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दीक्षा

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 14995
आईएसबीएन :81-8143-190-1

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दीक्षा

छः

 

प्रातः विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को बहुत जल्दी जगा दिया। सामान्य दिनों से भी जल्दी।

स्थाणु आश्रम के ऋषियों ने उन लोगों के लिए एक बड़ी-सी नौका का प्रबंध कर दिया था। गंगा की धारा में जल-यात्रा करते हुए सहज ही ताड़का वन तक जा सकते थे।

गुरु सिद्धाश्रम में अपने पहुंचने के समय का अनुमान भी लगा रहे थे। रात्रि के अंधकार के गहराने से पूर्व ही वे लोग सिद्धाश्रम की सीमाओं के भीतर पहुंच जाएं तो ठीक होगा; अन्यथा वह रात या तो गंगा के तट पर खुले आकाश के नीचे व्यतीत करनी पड़ेगी, अथवा ताड़का वन के पेड़ों की छाया में। ये दोनों ही स्थितियां उन्हें स्वीकार्य नहीं थीं। अतः जल्दी ही चल पड़ना चाहिए...।

विश्वामित्र राम-लक्ष्मण व अपनी शिष्य मंडली के साथ घाट पर बंधी नौका के पास आए। स्थाणु आश्रम के अनेक ऋषि उन्हें विदा करने आए थे। विश्वामित्र को उनके चेहरों पर अपने प्रति सहानुभूति और करुणा के भाव स्पष्ट दीख रहे थे, और उन लोगों की आंखों में जड़ीभूत एक द्वंद्व की भी वे उपेक्षा नहीं कर पा रहे थे। वे आंखें आश्वस्त नहीं थीं। उनमें जैसे एक भय था, आशंका थी, कातरता थी और उन सबके मध्य आशा, विश्वास और आश्वस्तता की एक धीमी-सी ज्योति भी थी। इन्हीं विरोधी भावों के कारण वे आंखें स्पष्ट और सरल नहीं लग रही थीं। अस्पष्ट, कुछ अऋजु, भ्रांत...।

''प्रणाम ऋषिवर!'' आश्रम के कुलपति ने कहा, ''प्रभु आपको सफल करें। आर्य संस्कृति का भविष्य आपके हाथ में है।''

विश्वामित्र ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठा भर दिया। कुछ कह नहीं सके। कैसे कहते! वह भी अपनी ओर से कोई स्पष्ट बात नहीं कह सकते थे। स्पष्ट बात को भविष्य ही कहेगा।...उनकी आंखें आकाश की ओर उठ गईं। वह बड़ी देर तक शून्य को घूरते रहे जैसे नीले आकाश की उदासी धीरे-धीरे अपने मन में उतार रहे हों।

नौका चल पड़ी। अगले ही क्षण नाविकों ने नाव को गंगा की बीच धार में डाल दिया था। प्रवाह की क्षिप्रता के साथ नौका बहती चली जा रही थी और विश्वामित्र जैसे भीतर ही भीतर उदास होते जा रहे थे।

राम ने गंगा की धारा पर से आंख हटाकर गुरु को देखा। कोई भी समझ सकता था, आज गुरु के मुख पर सामान्य दिनों जैसा वह सहज उल्लास नहीं था। क्या यह संघर्ष से पहले की चिंता थी? युद्ध से पूर्व की युद्ध की माया? राम का मन जिज्ञासा से अधीर हो गया।

''गुरुदेव!''

विश्वामित्र को राम के द्वारा इस प्रकार पुकारा जाना अच्छा लगता था। राम मूलतः ऋषि वसिष्ठ के शिष्य थे। इसी नाते वह उन्हें सामान्यतः 'ऋषिवर' और 'ऋषिश्रेष्ठ' इत्यादि सम्बोधनों से पुकारते थे। किंतु जब राम 'गुरुदेव' कहकर पुकारते तो विश्वामित्र का मन कहीं आश्वस्त होता-राम का सम्बोधन औपचारिक नहीं है, वह शील का प्रदर्शन भी नहीं है, वह अभिनय नहीं है। राम के हृदय और जिह्वा में ऋजु संबंध था। गुरु स्नेह आप्लावित स्वर में बोले, ''वत्स राम!''

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    अनुक्रम

  1. प्रथम खण्ड - एक
  2. दो
  3. तीन
  4. चार
  5. पांच
  6. छः
  7. सात
  8. आठ
  9. नौ
  10. दस
  11. ग्यारह
  12. द्वितीय खण्ड - एक
  13. दो
  14. तीन
  15. चार
  16. पांच
  17. छः
  18. सात
  19. आठ
  20. नौ
  21. दस
  22. ग्यारह
  23. बारह
  24. तेरह

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