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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
पत्नी की दृढ़ता
कस्तूरबाई पररोग के तीन घातक हमले हुए और तीनों वह केवल घरेलू उपचार से बच गयी। उनमें पहली घटना उस समय घटी जब सत्याग्रह का युद्ध चल रहा था। उसे बार बाररक्तस्राव हुआ करता था। एक डॉक्टर मित्र में शल्यक्रिया करा लेने की सलाह दी थी। थोडी आनाकानी के बाद पत्नी ने शल्यक्रिया कराना स्वीकार किया। उसकाशरीर बहुत क्षीण हो गया था। डॉक्टर ने बिना क्लोरोफार्म के शल्यक्रिया की। शल्यक्रिया के समय बहुत पीड़ा हो रही थी, पर जिस धीरज से कस्तूरबाई ने उसेसहन किया उससे मैं आश्चर्यचकित हो गया। शल्यक्रिया निर्विध्न पूरी हो गयी। डॉक्टर ने और उसकी पत्नी ने कस्तूरबाई की अच्छी सार-संभल की।
यह घटना डरबन में हुई थी। दो-तीन दिन के बाद डॉक्टर ने मुझे निश्चिन्त होकरजोहानिस्बर्ग जाने की अनुमति दे दी। मैं चला गया। कुछ ही दिन बाद खबर मिली कि कस्तूरबाई का शरीर बिल्कुल सुधर नहीं रहा है और वह बिछौना छोड़करउठ-बैठ भी नहीं सकती। एक बार बेहोश भी हो चुकी थी। डॉक्टर जानते थे कि मुझ से पूछे बिना औषधि या अन्न के रूप ने कस्तूरबाई को शराब अथवा माँस नहींदिया जा सकता। डॉक्टर ने मुझे जोहानिस्बर्ग में टेलिफोन किया, 'मैं आपकी पत्नी को माँस का शोरवा अथवा बीफ-टी देने की जरूरत समझता हूँ। मुझे इजाजतमिलनी चाहिये। '
मैंने उत्तर दिया, 'मैं इजाजत नहीं दे सकता।किन्तु कस्तूरबाई स्वतंत्र है। उससे पूछने जैसी स्थिति हो ते पूछिये और वहलेना चाहे तो जरूर दीजिये।'
'ऐसे मामलों में मैं बीमार से कुछ पूछना पसंद नहीं करता। स्वय आपको यहाँ आना जरूरी है। यदि आप मैं जो चाहूँसो खिलाने की छूट मुझे न दे, तो मैं आपकी स्त्री के लिए जिम्मेदार नहीं।'
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