मानुस तन - ऋता शुक्ल Manus Tan - Hindi book by - Rita Shukla
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मानुस तन

ऋता शुक्ल

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1559
आईएसबीएन :81-85827-79-6

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ कहानी संग्रह...

Manus tan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अंतर्ग्लानि अकेली मेरी नहीं, दाह उनके कलेजे में भी है। दूसरी कोई सन्तान नहीं, अकेला मैं...और मैं भी तो...लेकिन सुवर्णा, मेरी समझ से नियति अपने क्रियाकलापों में कोई भी हस्तक्षेप बरदाश्त नहीं कर सकती...।
तुम लोग अपने एकाकीपन का भार मुझे इसी तरह उठा लेने दो...बड़े सौभाग्य से मानव जन्म मिला है। इस जन्म की मर्यादा का निर्वाह मुझे इसी रूप में करना है। हाँ, कभी उस ईश्वर से अपने इस भाई के लिए कोई प्रार्थना करनी हो तो यही करना कि अगले जन्म में वह....


दिनाजपुरवालों की इतनी औकात नहीं है कि वे अपनी बेटी के लिए अच्छा घर, सुरुप वर जुटा सकें-इसीलिए वे हमारी दया-दृष्टि की लालसा किये बैठे हैं।...उस लड़की की आँखों में मेरे लिए हिकारत होगी या करुणा-और ये दोनों ही परिस्थितियाँ मेरी जिंदगी को हर तरह से दयनीय बनाकर छोड़ेंगी...नहीं, हम तुम्हारी यह बात कभी नहीं मान सकते...कभी नहीं...! तुम्हें किस बात की चिंता है, अम्मा बाबूजी नहीं रहे तो क्या, मैं तो हूँ। मेरे रहते तुम्हें कौन सा अभाव ?...
मैंने भी अपने भीतर एक सुरक्षा कवच ढूँढ़ लिया है, सुवर्णा....जब कभी मन बेहद अकेला अथवा संतप्त होता है, मैं अपने उसी क्षण के स्वर्ग की ओर वापस लौट जाता हूँ। तुम नहीं जानतीं—अनजाने ही मुझे जो निधि मिली है, उसे आत्मा की सात तहों में समेटकर मैं यह बड़ी आसानी से बिता लूँगा। यह बंधन ही क्या कम है ? जीन के लिए अब किसी बाहरी बंधन की अपेक्षा क्यों ?

इसी पुस्तक से


प्रख्यात कथाकार ऋता शुक्ल की कहानियों में समाज का संत्रास आँखोदेखी घटना के रूप में उभरता है। तभी तो उनकी कहानियाँ संस्मरण, रेखाचित्र और कहानी का मिला-जुला अनूठा आनंद प्रदान करती है। उनकी हृदयस्पर्शी एवं मार्मिक कहानियों का संकलन प्रस्तुत है-‘मानुस तन’ के रूप में।

अपनी बात
बड़े भाग मानुस तन....


मनुष्यता का शोक-पर्व मनाती यह सदी बीत रही है। कलछौहें चेहरों पर टँका हुआ अपराध; अनवरत अपराधों, नाना दुराचारों से पीड़ित आत्माओं का असह्य यंत्रणा-भार-और इन सबों से परे ढेर सारी सफेदपोशी कुंठाएं।
संवेदना के विकलांग होते चले जाने के प्रयोजन और भी हैं।

बड़े भाग मानुस तन पावा...
तब फिर...?
हरभागी जिंदगी को पाशविकता का पाला क्यों मारता चला जा रहा है ? गाँव हिंसक उन्माद में झुलसते अपनी मासूमियत खोते चले जा रहे हैं; शहरी मुखौटों का पाषाणीकरण होता जा रहा है।
राजनीति की स्वार्थजड़ित सुरसा वृत्ति, शिविरपंथी बुद्धिजीवियों की धृतराष्ट्र नीति, समष्टि भाव को मिटाने के न जाने कैसे-कैसे व्यष्टिवादी षड्यंत्र !
पंचतंत्र की कथा के कृशकाय वृद्ध व्याघ्र की अकूत तृष्णाएँ मानव मन में उतर नहीं आई हैं ?
तब ?
निष्कृति कहाँ से मिले ?
अपने पुरखे के अनुभव-जीर्ण पहिरावे में लिपटी हुई नवजात मानुसी काया मेरे सामने है—
अधखुली आँखों से दुनिया की झूठी चमक-दमक को निहारती ! और फिर, अधबूढ़े का मरघटी मौन तोड़ता है उस शिशु का नवोल्लास भरा रुदन...। मांगलिक गीत मनोहर आनंद-बधाव से उमंगित हैं मन की ब्रज-वीथियाँ—

नाहिं रोवऽ ए तिरिया नाहिं रोव
नाहिं डूबि मरहु हो
तिरिया आजु के नउए महीनवे
श्रीकृष्ण जनम लीहें
कंस उधारन अइहें ना...

मातृ-शक्ति के नैराश्य का कोई कारण तो नहीं दिखता।
इस कुलबुलाती मानव देह का उछाह देखिए—विपदाओं के शकटासुर को नन्हे पैरों से ठेलकर परे कर देने की कैसी आतुरता !
घर-घर में यशोदा मइया की कोख से जब तक ऐसा वैष्णवी आस्थाएँ अवतरित होती रहेंगी तब तक मनुष्यता का मंगल पर्व मनाने की जिजीविषा शेष रहेगी—इस इनहद आकांक्षा के साथ...
कलम की यह सौगात हर मानुस तन के लिए !

ऋता शुक्ल

निर्बंध


खदान से निकले हुए कच्चे लोहे की-सी रंगत, देह की शिराओं में हर क्षण उबाल खाते रक्त का खिंचाव, बुझने से पहले अंतिम बार सुलगती मशाल का आभास देती दिपती हुई आँखें। चिलम का लंबा कश लगाकर हरखू ने बलुआही माटी पर बिखरी नीम की पीली पड़ी पत्तियों को धीरे से उठाकर अपनी अँजुरी में बंद कर लिया था। पकी हुई निबकौरी की महक कितनी नशीली होती है; मन प्राणों को बौरा देनेवाली उसकी भीनी-सी सुगंध—लेकिन क्या उस सुगंध का बावला मन कभी निबकौरी के आस्वाद की आकुलता व्यक्त करता है ? नहीं न ! नीम की कड़वाहट किसकी जीभ को सहन होगी ? लेकिन क्या यह सच नहीं है कि मन की एक अबूझ कशिश ने बरखू को गंध बावरा बना दिया था; और अपनी सीधी-सादी जिंदगी को बहुत पीछे छोड़कर वह अनजाने ही नीम की कड़वाहट को गले लगाने की नियति से बँधा इतनी दूर चला आया था।

तुम्हारा नाम क्या है ?
हरखू।
पेशा ?
माई के साथ टोकरी बीनते हैं, हुजूर—इसी टीसन पर बेचकर।
हमारे साथ चलोगे ?
किशोरवय के उस बालक की आँखों में मासूमियत थी। नीलम और पुखराज जड़ी अँगूठियों से सजी मोटी उँगलियोंवाली हथेली उसके सामने पसरी हुई थी।

दोनों वक्त की रोटी और माहवरी के तीस रुपये। हमारे साथ रहोगे तो और भी बहुत कुछ...
राय विष्णुदेव चौधरी के कारिंदे रछपाल ने खीसें निपोरकर मालिक की बात का समर्थन किया था—
हमारे हुजूर दानी करन के औतार हैं। टुकुर-टुकुर क्या देख रहा है ! इतना बूझ ले, जिसपर मालिक की नजर पड़ गई उसकी जिन्दगी सुधर गई। अब आगा-पीछा कुछ मत सोच। जा, चटपट अपनी माई को बता दे और भागता हुआ लौटकर आ जा...।
बख्तियारपुर स्टेशन के पश्चिमवर्ती झोंपड़ों के फैलाव में नन्हा हरखू गर्द-गुबार भरी हवा का मटमैला झोंका बनकर समा गया था।

यह मेरी माई है, मालिक। आपसे कुछ कहना चाहती है।
हमार बचवा पोथी बाँचे भर गियान पा जाए, इहे निहोरा बा, सरकार !
चौधरी के कारिंदे रछपाल ने दस-दस के तीन नोट हरखू की मां को थमा दिए थे।
जाओ माई, तुम्हार लड़का सुख-चैन से रहेगा ! इसकी फिकिर एकदम मत करो !
वह दिन और आज का दिन।

चौधरी के उस कसाईबाड़े में अपनी जिंदगी के तीस साल गुजार देने के बाद अब उसे लगता है कि अमानुषिक यातनाओं के चक्रव्यूह में फँसी अपनी लहूलुहान जिंदगी  का एक-एक क्षण था—चौधरी के पास गिरवी रखने के एवज में उसे बलि-पशु की विवशता हाथ लगी थी। खूँटे से बँधे हुए निरीह मेमने की मुक्ति-कातर आँखों से हमेशा एक सा बना रहने वाला करुणभाव उसे भीतर तक हिला देता था—दोहाई रछपाल बाबू, इन दुधमुँहें छौनों को मारकर कौन सा सुख आपको मिलता है ?

और बदले में रछपाल का पिशाची अट्ठहास—इस गाँव का सिवान लाँघते तू सधुवा गया रे, हरखू ! बाभन-बिशनों का गाँव ठहरा न ! लेकिन हमारे मालिकार राजा ठहरे। साग-पात से उन्हें संतोष मिल जाए तब तो।...लेकिन तेरा कलेजा काहे दरकता है ! तेरी जातवाले तो बेंग-बेंगुची, मूस-बिलाई-सबका आहार..।
एक हफ्ते के बाद चौधरी के दालान में हरखू की पेशी हुई थी—पूरबवर्ती चक की अगोरिया करनी है, हरखू। रात भर मचान पर रहना होगा। डरेगा तो नहीं ?
उसने धीरे से सिर हिला दिया था। बाजरे की रोटी और प्याज-नमक की पोटली उसके आगे रखकर रछपाल अपनी दबी हुई आँखों को तनिक और दबाते हुए एक दुष्ट हंसी हंस पड़ा था—तेरी तो मउज हो गई, हरखुआ, मालिकार के घर में दिन भर हाड़ खटाओ, तब भी इतनी जल्दी तरक्की नहीं मिलती...! भूलना नहीं बचऊ, हमारा एहसान भी तुमपर उधारी है। आवेंगे, कभी चुकता कर लेंगे...!

मचान के नीचे लालटेन जलाकर लाठी सिरहाने सँभालने के बाद भी उसकी आश्वस्ति नहीं हुई थी। मकई की खड़ी फसल सामने थी। पत्तों की हलकी-सी सरसराहट होती, बालियों के हिलने की तनिक आहट होती तो वह चिहुँक उठता-
कवन...? कवन है उधर ?
उस रात उसे माई की बेहद याद आई थी। फटी-पुरानी गुदड़ी में उसे लपेटकर अपने नेह की नरमाई से उसकी सार-सँभाल करती उसकी बेसहारा माई।

रछपाल ने रसीद दिखाकर कहा था—तेरा पइसा बक्सर के डाकघर में भिजवाकर परची कटवा आए हैं, हरखू। दो-तीन दिनों के भीतर बख्तियारपुर पहुँच जाएगा तेरी माई के पास।
एक रात मचान पर बैठा हुआ वह बुरी तरह डर गया था। दशमी की हलकी उजास मकई की उमगती हुई बालियों पर यहाँ से वहाँ तक फैल चुकी थी। रोटी खाकर पानी का लोटा उसने जैसे ही खाली किया था, मचान के पिछवाड़े बड़े कुएँ के पास वाली बेर की झाड़ी यक-ब-यक जोरो से हिल उठी थी। भूत...! उसकी किशोर मानसिकता में माई के मुँह से सुनी भूत-प्रेत की कहानियों के जीवंत होने की आशंका का उद्वेलन था। लाठी पर अपनी नन्हीं मुट्ठियों की मजबूत पकड़ के बावजूद पूरी देह को सुन्न कर देनेवाली एक थरथराहट उसके रोम-रोम में हिलोर लेने लगी थी—
डर गए, हरखू ? अरे भाई, यह तो हम हैं—हम !

उसने गौर से देखा था, बेर की कटीली झाड़ियों में अपनी पगड़ी को सहेजता हुआ रछपाल धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा आ रहा था। हरखू की आँखों में कोई सवाल सुगबुगाता, इसके पहले रछपाल ने उचककर मचान पर अपने लिए जगह बना ली थी।

आज कैसी पुरवइया बह रही है ! हमारा जी घर में नहीं लगा, सो हमने सोचा कि...
ऐसे गुमसुम काहे बैठा है, हरखू ! लगता है जैसे माई मर गई हो। ले, खैनी खाएगा ?
हरखू की चुप्पी का जवाब रछपाल को एक अजीबो-गरीब हरकत ने दिया था-बिना घरनी का घर। हुँह, कोठरिया में घुसो तो दीवारें मुँह बिराती लगती हैं। दस बरिस उसे गुजरे हो गए। यह जिनगी भी कोई जिनगी है भला ! अबे हरखुआ, हम जो कहते हैं—सीधी तरह सुन ले। हमारी राजी-खुशी में ही तुम्हारी गुजर है।
 


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