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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
पर जिसे राम रखे, उसे कौन चखे? मेरी निष्ठा शुद्धथी, इसलिए अपनी गलतियों के बावजूद मैं बच गया और मेरे पहले अनुभव ने मुझे सावधान कर दिया।
उस रसोइये को शायद भगवान में ही मेरे पास भेजा था। वह रसोई बनाना नहीं जानता था, इसलिए वह मेरे यहाँ रह न सकता था। परउसके आये बिना दूसरा कोई मुझे जाग्रत नहीं कर सकता था। वह स्त्री मेरे घर में पहली ही बार आयी हो, सो बात नहीं। पर इस रसोइये जितनी हिम्मत दूसरो कोहो ही कैसे सकती थी? इस साथी के प्रति मेरे बेहद विश्वास से सब लोग परिचित थे।
इतनी सेवा करके रसोइये ने तो उसी दिन और उसी क्षण जाने कीइजाजत चाही। वह बोला, 'मैं आपके घर में नहीं रह सकता। आप भोले भंडारीठहरे। यहाँ मेरा काम नहीं।'
मैंने आग्रह नहीं किया।
उक्त मुहर्रिर पर शक पैदा करानेवाला यह साथी ही था, यह बात मुझे अब मालूम हुई।उसके साथ हुए अन्याय को मिटाने का मैंने बहुत प्रयत्न किया, पर मैं उसे पूरी तरह सन्तुष्ट न कर सका। मेरे लिए यह सदा ही दुःख की बात रही। फूटेबरतन को कितना ही पक्का क्यो न जोड़ा जाये, वह जोड़ा हुआ ही कहलायेगा, संपूर्ण कभी नहीं होगा।
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