लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

160 पाठक हैं

my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


मेरी नीयत मालिक को सजा करानेकी नहीं थी। मुझे तो बालासुन्दरम् को उसके पंजे से छुटाना था। मैंने गिकमिटियो से सम्बन्ध रखने वाले कानून की छान-बीन कर ली। यदि साधारण नौकरनौकरी छोडता, तो मालिक उसके खिलाफ दीवानी दावा दायर कर सकता था, पर उसे फौजदारी में नहीं ले जा सकता था। गिरमिट में और साधारण नौकरी में बहुतफर्क था। पर खास फर्क यह था कि अगर गिरमिटिया मालिक को छोडे, तो वह फौजदारी गुनाह माना जाता था और उसके लिए उसे कैद भुगतनी होती थी। इसीलिएसर विलियम विल्सम हंटर में इस स्थिति को लगभग गुलामी की सी स्थिति माना था। गुलाम की तरह गिरमिटिया मालिक की मिल्कियत माना जाता था। बालासुन्दरम्को छुटाने के केवल दो उपाय थे, या तो गिरमिटियो के लिए नियुक्त अधिकारी, जो कानून की दृष्टि से उनका रक्षक कहा जाता था, गिरमिट रद्द करे या दूसरेके नाम लिखवा दे, अथवा मालिक स्वयं उसे छोडने को तैयार हो जाये। मैं मालिक से मिला। उससे मैंने कहा, 'मैं आपको सजा नहीं कराना चाहता। इस आदमी कोसख्त मार पडी हैं, सो तो आप जानते ही है, आप इसका गिरमिट दूसरे के नाम लिखाने को राजी हो जाये तो मुझे संतोष होगा।' मालिक यही चाहता था। फिर मैंरक्षक से मिला। उसने भी सहमत होना स्वीकार किया, पर शर्त यह रखी कि मैं बालासुन्दरम् के लिए नया मालिक खोज दूँ।

मुझे नये अंग्रेज मालिक की खोज करनी थी। हिन्दुस्तानियों को गिरमिटिया मजदूर रखने की इजाजत नहींथी। मैं अभी कुछ ही अंग्रेजो को पहचानता था। उन्होंने मुझ पर मेंहरबानी करके बालासुन्दरम् को रखना मंजूर कर लिया। मैंने उनकी कृपा को साभारस्वीकार किया। मजिस्ट्रेट में मालिक को अपराधी ठहराकर यह लिख दिया कि उसने बालासुन्दरम् का गिरमिट दूसरे के नाम लिखाना स्वीकार किया हैं।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book