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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


'पर यह खानसाने-जैसी पगड़ी और ये बूट किसलिए?'

'हममें और खानसामो में आपने क्या फर्क देखा? वे हमारे खानसामा है, तो हम लार्डकर्जन के खानसामा हैं। यदि मैं दरबार में अनुपस्थित रहूँ, तो मुझको उसका दण्ड भुगतना पड़े। अपनी साधारण पोशाक पहनकर जाऊँ तो वह अपराध माना जायेगा।और वहाँ जाकर भी क्या मुझे लार्ड कर्जन से बाते करने का अवसर मिलेगा? कदापि नहीं।'

मुझे इस स्पष्टवक्ता भाई पर दया आयी।

ऐसे ही प्रसंगवाला एक और दरबार मुझे याद आ रहा हैं। जब काशी के हिन्दूविश्वविद्यालय की नींव लार्ड़ हार्डिग के हाथों रखी गयी, तब उनका दरबार हुआ था। उसमें राजा-महाराजा तो आये ही थे। भारत-भूषण मालवीयजी में मुझसेभी उसमें उपस्थित रहने का विशेष आग्रह किया था। मैं वहाँ गया था। केवल स्त्रियों को ही शोभा देनेवाली राजा-महाराजाओं की पोशाकें देखकर मुझे दुःखहुआ। रेशमी पाजामे, रेशमी अंगरखे और गले में हीरे-मोती की मालाये, हाथ पर बाजूबन्द और पगड़ी पर हीरे-मोती की झालरें ! इन सबके साथ कमर में सोने कीमूठवाली तलवार लटकती थी। किसी ने बताया कि ये चीजे उनके राज्याधिकार की नहीं, बल्कि उनकी गुलामी की निशानियाँ थीं। मैं मानता था कि ऐसेनामर्दी-सूजक आभूषण वे स्वेच्छा से पहनते होगे। पर मुझे पता चला कि ऐसे सम्मेलनों में अपने सब मूल्यावन आभूषण पहनकर जाना राजाओं के लिए अनिवार्यथा। मुझे यह भी मालूम हुआ कि कईयों को ऐसे आभूषण पहनने से धृणा थी और ऐसे दरबार के अवसर को छोड़कर अन्य किसी अवसर पर वे इन गहनों को पहनते भी न थे।इस बात में कितनी सच्चाई थी, सो मैं जानता नहीं। वे दूसरे अवसरों पर पहनते हों, क्या वाइसरॉय के दरबार में और क्या दूसरी जगह, औरतों को ही शोभा देनेवाले आभूषण पहनेकर जाना पड़े, यही पर्याप्त दुःख की बात हैं। धन, सत्ता और मान मनुष्य से कितने पाप और अनर्थ कराते है!

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