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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

मुवक्किल साथी बन गये


नेटाल और ट्रान्सवाल की वकालत में यह भेद था कि नेटान में एडवोकेट और एटर्नी का भेदहोने पर भी दोनों सब अदालतों में समान रुप से वकालत कर सकते थे, जबकि ट्रान्सवाल में बम्बई जैसा भेद था। वहाँ एडवोकेट मुवक्किल के साथ का साराव्यवहार एटर्नी के मारफत ही कर सकता हैं। बारिस्टर बनने के बाद आप एडवोकेट अथवा एटर्नी में से किसी एक की सनद ले सकते है और फिर वही धंधा कर सकतेहैं। नेटान में मैंने एडवोकेट की सनद ली थी, ट्रान्सवाल में एटर्नी की। एडवोकेट के नाते मैं हिन्दुस्तानियों के सीधे संपर्क मैं नहीं आ सकता थाऔर दक्षिण अफ्रिका में वातावरण ऐसा नहीं था कि गोरे एटर्नी मुझे मुकदमे दे।

यो ट्रान्सवाल में वकालत करते हुए मजिस्ट्रेट के इजलास पर तो मैं बहुत बार जा सकता था। ऐसा करते हुए एक प्रसंग इस प्रकार का आया, जबचलते मुकदमे के दौरान मैंने देखा कि मेरे मुवक्किल में मुझे ठग लिया है। उसका मुकदमा झूठा था। वह कठहरे में खड़ा इस तरह काँप रहा था, मानो अभी गिरपड़ेगा। अतएव मैंने मजिस्ट्रेट को मुवक्किल के विरुद्ध फैसला देने के लिए कहा और मैं बैठ गया। प्रतिपक्ष का वकील आश्चर्य चकित हो गया। मजिस्ट्रेटखुश हुआ। मुवक्किल को मैंने उलाहना दिया। वह जानते था कि मैं झूठे मुकदमें नहीं लेता था। उसने यह बात स्वीकार की और मैं मानता हूँ कि मैंने उसकेखिलाफ फैसला माँगा, इसके लिए वह गुस्सा न हुआ। जो भी हो, पर मेरे इस बरताव का कोई बुरा प्रभाव मेरे धंधे पर नहीं पड़ा, और अदालत में मेरा काम सरल होगया। मैंने यह भी देखा कि सत्य की मेरी इस पूजा से वकील बंधुओं में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ गयी थी और विचित्र परिस्थितियों के रहते हुए भी उनमें सेकुछ की प्रीति मैं प्राप्त कर सका था।

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