का अनुभव कर रही हूँ—वह हैं मेरे सहपाठी तारापद !’’

सुखदा की बातें सुनने के बाद तारापद अपने आपको बहुत छोटा महसूस कर रहा था। वह चाहता था कि सभा समाप्त होने के बाद वह सुखदा से मिलकर अपनी भूल के लिए क्षमा माँगे; लेकिन सभी समाप्त होते ही मंत्री महोदया के चारों तरफ भीड़ लग गई। लोगों की भीड़ से निकलकर सुखदा गाड़ी में बैठ गई; पर तारापद की भेंट सुखदा से न हो सकी। थोड़ी ही देर में एक लड़के ने तारापद को बताया कि जिस गाड़ी से वह आया था उसकी मरम्मत चल रही है।
तारापद ने अपनी कलाई घड़ी की ओर देखा और झुँझलाते हुए पास में खड़े लड़के से पूछा, ‘‘और कितना समय लग जाएगा ?’’

लड़के ने कहा, ‘‘कृपया आप बैठ जाइये। मैं जाकर पता लगाता हूँ।’’
तारापद ने सोचा—यदि यह लड़का भी चला गया तब वह एकदम अकेला हो जाएगा। फिर पता नहीं कितने समय तक उसे इंतजार करना पड़े, इसलिए लड़के के साथ वह भी गाड़ी के मरम्मत देखने चल पड़ा। सभास्थल से कुछ दूरा पर डाकबंगला था। उसी के पास गाड़ी की मरम्मत हो रही थी। डाकबंगले में मंत्री महोदया के ठहरने की वजह से वहाँ काफी गाड़ियाँ एकदम ठीक ही हो गयी हैं। तारापद ने फिर से अपनी कलाई पर बँधी घड़ी की ओर देखा।
उसके कुछ कहने से पहले ही छात्र नेता ने कहा, ‘‘आप भले ही जाने के लिए कितना भी परेशान क्यों न हों, लेकिन जब तक गाड़ी अच्छी तरह ठीक नहीं होती, हम आपको जाने नहीं देंगे। चलिए, डाकबंगले में थोड़ी विश्राम कर लीजिए।’’
तारापद अंदर जाकर मंत्री के चमचों की भीड़ में शामिल नहीं होना चाहता था। फिर भी अंदर गया; लेकिन मंत्री की विपरीत दिशा में जाकर बैठा।

शायद सुखदा ने उसे दूर से देख लिया था, क्योंकि उसके बैठने के तुरंत बाद मंत्री के निजी सचिव (युवा अफसर) ने तारापद से कहा कि उसे मंत्री महोदया ने बुलाया है। तारापद वहाँ से उठकर सुखदा के पास पहुँचा और सामने रखी कुरसी पर बैठ गया; लेकिन अभी लोगों की भीड़ से हटकर सुखदा उससे नहीं मिल पा रही थी।
अंत में सुखदा उठ खड़ी हुई और उसने सबसे कहा, ‘‘कृपया आप लोग अब जाइए, कल सुबह आकर मुझसे मिलें। मुझे अभी कुछ जरूरी काम करना है।’’ युवा अफसर ने बड़ी कठिनाई से लोगों को वहाँ से बाहर भेजा; लेकिन लोग वहाँ से हटकर डाकबँगले के फाटक पर भीड़ लगाकर खड़े हो गए।

सुखदा ने कहा, ‘‘मैं तो सभा समाप्त होते ही आपसे मिलना चाहती थी; लेकिन इतनी भीड़भाड़ में यह संभव नहीं हो सका। अच्छा हुआ कि आप यहाँ आ गए। अब पाँच मिनट एकांत में बातचीत हो सकेगी।’’
लेकिन एकांत की गुंजाइश ही नहीं थी वहाँ, क्योंकि उसी समय उसका निजी सचिव फाइलों के ढेर के साथ वहाँ आ पहुँचा। सुखदा ने उससे कहा, ‘‘रख दीजिए, मैं बाद में देख लूँगी।’’
सचिव ने कहा, ‘‘मैडम, कम-से-कम इस फाइल को देख लीजिए, क्योंकि इसे वापसे ले जाने के लिए एक व्यक्ति खड़ा है।’’
सुखदा को उस फाइल को देखना ही पड़ा।

चुपचाप सुखदा की ओर देखते हुए तारापद सोचने लगा—‘कैसी अजीब जिंदगी है इनकी ! अपने लिए भी वक्त नहीं है इनके पास। इतने मान-सम्मान के बदले में समझौता करना पड़ता है अपनी निजी जिंदगी से।’
फाइल देखते हुए सुखदा ने कहा, ‘‘मैं दो मिनट जरा फाइल देख लूँ, फिर बात करते हैं।’’ सेक्रेटरी को चाय के लिए भेजते हुए सुखदा ने तारापद के मन को भाँपते हुए कहा, ‘‘कोई उपाय नहीं है एक पल भी अकेले रहने का।’’
चाय आ गई। फाइल पर हस्ताक्षर करके सुखदा ने सेक्रेटरी से कहा, ‘‘आप इसे लेते जाएँ। मैं आज कुछ और नहीं देखूँगी।’’ हताश होकर सेक्रेटरी फाइल लेकर वहाँ से चला गया। अब केवल सुखदा और तारापद आमने-सामने बैठे थे—चाय की प्याली लिये। तीस सालों की दूरी को संकुचित करते हुए सुखदा ने कहा,
‘‘आपके साथ बहुत दिनों बाद मुलाकात हो रही है न ?’’

इतनी देर बाद तारापद ने सुखदा के मुखड़े को बहुत ही अपनेपन से निहारा। सभा मंच पर एवं जनता की भीड़ में सुखदा उसे एक अजनबी की तरह लग रही थी; लेकिन इस समय शहर से इतनी दूर, एकांत में स्थित इस डाकबँगले में बैठी सुखदा तीस साल पहले वाली लड़की दिख रही थी। अधपके बाल, झुर्रियाँ पड़ते चेहरे के भीतर से तारापद ने याद किया कॉलेज के दिनों की एक बहुत ही शांत-सरल सहपाठिनी को। इतनी उम्र ढलने के बाद भी आज इतनी सुंदर दिख रही थी सुखदा। तारापद अचानक सचेत हो गया क्योंकि सुखदा उसकी ओर देखकर अपने प्रश्न का उत्तर चाह रही थी। ख्यालों में डूबा तारापद सचेत होते हुए बोला, ‘‘ऐसी मुलाकात, वह भी ऐसी अजीब सी जगह होनी थी।’’
कुछ पल के लिए दोनों खामोश रहे। तारापद अपने मन के भीतर तरह-तरह की रोमांचक कल्पना करने लगा। परिस्थिति को पूरी तरह सँभालते हुए उसने कहा, ‘‘सुखदा तुम्हें याद है ?’’ वह इससे इधिक कुछ कह नहीं सका, क्योंकि इस समय छात्र नेता हाथ में चाय की प्याली लिये वहाँ आ पहुँचा और खुश होकर बोला, ‘‘सर, आपकी गाड़ी ठीक हो गई।’’ फिर एक कुरसी खींचकर सुखदा के पास बैठ गया और राजनीति पर बहस करने लगा। अब तो तारापद को चाय का घूँट भी कड़वा लगने लगा। उसने प्याली को नीचे रख दिया।

अब चलना चाहिए। पुनः वही नपी-तुली औपचारिकता। तारापद ने कहा, ‘‘मुझे बहुत दूर जाना है। फिर मिलेंगे।’’
सुखदा ने कहा, ‘‘आप लोग तो व्यस्त रहते हैं। आपसे मिलना तो कठिन है।’’
छात्रनेता ने कहा, ‘‘जी, मुझे आप जब भी कहिएगा, मैं सर को आपके पास ले आऊँगा।’’
विदाई समारोह के बाद तारापद सुखदा को और अपने कल्पनालोक को डाकबँगले पर छोड़कर नीचे उतर गया।
इतने में तेज आँधी के साथ बौछारें पड़ने लगीं। अचानक चारों तरफ सूखे पत्ते व धूल उड़ने लगी। बड़े-बड़े पेड़ों की डालियाँ टूटकर गिरने लगीं। डाकबँगले के आस-पास खड़े लोग दौड़कर सुरक्षित स्थानों पर चले गए। सेक्रेटरी अपने उड़ते हुए कागजों को सँभालने लगा। छात्रनेता ने सोचा—शायद उसे तारापद के साथ अधिक समय बरबाद करना पड़ सकता है। इसलिए उसने कहा, ‘‘सर, आप जल्दी से गाड़ी में बैठ जाइए।’’ लेकिन इस तेज आँधी के साथ मूसलाधार बारिश की वजह से वह जा न सका। मजबूरन तारापद को पुनः डाकबँगले के अंदर आना पड़ा छात्र नेता और तारापद दोनों ही पुनः अन्दर चले गए और सुखदा के पास रखी कुरसी पर बैठ गए।

सुखदा ने कहा, ‘‘समय पर घर पहुँचना आज आपकी किस्मत में नहीं है।’’
वातावरण में खामोशी छाई हुई थी। सभी इस बारिश के रुकने का इंतजार कर रहे थे। तारापद को महसूस हो रहा था जैसे आज बेमौसम बारिश उसके लिए आई हो, जिससे उसे सुखदा के साथ कुछ और वक्त बिताने का अवसर मिल सके; लेकिन यह वक्त प्रकृति के साथ समर्पित था। तारापद सुखदा की ओर देखकर मन-ही-मन अपने को उसके बहुत करीब महसूस कर रहा था। जो न कभी हुआ था, न हो सकता था। केवल समय ही ला सकता है व्यक्ति के मन के अंदर आधारित आत्मीयता का आदित्य संस्मरण। तारापद ने अपने को समर्पित कर दिया अपने काल्पनालोक को ।
परिवेश में आकर उसे निर्दयी की तरह तोड़ डाला—फाइलों का बंडल लिये सेक्रेटरी ने आकर। फाइलों का बंडल लिये मंत्री महोदया से कहा, ‘‘मैडम, और भी बहुत सारे जरूरी कागजात थे।’’

सुखदा ने उसकी ओर परिहास से देखते हुए कहा, ‘‘वेंकट, दो मिनट शांति से बारिश को देखो।’’
वेंकट बैठ गया और अपनी फाइलों को सँभालते हुए मंत्री महोदया को सुनाते हुए बोला, ‘‘ऐसी बारिश फसल के लिए अच्छी है ।’’ पुनः कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
बारिश के रुकने के आसार नजर न आते देख छात्रनेता जाने के लिए उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘मैं ड्राइवर को अच्छी तरह समझा कर चला जाता हूँ। आपको किसी तरह की असुविधा नहीं होगी।’’
एक पल को तारापद ने सोचा—गाड़ी में बैठने तक इस लड़के को रोक रखना अच्छा होगा, लेकिन दूसरे ही पल उसने तय कर लिया—नहीं, उसे जाने देना ही ठीक रहेगा। इस सुनहरे पल में वह अपने आपको सुखदा को समर्पित कर देना चाहता था।

तारापद बहुत कुछ सुखदा को कहना चाहता था। हो सकता है, सुखदा भी.....लेकिन फाइल वाला व्यक्ति दोनों के बीच दीवार की तरह खड़ा हो गया था। अंत में सुखदा को ही इस समस्या का समाधान करना पड़ा। उसने कहा, ‘‘वेंकट, आज मैं किसी तरह का काम करना पसंद नहीं करूँगी। बाकी बची सारी फाइलों को कल देखूँगी।’’ फिर भी वेंकट को वहाँ बैठा देखकर सुखदा ने कहा, ‘‘अब आप भी जाकर आराम करें।’’
बहुत ही अनमने ढंग से वेंकट वहाँ से उठा; लेकिन बरामदे के दूसरे कोने में जाकर बैठ गया, जहाँ से इन दोनों पर नजर रखी जा सके और थोड़ा सा प्रयास करने पर उनकी बातें भी सुनाई दे सकें।
अचनाक आई बारिश ने सारे वातावरण को बदल डाला था। पुनः एक बार ‘सुखदा, तुम्हें याद है’ जैसा वाक्य कहना संभव न हो सका तारापद के लिए। अब तो जैसे व्यक्तिगत बात भी न हो सकेगी। उससे बातचीत सीमित ही हो जाएगी बारिश की बातों से।

इसका भी हल सुखदा ने ही निकाला। उसने कहा, ‘‘मैंने आपकी सारी किताबें पढ़ी हैं।’’
किसी लेखक के लिए उसका सारी किताबों को पढ़ना उसके लिए जितने गर्व की बात हो सकती है, और कोई बात नहीं। तारापद ने सोचा, सुखदा अब उससे उसकी किसी विशेष किताब के बारे में कुछ कहेगी या फिर उसके लेखन की तारीफ करेगी।

लेकिन सुखदा ने पूछा, ‘‘आप आजकल सबसे अधिक लोकप्रिय हैं न ?’’
तारापद ने कहा, ‘‘लोकप्रियता के साथ कोई संबंध नहीं है अच्छे लेखक का; लेकिन तुम्हें कैसा लगा हमारा लेखन ?’’
‘‘यदि मैं कहूँ कि मुझे अच्छा लगा, तो क्या उससे कुछ फर्क पड़ेगा ? लेकिन एक बात यह भी है कि यदि मुझे अच्छा नहीं लगता तो क्या मैं सारी किताबें पढ़ती ? हाँ, मैं जरूर पढ़ती, क्योंकि लेखक मेरा सहपाठी रह चुका है ? आप क्या सोचते हैं ?
यदि कोई और समय होता या कोई और स्थिति होती तो ऐसे वार्तालाप से तारापद बहुत नाराज होता; लेकिन इस बारिश के साथ अतीत से निकलकर ऐसी साफ बातें करना, वह भी बचपन की सहपाठिनी के सामने करना, कठिन था।
ऐसे मौके पर केवल आत्मसमीक्षा ही सम्भव थी—‘‘तुमने ठीक ही कहा। ‘मेरा लेखन कैसा है ?’ अचानक ऐसे प्रश्न का जवाब क्या दिया जा सकता है—‘अच्छा है’ जैसे...? देखा जाए तो ऐसा प्रश्न करना ही अर्थहीन है; क्योंकि किसी लेखक के लेखन के बारे में कहने से पहले यह देखना होगा कि आप उसे किस पैमाने में तौलना चाहते हैं। आप अपने लेखन के बारे में क्या सोचते हैं ?’’

‘‘तुमने तो मुझे एक जटिल समस्या में डाल दिया। इसके बारे में कुछ कहने से पहले मुझे गंभीरता से सोचना पड़ेगा।’’ तारापद ने देखा, उसकी बातें सुनकर सुखदा मुस्करा रही थी। तारापद को महसूस होने लगा जैसे उसकी साहित्यिक कृतियाँ सब बेकार हो गई हों। उसके पुरस्कार, मान-पत्र, फूल-माला, तालियों की गड़गड़ाहट—सबकुछ एकदम झूठ है। सच केवल बाहर हो रही बारिश और सुखदा के सामने बैठे रहना है।
अचानक बिजली गुल हो गई। तारापद सोचने लगा कि इस अँधेरे में यदि वह सुखदा का स्पर्श कर लेगा तो पहुँच सकेगा एक ऐसे लोक में, जहाँ पर न तो साहित्य है और न ही मंत्रीत्व। वहाँ कुछ भी नहीं है, सिवाय इस बारिश के। तभी अँधेरे में किसी का स्पर्श अनुभव किया।

उसकी कुरसी के पास खड़ा चमचा कह रहा था, ‘‘मैडम मैं एक मिनट में पैट्रोमैक्स लाइट का प्रबंध कर देता हूँ।’’
पेट्रोमैक्स लाइट आ गई। वेंकट फिर एक बार कबाब में हड्डी की तरह आ टपका। अब यह तय हुआ कि तारापद रात के भोजन के बाद बारिश रुकने पर ही वहाँ से अपने घर जाएगा।
वेंकट के जाने के बाद तारापद ने सुखदा से कहा, ‘‘तुम्हारा सेक्रेटरी तुमसे दूर नहीं जाना चाहता।’’
सुखदा ने कहा, ‘‘हाँ, जानती हूँ। सेक्रेटरी लोग एक ईर्ष्यालु स्त्री की तरह होते हैं। हर कदम पर नजर रखना इनका काम है। मेरे साथ कौन मिलता-जुलता है, क्या बातें होती हैं, यहाँ तक कि मेरी हर निजी घरेलू जिंदगी के बारे में भी जानना इनके लिए जैसे बहुत जरूरी हो।’’

जैसे इन बातों को सिद्ध करने के लिए वेंकट फिर वहाँ आ पहुँचा और बोला, मैडम सारा प्रबंध हो गया है।’’
मंत्री महोदया को फिर एक बार ‘अच्छा’ ठीक है, अब आप जाइए।’ कहना पड़ा। उसकी ओर देखकर सुखदा और तारापद मन-ही-मन हँसने लगे। इसका पता वेंकट को नहीं चल सका।
सुखदा ने कहा, ‘‘हम लोगों की बातें हो रही थीं आपके लेखन पर। आज आपने जो भाषण दिया वह बहुत ठोस था। बहुत सी नई बातें सीखने को मिलीं मुझे। सबसे अच्छी बात यह है कि मैं भी उनमें से कुछ बातों को उपयोग अपने भाषण में कर सकती हूँ।’’

तारापद ने कहा, ‘‘तुम्हारा भाषण भी तो बहुत अच्छा था और ज्ञानवर्धक था। राजनीतिक नेताओं से इतने अच्छे भाषण की  उम्मीद नहीं की जा सकती।’’
सुखदा ने हँसकर कहा, ‘‘अरे, मेरा भाषण यदि आपने पहले कभी सुना होता तो जान जाते कि मैं किस तरह एक भाषण को फेर-बदलकर हर साहित्यक सभा में बोल देती हूँ। मेरे पास इतना समय कहाँ रहता है कि मैं किताबें पढ़ूँ और कुछ नई-नई बातें बोल सकूँ ! लेकिन आपकी बात तो अलग है।’’

तारापद ने सोचा, कहेगा—हाँ, भाषण देने के लिए मुझे देश-विदेश की अनेक किताबें पढ़कर नोट करना पड़ता है। कोई और होता तो वह शायद झूठ बोल देता। लेकिन बचपन की अपनी सीधी-सादी सखी के सामने, वह भी इतने सुहावने मौसम में साथ बैठे, कैसे बोल सकेगा ऐसे अनावश्यक झूठ ? उसने कहा, ‘‘तुम्हारा सोचना गलत है। हम लोग भी एक ही भाषण को फेर-बदल कर बोलते रहते हैं। हम लोगों के पास समय तो रहता है; लेकिन इतनी किताबें पढ़ता कौन है ! आज मैंने अपने भाषण में जो कुछ कहा, हो सकता है, लोग सोचें कि यह हमारे  बहुत दिनों की मेहनत हो। लेकिन इस भाषण को तैयार करने के लिए मैंने पाँच मिनट भी नहीं लगाए। बहुत पहले जो कुछ पढ़ा था, जो कहीं बोला या लिखा था, यह उन सबका मिला-जुला विवरण था।’’

सुखदा ने कहा, ‘‘लेकिन आपका सृजनशील लेखन तो आपका अपना ही है।’’
तारापद ने शून्य दृष्टि से सुखदा की ओर देखा। ऐसा लगा जैसे कि वह आज उसे अनावृत करने पर उतारू हो गई हो। तारापद ने कहा, ‘‘तुम पहले अपने बारे में बताओ।’’
‘‘क्या जानना चाहते हैं आप मेरे बारे में ? यदि कॉलेज के दिनों की बात पूछेंगे तो संक्षेप में यह बताया जा सकता है कि फाइनल ईयर में शादी करके पढ़ाई छोड़ दी। दस साल घर-गृहस्थी और बच्चों में बीत गए। उसके बाद राजनीति में कदम रखा। विधानसभा में आने के बाद और कुछ दिनों तक उपमंत्री रहने के बाद आजकल मंत्री पद पर हूँ।’’
‘‘एक मंत्री की हैसियत से तुम्हारा काफी नाम हो गया है।’’तारापद ने कहा।

सुखदा ने कहा, ‘‘वह मैं जानती हूँ। राजनीति में रहने के लिए इतना तो जानना ही पड़ता है अपनी काबिलियत कितनी है। न जानने से राजनीति नहीं की जा सकती। आप क्या सोचते हैं, मुख्यमंत्री जी ने मुझे इतनी जल्दी उपमंत्री से मंत्री बनाया अपनी कृपा दरशा कर ? उनके पास और कोई चारा नहीं था, क्योंकि उस वक्त देखिए, मैं आपको अपने दल की राजनीति के बारे में बताने जा रही थी।’’
तारापद ने कहा, ‘‘हमारे समसामयिक मित्रों में तुम ही सबसे ऊँचे दर्जे की अधिकारी हो।’’
‘‘मैं जितने विलंब से राजनीति में आई हूँ, उस दृष्टि से मुझे कोई अफसोस नहीं है। मुझे जो कुछ मिला, उस सबसे मैं संतुष्ट हूँ। वैसे तो राजनीति में सबकुछ संभव है; लेकिन मैं इससे अधिक और कुछ पाने की कोशिश भी नहीं करना चाहती हूँ।’’
‘‘तुम्हें भी बहुत कुछ मिल गया है।’’


   


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