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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
'तुम्हारे बाल ऐसे क्यों हो गये है? सिर पर चुहे तो नहीं चढ गये थे?'
मैंने कहा, 'जी नहीं, मेरे काले सिर को गोरा हज्जाम कैसे छू सकता हैं?इसलिएकैसे भी क्यों न हो, अपने हाथ से काटे हुए बाल मुझे अधिक प्रिय है।'
इस उत्तर में मित्रो को आश्चर्य नहीं हुआ। असल में उस हज्जाम का कोई दोष नथा। अगर वह काली चमड़ीवालो के बाल काटने लगता तो उसकी रोजी मारी जाती। हम भी अपने अछूतो के बाल ऊँची जाति के हिन्दूओ के हज्जाम को कहाँ काटने देतेहैं? दक्षिण अफ्रीका में मुझे इसका बदला एक नहीं स बल्कि अनेको बार मिला हैं, और चूकि मैं यह मानता था कि यह हमारे दोष का परिणाम है, इसलिए मुझेइस बात से कभी गुस्सा नहीं आया।
स्वावल्बन और सादगी के मेरे शौक ने आगे चलकर जो तीव्र स्वरुप धारण किया उसका वर्णन यथास्थान होगा। इस चीजका जड़ को मेरे अन्दर शुरू से ही थी। उसके फूलने-फलने के लिए केवल सिंचाई की आवश्यकता थी। वह सिंचाई अनायास ही मिल गयी।
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