कालम् - एस.टी.वासुदेवन नायर Kaalam - Hindi book by - S. T. Vasudevan Nayar
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कालम्

एस.टी.वासुदेवन नायर

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :254
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 125
आईएसबीएन :81-263-0213-5

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अपनी मिट्टी की गन्ध में रचे-बसे चरित्रों का अन्तरंग और आत्मीय मनोविश्वेषण करता एक मर्मस्पर्शी उपन्यास। मलयालम से हिन्दी में।

Kaalam - A Hindi Book by - M. T. Vasudevan Nayar कालम् - एस.टी.वासुदेवन नायर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित और भारतीय साहित्य जगत् में ‘एम.टी.’ के नाम से प्रसिद्ध मलयालम भाषा के महान् कथाकार एम.टी. वासुदेवन नायर का उपन्यास ‘कालम्’ उनकी एक कालजयी बहुचर्चित रचना है। अनेक दृष्टियों से अद्वितीय एम.टी. का यह उपन्यास केंद्रीय साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत हो चुका है।

यह सच है कि किसी भी सर्जनात्मक कृति में दर्शन चिंतन आये, राजनीति आये, या जीवन और उसके आसपास की इंद्रधनुषी प्रतीति प्रतिबिंबित हो, रचनाकार की संवेदना से अभिन्न होकर ही वह सार्थक होती है। साथ ही यह भी सत्य है कि रचनाकार रचना के माध्यम से चाहे स्वयं को आलोकित करे या लोकहित साधन; घटित यथार्थ को संभावित यथार्थ से जोड़े बिना उसका काम पूरा नहीं होता, संपूर्ण नहीं होता। -और कहने की जरूरत नहीं कि एम.टी. ने अपने उपन्यास ‘कालम्’ के माध्यम से यह काम पूरी सहजता और तन्मयता के साथ किया है। अपनी मिट्टी की सुगंध और नरमाई के बीच रचे बसे चरित्रों का अंतरंग और आत्मीय मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तथा उनका सुख-दुख, राग-विराग और परिवेश की विसंगतियों की सजग एवं प्रखर अभिव्यक्ति एम.टी. के उपन्यासों की वास्तविक उपलब्धि है। निस्संदेह इसका जीवंत प्रमाण है यह उपन्यास ‘कालम्।’

1

एक रात।
नई वर्षा से नवजीवन पाकर दूब पर सोए पड़े झींगुर पैरों की आहट सुन भीगे खेतों की मेड़ों के ऊपर चौंककर फुदकने लगे। पाँवों से टकराकर उछलते समय वे आवाज करते। वह आवाज किसी की याद दिला रही थी
स्पष्ट कुछ बता नहीं सकता। कारण, मन अस्वस्थ था। सुपरिचित एवं सुखद यह आवाज कब सुनी थी...?
भीगी मिट्टी तथा गाढ़े अँधेरे की गंध। अँधेरे और रात की भी गंध होती है। इस बात से अनवगत हो पल भर याद करता रहा। मछुआरों ने जाल बिछाने के लिए मिट्टी खोदकर जो घेरे बनाए थे, उनमें भरे पड़े गंदे मैले पानी में बादलों से आच्छादित आकाश की सफेद पर्तें झिलमिला रही थीं।
नारियल के पत्तों से बनी मशाल का प्रकाश आगे का रास्ता दिखा रहा था।
लोहे का संदूक तथा बिस्तर ढोए पीछे आने वाले बूढ़े चेरूमन्1 के हाँफने की ध्वनि सुनाई दे रही थी। खेत की मेड़ों को पार कर गाँव की राह पर आते ही नदी की झरझराहट नजदीक सुनाई देने लगी। झाड़ी से उलझा रखी नौका के तले अपना राग अलापने वाले प्रवाह की गुदगुदी सुनकर हम रुक गये। अंधकार की नदी, धुँधलके की अनंतता। उस पार लौहपुल को विकंपित करते हुए गाड़ी के पहिए उझक रहे थे।

घाट के पास बेंच पर से उनीदें उठकर छाया-से आ पहुँचे माँझी को रेलगाड़ियों के समय का ज्ञान था।
क्या यही गाड़ी है ?  साढ़े चार की गाड़ी ?
पूछने की हिम्मत नहीं थी। कारण, तू कल का कुछ न समझने वाला नादान छोकरा नहीं। छप्पन मील दूर, किसी जमाने में एक सुल्तान द्वारा बनाए गए किले की नगरी में उच्च कक्षा में पढ़ने जाने वाला सोलह वर्षीय युवा है। एक ही रात में बड़ा हो चुका है।
(एक रात। वर्षों के बाद भी निस्तेज न होने वाली एक रात मन को घेरे बैठी है।)
धुँधले शीशे के भीतर अपने प्रकाश को छिपाए लालटेन को नाव के सिरे पर
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1.    पुलयन् नामक जाति का एक आदमी।

लटकाकर झिल्ली के सहारे पानी उछाल फेंकते समय माँझी के वक्षस्थल में संध्या समय घर खपरैल पर उड़ आ बैठा एकाकी कबूतर फुदकने लगा।
नदी।
नाव।
मंदिर, नेत्रचिकित्सक के घर, अपने घर तथा ककड़ी के खेत की ओर आते-जाते कई बार पार की गई नदी कई वर्षों के बाद फिर प्रतीक्षारत नाव।
नाव के सिरे पर रखे लौह संदूक को चेरुमन ने जोर से पकड़ रखा है कि नहीं ? नाव के हिलते समय फिसलकर नीचे न गिर जाए। ‘‘चात्तप्पा, संदूक सँभालकर पकड़ो’’ यह कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
कंजी डाल सुखाकर इस्त्री की गई लुंगी भीगने न पाए, इसका ध्यान रखते हुए दोनों हाथों का सहारा देकर बैठते समय उस पार की विजनता में झोपडियों की काली छायाएँ जन्म ले रही थीं।
भीगी मिट्टी। पद-चिन्हों में ठंडा पानी जम जाता था। जल्दी-जल्दी चलने की इच्छा थी। लौहपुल ध्वनित होने लगा है क्या ? मशाल का अवशिष्ट भीगी मिट्टी में बुझने लगा। गहरे अंधकार में भी रेलगाड़ी के पहियों के रगड़ने से चमकती पटरियाँ निवारों के समान दिख रही थीं।

मन में आनंद की अपेक्षा भय कुछ ज्यादा था।
लुंगी को मोड़कर बाँधे, सिर पर पगड़ी धारे तथा अपने खुरदरे हाथों को जोर से हिलाते चलते मामा पीछे मुड़कर खड़े हो गए।
‘‘साथ चलो !’’
वह आवाज आवश्यकता से अधिक ऊँची थी। माँ, मामा मौसी, कभी-कभार घर आने वाले परमेश्वरन् दाऊ-सब के-सब प्रौढ़ लोग आवश्यकता से अधिक उच्च स्वर में बात करते हैं। इस कारण मन में किसी का हुलिया स्थान नहीं बना पाता, उच्च स्वर मात्र ठहर जाता है। रेल की पटरियों के बीच बिछाए स्लीपरों पर चलते समय सावधानी बरतनी पड़ती है। नुकीले काले कंकड़ पत्थर बिखरे पड़े हैं। तब साढ़े चार बजे की गाड़ी सिगनल के प्रकाश की लाल पलकें, पिछले दिन तक कल्पना में लाई गई नगरी कुछ भी स्मरण में नहीं आता। पीड़ा का अनुभव करना मूर्खता है। क्योंकि यह विदाई नहीं। मन में अनुभूत अस्वस्थ पीडा़ भी नहीं। आँखों का मींचना संभवतः संभवत; हाँ पसीने का तेल उतर जाने से होगा।
खेत की मेंड़ों पर इधर-उधर उछल-कूद करते झींगुरों की बारीक आवाज तक सहसा स्मृति में आई-नीले फूलों वाले ब्लाउज के प्रेस बटनों के टूटने के जैसे।

पहले क्यों याद में नहीं आई ? सोलह साल के युवा की आवेग पूरित चाल के एक को छोड़ दूसरे स्लीपर पर पैर रख तीव्र होते ही, वह स्वयं को डाँटने लगता है: पहले याद क्यों नहीं आई ?

2


कंकड़ों पर रखे ताँबे के घड़े में बचा जल एक कमंडलु में भरकर सेतु ने एक बार और अपना हाथ-मुख धो लिया। आखिरी अंजलि भर जल छाती तथा गले में छिटकाकर पूरब के बरामदे के खंभे के पास आ बैठा।
बाहर दोपहर की कड़ी धूप अपनी उग्रता दिखा रही थी। पूग के बाग से कभी-कभार आ जाती हवा आग की ज्वाला सी लगती। उसे लगा कि झाड़ू देकर पानी से धो डालने पर फर्श पर सोया जा सकता है। पर फर्श टूटा-फूटा तथा धूल से भरा पड़ा था।

डाकघर जाने के लिए अभी काफी समय शेष था। संभव है, पिताजी का पत्र आ जाय। परमेश्वरन् दाऊ ने प्रतिमास तीस रुपए भेज देने का आश्वासन दिया था। कुछ रकम अगर पिताजी भेज देते तो कॉलेज में प्रवेश लिया जा सकता था। दाऊ ने लिखा तो नहीं, माँ ने लिखा था। जो उत्तर में-पहले जैसी शारीरिक क्षमता नहीं रही तथा खेती बारी से पूर्ववत् आय नहीं मिलती, ऐसी सारी कठिनाइयाँ लिखीं गईं। माँ को पूरा पत्र एक बार पढ़कर सुनाने के बाद पत्र पर एक बार आद्यन्त दृष्टि डाली। नहीं, सेतु के बारे में कुछ नहीं था। मां के पत्र के साथ स्वयं अपना एक पत्र भी प्रेषित करके पिछले नौ दिन से उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था।

आनमला से पत्र आ पहुँचने में दो दिन लगते।
मेल गाड़ी का पुल पार करने का दृश्य पहाड़ी के उतार पर खड़े होकर देखा जा सकता था। लाल रंगीन डाक डब्बा देख, मेल होने का निश्चय होने के बाद ही डाकघर जाना था। फिर भी बिवाई से पीड़ित डाकिया कट्टिपुरम् से चलकर डाकघर जैसे-तैसे पहुँच जाता। चार बजे तक सोया जा सकता था। वहाँ खिड़की की तरफ सिर रख सोने में सुख था। गर्मी के दिनों में रात-दिन माँ वहीं सोया करती। बाहर देखते ही आँखें चौंधिया जातीं। जोते गए खेतों पर आग धधक उठती-सी लगती। उसके आगे जहाँ वटवृक्ष गिरा पड़ा हुआ है, वहाँ रेतीली भूमि की ओर सिर्फ एक ही बार देखा जा सकता है। आँखें झुलस जाती हैं।
सोचा था कि विषु के दिन पानी गिरेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। शेरंकश तालपोलि1 के दिन पानी बरसा करता था। इस बार वह भी नहीं हुआ। सेतु की मौसी का कथन है कि उसके जीवन में कभी ऐसा ग्रीष्म देखने को नहीं आया। सभी ग्रीष्मों में मौसी यही दुहराया करती है। हर ग्रीष्म में कहती, ऐसी हालत रही तो लोग झुलसकर मर जाएँगे। पर कोई नहीं मरा।
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1.    एक धार्मिककृत्य जो देवी मंदिरों में संपन्न होता है। अलंकृत बालिकाएँ हाथों में सुसज्जित थालियाँ लिए, आरव करती मंदिर की परिक्रमा करती हैं।

‘‘सेतु, पत्मु को कहीं देखा क्या ?’’ ऊपर के बरामदे से चली आती मौसी ने पूछा।
‘‘नहीं देखा।’’
‘‘यह कुलक्षणी दोपहर को कहीं झाड़ू नहीं करती। लड़कियों में अनुशासन होना चाहिए। आज आने दो उसे।’’
मौसी अब आगे बढ़ती। मानो उसका चीर-फाड़ करने जा रही हो। अतः बता दिया, ‘‘वह पड़ोसी घर में खेल रही होगी।’’
मौसी सदा उसे मारती-पीटती रहती। जो भी हाथ लगा, उसे उठाकर दे मारती। माँ से झगड़ बैठते समय भी पहले उसका ध्यान पत्मु पर जाता। माँ कुछ नहीं बोलती। रो-रोकर दम घुटने पर भी वह उसे नहीं छोड़ती। तब माँ सेतु को बुलाती।
‘‘उस लड़की को कहीं उठा ले जाओ। मरने पर भी उसे उठा लेने के लिए मैं ही रहूँगी ?’’
थोड़ी देर बात, क्रोध शांत होने पर पत्मु को उठाकर तेल लगाकर स्नान कराती तथा भस्म लगाकर गोद में बिठाकर लाड़ प्यार जताती और रोती।

ग्रीष्म काल में मौसी चोली नहीं पहना करती। गंदा तीन गज का कपड़ा पहनती और उसी से अर्धांग ढक लेती तथा दालान में इधर-उधर टहलती रहती फलों के व्यापारी या माधव मामा से मिलने जो भी आए, उसका वह टहलना जारी रहता। क्रुद्ध सेतु के मन में कई बार आया, चुड़ैल इस वेष में दालान में टहलती ही रहेगी क्या ? माधव मामा तक मौसी को समझाने की हिम्मत नहीं करते। माँ तथा मौसी का छोटा भाई जो ठहरा, उससे क्या डरना।
‘‘इस बरामदे पर मैंने एक झिल्ली का पंखा रखा था। सवेरे यहाँ पड़ा पाया था। पर अब नहीं दीख रहा है !’’
चूँकि सेतु से नहीं कह रही थी, इसलिए वह चुप रहा।
मौसी को नाम के वास्ते कोई मिले तो बस, हजारों बातें वह कहने लगती।
‘‘उपकार के लिए कोई नहीं, अपकार के लिए सब हैं।’’

मौसी दालान में टहलती हुई अपने पांडुर होठों को पोंछती-थूकती झगड़े का उपक्रम कर रही थी।
‘‘कई लोगों के पीछे पड़ने के बाद उस चात्तप्पन् का लड़का एक झिल्ली ला दे गया था। अब उसके जरूरतमंद लोग रहे।’’
क्रुद्ध सेतु मौन बना रहा।
भीतर से माँ कह रही थी, ‘‘दोपहर को जरा आराम करने की सोच रही थी, पर वह भी नहीं करने देती।’’
अपने आँचल से नास की शीशी निकालकर चुटकी भर सूँघकर मौसी परिहास के रूप में बाहर की तरफ मुँह करके मुस्कराने लगी।
‘‘मुझे कुछ बोलने का अधिकार नहीं है न ! मेरा मुँह खोलना ही अपराध बन जाता है। कल्याणी अनाथ है न ! कुछ भी बोले तो अपराध है। नहीं तो तू ही बता, मैंने अब क्या कह दिया ? एक पंखा इधर जो रखा था, वह किसी ने देखा या नहीं, इतना ही पूछा था। गलत हो गया ?’’

सेतु गवाह बन जाने को तैयार न होकर मुँह झुकाए बैठा रहा। मन में कोफ्त भरी थी। इधर से कब बच निकल जाऊँ...लेकिन माँ छोड़ने को तैयार नहीं थी। वह आंगन में उतर पड़ा। आँगन के छोर पर जा खड़ा हो गया। इल्लम्1 के परिसर में खड़ी होकर देवु ने पुकारकर पूछा, ‘‘माधव भैया है क्या सेतु ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘आने पर कहना कि बहन ने बुलाया है।’’
कुंचु नंपूतिरी की मृत्यु के बाद माधव मामा इल्लम् के मुख्तार बने हैं। सुपारी तुड़वाकर बेचने तथा असामी गोविंदन् से किराए की वसूली के सारे काम माधव मामा करते आ रहे हैं। कुंजात्तोल का उन पर पूरा भरोसा है। एक पैसे का नुकसान नहीं करते। कभी-कभार कुंजात्तोल कुछ दे दें तो स्वीकार कर लेते।
नेंत्रन केले की खेती करने तथा मुख्तार की पूरी जिम्मेदारी सँभाल लेने पर भी माधव मामा को नास खरीदने के लिए एक कौड़ी तक नहीं दी जाती, इसकी मौसी को शिकायत है।

‘‘वह एक पुरुष है। सौ तरह के खर्चे होंगे।’’ अक्सर माँ कहती। झगड़ा खत्म हुआ कि नही, इसका पता लगाने के लिए उस ओर कान लगाया। नहीं। मां झगड़े के लिए कमर कसकर दालान में उतर चुकी है।
इल्लम् के परिसर में ढूँढ़ने पर जितनी चाहे झिल्ली मिल सकती हैं। एक उठाकर पंखा बनाकर क्यों न फेंक दिया जाए ?
नहीं। झगड़ा तब भी नहीं रुकता। दोनों के लिए कोई कारण नहीं चाहिए। अंत में जीत माँ की होती है। कारण, घर का खर्च वही उठाती है न ! आज पत्मु की पीठ पर भी झाड़ू और डंडा पड़ने को है। चाचा जब जीवित थे, तब झगड़े का आरंभ उनको लेकर होता था। मुश्किल से सामने के शरीर को ढकने वाला कछोटा बाँधे तथा अपनी सफेद दाढ़ी के रोओं पर हाथ फेरते एक मुनि के रूप में बैठा करते थे चाचा।

मौसी के द्वितीय पति थे। प्रथम पति कुंटुलि के कृष्णन् नायर थे। दो साल ही हुए थे कि छोड़ कर चले गए थे।
‘‘औरत को मर्द की इच्छावर्ती होकर जीना चाहिए’’-माँ का यह कथन मौसी को लक्ष्य करके था।
‘‘इच्छावर्ती बनने के लिए वैभवशालियों को अब भर-भरकर मिलता है न ? मेरा मुख न खुलवाना।’’-यह मौसी का कथन है पिताजी सब कुछ भानजों को दे रहे हैं, यही शिकायत है।
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1.    ब्राह्मण भवन को ‘इल्लम्’ कहते हैं।

उन दिनों कृष्णन नायर के पास पैसा नहीं था। हेमंतकाल में धान निकाल लेने पर खाली पड़ा कोई खेत बटाई पर लेते थे। सरसों की खेती करते थे। नदी किनारे की पुरमपोक जमीन (सरकारी जमीन) नीलामी पर लेकर वहाँ ककड़ी बोते थे। माँ उन्हें खूब मानती थी। बड़े स्नेही व्यक्ति थे। परमेश्वरन् दाऊ तब छोटा बच्चा थे। सबका विचार था कि सूजन से आक्रांत हो मरने वाला है। कोटुमुंड वाले वैद्य भी हार मान चुके थे। सूजन से पीड़ित दाऊ के शरीर में एक साँस भर अटकी हुई थी। सारे लोग मृत्यु की राह देख रहे थे। रातों-रात नदी पार पाँच मील दूर की एक ओझा स्त्री को कृष्णन नायर बुला लाए। निस्तेज नेत्रों वाली तथा चलने में असमर्थ वह स्त्री कहीं बाहर नहीं निकलती थी। पर आधी रात के पहले ही कृष्णन् नायर उसे किसी-न-किसी प्रकार घर ले आए। वह बेल-बूटियाँ माथे तथा छाती पर रगड़कर झाड़ने फूँकने लगी तो दाऊ ने नेत्र खोले।

रिश्ता तोड़ जाने के बाद उनके बारे में कुछ पता नहीं चला। इतना मालूम था कि यह इलाका छोड़ कहीं चले गए हैं। चाचा के अपने भानजे को अधिकार देकर घर में आ रहने के बाद एक दिन सुना कि कष्णन् नायर पलनी में व्यापार कर रहे हैं और बहन के नाम पाँच सौ रुपये आए हैं। मकर मास के पुष्योत्यव पर जाकर आए ओटन1 पुजारी ने सुनाया कि कृष्णन् नायर का खूब व्यापार चल रहा है और खूब पैसे कमा रहे हैं। पत्नी तथा बाल बच्चे हैं।
पाँच वर्ष पहले कृष्णन नायर गाँव में आए थे। परमेश्वरन् दाऊ के विवाह के चार पाँच दिन पहले। पिताजी घर पर थे। कपड़े खरीद लाने के लिए दाऊ तथा माधव मामा को कुन्नम्कुलम् गए अधिक देर नहीं हुई थी। नीली कमीज और रेशमी धोती पहने हुए एक आदमी द्वार पार कर आ रहा था।
कृष्णन् नायर।

तभी कृष्णन् नायर को देखा था। कानों में सफेद पत्थर जड़े कुंडल। गले में तथा बाएँ भुजदंड में सोने की चेन। उँगलियों पर अँगूठी। भुजदंड में मुरलीवादक श्रीकृष्ण के चित्र का गोदना। सारी हड़बड़ाहट माँ के चेहरे पर झलक रही थी। चाय नाश्ता तैयार करने की व्यग्रता।
पिताजी तथा कृष्णन् नायर परस्पर वार्तालाप में लगे रहे। बीच-बीच में दहलीज पर आकर माँ बातचीत में भाग लेती रही।
‘‘कहाँ हैं अप्पु नायर ?’’
‘‘थोड़ी देर पहले तो यहीं पर थे।’’
चाचा को बाड़ा पार कर उत्तरी घर की तरफ जाते हुए मात्र सेतु ने देखा। जाते समय कृष्णन् नायर ने माँ से पूछा, ‘‘कल्याणियम्मा कहां हैं ?’’
सेतु का विचार था कि मौसी नहीं आएगी। पत्मु को दूध पिलाती हुई कहीं भीतर
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1.    एक निम्न जाति।

 ही रहेगी।
पर पत्मु को उठाए, बाएँ कान पर पड़े सफेद बालों को सँभाले मौसी धीरे-धीरे माँ के पास आ पहुँची। सेतु ने मौसी को मुस्कान भरने की चेष्टा करते देखा।
‘‘आराम से तो हो न ?’’ सोने के नकली दाँतों को निपोरते हुए दरवाजे पर हाथ लगाए कृष्णन् नायर खड़े रहे।
मौसी ने शायद हामी भर दी थी। फीकी सी मुस्कान तब भी मौसी के चेहरे पर प्रतिबिंबित हो रही थी।
‘‘मैं कल जा रहा हूँ। जाने से पहले सभी से एक बार मिलने के विचार से निकला हूँ।’’
बहती नाक वाली पत्मु के हाथ में कृष्णन् नायर को कुछ रख देते हुए देखा। पाँच रुपये का नोट।
पिताजी से विदा लेकर बाहर निकलते समय सेतु की पीठ पर हाथ रखते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘किस कक्षा में पढ़ते हो ?’’
छठी में।’’

उनके दिए करारे पाँच रुपये के शुभ्र नोट की सुगंध आज भी स्मृति में है। कृष्णन् नायर के सीढ़ियाँ उतर जाने तक माँ तांबूल टटोलती रही। फिर बोली, ‘‘कितने ही धनी क्यों न हों, वे अपने पूर्व जीवन को नहीं भूले हैं। सहृदय हैं।’’
तभी उत्तर के बाड़े को पार कर अपने मोटे तोंदिल शरीर को खींचते घसीटते हाँफते हुए चाचाजी आते हुए दिखाई दिए।
‘‘यह सब कुछ भाग्य पर निर्भर है। अब देखा। मेरी छोटी बहन है, कहने से क्या होता है ! उसकी ऐंठ के कारण ही सब अनर्थ हुए।’’
यह सब सुनने पर भी अपराध बोध से सिर झुकाए खड़ी मौसी क्षुब्ध नहीं हुई। माँ की तरफ देखा भी नहीं।
पिता ने डाँटा, ‘‘चुप रहो, वे आ रहे हैं।’’
‘‘सेतु...!’’
मौसी की पुकार सुनाई पड़ी।

बरामदा शांत था। ऐसा लगा कि इस बार झगड़े में माँ की हार हुई है। मौसी दालान में टहल रही थी।
मौसी कोई रहस्य प्रकट करने के भाव से समीप आई।
‘‘तू आज डाकघर जा रहा है क्या ?’’
शायद ।’’
‘‘आते समय दो आने की नास लेते आना। तेरी मौसी के पास पैसे नहीं हैं।’’
सेतु से प्रार्थना की कि माँ यह न सुने। अन्यथा दूसरे झगड़े की शुरुआत हो जाएगी। औरतों का नास सूँघना बुरी आदत है। उसको देखते ही माँ आपे से बाहर हो जाती है।
‘‘दो आने मैं कहाँ से लाऊँ ?’’
मौसी से कुछ नहीं कहा।

बरामदे पर हथेलियों पर मुख रखे खड़ी मौसी ने आँगन की ओर लक्ष्य करके थूक दिया।
फाटक की तरफ देखते बैठते समय किन्हीं दो लोगों को खेत की मेड़ों पर चलते देखा। कौन होंगे इस समय ? सीढ़ियाँ चढ़ते ही एक झटके के साथ समझ जाता है। हरिदासन्। हे भगवान ! हरिदासन् को देखते ही बरामदे पर बिना चोली पहने अपनी नग्नता का प्रदर्शन किए लेटी मौसी पहले याद आई।
‘‘मौसी, कोई आ रहे हैं।’’
‘‘कौन हैं ?’’
‘‘मेरा सहपाठी तथा एक और व्यक्ति।’’
‘‘आने दो।’’

‘मौसी, जरा भीतर चली जाओ।’ ऐसा कहने की हिम्मत न पाकर कठिनाई का सामना करते हुए खड़ा हुआ था कि हरिदासन् आँगन में आ पहुँचा। जब यह ध्यान आया कि मैं मैला वस्त्र पहने हूँ, तो हँसना भी भूल गया।
‘‘सेतु, तुम्हारा घर ढूँढ़ पाने में बहुत कठिनाई हुई।’’
‘‘एक कार्ड नहीं डाल सकते थे ?’’
‘‘यह हैं चंद्रन दाऊ। चंद्रन् दाऊ और मैं मिलकर गोपी मेनोन के घर आए हैं। नजदीक समझकर इस ओर चढ़ आए।’’
बैठने को जगह नहीं। नीचे कुर्सियाँ नहीं।
हरिदासन् के सफेद पॉपलीन शर्ट से पसीने की दुर्गंध आ रही थी।
कमर पर हाथ रखे हरिदासन् अपना मस्तक झुकाए आँखों में मुस्कान भरकर बोल उठे, ‘‘मैं बोला नहीं था कि एक दिन एकाएक आ जाऊँगा ?’’

‘‘आओ, ऊपर चलेंगे।’’
बरामदे पर लेटी मौसी ने आवाज सुनकर सिर उठाकर देखा। फिर लेट गई। बरामदे के छोर पर ड्योढ़ी के ऊपर जाने के लिए वे सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। बाहर के बरामदे में आरामकुर्सी मोड़कर रखी हुई थी। भीतर पहुँचकर बोला, ‘‘बैठो।’’
मंद प्रकाश के कमरे में वे खाट पर बैठ गए। सूखे घास फूस भरे बरामदे में झाड़ू लगाने के बाद भी धूल तथा कागज के टुकड़े बिखरे पड़े थे।
झिझक-सी महसूस हुई।
चेरुमि1 तथा बढ़इन नाणी से माँ को बोलना चाहिए। इस दुर्ग जैसे घर को सँभालकर रखना क्या कोई आसान काम है ?
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1.    पलयन् जाति की स्त्री।

दुर्ग जैसा घर !
लोहे का फाटक खुलने पर दोनों ओर दीवारों पर रखे तसलों में फूलों वाले पौधे। आँगन में जूही का पौधा अपना जाल बिछाये हुए था। छोटा होने पर भी दास का खपरैल का मकान बहुत ही सुंदर था।
बरामदे पर गोलमेज के चारों ओर कुर्सियाँ। रंगीन सूत की पच्चीकारी की गई मेजपोश हरिदासन् ने माँ के सामने परिचय कराया। कंजी चढ़े सफेद वस्त्र। चौड़ी काली रेखाओं वाला दुपट्टा। हरिदासन् दीदी चाय लाई। थाली काटकर रखा रसाल।



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