लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

160 पाठक हैं

my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


किन्तुआफिस में एक स्थायी शॉर्टहैंड राइटर की आवश्यकता तो थी ही। एक महिला इसके लिए भी मिल गयी। नाम था मिस श्लेशिन। उसे मेरे पास लाने वाले मि. कैलनबैकथे, जिनका परिचय पाठको को आगे चलकर होगा। इस समय यह महिला एक हाईस्कूल में शिक्षिका का काम कर रही थी, उसकी उमर कोई सतरह साल की रही होगी। उसकी कुछविचित्रताओ से मि. कैलनबैक और मैं हार जाते थे। वह नौकरी करने के विचार से नहीं आयी थी। उस तो अनुभव कमाने थे। उसके स्वभाव में कहीं रंग-द्वेष तो थाही नहीं। उसे किसी की परवाह भी नहीं थी। वह किसी का भी अपमान करने से डरती न थी और अपने मन में जिसके बारे में जो विचार आते, सो कहने में संकोच नकरती थी। अपनी इसी स्वभाव के कारण वह कभी कभी मुझे परेशानी में डाल देती थी। लेकिन उसका सरल और शुद्ध स्वभाव सारी परेशानी दूर कर देता था।अंग्रेजी के उसके ज्ञान को मैंने हमेशा अपने से ऊँचा माना था। इस कारण और उसकी वफादारी पर पूरा विश्वास होने के कारण उसके द्वारा टाइप किये गयेबहुत से पत्रों पर, उन्हे दुबारा जाँचे बिना ही, मैं हस्ताक्षर करता था।

उसकी त्यागवृत्ति का पार न था। उसने एक लम्बे समय तक मुझ से प्रतिमास सिर्फ छहपौंड ही लिये और दस पौंड से अधिक वेतन लेने से उसने अन्त तक साफ इनकार किया। जब कभी मैं अधिक लेने को कहता, वह मुझे धमकाती और कहती, 'मैं वेतनलेने के लिए यहाँ नहीं रही हूँ। मुझे आपके साथ यह काम करना अच्छा लगता है और आपके आदर्श मुझे पसन्द हैं, इसलिए मैं यहाँ टिकी हूँ।'

एक बार आवश्यकता होने से उसने मुझसे चालीस पौड़ लिये थे, पर कर्ज के तौरपर। पिछले साल उसने वे सारे पैसे लौटा दिये।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book