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उपन्यास >> भूख

भूख

अमृतलाल नागर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1437
आईएसबीएन :9789350643754

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प्रख्यात लेखक अमृतलाल नागर का एक सफल उपन्यास...

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सन् ’43 के बंग-दुर्भिक्ष में मनुष्य के चरम दयनीयता और परम दानवता के दृश्य आँखों देखे गये हैं। कलकत्ते की सड़कों के फुटपाथ ऐसी बीभत्स करूणा से भरे थे कि देख-देखकर जी उमड़ता था....द्वितीय महायुद्ध में गला फँसाए हुए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और निहित स्वार्थों से भरे अफसर-व्यापारियों के षडंयंत्र के कारण ही हजारों लोग भूखों तड़प-तपड़कर मर गए, सैकड़ों गृहणियाँ वेश्याएँ बनाई जाने के लिए और सैकड़ों बच्चे गुलामों की तरह दो मुट्ठी चावल के मोल बिक गए। इस उपन्यास में सब कुछ अंकित है।

 

भूमिका

 

आज से इकहत्तर वर्ष पहले सन् 1899-1900 ई० यानी संवत् 1956 वि० में राजस्थान के अकाल ने भी जनमानस को उसी तरह से झिंझोड़ा था जैसे सन्’43 के बंग दुर्भिक्ष ने। इस दुर्भिक्ष ने जिस प्रकार अनेक साहित्यकों और कलाकारों की सृजनात्मक प्रतिभा को प्रभावित किया था उसी प्रकार राजस्थान का दुर्भिक्ष भी साहित्य पर अपनी गहरी छाप छोड़ गया है। उस समय भूख की लपटों से जलते हुए मारवाड़ियों के दल के दल एक ओर गुजरात और दूसरी ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नगरों में पहुँचे थे। कई बरस पहले गुजराती साहित्य में एक वरेण्य कवि, शायद स्व० दामोदरदास खुशालदास बोटादकर की एक पुरानी कविता पढ़ी थी जो करुण रस से ओत-प्रोत थी। सूखे अस्थिपंजर में पापी पेट का गड्ढा धंसाए पथराई आँखों वाले रिरियाते हुए मारवाड़ी का बड़ा ही मार्मिक चित्र उस कविता में अंकित हुआ है। सन्’ 47 में आगरे में अपने छोटे नाना स्व० रामकृष्ण जी देव से मुझे उक्त अकाल से संबंधित एक लोक-कविता भी सुनने को मिली थी जिसकी कुछ पंक्तियां इस समय याद आ रही हैं-


‘‘आयो री जमाईड़ों धस्क्यों जीव कहा से लाऊ शक्कर घीव-
छप्पनिया अकाल फेर मती आइजो म्हारे मारवाड़ में।’’


सन् ’43 के बंग दुर्भिक्ष में मनुष्य की चरम दयनीयता और परम दानवता के दृश्य मैंने कलकत्ते में अपनी आँखों से देखे थे। सियालदह स्टेशन के प्लेटफार्म, कलकत्ते की सडकों के फुटपाथ ऐसी बीभत्स करुणा से भरे थे कि देख-देखकर आठों पहर जी उमड़ता था। कलकत्ते वालों को उन दृश्यों से घिर जाने के कारण अपना शहर काटता था। इतनी बड़ी भूख के वातावरण में लोगों से मुँह में कौर लेते नहीं बनता था। बहुत-से ऐसे भी थे जिनके ऊपर उन दृश्यों का उतना ही असर होता था जितना चिकने घड़े पर पानी का होता है। ‘दुनिया दुरंगी मकारा सराय, कहीं खूब-खूबां कहीं हाय-हाय।’ यही हाल था।
धनाभाव में अथवा अपने से शक्तिशाली के द्वारा भूखे रहने पर विविश किए जाने और स्वेच्छा से व्रत लेकर निराहार रहने में, बात एक होने पर भी जमीन-आसमान का अंतर होता है। सन् ’41 में एक बार अर्थाभाव के कारण मुझे बंबई में चार दिनों तक भूख की ज्वाला सहनी पड़ी थी। सन् 43 के अंत में कलकत्ते से वापस लौटने पर मैं स्वेच्छा से चार दिनों तक भूखा रहा था। पहले अनुमान में बड़ी घुटन, बेबसी और विद्रोह-भावना पाई, दूसरे में सहनशक्ति बढ़ी और चेतना गहराई। मेरा मन उन दिनों कलकत्ते के दृश्यों से इतना भरा हुआ था कि अपनी इच्छा से आरोपित भूख को जनमत की करुणा में लय करके सहज बिसार देता था। इस उपन्यास के आरंभिक नोट्स मैंने उसी उपवास के दौर में लिखे थे। लेकिन यहां पर अपना एक और अनुभव लिखे बिना बात अधूरी ही रह जाएगी। सन् ’44 में अपने फिल्मी धंधे से एक महीने की छुट्टी लेकर बंबई से आगरे आने पर जब मैं इस कथानक के दृश्य बाँधने लगा तो शुरू के आठ दस दिनों तक मुझे भूख ने बेहद सताया। लिखते-लिखते बीच में कुछ खाने को मचल उठता था। बाद में यह मनोविकार स्वयं ही दूर भी हो लिया।

सन् ’43 का बंग-दुर्भिक्ष दैवी प्रकोप न होकर मनुष्य के स्वार्थ का एक अत्यन्त जघन्न रूप प्रदर्शन और उसका स्वाभाविक परिणाम था। भारत के एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो० महालनवीस ने उन दिनों सही आँकड़े प्रस्तुत करके यह सिद्ध कर दिखलाया था कि उस साल बंगाल में धान की उपज के हिसाब से अकाल पड़ने की कोई संभावना ही नहीं थी। द्वितीय महायुद्ध में गला फँसाए हुए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और निहित स्वार्थों-भरे अफसर-वैपारियों के षडयंत्र के कारण ही हज़ारों लोग भूखों तड़प-तड़प मर गए, सैकड़ों गृहिणियां वेश्याएं बनाई जाने के लिए और सैकड़ों बच्चे गुलामों की तरह दो मुट्ठी चावल के मोल बिक गए। महायुद्ध की पृष्ठभूमि में तस्वीर यों बनती थी कि एक शक्तिशाली पुरुष दूसरे के मुँह का निवाला छीन और खुद खाकर तीसरे शक्तिशाली से मारने या मर जाने की ठानकर लड़ रहा था। उसके इसी हठ में असंभव संभव हो गया। वही असंभव संभव इस उपन्यास में अंकित है। उत्तर प्रदेश के एक बड़े कम्यूनिस्ट नेता, मेरे मित्र रमेश सिन्हा ने सुप्रसिद्ध फोटो चित्रकार श्री युत चिन्ताप्रसाद से बंबई में भेंट करा दी। उन्होंने अकालग्रस्त क्षेत्र में जाकर कई सौ चित्र खींचे थे। चिन्ता बाबू ने मुझे उन चित्रों के पीछे की घटनाएं भी सुनाई थीं। श्रीयुत ज़ैनुल आब्दीन के बनाए रेखाचित्र भी देखने को मिले थे। मानवीय करूणा के उन मार्मिक चित्रों से मैंने प्रेरणा पाई थी अतः इनका कृतज्ञ हूँ।
इस उपन्यास का पहला संस्करण सन् ’46 में प्रकाशित हुआ था। तब से अब तक कई विद्वान आलोचकों और उपन्यास साहित्य पर शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत करने वाले अनेक छात्रों ने जिस उपन्यास को अपनी-अपनी कसौटियों पर कसकर इसे जीवन का सही दस्तावेज बतलाया है। कसने का कष्ट उठाने के लिए उन सबके प्रति कृतज्ञता अनुमान करता हूँ।

इस संस्करण में उपन्यास का पुराना नाम बदल देने के लिए भी सफाई देना आवश्यक है। प्रकाशक को लगा कि नाम बदल देना चाहिए। उनकी इस बात से सहमत होने के लिए मेरे पास भी एक कारण था। लगभग साल-सवा साल पहले एक सज्जन, जिन्होंने इस उपन्यास का नाम भर ही सुना था। मुझसे पूछने लगा कि जो नाम 26 वर्ष पहले अकाल की स्मृति ताज़ी होने के कारण पाठकों के मन में अपना स्पष्ट अर्थ-बोध करा सकने में समर्थ था वह अब अकाल से संबंधित जन-स्मृति के पुरानी पड़ जाने के कारण कुछ अड़चन महसूस होगी उनसे अभी ही क्षमा मांगे लेता हूं। बाकी पाठकों के लिए नाम-परिवर्तन से कोई समस्या उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

 

चौक, लखनऊ-3
9 जुलाई, 1970 ई०

 

अमृतलाल नागर


कथा प्रवेश

 


बर्मा पर जापानियों का कब्जा हो गया। हिन्दुस्तान पर महायुद्घ की परछाई पड़ने लगी।
हर शख्स के दिल से ब्रिटिश सरकार का विश्वास उठ गया। ‘कुछ होनेवाला है, -कुछ होगा !’-हर एक के दिल में यही डर समा गया।
यथाशक्ति लोगों ने चावल ज़मा करना शुरू किया। रईसों ने बरसों के खाने का इन्तज़ाम कर लिया। मध्यवर्गीय नौकरीपेशा गृहस्थों ने अपनी शक्ति के अनुसार दो-तीन महीने में लगाकर छः महीने तक की खुराक जमा कर ली। खेतिहर भूख से लड़ने लगा।

व्यापारियों ने लोगों को कम चावल देना शुरू किया।
हिन्दू और मुसलमान, व्यापारी और धनिक वर्ग, अपनी-अपनी कौमों को थोड़ा-बहुत चावल देते रहे।
खेतिहार मजदूर भीख मांगने पर मजबूर हुआ। शुरू में भीख दे देते थे; फिर अपनी ही कमी का रोना रोने लगे। दया-दान की भावना मरने लगी।
भूख ने मेहनत मजदूरी करने वाले ईमानदार इन्सानों को खूंख्वार लुटेरा बना दिया।
भूख ने सतियों को वेश्या बनने पर मजबूर किया।
मौत का डर बढ़ने लगा।

मौत का डर आदमियों को परेशान करने लगा, पागल बनाने लगा।
और एक दिन चिर आशंकित, चिर प्रत्याशित मृत्यु, भूख को दूर करने के समस्त साधनों के रहते हुए भी, भूखे मानव को अपना आहार बनाने लगी।
तब आशावादी मानव कठोर होकर मृत्यु से लड़ने लगा। उपन्यास का प्रारम्भ यहीं से होता है।

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