|
जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
|
160 पाठक हैं |
|||||||
my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
जेल के समयोंको छोड़कर दस बर्षो के अर्थात् सन् 1914 तक के 'इंडियन ओपीनियन' के शायद ही कोई अंक ऐसे होगे, जिनमें मैंने कुछ लिखा न हो। इनमे मैं एक भी शब्दबिना बिचारे, बिना तौले लिखा हो या किसी को केवल खुश करने के लिए लिखा हो अथवा जान-बूझकर अतिशयोक्ति की हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। मेरे लिए यहअखबार संयम की तालीम सिद्ध हुआ था। मित्रों के लिए वह मेरे विचारों को जानने का माध्यम बन गया था। आलोचको को उसमें से आलोचना के लिए बहुत कासामग्री मिल पाती थी। मैं जानता हूँ कि उसके लेख आलोचको को अपनी कलम पर अंकुश रखने के लिए बाध्य करते थे। इस अखबार के बिना सत्याग्रह की लड़ाई चलनहीं सकती थी। पाठक-समाज इस अखबार को अपना समझकर इसमें से लड़ाई का और दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियो की दशा का सही हाल जानता था।
इस अखबार के द्वारा मुझ मनुष्य के रंग-बिरंगे स्वभाव का बहुत ज्ञान मिला।संपादक और ग्राहक के बीच निकट का और स्वच्छ संबंध स्थापित करने की ही धारणा होने से मेरे पास हृदय खोलकर रख देने वाले पत्रो का ढेर लग जाता था।उसमें तीखे, कड़वे, मीठे यो भाँति भाँति के पत्र मेरे नाम आते थे। उन्हें पढना, उन पर विचार करना, उनमें से विचारो का सार लेकर उत्तर देना -- यह सबमेरे लिए शिक्षा का उत्तम साधन बन गया था। मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो इसके द्बारा मैं समाज में चल रहीं चर्चाओं और विचारो को सुन रहा होऊँ। मैंसंपादक के दायित्व को भलीभाँति समझने लगा और मुझे समाज के लोगों पर जो प्रभुत्व प्राप्त हुआ, उसके कारण भविष्य में होने वाली लड़ाई संभव हो सकी,वह सुशोभित हई और उसे शक्ति प्राप्त हुई।
'इंडियन ओपीनियन' के पहले महीने के कामकाज से ही मैं इस परिणाम पर पहुँच गया था कि समाचार पत्रसेवा भाव से ही चलाने चाहिये। समाचार पत्र एक जबरदस्त शक्ति हैं, किन्तु जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गाँव के गाँव डूबो देता है और फसल कोनष्ट कर देता हैं, उसी प्रकार कल का निरंकुश प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता हैं। यदि ऐसा अंकुश तो अंदर का ही लाभदायक हो सकता हैं। यदि यह विचारधारासच हो, तो दुनिया के कितने समाचार पत्र इस कसौटी पर खरे उतर सकते हैं? लेकिन निकम्मो को बन्द कौन करे? उपयोगी और निकम्मे दोनों साथ साथ ही चलतेरहेंगे। उनमें से मनुष्य को अपना चुनाव करना होगा।
|
|||||

i 









