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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


रेलवे-विभागकी ओर से होनेवाली इन असुविधाओं के अलावा यात्रियों की गन्दी आदतें सुधड़ यात्री के लिए तीसरे दर्जे की यात्रा को दंड-स्वरूप बना देती हैं। चाहेजहाँ थूकना, चाहे जहाँ कचरा डालना, चाहे जैसे और चाहे जब बीड़ी पीना, पान-तम्बाकू चबाना और जहाँ बैठे वहीं उसकी पिचकारियाँ छोड़ना, फर्श परजूठन गिराना, चिल्ला-चिल्ला कर बाते करना, पास में बैठे हुए आदमी की सुख-सुविधा का विचार न करना और गन्दी बोली बोलना - यह तो सार्वत्रिक अनुभवहैं।

तीसरे दर्जे की यात्रा के अपने 1902 के अनुभव में और 1915 और 1919 तक के मेरे अनुभव दूसरी बार के ऐसे ही अखंड अनुभव में मैंने बहुतअन्तर नहीं पाया। इस महाव्याधि का एक ही उपाय मेरी समझ में आया हैं, और वह यह कि शिक्षित समाज को तीसरे दर्जे में ही यात्रा करनी चाहिये औऱ लोगों कीआदतें सुधारने का प्रयत्न करना चाहियें। इसके अलावा, रेलवे विभाग के अधिकारियों को शिकायत कर करके परेशान कर डालना चाहिये, अपने लिए कोईसुविधा प्राप्त करने या प्राप्त सुविधा की रक्षा करने के लिए घूस-रिश्वत नहींदेनी चाहियें और उनके एक भी गैरकानूनी व्यवहार को बरदाश्त नहीं करना चाहिये।

मेरा यह अनुभव है कि ऐसा करने से बहुत कुछ सुधार हो सकता हैं। अपनी बीमारी के कारण मुझे सन् 1920 से तीसरे दर्जे की यात्रा लगभगबन्द कर देनी पड़ी हैं, इसका दुःख और लज्जा मुझे सदा बनी रहती हैं। और वह भी ऐसे अवसर पर बन्द करनी पड़ी, जब तीसरे दर्जे के यात्रियो की तकलीफो कोदूर करने का काम कुछ ठिकाने लग रहा था। रेलो और जहाजों में गरीब यात्रियों को भोगने पड़ते कष्टो में होनेवाली वृद्धि, व्यापार के निमित्त से विदेशीव्यापार को सरकार की ओर से दी जाने वाली अनुचित सुविधाये आदि बाते इस समय हमारे लोक-जीवन की बिल्कुल अलग और महत्त्व की समस्या बन गयी हैं। अगर इसेहल करने में एक-दो चतुर और लगनवाले सज्जन अपना पूरा समय लगा दे, तो अधिक नहीं कहा जायेगा।

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