लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

160 पाठक हैं

my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव


इस महामारी ने गरीब हिन्दुस्तानियो पर मेरे प्रभाव को, मेरे धंधे का और मेरी जिम्मेदारीको बढा दिया। साथ ही, यूरोपियनो के बीच मेरी बढ़ती हुई कुछ जान पहचान भी इतनी निकट की होती गयी कि उसके कारण भी मेरी जिम्मेदारी बढ़ने लगी।

जिस तरह वेस्ट से मेरी जान पहचान निरामिषाहारी भोजनगृह में हुई, उसी तरह पोलाकके विषय में हुआ। एक दिन जिस मेंज पर मैं बैठा था, उससे दूसरी मेंज पर एक नौजवान भोजन कर रहे थे। उन्होंने मिलने की इच्छा से मुझे अपने नाम काकार्ड भेजा। मैंने उन्हें मेंज पर आने के लिए निमंत्रित किया। वे आये।

'मैं'क्रिटिक' का उप संपादक हूँ। महामारी विषयक आपका पत्र पढने के बाद मुझेआपसे मिलने की बडी इच्छा हुई। आज मुझे यह अवसर मिल रहा है।'

मि. पोलाक की शुद्ध भावना से मैं उनकी ओर आकर्षित हुआ। पहली ही रात में हम एकदूसरे को पहचानने लगे और जीवन विषयक अपने विचारो में हमे बहुत साम्य दिखायी पडा। उन्हें सादा जीवन पसंद था। एक बार जिस वस्तु को उनकी बुद्धिकबूल कर लेती, उस पर अमल करने की उनकी शक्ति मुझे आश्चर्य जनक मालूम हुई। उन्होंने अपने जीवन में कई परिवर्तन तो एकदम कर लिये।

'इंडियन ओपीनियन' का खर्च बढ़ता जाता था। वेस्ट की पहली ही रिपोर्ट मुझेचौकानेवाली थी। उन्होंने लिखा, 'आपने जैसा कहा था वैसा मुनाफा मैं इस काम में नहीं देखता। मुझे तो नुकसान ही नजर आता हैं। बही खातो की अव्यवस्थाहै। उगाही बहुत है। पर वह बिना सिर पैर की है। बहुत से फेरफार करने होगे। पर इस रिपोर्ट से आप घबराइये नहीं। मैं सारी बातो को व्यवस्थित बनाने कीभरसक कोशिश करुँगा। मुनाफा नहीं है, इसके लिए मैं इस काम को छोडूंगी नहीं।'

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book