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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
लोगों के चहेरों परसे चिन्ता दूर हुई और उसी के साथ ईश्वर भी लुप्त हो गया ! लोग मौत का डर भूल गये और तत्काल ही गाना-बजाना तथा खाना-पीना शुरू हो गया। माया का आवरणफिर छा गाय। लोग नमाज पढ़ते और भजन भी गाते, पर तूफान के समय उनमें जो गंभीरता धीख पड़ी वह चली गयी थी !
पर इस तूफान में मुझे यात्रियों के साथ ओतप्रोत कर दिया था। कहा जा सकता हैं कि मुझे तूफान काडर न था अथवा कम से कम था। लभगभ ऐसे ही तूफान का अनुभव मैं पहले कर चुका था। मुझे न समुद्र लगता था, न चक्कर आते थे। इसलिए मैं निर्भय हो कर घूमरहा था, उन्हें हिम्मत बँधा रहा था और कप्तान की भविष्यवाणियाँ उन्हें सुनाता रहता था। यह स्नेहगाँठ मेरे लिए बहुत उपयोगी सिद्द हुई।
हमने अठारह या उन्नीस दिसम्बर को डरबन में लंगर डाला। 'नादरी' भी उसी दिपहुँचा। पर वास्तविक तूफान का अनुभव तो अभी होना बाकी था।
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