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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


यों ट्रेन में ही मन को हलका करके मैं फीनिक्स पहुँचा।पूछताछ करके जो अधिक जानकारी लेनी थी सो ले ली। यद्यपि मेरे उपवास से सबको कष्ट हुआ, लेकिन उसके कारण वातावरण शुद्ध बना। सबको पाप करने की भयंकरताका बोध हुआ तथा विद्यार्थियो तथा विद्यार्थिनियो के और मेरे बीच सम्बन्ध अधिक ढृढ और सरल बन गया।

इस घटना के फलस्वरूप ही कुछ समय बादमुझे चौदह उपवास करने का अवसर मिला था। मेरा यह विश्वास है कि उसका परिणामअपेक्षा से अधिक अच्छा निकला था।

इस घटना पर से मैं यह सिद्ध नहीं करना चाहता कि शिष्यो के प्रत्येक दोष के लिए शिक्षको को सदाउपवासादि करने ही चाहिये। पर मैं जानता हूँ कि कुछ परिस्थितियो में इस प्रकार के प्रायश्चित-रूप उपवास की गुंजाइश जरूर है। किन्तु उसके लिएविवेक और अधिकार चाहिये। जहाँ शिक्षक और शिष्य के बीच शुद्ध प्रेम-बन्धन नहीं है, जहाँ शिक्षक को अपने शिष्य के दोष से सच्चा आघात नहीं पहुँचता,जहां शिष्यो के मन में शिक्षक के प्रति आदर नहीं है, वहाँ उपवास निरर्थक है और कदाचित हानिकारक भी हो सकता है। ऐसे उपवास या एकाशन के विषय मेंशंका चाहे हो, परन्तु इस विषय में मुझे लेशमात्र भी शंका नहीं कि शिक्षक शिष्य के दोषो के लिए कुछ अंश में जरूर जिम्मेदार है।

सात उपवासऔर एकाशन हम दोनों में से किसी के लिए कष्टकर नहीं हुए। इस बीच मेरा कोई भीकाम बन्द या मन्द नहीं रहा। इस समय में मैं केवल फलाहारी ही रहा था। चौदह उपवासो का अन्तिम भाग मुझे काफी कष्टकर प्रतीत हुआ था। उस समय मैं रामनामके चमत्कार को पूरी तरह समझा न था। इस कारण दुःख सहन करने की शक्ति मुझमे कम थी। उपवास के दिनो में कैसा भी प्रयत्न करके पानी खूब पीना चाहिये, इसबाह्य कला क मुझे जानकारी न थी। इस कारण भी ये उपवास कष्टप्रद सिद्ध हुए। इसके अतिरिक्त, पहले उपवास सुख-शान्तिपूर्वक हो गये थे, अतएव चौदह दिन केउपवासो के समय मैं असावधान बन गया था। पहले उपवासो के समय मैं रोज कूने का कटिस्नान करता था। चौदह दिनो के उपवास में दो या तीन दिन के बाद मैंनेकटिस्नान बन्द कर दिया। पानी का स्वाद अच्छा नहीं लगता था और पानी पीने पर जी मचलाता था, इससे पानी बहुत ही कम पीता था। फलतः मेरा गला सूखने लगा,मैं क्षीण होने लगा और अंतिम दिनो में तो मैं बहुत धीमी आवाज में बोल पाता था। इतना होने पर भी लिखने का आवश्यक काम मैं अन्तिम दिन तक कर पाया था औररामायण इत्यादि अंत तक सुनता रहा था। कुछ प्रश्नो के विषय में सम्मति देने का आवश्यक कार्य भी मैं कर सकता था।

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