शायरी के नये दौर - भाग 4 - अयोध्याप्रसाद गोयलीय Shayari Ke Naye Daur - 4 - Hindi book by - Ayodhyaprasad Goyaliya
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शायरी के नये दौर - भाग 4

अयोध्याप्रसाद गोयलीय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :248
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1290
आईएसबीएन :81-263-0017-5

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प्रस्तुत है शायरी के नये दौर भाग-4.....

Shairi ke naye daur (4)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

उठाये कुछ वरक़ लाले ने, कुछ नर्गिस ने, कुछ गुल ने
चमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी
उड़ा ली क़ुमरियों ने, तूतियों ने, अन्दलीबों ने
चमनवालों ने मिलकर लूट ली तर्ज़ें-फ़ुग़ाँ मेरी

इक़बाल

एक नज़रमें


अख़्तर शीरानी


अख़्तर शीरानीकी शाइरी, प्रेम और प्यारकी शाइरी है। वे उर्दू के ऐसे रोमानी शाइर हैं, जिनका रोम-रोम प्रेम और आसक्तिमें भीगा हुआ है। वे सूफी़ शाइरोंकी तरह न तो ख़ुदासे इश्क़ फ़र्माते हैं, न वे वेश्याओंके कूचेकों इश्क़े-हक़ीक़ीका जीना समझते हैं। न वे किसी काल्पनिक प्रेयसी के काल्पनिक विहरमें आँसुओंके दरिया बहाते हैं, न वे किसी ऐसी अलभ्य हूरपर आसक्त होते हैं, जिसपर मनोभाव व्यक्त करना भी संभव नहीं और इकतर्फ़ा इश्क़में एड़ियाँ रगड़-रगड़कर मरनेके सिवा दूसरा उपाय नहीं। न वे पुराने शाइरों की तरह ऐसे बेवफ़ा ज़ालिम, हरजाई हबीबको दिल देनेकी ग़लती करते हैं, जो आशिक के दिलकी मिट्टीके ढेले जितनी भी कीमत नहीं समझता। शराब पीता है, महफ़िल में कभी इससे और कभी उससे आँख लड़ाता है, आशिक़ोंको धक्के देकर बाहर निकलवा देता है और ज़रूरत पड़नेपर धौल-धप्पा करने से भी नहीं चूकता।
अख़्तरका इश्क़ इकतर्फ़ा नहीं है। उनकी प्रेयसी भी अपने प्यारेको मन-वचन-कायसे चाहती है। वह भी ‘अख़्तर’ की तरह अपने सीनेमें प्रेम-विभोर हृदय रखती है। अख़्तर की चाहतको अपने जीवनकी अमूल्य निधि समझती है, और अख़्तर अपनी प्रेयसीको विषय-वासनाका साधन न समझकर उसे निश्छल भाव से चाहते हैं। अपने हृदय-मन्दिरमें अभिषिक्त करके उसकी पूजा करते हैं। प्रेमको वे सामाजिक अपराध अथवा जीका जंजाल न समझकर मानवोचित, पवित्र और स्वाभाविक समझकर मुक्त कण्ठसे उसका बखान करते हैं।

लेकिन प्रेम और आसक्तिसे लबालब भरे होनेपर भी अख़्तरके जामे-शाइरीमें वह प्रेमसुरा नहीं, जिसे पीकर मन-मयूर नाच उठे और कुछ दिनोंके लिए सुध-बुध विसार बैठे। न उनके यहाँ वह विरह-वेदना है, जिससे हृदय तड़प उठे और आँखसे आँसू झरने लगें। उनकी प्रेम विरह की शाइरी स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ती। सम्भवतः इसका कारण यही है कि वे ‘सलमा’ के विछोहके बाद आपेमें न रह सके और उनके सुरासेवी साथियों-ने उन्हें कुमार्गरत कर दिया। वे प्रेमी न रहकर कामुक बन गये। काश ‘अख़्तर’ ने सलमाकी विरहाग्निमें धूनी रमाली होती। उनके रोम-रोम से ‘सलमा-सलमा’ की ध्वनि प्रस्फुटित होती तो उनका कलाम भी आज अमर हुआ होता और राधा-कृष्ण, हीर-राँझाके समान न सही शरतबाबूके देवदास और पारोकी तरह तो प्रसिद्ध हुए होते।

अब्दुलहमीद अदम


अदमने कभी इश्क़ नहीं किया। इसलिए उनके कलाममें वह आग नहीं, जो प्रेमी-प्रेमिकाओं-द्वारा प्रज्वलित होती है। न उनके यहाँ वह व्यथा और वेदना है, जो प्रेम-ज्वालामें झुलसनेपर होती है। न उनके यहाँ वह तड़प और बेचैनी है जो विरहीको तारे गिनवानेपर मजबूर करती है। अदम किसी चन्द्रमुखीके चकोर सुरा-प्रेमी हैं। सुरा ही उनकी प्रेयसी है, उसीसे आँखमिचौनी खेलते रहते हैं। उसीको पाने में दिन-रात व्यस्त रहते हैं और उसीके नशे में झूम-झूमकर शेर कहते हैं। अदम न राजनैतिक हैं, न मज़हबी और न किसी दल विशेष के प्रचारक। न वे अपनी शाइरी में दार्शनिक पुट देते हैं, न लीडराना रंग भरते हैं, न कोई पैग़ाम उग़लते हैं। सिर्फ़ दिल बहलावेके लिए शेर कहते हैं। स्वभावतः शाइराना दिलो-दिमाग़ पाया है। इसलिए जो मनमें भाव उठते हैं, अनायास नौके-कलमसे काग़ज़पर थिरकने लगते है।

एहसान दानिश


मैंने पन्द्रह वर्ष पूर्व शेरों-शाइरी के लिए लिखा था- ‘‘एहसान शोषित वर्गके पैगम्बर कहलानेके अधिकारी हैं। वे उनके लिए जीते हैं, उन्हीं के लिए सोचते हैं और उन्हींकी व्यथाओं को काग़ज़पर मूर्तिवान रूप देते हैं। उनके यहाँ निरी कल्पना, कोरी भावुकता और उड़ा न नहीं। उनका एक-एक अक्षर आपबीती और जगबीतीका सवाक चित्रपट है। उनका कलाम सुनते अथवा पढ़ते हुए प्रतीत होता है कि हम सब दृश्य और घटनाएँ अपनी आँखों से देख रहे हैं। उन्होंने जीवन के लक्षतक पहुँचनेमें जिन कण्टकाकीर्ण और दुर्गम मार्गोंको तय किया है, उसीमें जो देखनेको मिला, उसे काग़ज़पर चित्रित कर दिया है। ‘एहसान’ अपने सीनेमें दहकती आग लिये फिरते हैं और उसी आगकी चमकमें जो देखते हैं, शाइराना दिलो-दिमाग़से उसे चमका देते हैं।’’ ‘एहसान’ तफ़रीह-के लिए या दमाग़ी ऐय्याशीके के लिए शेर नहीं कहते। उनका कहना है कि ‘‘मैं मुशाअर्रमें शोर-और-शग़फ़ (प्रशंसात्मक आवाजें या तल्लीनता) की हवाई और हंगामी दादो-तहसीन (वाह-वाह) से खुश नहीं होता, बल्कि हाज़रीन (उपस्थित समूह) की आँखोंमें आँसुओं की झिलमिलाहट और लबोंपर मुहरे-खामोशी (संलग्नता) देखकर अपनी नज़्म कामयाब समझता हूँ।’’ और यह कामयाबी क्या उन्हें सोफ़ेपर बैठकर सोनेके क़लम-से लिखनेमें नसीब हुई ? बक़ौल किसीके-


हल करता है इफ़लासके उक़्दे वह सुख़नवर
जो हाथमें थामे हुए सोनेका क़ल़म है1

एहसानकी कामयाबीका राज़ उक्त शेरमें नहीं, अपितु हज़रत ‘असर’ लखनवीके इस शेर में निहाँ है-

हमने रो-रोके राट काटी हैं
आँसुओंमें यह रंग तब आया

26 जनवरी 1960 ई.]
1. अर्थाभावकी समस्याएँ वह शाइर सुलझा रहा है, जिसके हाथमें सोनेका क़लम है !

अख़्तर शीरानी


परिचय


‘अख़्तर’ शीरानीके पूर्वज टौंक रियासतके निवासी थे। वहीं पर आपका 4 मई 1905 ई. में जन्म हुआ। आपका जन्मका नाम दाऊददख़ाँ था और अफ़ग़ानोंके ‘शीरानी’ कबीले से संबंधित थे। होश सँभालनेपर आपने ‘अख़्तर’ तखल्लुम और शीरानी वंश हानि के कारण अपने को अख़्तर शीरानी लिखना पसन्द किया और इस नामसे आपने ख्याति पाई। आपके पिता हाफ़िज़ मदमूदखाँ शीरानी फ़ारसी साहित्य और इतिहासके बहुत बड़े विद्वान थे और फ़ारसी पिंगल-शास्त्रके भारत में सर्वोच्च अधिकारी थे। हाफ़िज़जी 1914 ई. में अपनी शिक्षा पूर्ण करके विलायतसे भारत वापिस आये तो आपने अख़्तर के लिए फ़ारसी-विद्वान्, एक व्यायाम-मास्टर और एक खुशख़तनवीस को नियुक्त किया।

सन् 1920 में रियासत टौंकसे हाफ़िज़जी किसी कारण से निर्वासित किये गये तो आप सपरिवार लाहौर चले गये, अख़्तर भी साथ थे। वहाँ हाफ़िज़जी प्रारम्भ में ओरियण्टल कालेजके और बादमें पंजाब यूनिवर्सिटीके प्रोफ़ेसर रहे। अख़्तरने 1922 ई. में मुंशी फ़ाज़िलकी परीक्षा पास की। आपके पिताकी उत्कट अभिलाषा थी कि ‘अख़्तर’ उच्च-से-उच्च शिक्षा प्राप्त करें, किन्तु अख़्तरकी शाइरीके शौकने यह क्रम चलने नहीं दिया।

शाइरी का शौक़

अख़्तरने अपने अध्यावसायसे अरबी और अंग्रेज़ीका भी थोड़ा-बहुत अभ्यास कर लिया था, किन्तु व्यवस्थित रूपसे कालेजमें शिक्षा प्राप्त न कर सके। यूँ तो आपका बचपनसे ही शाइरीकी तरफ़ रुझान था, किन्तु लाहौर के वातावरण ने उसे और भी हवा दी। 1924 ई. में जब कि आप 19 वर्ष के भी न हो पाये थे। आपकी पहली नज़्म ‘जोगन’ उर्दू-पत्रिकामें प्रकाशित हुई तो


द-4-2

उर्दू-अदीबोंका ध्यान बरबस आपकी तरफ़ आकर्षित हो गया, और अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं के लिए नज़्में भेज देने के लिए सम्पादकोंके तक़ाजोंका ताँता लग गया। जिस पहली नज़्म से आपको ख्याति मिली उसके 50 में- 14 शेर बतौर नमूना यहाँ दिये जा रहे हैं-

देखो ! वह कोई जोगन जंगलमें गा रही है
...................................................
देखों ! वह कोई जोगन जंगलमें गा रही है,
मौसीक़-ए-हज़ींके1 दरिया बहा रही है
..................................................
हर लरज़िशे-सबामें2 तूफ़ाँ उमड़ रहे हैं,
किस दु:ख भरी अदा से तानें लगा रही है,
अठखेलियोंका सिन है, हँस बोलने का दिन है,
लेकिन न जाने क्यों वह आसूँ बहा रही है,
......................................................
है एक सितार उसके आग़ोशे-नाज़नींमें3
दो नाजुक उँगलियों से जिसको बजा रही है,
......................................................
जंगलके जानवर कुछ बैठे हैं उसके आगे
रो-रोके जिनको अपनी बिपता सुना रही है
खूँख़्वार शेर भी हैं वहशी ग़ज़ाल4 भी हैं,
लेकिन वह सबके दिल पर सिक्का जमा रही है,
कुछ साँप झूमते हैं रह-रहके मस्त होकर
इक मौजे-वज्द5 उनकी रग-रग पै छा रही है,

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1.व्यथापूर्ण संगीतके, 2. हवाके कम्पनमें, 3.सुकुमार गोदमें, 4. उन्मत्त हिरण, 5. बेहोशीकी-सी लहर।

    


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