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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


ऐसी सभा का मेरा यह पहला अनुभव था। मुझे विश्वास होगया कि मेरी आवाज कोई सुन न सकेगा। मैंने काँपते-काँपते भाषण पढना शुरू किया। सर फिरोजशाह मुझे प्रोत्साहित करते जाते थे। 'जरा औऱ ऊँची आवाज से'यों कहते जाते थे। मुझे कुछ ऐसा ख्याल हैं कि इस प्रोत्साहन से मेरी आवाज और धीमी पड़ती जाती थी।

पुराने मित्र केशवराव देशपांडे मेरी मदद को बढे। मैंने भाषण उनके हाथ में दिया। उनकी आवाज तो अच्छी थी, परश्रोतागण क्यों सुनने लगे? 'वाच्छा, वाच्छा' की पुकार से हॉल गूँज उठा। वाच्छा उठे। उन्होंने देशपांडे के हाथ से कागज ले लिया और मेरा काम बनगया। सभा ने तुरन्त शांति छा गयी और अथ से इति तक सभा ने भाषण सुना। प्रथा के अनुसार जहाँ जरूरी था वहाँ 'शेम-शेम' (धिक्कार- धिक्कार) की तालियों कीआवाज भी होती रही। मुझे खुशी हुई।

सर फिरोजशाह को मेरा भाषण अच्छा लगा। मुझे गंगा नहाने का सा संतोष हुआ।

इस सभा के परिणाम स्वरुप देशपांडे और एक पारसी सज्जन पिघले और दोनों ने मेरेसाथ दक्षिण अफ्रीका जाने का अपना निश्चय प्रकट किया। पारसी सज्जन आज एक सरकारी पदाधिकारी हैं, इसलिए उनका नाम प्रकट करते हुए मैं डरता हूँ। उनकेनिश्चिय को सर शुरशेद जी ने डिगा दिया, उस डिगने के मूल में एक पारसी बहन थी। उनके सामने प्रश्न था, ब्याह करे या दक्षिण अफ्रीका जाये? उन्होंनेब्याह करना उचित समझा। पर इन पारसी मित्र की ओर से पारसी रुस्तम जी ने प्रायश्चित किया और पारसी बहन की तरफ का प्रायश्चित दूसरी पारसी बहनेसेविका का काम करके और खादी के पीछे वैराग्य लेकर आज कर रही हैं। इसलिए इस दम्पती को मैंने क्षमा कर दिया। देशपांडे के सामने ब्याह का प्रलोभन तो नथा, परन्तु वे नहीं आ सके। उसका प्रायश्चित तो वे खुद ही कर रहे हैं। वापस दक्षिण अफ्रीका जाते समय जंजीबार में तैयबजी नाम के एक सज्जन मिले थे।उन्होंने भी आने की आशा बँधायी थी। पर वे दक्षिण अफ्रीका क्यों आने लगे? उनके न आने के अपराध का बदला अब्बास तैयबजी चुका रहे हैं। पर बारिस्टरमित्रो को दक्षिण अफ्रीका आने के लिए ललचाने के मेरे प्रयत्न इस प्रकार निष्फल हुए।

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