लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

160 पाठक हैं

my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


दूध के त्याग में धर्म-भावना की स्थान मुख्य था।कलकत्ते में गाय-भैस पर होने वाली दुष्ट क्रियाएँ मेरे सामने मूर्तिमंत थी। माँस की तरह पशु का दूध भी मनुष्य का आहार नहीं है, यह बात भी मेरेसामने थी। इसलिए दूध के त्याग पर डटे रहने का निश्चय करके मैं सबेरे उठा। इतने निश्चय से मेरा मन बहुत हलका हो गया। गोखले का डर था, पर मुझे यहविश्वास था कि वे मेरे निश्चय का आदर करेंगे।

शामको नेशनल लिबरल क्लब में हम उनसे मिलने गये। उन्होंने तुरन्त ही प्रश्नकिया, 'क्यों डॉक्टर का कहना मानने का निश्चय कर लिया न?'

मैंने धीरे से जवाब दिया, 'मैं सब कुछ करूँगा, किन्तु आप एक चीज का आग्रहनकीजिये। मैं दूध और दूध के प्रदार्थ अथवा माँसाहार नहीं लूँगा। उन्हें न लेने से देहपात होता हो, तो वैसा होने देने में मुझे धर्म मालूम होता है।'

गोखले ने पूछा, 'यह आपका अंतिम निर्णय है?'

मैंने जवाब दिया, 'मेरा ख्याल है कि मैं दूसरा जवाब नहीं दे सकता। मैंजानता हूँ कि इससे आपको दुःख होगा, पर मुझे क्षमा कीजिये।'

गोखले में कुछ दुःख से परन्तु अत्यन्त प्रेम से कहा, 'आपका निश्चय मुझे पसन्दनहीं है। इसमे मैं धर्म नहीं देखता। पर अब मैं आग्रह नहीं करूँगा।' यह कहकर वे डॉ. जीवराज मेंहता की ओर मुड़े और उनसे बोले, 'अब गाँधी को तंग मतकीजिये। उनकी बतायी हुई मर्यादा में उन्हे जो दिया जा सके, दीजिये।'

डॉक्टर में अप्रसन्नता प्रकट की, लेकिन वे लाचार हो गये। उन्होंने मुझे मूंग कापानी लेने की सलाह दी औऱ उसमें हींग का बघार देने को कहा। मैंने इसे स्वीकार कर लिया। एक-दो दिन वह खुराक ली। उससे मेरी तकलीफ बढ़ गयी। मुझेवह मुआफिक नहीं आयी। अतएव मैं फिर फलाहार पर आ गया। डॉक्टर ने बाहरी उपचार तो किये ही। उससे थोडा आराम मिलता था। पर मेरी मर्यादाओ से वे बहुत परेशानथे। इस बीच लंदन का अक्तूबर-नवम्बर का कुहरा सहन न कर सकने के कारण गोखले हिन्दुस्तान जाने को रवाना हो गये।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book