कहाँ जा रहे है हम - अखिलन Kahan ja Rahe Hai Hum - Hindi book by - Akhilan
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कहाँ जा रहे है हम

अखिलन

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :264
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1328
आईएसबीएन :81-263-776-5

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प्रस्तुत है तमिल अखिलन का उपन्यास...

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आजादी के बाद के कुछ दशकों में समाज और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का तल्ख चित्रण।

प्रश्नः उत्तर

(भूमिका)

‘कहाँ जा रहे हैं हम ?’,देश कहाँ जा रहा है ? ’-इस तरह के प्रश्न देश की आजादी का पहला दशक पूरा होते-होते,1957 में मेरे मन में उठने लगे थे। चोरबाजारी करनेवाले, जमाखोर और धनाढ्य लोग,जिन्होंने अँग्रेज हुक्मरानों के लिए चँवर डुलाया था-ऐसे लोगों को खादी का कुरता पहनाकर तमिलनाडु में जनता के प्रतिनिधियों के रूप में चुनाव में खड़ा किया गया। यही नहीं,शिक्षित,संस्कार-सम्पन्न तथा गाँधीवादी विचारधारा में आसक्ति रखनेवाले योग्य व्यक्ति राजनीति में हाशिये पर धकेल दिये गये।

शिक्षा-ज्ञान,सिद्धान्त के प्रति निष्ठा सेवा-भावना, श्रमशीलता आदि गुणों के मुकाबले में अवसरवाद धनतन्त्र और जातीय तन्त्र राजनीतिक जीवन की बुनियादी योग्यता के रूप में माने गये। देश के इस रूख पर मैं बेहद सदमे के साथ गौर करता रहा।

हालाँकि ‘यथा राजा तथा प्रजा’ राजतन्त्र का सिद्धान्त जनतन्त्र के लिए अनभ्यस्त हमारी जनता को सम्भवतः यही रुचिकर एवं अनुकरणीय लगा हो ! पत्र-पत्रिकाएँ भी, जिनका धर्म जनता के बीच में जनतान्त्रिक चेतना लाने के लिए राजनीतिक,आर्थिक एवं सांस्कृतिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना है,जनता को धोखा देने लग गयीं। जिन अखबारों ने देश के स्वतन्त्रता-संग्राम को अपना एकमात्र उद्देश्य मान रखा था,बाद में खुदगर्जी और मुनाफाखोरी को अपना चरम और परम लक्ष्य मानने लग गये। जिन लोगों ने देखा कि पत्रिका-व्यवसाय अपनाने पर गलत-सलत तरीके से अकूत सम्पत्ति और राजनीतिक लाभ मिल सकते हैं वे भी यहाँ खुलकर खेलने लगे। काले धन को समान के रूप में अपनानेवालों-राजनीति, पत्र-पत्रिका और फिल्म-इन तीनों ने आपस में एक अलिखित समझौते पर दस्तखत कर लिये थे।

वह  जमाना लद गया जब किसी प्रलोभन या भय के बिना जनता के सामने साहस के साथ सच्ची बात लिखनेवाले धीर -पुरुष समाचारपत्रों के सम्पादक पद पर विराजे थे। सुब्रह्मण्य भारती,तिरु,वी.कल्याणसुन्दर मुदलियार, टी. एस. चोक्कलिंगम, पुदुमैपि-त्तन, कल्की जैसे सम्पादक-रत्नों का लेखन पढ़ते हुए मैं बड़ा हुआ था। जिस जगह पर सच्चे मानव बैठकर अच्छे इनसानों को रूप दिया करते थे,वहाँ हमारी बदकिस्मती से धन-पिशाच आकर बैठ गया और वह जन-समाज को ठगने और बिगाड़ने लगा। सनसनीखेज खबरें,फिल्मी दुनिया का नग्न श्रृंगार,स्त्री-पुरुष की मांसलतापूर्ण काम-केलियाँ आदि का जनता के मध्य प्रति दिन और प्रति सप्ताह प्रचार-प्रसार किया गया। जो महानुभाव अपने को वेद-शास्त्रों में पारंगत कहलाने में गर्व का अनुभव करते थे,वे भी इस तरह के कदर्य व्यवसाय में अभिमान के साथ संलग्न हो गये। जब सम्पादकीय एवं अग्रलेख लिखनेवाला मस्तिष्क ही दूषित तथा कलुषित हो जाए तो समाज का धड़ कहाँ से स्वस्थ रह पाएगा ? मार्गदर्शक गुरु ही जब फिसलकर गिर जाए तो फिर देश कहाँ जाएगा ?

जनतन्त्र का मूलाधार है लेखन की स्वतन्त्रता। जनतन्त्र को पालने-पोसने में सक्षम लेखकीय-स्वतन्त्रता उसे मटियामेट भी कर सकती है एक दशक के इस छोटे अर्से में समाचारपत्र देश के अन्दर ऐसा स्वस्थ वातावरण पैदा कर सकते थे जिसमें देश के नागरिक पर्याप्त सुख-सुविधा शिक्षा-संस्कार और राजनीतिक जागरण के साथ जीवन-यापन करते। अखबारों के पतन से यहाँ अच्छे इनसानों की किल्लत पड़ गयी,धन प्रबल हुआ और धनतन्त्र का नंगा नाच शुरू हो गया।

‘जनता जिधर को बढ़े सरकार उसी ओर मुड़े’-यही जनतन्त्र का उसूल है। यहाँ जनता को दोष देना अर्थहीन है. बदकिस्मती यह है कि अधिसंख्यक तमिल् जनता का मार्गदर्शन करती हैं तमिल फिल्में,और उनके लिए चँवर डुलाकर पेट पालनेवाली पत्रिकाएँ। यह सच्चाई अब जग-जाहिर हो चुकी है। आज भी ये पत्रिकाएँ कॉलेजों में शिक्षित युवक-युवतियों के बीच में अमेरिकी ‘हिप्पी’ संस्कृति और अर्ध-शिक्षित नौजवानों के बीच में तमिल फिल्मी संस्कृति का योजनाबद्ध ढंग से प्रचार करने में लगी हुई हैं। पैसे की हेकड़ी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है,कम होने का नाम नहीं ले रही।

इधर देश ने महात्मा गाँधी का शताब्दी वर्ष मनाया। स्वतन्त्रता-प्राप्ति का रजत-जयन्ती वर्ष निकट आ रहा था। 1970 में ‘कलैमगल’ पत्रिका में ‘ज्वालामुखी’ कहानी के माध्यम से मेरे मन के भीतर का जलजला फूट पड़ा। उस कहानी की प्रतिध्वनि के रूप में विभिन्न भागों से गर्जन और घरघराहट मुझे सुनाई दी। प्रशंसा करनेवालों ने दिल खोलकर उसकी तारीफ की। निन्दा करनेवालों ने उतने ही जोश और आक्रोश के साथ उस कहानी की आलोचना की। पाठकों की सजगता देखकर मेरे मन में उत्साह बढ़ा। मैंने सोचा,‘बहरों के सामने शंखनाद करने की गोरखधन्धेवाली स्थिति’ अब नहीं है। निन्दकों की भी पहचान हो गयी। मैंने ठान लिया कि जो बात मन को अच्छी लगे,उसे बेखटके लिखता जाऊँगा,जिनमें समझने का माद्दा हो,समझ लें और जो लोग भावुक हों इन पर चिन्तन करें....आज या कल अथवा अगली पीढ़ी में उभरनेवाले किसी कर्मवीर के हाथ में यह पड़ जाएँ तो इसी में मुझे कृतार्थता मिल जायगी।

वेश्यावृत्ति में अपने तन को पूँजी के रूप में लगाकर बेशुमार दौलत बटोरने की बेहाली के लिए अभिशप्त एक नारी को मैने जानबूझकर इस उपन्यास की नायिका बनाया। समाज में ‘भद्र लोक’ का चोला पहनकर घूमनेवाले तथाकथित प्रतिष्ठित लोग वास्तव में इस वेश्या से भी गये-गुजरे हैं। चाँदी के टुकड़ों के लिए अपने अन्तःकरण, वाणी, कर्म, आत्मा-इन सबका व्यभिचार करनेवाले कापुरुष हैं ये लोग ! समाज में जहाँ-तहाँ नीच और कदर्य लोग रहते ही हैं। किन्तु ऐसे पतितों को मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करनेवाले समाज का कभी उद्धार हो पाएगा ? इस उपन्यास के माध्यम से मेरा यही प्रश्न है। इस देश ने गाँधीजी के मार्गदर्शन में आजादी पायी। महज पच्चीस साल के अन्दर यह बदहाली देखनी पड़ी,क्या यह उचित है ?

बापू के त्याग और बलिदन से इस देश ने जो आजादी पायी,उसमें प्राप्त लेखकीय-स्वतन्त्रता का मैने इस कार्य में भरपूर उपयोग किया है। इस उपन्यास में मैंने बापू के विचारों को पुनः समझने की कोशिश की है। यदि इस देश में कोई ऐसी गलतफहमी पाले कि बापू की नाड़ियों में स्पन्दित संघर्ष-भावना उनके साथ मरकर मिट्टी में मिल जाएगी तो वे लोग दयनीय हैं। जिस तरह सत्य का कोई मार नहीं सकता उसी तरह गाँधी को भी मारा नहीं जा सकता।

विदेशों से उधार में मिले उपन्यास-सिद्धान्त यहाँ टकराकर धक्के खा रहे हैं। मैंने न तो उनका एकदम तिरस्कार किया है,न ही पूर्ण रूप से इन्हें स्वीकार किया है। साहित्य का एक सिद्धान्त ऐसा है जो कुछ व्यक्तियों और उनके आन्तरिक मामलों के इर्द-गिर्द व्यापक रूप से डंका बजाता है। दूसरा सिद्धान्त ऐसा है जो समाज-हित के नाम पर उस सिद्धान्त के उन्नायक लेखक का मुँह बन्द करने पर तुला हुआ है। इसलिए मैं इतना कहूँगा कि जो लोग इस उपन्यास के साहित्यिक रूप,गठन,युक्ति या आशय अथवा उद्देश्य के बारे में फैसला करने के लिए आगे बढ़ेंगे,वे अपने-अपने मानदण्डों की खामियों को ही इसमें देख सकेंगे। सावधान होकर इसके समीप आइए। यह एक ऐसा अग्निपुंज हैं,‘ज्वालामुखी’ से फूटकर जिसके सत्यावेग का तेज अभी ठण्डा नहीं हुआ है।

आत्मा की अभिव्यक्ति ही कला है,सत्य में सौन्दर्य की तलाश करो,बाह्म-चक्षुओं के लिए सत्य का स्वरूप भले ही असुन्दर दिखाई दे,आन्तरिक नेत्रों से उसके सौन्दर्य की खोज करो-इस मिट्टी में जनमें इसी कला-साहित्य दर्शन की देश के कलाकारों-साहित्यकारों की सभा में एक बार चर्चा की थी। इस उपन्यास में मैने उसी दर्शन का परीक्षण करने का प्रयास किया है। जहाँ तक मैं जानता हूँ यह तमिलनाडु का सर्वप्रथम प्रयोगवादी उपन्यास है,जिसमें बापू जी के साहित्यिक सिद्धान्त को साकार करने का प्रयत्न हुआ है। आज के युग में सत्य और असत्य का ऐसा एकाकार संगम हो गया है जिसमें अभ्रक खालिस सोने के समान और खालिस सोना जंग लगे लोह-खण्ड के समान दिखाई देता है। मुझे लगा कि उनकी सही-सही पहचान कराना मेरा धर्म है,और इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने यह उपन्यास रचा है।

जिन लोगों ने मुझ पर ‘सामान्य जन के मनोरंजन के लिए पत्रिकाओं में लिखनेवाला साधारण लेखक’ का ठप्पा लगाया था पत्रिकाओं में लिखने के लिए अवसर न मिलने से वे लोग हताश होकर आज आलोचक बन गये हैं। यह सच है कि मैं पत्रिकाओं में लिखता हूँ किन्तु पत्रिकाओं के लिए-पत्रिका चलानेवालों की इच्छा-अनिच्छाओं के अनुरूप मैंने कभी भी नहीं लिखा है। इसमें भी मैं गाँधी की सीख का अनुगामी हूँ। बापू का आदेश है-कला और साहित्य को लक्ष-लक्ष जनता तक पहुँचना है। बापू एक जनप्रिय नेता रहे हैं,इसलिए लाखों की संख्या में जनता की भीड़ को जगाकर उन्हें स्वतन्त्रता-सेनानी की तरह बदलने में कामयाबी मिली। उन्होंने किसी कोने में बैठकर ‘करुणा-निधान ब्रिटिश सरकार बहादुर की सेवा में’ अर्जियाँ भेजने के जरिए आजादी नहीं दिलायी। पत्रिका पढ़नेवाली जनता की भीड़ मेरी सम्पत्ति है। मैं जिस चीज को उन तक पहुँचाना चाहता हूँ लिखता हूँ। पाठक-गण अपनी क्षमता की सीमा में जितने हद तक समझ सकें उतना समझ लें,तो उसी में मेरी कृतार्थता है।

1

योग्य पिता का योग्य पुत्र

1955-जनवरी की पच्चीसवीं तारीख। सुबह सात बजे का समय।
चेन्नई की प्रधान सड़क अण्णा सालै के गोल चक्कर में अभी गहमागहमी शुरू नहीं हुई है। थोड़ी देर बाद यहाँ का दृश्य देखने लायक होगा। लोग तरह-तरह के गाड़ियों में सवार होकर इस ‘राउण्ड ठाना’ के चक्कर काटते नजर आएँगे। तेजी,हड़बड़ी,अफरा-तफरी, गाडि़यों का शोरगुल,फुटपाथ की चहल-पहल इन सबका मिला-जुला रूप है ‘राउण्ड ठाना’।
महानगर के इस हिस्से से लगा हुआ,लेकिन इसके ठीक विपरीत एक शान्त-सुन्दर नन्दनवन भी वहाँ पर है। शाखा-प्रशाखाओं के संग ऊंचे उठे सघन वृक्षों,हरी-भरी झाड़ियों और मखमल जैसी हरी घास के मैदानों से पटा एक शानदार आहाता। परकोटे जैसी ऊँची दीवारों के पीछे स्थित यह आहाता ‘गवर्नमेण्ट एस्टेट’ या ‘माउण्ड रोड एवरेस्ट’ के नाम से मशहूर है। चेन्नई के निवासियों के लिए यह नाम जाना-पहचाना है। सन् सैंतालीस तक इस देश में राज करनेवाली ब्रिटिश सरकार ने शायद इसी कल्पना के साथ इस नन्दनवन को बसाया था कि वे हमेशा के लिए यहाँ राज करते रहेंगे।
सर्दी का मौसम। अभी सुबह का उजास नहीं हुआ था। सघन तरू-शाखाओं के बसेरे में सोये भाँति-भाँति के पंछी जमकर चहकने लगे। पूस की कड़कती ठण्ड न पड़ती होती तो इनकी मीठी तान संगीत की महफिल में बदल गयी होती।

सोये हुए पत्तों को फैलाकर उन्हें सहला रही प्रभात की किरणें उनींदे तमाल-वृक्षों को जगा रही थीं। मोती सरीखी ओस की बूँदें जहाँ-तहाँ टपक रही थीं। आँखमिचौनी खेलती गिलहरियों की धमाचौकड़ी शुरू हो गयी थी।

आहाते की दीवार की पिछवाड़े को सरहद बनाकर दूसरी तरफ मुखातिब था एक घर। इस घर के बाहरी कक्ष में टेलीफोन की घण्टी बज उठी। कमरे में कोई नहीं था। घण्टी लगातार बजती रही। बगलवाले कमरे में काम में व्यस्त चिदम्बरम ने जल्दी से आकर चोंगा उठाया । पूछा,जी कौन बोल रहे हैं ?
कहाँ गये तुम्हारें पिताजी ?
आवाज पहचानकर चिदम्बरम जरा झिझका। झट जबाव नहीं दे पाया। थोड़ा सकपकाया भी।
क्यों बेटे ! हमें पहचाना नहीं ? नींद से अभी-अभी उठे हो ? या बाहर जाने से पहले तुम्हारे पिता ने तुम्हे मना कर दिया है कि मुझे भी सूचना न दी जाए ?

इसके बाद उनके हँसने की आवाज सुनाई दी। सहज स्वाभाविक हँसी नहीं थी वह।
पोन्नय्या के सवाल और हँसी चिदम्बरम के मन में चुभ गये। उसे पता था कि पिछले कई महीनों से पोन्नय्या और उसके पिता में पट नहीं रही थी। इसे जाहिर किये बिना बोला,ऐसी कोई बात नहीं है चाचाजी जो कि आपसे छिपाई जाए।
तो बताओ न ,कहाँ गये हैं ? कब आएँगे ?
मदुरै के आसपास दौरे पर गये है। आज शाम को नहीं तो कल सुबह तक जरूर आ जाएँगे। आते ही मैं बता दूंगा कि आपने याद किया था।

तुम दफ्तर कब जाते हो ?
दस बजे पहुँचना है चाचाजी ! ‘भोर का तारा’ का आखिरी फर्मा आज छपाई के लिए भेजना है...
अच्छा....इसके बाद थोड़ी देर तक फोन से कोई आवाज नहीं आयी। चिदम्बरम समझ गया कि पोन्नय्या कुछ सोच रहे हैं। कुछ सेकेण्ड बाद उनकी आवाज सुनाई पड़ी। ऐसा है तो दफ्तर जाते हुए इधर से निकलना। जरूरी बात करनी है तुमसे। नौ-सवा नौ तक पहुँच जाओ तो अच्छा रहेगा,ठीक है।
जी चाचाजी !

देखो बैठक में कई मुलाकाती बैठे मिलेंगे। कहीं उनके साथ न बैठ जाना,समझे ? घर के आदमी हो,सीधे अन्दर पहुँच जाना। वैसे, पीछे वाले दरवाजे से भी आ सकते हो। बहुत ही खास बात है,जरूरी भी। आखिरी वाक्य के बोल थोड़ी देर तक उसके कानों में डोलते रहे। दो दिन पहले एकाएक दौरे पर निकले पिताजी ने भी गाड़ी में बैठने से पहले यही बात कही थी,बहुत ही खास बात है,जरूरी भी है।
पिताजी को जब दौरे पर जाना होता,पहले से ही रेल में आरक्षण करवा लेते। जहाँ जैसी सवारी,जीप या ट्रक मिले,उस पर घूमते और फिर किसी रेलगाड़ी से लौटते।
अबकी बार बिना किसी पूर्व ,सूचना के दफ्तर की कोई गाड़ी लेकर निकल पड़े थे। तब से ही उसे यही लग रहा था, मामला जरूर कुछ टेढ़ा है।

चिदम्बरम ने घड़ी देखी। सवा सात बज रहे थे। पोन्नय्या ने जो खबर दी थी, उसके झटके से बाहर आने की कोशिश में वह अपने पिता की कुर्सी पर बैठ गया। सामने गाँधी जी का चित्र लगा था। इस चित्र के शीशे के अन्दर उसे अपनी धुँधली परछाई दिखाई दी।

करीने से कटे हुए घुँघराले बाल,लम्बा-सा गोल चेहरा, घनी भौहों के ऊपर विशाल माथा,उभरी हुई नासिका,पैनी चितवन। फड़कते हुए अधर उसके संवेदनशील स्वभाव की ओर इंगित कर रहे थे। आधी बाँह की खादी की कमीज और चार हाथ की धोती पहने था। उम्र कोई सत्ताईस-अट्ठाईस साल की होगी।

अचानक उसकी नजर मेज के ऊपर रखे,छपे हुए कागज पर पड़ी। लकडी के सुन्दर फ्रेम में मढ़ा वह कागज कोई खास दस्तावेज था। 1950 जनवरी की 26वीं तारीख को जन्मे भारतीय गणतन्त्र घोषणापत्र, जिसमें भारतीय नागरिकों के मूलाधिकारों का उल्लेख था। उसके पिता रामलिंगम इसे ‘भारतीय संविधान का मूल मन्त्र’ कहते थे। अगले दिन गणतन्त्र दिवस का समारोह था। चिदम्बरम उस घोषणा को पढ़ने लगा।

हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने विचार और अभिव्यक्ति की तथा धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता दिलाने,समान अवसर, समान प्रतिष्ठा तथा व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की एकता को महत्व देने का संकल्प करते हुए अपने-आपको यह संविधान दे रहे हैं।

इस छपे हुए कागज के नीचे रामलिंगम ने महात्मा गाँधी के एक विचार को अपने हाथ से लिख रहा था,स्वतन्त्र भारत के आर्थिक सिद्धान्त के अनुसार देश के किसी भी नागरिक को भोजन और वस्त्र के बिना कष्ट उठाने की नौबत नहीं आनी चाहिए।
आजादी के कुछ ही महीनों बाद किसी धर्मान्ध व्यक्ति की गोलियों का शिकार बनकर महात्मा ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। लेकिन देश की आजादी के पहले ही महात्मा संविधान में शामिल करने के लिए इस बुनियादी विचार को विरासत के रूप में छोड़ चुके थे। बापू के इस विचार को मूलाधिकार वाले अंश में निष्ठपूर्वक लिपिबद्ध ,करने की अपने पिता की जागरूकता का खयाल आते ही चिदम्बरम का मन पुलकित हो उठा।

चिदम्बरम की छोटी बहन भारती ने उस कमरे के अन्दर पहले ही अगरबत्ती जला रखी थी। घर के बगीचे में खिले-बिरंगे ताजे फूल सामने रखे फूलदान में महक रहे थे। गाँधी जी के चित्र के अगल-बगल में स्वतन्त्रता-संग्राम के जाने-माने सेनानी व उ.चिदम्बरम पिल्लै, राष्ट्रीय कवि सुब्रह्मण्य भारती,तिरु.वि.कल्याण सुन्दर मुदलियार आदि के चित्र रखे थे। ऐसे महान नेताओं की स्मृतियों को उनके चित्रों के साथ भूल-भुला न दें,इसी अच्छे विचार के साथ रामलिंगम ने अपने बच्चों को उनके नाम दे रखे थे। पहला बेटा जब हुआ, उसका नाम रखा चिदम्बरम। दूसरे नम्बर पर बेटी हुई तो उसे भारती नाम दिया। आखिरी बेटा ‘सुभाष’ था।

हाथ में जो काम था, उसे पूरा करने के लिए चिदम्बरम अपने कमरे की ओर लौटा। उस छोटे-से-कमरे के अन्दर चारों ओर किताबें-ही-किताबें थीं। झुग्गी-झोंपड़ियों में रहनेवाले गरीब कारीगरों द्वारा बाँस की खपच्चियों से निर्मित किताबों की अलमारियों पर दुनिया के मशहूर ज्ञानी और विद्वान पुस्तकों के आकार में विराजमान थे। ‘भोर का तारा’ में देने के लिए पिछली रात को उसने जो सम्पादकीय तैयार किया था उसका प्रूफ देखकर आवश्यक संशोधन करने के बाद बापू जी की तस्वीर को एक बार निहारा। प्रसन्न मन से फिर दोनों कागजों को दफ्तर ले जानेवाली झोली में हिफाजत के साथ रख लिया।

उसकी माँ लक्ष्मीदेवी रसोईघर में अपने काम में लगी हुई थी। साढ़े आठ बजे तक रोज ही खाना बनकर तैयार हो जाता है। सुभाष अपनी किताब और काँपियों को फर्श पर फैलाये घुटने के बल बैठा था और नीचे झुका हुआ गणित से जूझ रहा था। यद्यपि उसके सामने मुनीमोंवाली लकड़ी की छोटी-सी मेज पड़ी थी,लेकिन सुभाष को उसकी परवाह नहीं थी। फर्श पर औंधा लेटकर लिखने-पढ़ने में ही मानो उसे आनन्द आता हो !

धुले हुए कपड़ों को हाथ में लेकर चिदम्बरम गुसलखाने की ओर जा रहा था। क्षण-भर रुककर उसने देखा,छोटी बहन भारती खिड़की से बाहर झाँकती हुई खडी है और कोयल की कूक का जवाब दे रही है। जोर से हँसने पर भारती के दिल में उभरती खुशी में खलल पड़ जाएगी,इसी खयाल से उसे अपनी हँसी रोकनी पड़ी। भारती की कांलेज की पढ़ाई अभी-अभी पूरी हुई थी। इस समय खिड़की के बाहर पेड़ की डाल पर सुस्ता रही किसी कोयल की एकल कूक का जवाब देने में वह मशगूल थी मानो वह उसकी सहेली हो ! कोयल ने आवाज दी-कू...! इधर से उसी तर्ज पर कूक उठी। बारी-बारी से उठी ‘कू..कू’ ध्वनियों में से कौन सी कोयल की थी और कौन-सी भारती की थी,यह बता पाना कठिन हो रहा था।

आमतौर पर यह देखा जाता है कि चैत्र-वैशाख के महीनों में कोयलों में अजीब किस्म की मस्ती छा जाती है। लेकिन पता नहीं क्यों, चेन्नई नगर की यह कोयल पूस के महीने में ही कैसे इतनी अलमस्त है,जिसकी तान सुनकर भारती भी अपने-आपको भूल गयी।
नलके के नीचे खडे होकर ठण्डे पानी में स्नान कर रहा चिदम्बरम अपनी बहन की मनोदशा पर भावुक हो उठा। उसे खयाल आया,इन दिनों वह हर रोज नयी सुबह का स्वागत करती हुई भाव-विभोर हो जाती है। भारती के अन्तर में उमड़-घुमड़कर फूटती उल्लासमय उमंग ने शायद उसे पंख फड़फड़ाते हुए कोयल के साथ होड़ लगाने की प्रेरणा दी। उसकी नन्ही-सी आत्मा स्वयं कोयल का रूप लेकर मधुमय तान बरस रही थी। हाँ इस समय वह अपने होनेवाले पति राजन की याद में अपने-आपको भूली हुई थी।

राजन डाँक्टर की पढ़ाई पूरी करके ‘हाउस सर्जन’ के रूप में सेवारत था। भारती भी कुछ समय पहले बी.ए.की अपनी पढाई पूरी कर चुकी थी। जब घर में कोई न होता,कभी-कभी भारती राजन से टेलीफोन पर बात कर लेती। चिदम्बरम ने एकाध बार इसे देख लिया है। मौका मिलने पर वे दोनों घर के बाहर भी एक-दूसरे से मिलते थे,यह बात केवल चिदम्बरम को मालूम थी। एक दिन शाम को चिदम्बरम अपने मित्रों के साथ समुद्र-तट पर टहलने गया था उसने देख लिया कि वहाँ नाव की ओट में भारती और राजन अकेले में बैठकर बतिया रहे हैं। उस दिन उन दोनों की नजर से बचना और अपने साथियों की नजर से उन्हें बचाना उसके लिए बहुत दुश्वार बन गया था।


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