लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

160 पाठक हैं

my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

पहली रात


फीनिक्स में 'इंडियन ओपीनियन' का पहला अंक निकालना सरल सिद्ध न हुआ। यदि मुझे दोसावधानियाँ न सूझी होती तो अंक एक सप्ताह बंद रहता अथवा देर से निकलता। इस संस्था में एंजिन से चलने वाली मशीनें लगाने का मेरा कम ही विटार था।भावना यह थी जहाँ खेती भी हाथ से करनी है वहाँ अखबार भी हाथ से चल सकनेवाले यंत्रों की मदद से निकले तो अच्छा हो। पर इस बार ऐसा प्रतीत हुआकि यह हो न सकेगा। इसलिए वहाँ ऑइल एंजिन ले गये थे। किन्तु मैंने वेस्ट को सुझाया था कि इस तैल-यंत्र बिगड़ने पर दूसरी कोई भी कामचलाऊ शक्ति हमारेपास हो तो अच्छा रहे। अतएव उन्होंने हाथ से चलाने की व्यवस्था कर ली थी। इसके अलावा, हमारे अखबार का कद दैनिक पत्र के समान था। बड़ी मशीन केबिगडने पर उसे तुरन्त सुधार सकने की सुविधा यहाँ नहीं थी। इससे भी अखबार का काम रुक सकता था। इस कठिनाई से बचने के लिए उसका आकार बदलकर साधारणसाप्ताहिक के बराबर कर दिया गया, जिससे अड़चन के समय ट्रेडल पर पैरो की मदद से कुछ पृष्ट छापे जा सके।

शुरु के दिनों में 'इंडियन ओपीनियन' ओपीनियन प्रकाशित होने के दिन की पहली रात को तो सबका थोड़ा बहुतजागरण हो ही जाता था। कागज भाँजने के काम में छोटे बडे सभी लग जाते थे और काम रात को दस बारह बजे पूरा होता था। पहली रात तो ऐसी बीती कि वह कभी भूलनहीं सकती। फर्मा मशीन पर कर दिया गया, पर एंजिन चलने से इनकार करने लगा ! एंजिन को बैठाने और चलाने के लिए एक इंजीनियर बुलाया गया था। उसने औरवेस्ट ने बहुत मेंहनत की, पर एंजिन चलता ही न था। सब चिन्तित हो गये। आखिर वेस्ट ने निराश होकर डबडबायी आँखो से मेरे पास आये और बोले, 'अब आज एंजिनचलता नजर नहीं आता और इस सप्ताह हम लोग समय पर अखबार नहीं निकाल सकेंगे।'

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book