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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
वेस्टके हर्ष का पार न रहा। उन्होंने काम करते हुए भजन गाना शुरू किया। चक्र चलाने में बढ़इयों की बराबरी में मैं खड़ा हुआ औऱ दुसरे सब बारी बारी सेखड़े हुए। काम निकलने लगा। सुबह के लगभग सात बजे होगे। मैंने देखा कि काम अभी काफी बाकी है। मैंने वेस्ट से कहा, 'क्या अब इजीनियर को जगाया नहीं जासकता? दिन के उजेले में फिर से मेंहनत करे तो संभव है कि एंजिन चलने लगे और हमारा काम समय पर पूरा हो जाय।'
वेस्ट ने इंजीनियर को जगाया। वह तुरन्त उठ गया और एंजिन घक में धुस गया। छूते ही एंजिन चलने लगा।छापाखाना हर्षनाद से गूँज उठा। मैंने कहा, 'ऐसा क्यों होता है? रात में इतनी मेंहनत करने पर भी नहीं चला और अब मानो कोई दोष न हो इस तरह हाथलगाते ही चलने लग गया !'
वेस्ट ने अथवा इंजीनियर ने जवाब दिया,'इसका उत्तर देना कठिन हैं। कभी कभी यंत्र भी ऐसा बरताव करते पाये जातेहै, मानो हमारी तरह उन्हें भी आराम की आवश्यकता हो !'
मेरी तो यह धारणा रही कि एंजिन का न चलना हम सब की एक कसौटी थी और ऐन मौके पर उसका चलपडना शुद्ध परिश्रम का शुद्ध फल था। अखबार समय से स्टेशन पर पहुँच गया और हम सब निश्चित हुए।
इस प्रकार के आग्रह का परिणाम यह हुआ कि अखबार की नियमितता की धाक जम गयी और फीनिक्स के परिश्रम का वातावरण बना।इस संस्था में एक ऐसा भी युग आया कि जब विचार पूर्वक एंजिन चलाना बन्द किया गया और ढृढता पूर्वक चक्र से ही काम लिया गया। मेरे विचार मेंफीनिक्स का वह ऊँचे से ऊँचा नैतिक काल था।
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