लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

160 पाठक हैं

my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

मिट्टी और पानी के प्रयोग


जैसे-जैसे मेरे जीवन में सादगी बढ़ती गयी, वैसे-वैसे रोगों के लिए दवा लेने की मेरीअरुचि, जो पहले से ही थी, बढ़ती गयी। जब मैं डरबन में वकालत करता था तब डॉ. प्राणजीवनदास मेंहता मुझे अपने साथ ले जाने के लिए आये थे। उस समयमुझे कमजोरी रहती थी और कभी-कभी सूजन भी हो आती थी। उन्होंने इसका उपचार किया था और मुझे आराम हो गया था। इसके बाद देश में वापस आने तक मुझे कोईउल्लेख करनें जैसी बीमारी हुई हो, ऐसा याद नहीं आता।

पर जोहानिस्बर्ग में मुझे कब्ज रहता था और कभी कभी सिर भी दुखा करता था। कोईदस्तावर दवा लेका मैं स्वास्थ्य को संभाले रहता था। खाने-पीने में पथ्य का ध्यान तो हमेशा रखता ही था, पर उससे मैं पूरी तरह व्याधिमुक्त नहीं हुआ।मन में यह ख्याल बना हू रहता कि दस्तावर दवाओ से भी छुटकारा मिले तो अच्छा हो।

इन्हीं दिनों मैंने मैन्चेस्टर में 'नो ब्रेकफास्ट एसोशियेशन' की स्थापना का समाचार पढ़ा। इसमे दलील यह थी कि अंग्रेज बहुतबार और बहुत खाते रहते हैं और फिर डॉक्टर के घर खोजते फिरते हैं। इस उपाधि से छूटना हो तो सबेरे का नाश्ता -- 'ब्रेकफास्ट'-- छोड़ देना चाहिये। मुझेलगा कि यद्यपि यह दलील मुझ पर पूरी तरह घटित नहीं होती, फिर भी कुछ अंशों में लागू होती हैं। मैन तीन बार पेट भर खाता था और दोपहर को चाय भी पीताथा। मैं कभी अल्पाहारी नहीं रहा। निरामिषाहार में मसालों के बिना जिनते भी स्वाद लिये जा सकते थे, मैं लेता था। छह-सात बजे से पहले शायद ही उठता था।

अतएव मैंने सोचा कि यदि मैं सुबह का नाश्ता छोड़ दूँ तो सिर के दर्द से अवश्य ही छुटकारा पा सकूँगा। मैंने सुबह का नाश्ता छोड़ दिया। कुछदिनों तक अखरा तो सही, पर सिर का दर्द बिल्कुल मिट गया। इससे मैंने यह नतीजा निकाला कि मेरा आहार आवश्यकता से अधिक था।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book