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सदाबहार >> गोदान गोदानप्रेमचंद
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गोदान भारत के ग्रामीण समाज तथा उसकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है...
खन्ना परास्त हो गये। वह ऐसे सकरे कोने में फँस गये थे, जहाँ इधर-उधर हिलने का भी स्थान न था। क्या वह उससे यह कहने का साहस रखते हैं कि मैंने अब तक तुम्हारे ऊपर हजारों रुपए लुटा दिये, क्या उसका यही पुरस्कार है? लज्जा से उनका मुँह छोटा-सा निकल आया, जैसे सिकुड़ गया हो! झेंपते हुए बोले–मेरा आशय यह न था मालती, तुम बिलकुल गलत समझीं।
मालती ने परिहास के स्वर में कहा–खुदा करे, मैंने गलत समझा हो, क्योंकि अगर मैं उसे सच समझ लूँगी, तो तुम्हारे साये से भी भागूँगी। मैं रूपवती हूँ। तुम भी मेरे अनेक चाहनेवालों में से एक हो। वह मेरी कृपा थी कि जहाँ मैं औरों के उपहार लौटा देती थी, तुम्हारी सामान्य-से-सामान्य चीजें भी धन्यवाद के साथ स्वीकार कर लेती थी, और जरूरत पड़ने पर तुमसे रुपए भी माँग लेती थी, अगर तुमने अपने धनोन्माद में इसका कोई दूसरा अर्थ निकाल लिया, तो मैं तुम्हें क्षमा करूँगी। यह पुरुष-प्रकृति का अपवाद नहीं; मगर यह समझ लो कि धन ने आज तक किसी नारी के हृदय पर विजय नहीं पायी, और न कभी पायेगा।
खन्ना एक-एक शब्द पर मानो गज़-गज़ भर नीचे धँसते जाते थे। अब और ज्यादा चोट सहने का उनमें जीवट न था। लज्जित होकर बोले–मालती, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ, अब और जलील न करो। और न सही तो मित्र-भाव तो बना रहने दो।
यह कहते हुए उन्होंने दराज़ से चेकबुक निकाला और एक हजार लिखकर डरते डरते मालती की तरफ बढ़ाया।
मालती ने चेक लेकर निर्दय व्यंग किया–यह मेरे व्यवहार का मूल्य है या व्यायामशाला का चन्दा?
खन्ना सजल आँखों से बोले–अब मेरी जान बख़्शो मालती, क्यों मेरे मुँह में कालिख पोत रही हो।
मालती ने जोर से कहकहा मारा–देखो, डाँट भी बताई और एक हजार रुपए भी वसूल किये। अब तो तुम कभी ऐसी शरारत न करोगे?
‘कभी नहीं, जीते जी कभी नहीं।’
‘कान पकड़ो।’
‘कान पकड़ता हूँ; मगर अब तुम दया करके जाओ और मुझे एकान्त में बैठकर सोचने और रोने दो। तुमने आज मेरे जीवन का सारा आनन्द...।’
मालती और जोर से हँसी–देखो खन्ना, तुम मेरा बहुत अपमान कर रहे हो और तुम जानते हो, रूप अपमान नहीं सह सकता। मैंने तो तुम्हारे साथ भलाई की और तुम उसे बुराई समझते हो।
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