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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

महामारी-1


म्युनिसिपैलिटी ने इस लोकेशन का मालिक पट्टा लेने के बाद तुरन्त ही वहाँ रहनेवाले हिन्दुस्तानियो कोहटाया नहीं था। उन्हें दूसरी अनुकूल जगह देना तो जरूरी था ही। म्युनिसिपैलिटी ने यह जगह निश्चित नहीं की थी। इसलिए हिन्दुस्तानी लोग उसी'गन्दे' लोकेशन में रहें। लेकिन दो परिवर्तन हुए। हिन्दुस्तानी लोग मालिक न रहकर म्युनिसिपल विभाग के किरायेदार बने और लोकेशन की गन्दगी बढी। पहलेजब हिन्दुस्तानियों का मालिक हक माना जाता था, उस समय वे इच्छा से नहीं तो डर के मारे ही कुछ न कुछ सफाई रखते थे। अब म्युनिसिपैलिटी को भला किसका डरथा? मकानों में किरायेदार बढ़े और उसके साथ गन्दगी तथा अव्यवस्था भी बढ़ी।

इस तरह चल रहा था। हिन्दुस्तानियों के दिलों में इसके कारण बेचैनीथी ही। इतने में अचानक भयंकर महामारी फूट निकली। यह महामारी प्राणघातक थी। यह फेफड़ो की महामारी थी। गाँठवाली महामारी की तुलना में यह अधिक भयंकरमानी जाती थी।

सौभाग्य से महामारी का कारण यह लोकेशन नहीं था। उसका कारण जोहानिस्बर्ग के आसपास की अनेक सोने की खानो में से एक खान थी।वहाँ मुख्य रूप से हब्शी काम करते थे। उनकी स्वच्छता की जिम्मेदारी केवल गोरे मालिको के सिर थी। इस खान में कुछ हिन्दुस्तानी भी काम करते थे। उनसेसे तेईस को अचानक छूत लगी औऱ एक दिन शाम को भयंकर महामारी के शिकार बनकर वे लोकेशन वाले अपने घरों में आये।

उस समय भाई मदनजीत 'इंडियन ओपीनियन' के ग्राहक बनाने और चन्दा वसूल करने के लिए वहाँ धूम फिर रहे थे।उनमें निर्भयता का बढिया गुण था। वे बीमार उनके देखने में आये और उनका हृदयव्यथित हुआ। उन्होंने पेन्सिल से लिखी एक पर्ची मुझे भेजी। उसका भावार्थ यह था, 'यहाँ अचानक भयंकर महामारी फूट पड़ी हैं। आपको तुरन्त आकर कुछ करनाचाहिये, नहीं तो परिणाम भयंकर होगा। तुरन्त आइये।'

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