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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


म्युनिसिपैलिटीकी दूसरी तैयारियाँ चल रही थी। जोहानिस्बर्ग से सात मील दूर एक 'लेज़रेटो' अर्थात् संक्रामक रोगो के लिए बीमारो का अस्पताल था। वहाँ तम्बू खड़े करकेइन तीन बीमारो को उनमें पहुँचाया गया। भविष्य में महामारी के शिकार होनेवालों को भी वहीं ले जाने की व्यवस्था की गयी। हमें इस काम से मुक्तिमिली। कुछ ही दिनों बाद हमे मालूम हुआ कि उक्त भली नर्स को महामारी हो गयी थी औऱ उसी से उसका देहान्त हुआ। वे बीमार कैसे बचे और हम महामारी से किसकारण मुक्त रहे, सो कोई कह नहीं सकता। पर मिट्टी के उपचार के प्रति मेरी श्रद्धा और दवा के रुप में शराब के उपयोग के प्रति मेरी अश्रद्धा बढ़ गयी।मैं जानता हूँ कि यह श्रद्धा और अश्रद्धा दोनों निराधार मानी जायेगी। पर उससमय मुझ पर जो छाप पडी थी और जो अभी तक बनी हुई है उसे मैं मिटा नहीं सकता। अतएव इस अवसर पर उसके उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ।

इस महामारी के शुरू होते ही मैंने तत्काल समाचार पत्रों के लिए एक कड़ा लेखलिखा था और उसमें लोकेशन को अपने हाथ में लेने के बाद से बढ़ी हुई म्युनिसिपैलिटी की लापरवाही और महामारी के लिए उसकी जवाबदारी की चर्चा कीथी। इस पत्र ने मुझे मि. हेनरी पोलाक से मिला दिया था और यही पत्र स्व. जोसेफ डोक के परिचय का एक कारण बन गया था।

पिछले प्रकरण में मैं लिख चुका हूँ कि मैं एक निरामिष भोजनालय में भोजन करने जाता था। वहाँ मि.आल्बर्ट वेस्ट से मेरी जान पहचान हुई थी। इम प्रतिदिन शाम को इस भोजनायल में मिलते और भोजन के बाद साथ में घूमने जाया करते थे। वेस्ट एक छोटे सेछापाखाने के साझेदार थे। उन्होंने समाचार पत्रों में महामारी विषयक मेरा पत्र पढ़ा और भोजन के समय मुझे भोजनालय में न देखकर वे धबरा गये।

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