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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...

गोखले के साथ एक महीना-2


गोखले की छायातले रहकर मैंने सारा समय घर में बैठकर नहीं बिताया।

दक्षिण अफ्रीका के अपने ईसाई मित्रों से मैंने कहा था कि मैं हिन्दुस्तान केईसाइयों से मिलूँगा और उनकी स्थिति की जानकारी प्राप्त करूँगा। मैंने कालीचरण बैनर्जी का नाम सुना था। वे कांग्रेस के कामों में से अगुआ बनकरहाथ बँटाते थे, इसलिए मेरे मन में उनके प्रति आदर था। साधारण हिन्दुस्तानी ईसाई कांग्रेस से और हिन्दू-मुसलमानों से अलग रहा करते थे। इसलिए उनकेप्रति मेरे मन में जो अविश्वास था, वह कालीचरण बैनर्जी के प्रति नहीं था। मैंने उनसे मिलने के बारे में गोखले से चर्चा की। उन्होंने कहा, 'वहाँजाकर क्या पाओगे? वे बहुत भले आदमी हैं, पर मेरा ख्याल है कि वे तुम्हें संतोष नहीं दे सकेंगे। मैं उन्हें भलीभाँति जानता हूँ। फिर भी तुम्हेंजाना हो तो शौक से जाओ।'

मैंने समय माँगा। उन्होंने तुरन्त समय दिया और मैं गया। उनके घर उनकी धर्मपत्नी मृत्युशय्या पर पड़ी थी। घर सादाथा। कांग्रेस में उनको कोट-पतलून में देखा था। पर घर में उन्हें बंगाली धोती और कुर्ता पहने देखा। यह सादगी मुझे पसन्द आयी। उन दिनों मैं स्वयपारसी कोट-पतलून पहनता था, फिर भी मुझे उनकी यह पोशाक और सादगी बहुत पसन्द पड़ी। मैंने उनका समय न गँवाते हुए अपनी उलझने पेश की।

उन्होंने मुझसे पूछा, 'आप मानते हैं कि हम अपने साथ पाप लेकर पैदा होतेहैं?'

मैंने कहा, 'जी हाँ।'

'तो इस मूल पाप का निवारण हिन्दू धर्म में नहीं हैं, जब कि ईसाई धर्म में हैं।' यो कहकर वे बोले, 'पाप का बदला मौत हैं। बाईबल कहती हैं कि इस मौत से बचने का मार्ग ईसा की शरण हैं।'

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