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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

हृदय-मंथन


'जुलू-विद्रोह' में मुझे बहुत से अनुभव हुए और बहुत-कुछ सोचने को मिला। बोअर-युद्ध में मुझे लड़ाईकी भयंकरता उतनी प्रतीत नहीं हुई थी जितनी यहाँ हुई थी। यहाँ लड़ाई नहीं, बल्कि मनुष्यो को शिकार हो रहा था। यह केवल मेरा ही नहीं, बल्कि उन कईअंग्रेजो का भी अनुभव था, जिनके साथ मेरी चर्चा होती रहती थी। सबेरे-सबेरे सेना गाँव में जाकर मानो पटाखे छोडती हो, इस प्रकार उनकी बन्दूको की आवाजदूर रहनेवाले हम लोगों के कानो पर पड़ती थी। इन आवाजो को सुनना और इस वातावरण में रहना मुझे बहुत मुश्किल मालूम पड़ा। लेकिन मैं सब-कुछ कड़वेघूँट की तरह पी गया और मेरे हिस्से काम आया सो तो केवल जुलू लोगों की सेवा का ही आया। मैं यह समझ गया कि अगर हम स्वयंसेवक दल में सम्मिलित न हुएहोते, तो दूसरा कोई यह सेवा न करता। इस विचार से मैंने अपनी अन्तरात्मा को शान्त किया।

यहाँ बस्ती बहुत कम थी। पहाड़ो और खाइयो में भले, सादे और जंगली माने जाने वाले जुलू लोगों के धासफूस के झोपड़ो को छोड़करऔर कुछ न था। इस कारण दृश्य भव्य मालूम होता था। जब इस निर्जन प्रदेश में हम किसी घायल को लेकर अथवा यो ही मीलो पैदल जाते थे, तब मैं सोच में डूबजाता था।

यहाँ ब्रह्मचर्य के बारे में मेरे विचार परिपक्व हुए। मैंने अपने साथियो से भी इसकी थोडी चर्चा की। मुझे अभी इस बात कासाक्षात्कार तो नहीं हुआ था कि ईश्वर दर्शन के लिए ब्रह्मचर्य अनिवार्य वस्तु है। किन्तु मैं यह स्पष्ट देख सका था कि सेवा के लिए ब्रह्मचर्यआवश्यक है। मुझे लगा कि इस प्रकार की सेवा तो मेरे हिस्से में अधिकाधिक आती ही रहेगी और यदि मैं भोग-विलास में, सन्तानोत्पत्ति में और संतति केपालन-पोषण में लगा रहा, तो मुझसे सम्पूर्ण सेवा नहीं हो सकती, मैं दो घोड़ो पर सवारी नहीं कर सकता। यदि पत्नी सगर्भा हो तो मैं निश्चिन्त भावसे इस सेवा में प्रवृत हो ही नहीं सकता। ब्रह्मचर्य का पालन किये बिना परिवार की वृद्धि करते रहना समाज के अभ्युदय के लिए किये जानेवाले मनुष्यके प्रयत्न का विरोध करनेवाली वस्तु बन जाती है। विवाहित होते हुए भी ब्रह्मचर्य का पालन किया जाय तो परिवार की सेवा समाज-सेवा की विरोधी नबने। मैं इस प्रकार के विचार-चक्र में फँस गया और ब्रह्मचर्य का व्रत लेने के लिए थोडा अधीर भी हो उठा। इन विचारो से मुझे एक प्रकार का आनन्द हुआ औरमेरा उत्साह बढ़ा। कल्पना ने सेवा के क्षेत्र को बहुत विशाल बना दिया।

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