मकड़ी का जाला - जगन्नाथ प्रसाद दास Makadi ka Jala - Hindi book by - Jagannath Prasad Das
लोगों की राय

कहानी संग्रह >> मकड़ी का जाला

मकड़ी का जाला

जगन्नाथ प्रसाद दास

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1990
पृष्ठ :204
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1241
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

178 पाठक हैं

प्रस्तुत है श्रेष्ठ कहानियों का संग्रह...

Makadi ka Jala

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इन कहानियों में मनुष्य लगभग एकाकी असहाय है संत्रास उत्कंठा और शून्यताबोध का शिकार है अपराध किए बगैर अपराधबोध से ग्रस्त हैं। चारों ओर विरूप संसार है। गंतव्य निश्चित है,पर यात्रा में आनन्द है न ही प्रकाश। जीवन विषर्ण्ण है। एक अर्थहीन सा समय अथवा नियति के हाथों निंरतर धराशायी होता रहता है। ऐसा नहीं कि मनुष्य अपनी नियति से जूझता नहीं जूझता है। लेकिन अंततः असहाय हो उसके साथ सहावस्थान करता है।

प्रस्तुति

भारतीय ज्ञानपीठ विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य मनीषियों और लेखकों की कृतियों के हिन्दी अनुवाद के प्रकाशन में विशेष रूप से सक्रिय है। प्रत्येक साहित्यक विधा के अग्रणी लेखकों की कृतियाँ या संकलनों को सुनियोजित ढंग से हिन्दी-जगत् को समर्पित करने का कार्य प्रगति पर है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत हाल ही में प्रकाशित पुस्तकों का जो स्वागत हुआ है उसके लिए हम साहित्य मर्मज्ञों और पाठकों के अत्यन्त आभारी हैं। इससे हमारी योजना को बल मिलता है और हमको प्रोत्साहन।

‘भारतीय कहानीकार’ श्रृंखला में उड़िया के प्रख्यात लेखक जगन्नाथ प्रसाद दास, (जिन्हें वर्षों से मैं आत्मीयता के कारण जे.पी. कहकर सम्बोधित करता हूँ) के कहानी-संग्रह के हिन्दी रूपान्तर का प्रकाशन हमारे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात है। सामाजिक इतिहासकार और कला-समीक्षक के साथ-साथ जे .पी. उड़िया भाषा के अग्रणी साहित्याकार हैं। उन्होंने साहित्य सृजन की प्रायः सभी विधाओं-कहानी, कविता, नाटक और लेख-में योगदान दिया है। उनके हिन्दी में अब तक 5 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पांचवां संकलन ‘‘लौटते समय’’ पिछले वर्ष ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया है। उसका हिन्दी जगत में बहुत ही अच्छा स्वागत हुआ है। कहानी-संग्रह भी उनके तीन प्रकाशित हो चुके हैं पर यह चौथा कहानी संग्रह जो अब हम प्रकाशित कर रहे हैं, उन सबसे भिन्न है। यह उनकी पूरी कथा यात्रा का वृतान्त है। प्रारम्भिक से लेकर नवीनतम कहानी तक इसमें सम्मिलित है और इसका चयन किया है उड़िया के प्रख्यात समीक्षक प्रो. दाशरथी दास ने। उनकी कथा इस कथा यात्रा में अंतर्निहित संवेदना, भावना और विचारों को बड़े सूक्ष्म रूप से उद्घघटित करती है। मैं प्रो. दासरथी दास का अत्यन्त आभारी हूं कि उन्होंने उड़िया के एक प्रतिभा सम्पन्न साहित्याकार की कहानियों को हिन्दी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने में हमें अमूल्य सहयोग दिया है। सच तो यह है कि बिना ऐसे साहित्य-मनीषियों की सहायता के विभिन्न भारतीय भाषाओं की सीमाएं तोड़ने का हमारा प्रयास विशेष सफल नहीं हो सकता।
सदा की भांति ज्ञानपीठ के मेरे सहयोगियों नेमिचन्द्र जैन, चक्रेश जैन और सुधा पाण्डेय ने इस पुस्तक के प्रकाशन में विशेष रूचि ली है; मैं उनका कृतज्ञ हूं। सुरूचिपूर्ण साज-सज्जा के लिए पुष्पकणा मुखर्जी सुन्दर मुद्रण के लिए अंबुज जैन का आभार मानता हूं।

भूमिका

जगन्ननाथ दास (जे.पी.) की कहानियां स्वयंभू नहीं हैं। उनके पीछे एक समृद्ध लंबी परंपरा है। आज से 92 वर्ष पहले ‘उत्कल साहित्य’ पत्रिका के द्वितीय वर्ष के सातवें अंक में ओड़िया गद्य साहित्य के जनक फकीर मोहन को अपनी परिपक्क प्रतिभा लिए एक कहानी लिखी थी। यह ओड़िया भाषा की पहली कहानी थी। जो यथार्थ है। उन्नीसवीं शताब्दी के युग मानस ने अपने भाव सत्य को जन्म दिया था, मासिक पत्रिका ने उनकी काया का निर्माण किया । उस दिन का वह नया आगंतुक आज भी सृजन कर रहा है। जे. पी. उसी सृजन शीलता के अन्यतम परिणत प्रकाश हैं। उनका ओड़िया कथा-संग्रह ‘भवनाथ ओ अन्यमाने’’ 1982 में प्रकाशित हुआ। 1898 से 1982 जन्म से परिणति के बीच लम्बा अन्तराल है। इसमें आधुनिकता आई है अनेक छोटी- बड़ी तरंगों को कोई भी युगान्तर कह सकता है, पर तरंग भंग का विराम नहीं है। कहानियों की गति और दिशा निरंतर बदली है। फकीर मोहन ने जिस आदमी को रोज़मर्रा की प्रत्यक्ष तथा वास्तविक ग्रामीण पृष्ठभूमि में देखा है, वह आदमी लगभग पूरी तरह समाज से बंधा हुआ है। लेकिन जे.पी. का आदमी समाज के प्रति महज जागरुक ही नहीं, पूरी तरह आत्म सचेत भी है। उनकी समस्या समाज-नीति की समस्या नहीं है, उनकी समस्या है व्यक्तित्व की- अस्तित्व की-समाज पीछे खिसक गया है। यह कहा जा सकता है कि सामाजिक पृष्ठभूमि में व्यक्ति की समस्या नहीं है।

 जे.पी. मनुष्य के विचारक भी नहीं, हैं वे एक अनुग्र सहानभूतिशील गवाह मात्र हैं कहानियां भी घटना प्रधान नहीं है, प्लाट (plot) प्रधान या थीम् (theme) प्रधान है। ओड़िया कहानियों की धारावाहिकता और परिवर्तनशीलता एक-दूसरे का हाथ थाम कर चलते हुए लम्बी यात्रा के बाद आज यहां पहुंचती हैं। छायावादी भावुक कहानियां और प्रगतिशील सामाजिक यथार्थवादी कहानियां न जाने कितने पीछे छूट गयी हैं। फ्रॅयडीय तत्व और मार्क्सवादी सामाजिक विचारधारा का प्रभाव कब का धूमिल पड़ चुका है। स्वाधीनता प्राप्ति के तुरन्त बाद ओड़िया कहानियां विश्व कथा-साहित्य से पहले कहीं ज्यादा घनिष्ठ हो उठी हैं। अनेक विद्वानों विदग्ध कथाकारों ने एक के बाद एक कथा-साहित्य को समृद्ध किया है। गोपीनाथ महांति, सुरेन्द महांति, राजकिशोर राय और राजकिशोर पटनायक के साथ किशोर चरणदास, महापात्र नीलमणि साहू और अखिल मोहन पटनायक आदि शामिल हुए इनके बाद आए शांतुन कुमार आचार्य और मनोज दास। जे.पी. इन्हीं के समसामायिक हैं। लेकिन इन्होंने कहानियां लिखी काफी बाद। इसीलिए जहां दूसरों को आधुनिकता अपनानी पड़ी ये शुरू से ही आधुनिक रहे।

सभ्यता का विकास हर जगह एक जैसा नहीं हुआ। इसलिए साहित्य में आधुनिकता हर जगह एक साथ नहीं आयी है। पाश्चात्य साहित्य में 30-40 साल पहले जो कुछ घटित हो चुका है भारतीय साहित्य में उन सबकी शुरूआत अभी कुछ ही समय पहले हुई है जो कुछ वहां अब घटित हो रहा है, वह यहां आएगा कुछ समय बाद। कुछ पीछे रहकर पाश्चात्य साहित्य का अनुशरण करना ही आधुनिक भारतीय साहित्य की क़िस्मत है। द्वितीय विश्व युद्ध के कुछ समय पहले वहां अस्तित्ववादी साहित्य आन्दोलन की शुरूआत होती है। पाश्चात्य कवि नाटककार और कथाकार क्रमशः अस्तित्ववादी चेतना को पैनी कर लेते हैं। वह पैनापन तत्कालीन वातावरण की विशेषता में आना असम्भव नहीं। नृशंस हत्या, कल्पनातीत बर्बरता और परमाणु विस्फोट लिए उन दिनों दोनों देश-काल अंतः सत्वा हो उठे थे। स्वाधीनता के बाद भारत उसी तरह एक अन्धे युग में पहुंचा है। इसीलिए उसने एक ही तरह की भाव-वेदना का अहसास किया है। स्वाधीनता का मोहभंग, शिक्षित मध्य वर्गों का आशा-भंग और निराशा, दंगा, नृशंस नरहत्या, साहित्यकारों में अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक ही है। वास्तव में हम लोग भी उन दिनों के पाश्चात्यवासियों की तरह एक बीमार दुनिया में जा पड़े हैं, जो दुनिया न ईश्वर की है न मनुष्य की। ऐसे में जब हमारा स्पर्शकातर कथाकार अस्तित्वादी दर्शन की उपलब्धियों में अपनी अंतरदृष्टि पैनी कर लेते हैं और जीवन बोध को समृद्ध करके गढ़ते हैं, तब उनके पाश्चात्यानुसरण को दोष नहीं दिया जा सकता। अस्तित्ववाद भी दर्शन प्रस्थान मात्र नहीं है, वह एक विशेष जीवन बोध है। जे. पी. शुरू से इस जीवनबोध से दीक्षित हो ओड़िया साहित्य के क्षेत्र में आए हैं। इसलिए उनकी आधुनिकता ओड़िया में सीमाबद्ध कोई अलग आधुनिकता नहीं है, वह विश्व कथा-साहित्य का अविभाज्य अंग है।

इसलिए जे.पी. की कहानियों में रोमांटिक सहानुभूति की भावुकता नहीं है, सामंतवाद के अवशेषों की करूणा नहीं है, सामाजिक संकट महत्वहीन है। पर उनकी कहानियों में सामाजिक अभिशाप नहीं है, कहना ग़लत होता है। बल्कि उसमें नारी संबंधी सामाजिक समस्याओं के प्रति पैनी नज़र है, समकालीन सामाजिक संकट और समाज से जुड़ी जीवन भावना साफ़-साफ़ दिखाई देती है। यहां तक कि राजनीतिक परिस्थिति के विषय में जागरूकता स्पष्ट है। उनकी कहानियां पीड़ा की उपज हैं। लेकिन सामाजिक अभिप्राय कहीं भी हावी नहीं लगता। अक्सर उनकी कहानियां निश्चित देश-काल को लांघ मानवीय स्थिति के मौलिक संकट को सामाने लाना चाहती हैं, मानव अस्तित्व की किसी न किसी जिज्ञासा के रू-ब-रू होने को बेचैन है। ऐसा नहीं है कि अस्तित्ववादी साहित्य आन्दोलन का थीम् किसी दूसरे ओड़िया कथाकार ने नहीं किया है, लिया है। सुगठित अस्तित्ववादी दर्शन का प्रयोग न करने पर भी किशोर चरण दास, सांतनु कुमार आचार्य और मनोज दास की कहानियों में इसका स्पष्ट प्रयोग देखा जा सकता है। शून्यताबोध, मोहभंग, नित्य उत्कंठा(angst) और संत्रास तथा अलगाव-बोध की अचरितार्थता का इन लोगों ने भी उपयोग किया है। उनकी विधा और निपुणता सर्वस्वीकृत है। उन लोगों को यहाँ तक पहुंचने में काफी लंबा रास्ता तय करना पड़ा है; लेकिन जे.पी. इसी जगह से सीधे निकले हैं। शुरू के जीवन को एक दुःसाहसिक अभियान के तौर पर अपनाया है। सेकेंडहैंड जीवन यात्रा को छोड़कर ऑथेंटिक (यथार्थ) सत्ता लेकर खड़े होने के लिए पात्रों को प्रोत्साहित किया है। इसके अलावा बोझहीन, सूक्ष्म, सरस, विदग्धतापूर्ण, जो फ्रांसीसी साहित्य-सुलभ सुकुमार संवेदनशीलता उनकी कहानियों में अनायास मिलती है, वह अन्यत्र कम ही दिखाई देती है।

जे. पी. सन् 1971 में पहली बार ओड़िया साहित्य में आए। हाथ में था ‘प्रथम पुरूषः’ कविता-संग्रह। उस समय तक सच्चिदानंद और गुरू प्रसाद ओड़िया कविता में नई परंपरा स्थापित कर चुके थे। रमाकांत और सीताकांत अपनी-अपनी दिशा और गति पा चुके थे। कवि गुरू इलियट के प्रभाव से रूचि और चेतना में विशाल परिवर्तन हो चुका था। आवेगमयता का स्थान तीक्ष्ण मनन ग्रहण कर चुका था। प्रत्यय को तोड़ चुका था संशय और अविश्वास। नई आवेगानुभूति के दबाव से शब्दों की प्रचलित विन्यास-मुद्राएं भी ढह चुकी थीं। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ‘प्रथम पुरूष’ सामने आया। जिस वक़्त जे. पी. की साहित्यिक संभावना के प्रति सभी हर तरह से उम्मीद छोड़ चुके थे, उस वक़्त वे आत्मा निर्वासन से बस लौटे ही थे’ महज तैयारी और वायदा लिये नहीं। काफी हद तक सिद्धि और संकल्प लिए। अतः उनके लिए पहली पंक्ति मैं जगह छोड़नी पड़ी। आधुनिक कविता का ‘मैं’ ही यह प्रथम पुरूष (फस्ट मैन नहीं फस्ट पर्सन) है। इस मैं को पहचाने बिना जे. पी. को नहीं पहचाना जा सकता । कविता हमेशा से अहं भरी और मैं-पने से स्फीत थी। लेकिन यह ‘मैं’ अभी हाल ही तक था वोलटारियन मैं (voltaireenl) –स्वयंसिद्ध काव्य नायक विपन्न विश्रृंखला, कुरूप जगत् में अन्तर्दृष्टि संपन्न एकमात्र साधु पुरूष। सबसे ऊपर हैं वह। खुद को निष्पाप मृग समझता है, और राष्ट्र तथा समाज व्यवस्था को भयानक व्याघ्र मानकर अभिशाप देता है, व्याघ्र की मृत्यु से सारे संकट दूर हो जाएंगे ।

कवि इलियट ने इस मैं का चरित्र बदल दिया उसकी आत्मचेतना ने खुद पर भी विचार किया, श्लेष चक्र आत्म समीक्षा से विचलित हुआ, ‘‘No I am not Prince Hamlet nor was meant to be.’’ प्रुफ्रॅक की यह आत्म भावना आधुनिक मैं की ही आत्मकथा है। जे.पी. को यहीं से प्रेरणा मिलना असंभव नहीं है। प्रथम पुरूष शुरु से ही Modern। है। वह वक्ता नहीं ना ही त्राता है, और न ही अस्वीकृत विधान निर्माता । वह आत्म चेता मनुष्य मात्र है। वह खुद को अपनी चैतन्य अग्नि के तपाने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता। रोमांटिक कविता का मैं काव्य का नायक है। किंतु यह प्रथम पुरुष नायक मात्र नहीं, खलनायक भी है। निष्पाप मृग स्वयं ही भयानक व्याघ्र है। और मज़े की बात यह कि वही असंगत जीवन-नाट्य का सूत्रधार है, वही विदूषक है। उसके सिवाय और कोई नहीं। अद्भुत पात्र है वह-हँसता है और अपनी हँसी उड़वाता है। व्यक्तिगत जीवन में जे.पी. एक कुशल प्रशासक रहे होंगे, एक मेधावी शोधार्थी या प्रतिभावान चित्रकार व साहित्यकार; लेकिन उनकी कविसत्ता अक्षम असहाय है ‘साम्राज्य’ कहानी के रघुपति की तरह विकृत जगत् में पूर्णतः कर्तृवत्व हीन। उस साम्राज्य में वे निष्फल अनुग्रह मांग सकते हैं, पर किसी तरह के अधिकार का दावा नहीं कर सकते। इस मानवीय स्थिति को वे हृदयंगम कर सकते हैं, यही है उनका दुर्लभ बाल और काल, साथ ही शक्ति और दुर्भाग्य भी। इसीलिए अचरितार्थता और अक्षमता लिए वे खुद को कम नहीं उलझाते। आत्म व्यंग्य उनका कवि कर्म है। यह नहीं कि वे सपना नहीं देखते, देखते हैं, लेकिन सपने के अंत में चिरस्थायी धूसरता को ही अपनाते हैं, ‘‘शाम की मृत्यु इच्छा बन जाती है। सुबह के जीने का मोह।’’ (प्रेम एक ऋतु)। बेचारे समय के प्रति बड़े ही सचेत हैं। और उनका समय ही बेहद सीमाबद्ध है। प्रथम पुरूष तब था।

द्विधाग्रस्त आधुनिक मनुष्य का सूचना समाप्तिहीन आत्मकथन। उसमें अर्ध विराम, पूर्ण विराम का अस्तित्व नहीं है। संभवतः जे.पी. अपोलोनियर की भांति कविता में विराम चिह्न थोपना नहीं चाहते । हालांकि जे.पी. का समग्र साहित्य उन्हीं विरामहीन आत्मकथनों का संप्रसारण (विस्तार) मात्र है। हर जगह वही व्याकुल आत्मसंधान-प्रेम और समय का द्वंद्ध मूल्याकंन। वास्तव में उनके समग्र साहित्य सृजन में एकमात्र पात्र है वही प्रथम पुरूष। नाटक में वह दीपंकार है, कहानियों में भवनाथ और अन्य लोग। और जीवन में ? ‘‘हम सभी वही एक ही मनुष्य’’ (दर्पण) हमारी बातें उसी की बात की प्रतिध्वनि हैं। जीवन एक मुखौटाधारी नाटक है-जहाँ एक पात्र अलग-अलग समय में अलग-अलग मुखौटा पहने अलग-अलग भूमिका मात्र निभाता है। जिस तरह जे.पी. कवि, नाटककार और कथाकार हैं। कवि जे.पी., नाटककार जे.पी. और कथाकार जे.पी. आदि विभाग स्वीकार्य होने पर भी अंत तक एक दूसरे से जुड़े हुए, उद्दीपक और परिपूरक हैं। हालांकि एक साथ कवि, नाटककार और कथाकार होना मुश्किल है। यदि कोई कवि और कथाकार दोनों हो तो उसकी एक दिशा समृद्ध और दूसरी दिशा कमजोर पड़ जाने की आशंका को नजरोन्दाज नहीं किया जा सकता।

एक साथ तीनों को होना शायद अच्छा नहीं होता। लेकिन सृजनशीलता के क्षेत्र में कोई नियम न होना ही नियम है। इसीलिए जे.पी. अच्छे कवि होते हुए भी प्रतिभा संपन्न नाटककार हैं। अच्छे नाटककार होते हुए भी कहानी के महत्वपूर्ण शिल्पी हैं। विद्या, साहित्यिक अंतर्दृष्टि, विश्लेषणात्मक बुद्धि, सरस सृजनशील प्रतिभा और सूक्ष्म कोमल मानवीय संवेदना के लिए तीनों सारस्वत क्षेत्र में उन्होंने समान रूप से क़दम रखा है। वस्तुगत अनुभव के क्षेत्र में इन सबकी विचरण भूमि अलग-अलग होते हुए भी एक अखंड सत्ता का प्रतिरूप बन गए हैं। रूप अलग-लेकिन अभिप्राय एकः अद्भुत जीवन का रूपायन। जे.पी. जानते हैं, रूप अलग-अलग लेकिन अभिशाप एकः अद्भुत जीवन का रूपायन। जे. पी. जानते हैं, किसी भी शिल्प की तरह साहित्यिक शिल्प भी जीवन के स्वरूप को बदल नहीं सकता, शून्यता के रेगिस्तान में कोई निश्चित आश्रय नहीं दे सकता। उसका केवल एक ही काम है अद्भुत अस्तित्व का वाणी रूपायन। इसलिए वे हर जगह जाग्रत हैं एक निर्मोही दृष्टि लिए जीवन को देखते हैं और यथासंभव चमत्कार रूप से भाषा-शिल्प में रूपायित करते हैं। संभवतः जीवन की विसंगतियों और अर्थहीनता के विरुद्ध सभी सहित्यकारों की यही एक विद्रोह-मुद्रा है। जे.पी. के नाटक असंगत जीवन को दिखाते हैं। जे.पी. के तीन नाटक और एक एकांकी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ये हैं सूर्यास्त (1977) सबसे नीचे का आदमी (1980) और असंगत नाटक (1981) तथा पूर्वराग (1983) एकांकी-संग्रह। उसमें मनन नहीं, सबकुछ प्रदर्शन है। कविता की जीवन चिंता होती है नाटक का जीवन दर्शन। और कहानियों में ? कहानियों में वही खास जीवन चिंता भूगोल पर आधारित समसामयिक इतिहास में समाए रहकर सामाजिक हालात में अपनी समानता तलाश लेता है। कविता में जो होता है निर्विशेष सत्य, कहानियों में वह होती है स्पेसिफिक् बात। हालाँकि जे.पी. की कहानियों का भूगोल और सांप्रतिक इतिहास ओड़िशा तक ही सीमित नहीं है, ओड़िशा से बाहर के चित्र और पात्र उनमें भरे पड़े हैं। लेकिन इससे कविता और कहानियों की सत्ता विनिमय के क्षेत्र में कोई बाधा पैदा नहीं होती। दोनों में मनुष्य जीवन ही है, क्यों न वह किसी भी भूखंड का हो। कविता की परिभाषा और उसका स्वरूप क्या है ? सांसारिक घटनाओं की चहल-पहल से स्थानीय तथा सामयिक परिवर्तनशील देहमय अंश झड़ जाने पर जो भाव, स्वर और कंपन बचा रह जाता है, क्या वही नहीं है कविता ? ‘शब्द भेद’ कहानी का कवि भवनाथ समझा देता है यही बात-कहानी से निकाल लीजिए सभी पात्रों को, मुक्त कर दीजिए उसे सारे संवादों और भावुकता से, अब जो कुछ बचा रह जाएगा, वही तो है कविता। ‘‘थोड़ा दुःख, थोड़ा अंतर्दाह, और समझ।’

’ कविता पात्र, घटना, संवाद निरपेक्ष एक सार्वभौम सत्य है। और कहानी उसी सत्य के विशेष स्थान काल निर्भर पात्र घटना संवाद से जुड़ी भाष्य मात्र। इसलिए जे.पी की कविताएं और कहानियां आसानी से काया पलट लेती हैं। किसी-किसी साक्षात्कार। ‘दिनचर्या’ कविता के चरित्र, घटना, संवाद में सजा देने पर दिनचर्या कहानी बन जाएगी, और कहानी से देश-काल निर्भर घटनाएं निचोड़कर सत निकाल लेने पर कविता झांकने लगेगी: ‘‘स्वर्णाभ स्वप्न के पीछे। निश्चित क्रम में दौड़ते। प्रात्यहिक त्यौहारों को। समय ले जाकर सजाकर रख देता है, सफ़ेद बिस्तर पर। एक और अवधि तक।’’ इसमें और कुछ अच्छा लगेगा कैसे ? ठीक उसी तरह ‘घर’ कहानी को घटना, चरित्र और भावुकता से मुक्त कर देने पर अंत में कविता बची रहेगी: ‘‘इस तरह घर। कैसे किसी को पकड़े रख सकता है। जिसका अन्दर और बाहर सब शून्य है।’’ (गृह प्रवेश) इसका उल्टा भी ग़लत नहीं होगा। पर जे. पी. की कविता और कहानी के पात्रों व उपलब्धियों में कुछ अंतर है। अब तक प्रकाशित पाँच कविता संग्रह: प्रथम पुरूष (1971), अन्य सबु मृत्यु (1976), जे जाहार निर्जनता (1979), अन्य देश भिन्न समय (1982) और यात्रा का प्रथम पाद (1987)। काव्य वृत्त जटिल अवश्य है। पर उसके तीन प्रमुख स्वर पहचान में आते हैं: प्रेम, समय और स्मृति। लेकिन प्रेम की परिभाषा से समय को समझना पड़ता है, ‘‘प्रेम की अवर्तमानता में । जो कुछ बीत जाता है। उसका नाम है समय।’’ एक ओर एक सफल प्रेम होता है संपूर्ण जीवन और दूसरी ओर प्रत्येक असफल प्रेम एक-एक मृत्यु। प्रेम और समय का निरंतर द्वंद्ध और मूल्यांकन जे.पी. की कविता की सर्वधारी प्रेरणा है। इसीलिए एक बेचैनी भरी तलाश हर जगह दिखाई देती है। आवेगानुभूति के जहां से जे.पी. ने यात्रा शुरू की थी आज वे वहां से काफी दूर निकल आए हैं। अब प्रेम में ताज़गी भरे जीवन की चरितार्थता देखते हैं। ‘‘यहां कोई तथ्य। प्रासंगिक नहीं। तुम्हारी सामयिक कामना के सिवाय।’’ (चरम सत्य)। लेकिन कहानियों में प्रेम की कृतार्थता नहीं के बराबर है। (जो तिकोना प्यार कहानी में ऊष्म उत्तेजना उत्पन्न करता है, वह बिल्कुल नहीं है।) व्यर्थता से सामयिक चरितार्थता में और सामयिक चरितार्थता से व्यर्थता की आवाजाही है कविता में। लेकिन कहानियों में व्यर्थता की तस्वीर गहरे रूप में है।

वास्तविकता अमोघ है। आवेग कठोर रूप से नियंत्रित है। आवेगहीनता मनन प्रधान जीवन विश्लेषण की शेष कथा है। पर उसमें एक विशेष मात्रा में काल्पनिकता है, जोकि कविताओं में नहीं है। आधुनिक साहित्य से परिचित यथार्थ जब असह्य और अटपटा लगने लगता है, तब कथाकार इस कल्पना शाक्ति का सहारा लेता है। जे.पी. के ‘सबा शेष लोक’ नाटक में यही विचार सहज ही दिखाई देता है। जिस समाज में नारी रखैल है। कलाकार, नौकर और साहित्यकार जहां अनुग्रह चाहते हैं, वहां छुटकारा कहाँ। इसलिए नाटककार ने इसी कल्पना के बल पर जीवन से समझौता किया है। वास्तविकता का मज़ाक उड़ाया है, ‘‘श्याम आएगा, सारी दुर्दशा खत्म हो जाएंगी।’’ यह एक तरह की रूमानी भावुकता है या इच्छापूर्ति का मामला। कहानियों में इसी इच्छापूर्ति की कल्पना सक्रिय है-यहां तक कि एक कहानी का नाम भी है ‘इच्छा पूर्ति’ (इस संग्रह में संग्रहीत नहीं)। पात्र विरूप व्यक्ति है, विश्व और वस्तुओं को अपने मनचाहे स्थान पर रखकर काल्पनिक मनोरंजन का उपभोग करते हैं, कठिन वास्तविकता से फंतासी अथवा रूपकथा सुलभ समझौता कर लेते हैं। इससे हालांकि वास्तविकता पिघलती नहीं, पात्रों की अक्षमता और असहायता साफ़ तौर पर महज़ प्रमाणित होती है। इसीलिए कहना चाहिए, जे. पी. की कहानियों में जीवन का क्षय और अचरितार्थता अधिक है। कविताओं की तुलना में। इसलिए-कहानी जगत् अपेक्षाकृत अधिक आशाहीन और प्रकाशहीन है। हालांकि नाटकों में सामाजिक विसंगतियों से छुटकारा पाने की संभावना शायद है, लेकिन कहानियों की मानवीय दुःस्थिति दूर नहीं की जा सकती।

जे.पी. के चार कहानी-संग्रह ओड़िशा में प्रकाशित हो चुके हैं: भवनाथ व अन्य माने (1982), दिनचर्या (1983), आमे जेउँमाने (1986) और साक्षात्कार (1987), भावुकता वर्जन और आवेगानुभूति का कठिन नियंत्रण तथा निर्मोह मनन प्रधान जीवन विश्लेषण जे.पी. की कहानियों का विलक्षण है। उनका वस्तुज्ञान प्रखर है। आविष्कार क्षमता भी प्रबल है। परंतु उनकी उपलब्धियों की सीमा है। जिस भद्र शिक्षित मध्यवर्गीय स्तर में वे रहते हैं, जिस स्तर की जीवन-यात्रा और पात्रों से उनका परिचय है, उससे बाहर प्रायः वे नहीं जाते। वे खासकर समकाल से निश्चित रूप से पीड़ित हैं। कहानियों में अपने समय का पाठोद्धार करना चाहते हैं। इसलिए शहर केंद्रित शिक्षित मध्यवित्त जीवन कहानियों की भूमिका बनाता है। इसी जीवन में समाजिक और पारिवारिक संतुलन अचल है; हर व्यक्ति आत्मकेंद्रित, सुख प्रिय, स्वार्थी और समृद्धकामी है। नैतिक अधोपतन चरम सीमा पर है। आदमी से आदमी की दूरी कठोर है। इसलिए व्यक्ति विच्छिन्नताबोध और एकाकीत्व से पीड़ित है। अतः उसे अक्सर संत्रास, उद्वेग, और शून्यता बोध में जीना पड़ता है।

पुराने मूल्यबोध और शुभबुद्धि विध्वस्त, पर कोई नया मानसिक आश्रय नहीं पनपा है। जे.पी. भी क़ाफी समाज सचेत हैं। इसलिए उनकी कहानियों में इस मध्यवित्त समाज के बुद्धिजीवी नागरिकों की आत्मकेंद्रिकता से लेकर चरित्रहीनता तक सारी नीचताओं का निर्मम विश्लेषण है। वे केवल समकालीनता से कभी नहीं बँधे। मध्यवित्त का क्रमशः क्षय होना, मनस्तात्विक जटिलता और भीतरी विकारों के बीच वे मनुष्य की विच्छिन्नता और पात्र नियति की दुर्ज्ञेयता देखते हैं। जीवन का रहस्य, जटिलता, दूर करना उसका लक्ष्य है, जीवन का अर्थ तलाशना कहानी का कार्य; समाज विश्लेषण उप-लक्ष्य भर है। इसीलिए वे आधुनिक कथा-साहित्य की डिटेक्शन (Detection) पद्धति का सहारा लेते हैं। जीवन के सत्यान्वेषण में इस नई पद्धति की चारितार्थता है। सूक्ष्म अंतर्दृष्टि और पैना पर्यवेक्षण उनका आधार है। क्या है इस जीवन का स्वरूप ? सत्य ? जीवन एक गतिशील प्रवाह है, जिसके तट पर बैठे वे अपनी कहानी की नायिका शर्बरी की तरह मनुष्य के प्रवाह के साथ असहाय अर्थहीन-सा बहते देख रहे हैं। वे चुपचाप देख रहे हैं और निर्मोही-से दिखा रहे हैं। महत कलादृष्टि दिखनेवाले वस्तु का संस्कार नहीं करती, इस तरह दिखाती भर है। जे.पी. की कहानियों में जब जीवन संशय, निराशा, विक्षोम से अस्थिर हो उठता है; विच्छिन्नताबोध निस्संगता और शंकातुरता से अधीर हो जाता है; तो उसके लिए कहानीकार ज़िम्मेदार नहीं है, खुद जीवन ही ज़िम्मेदार है। जीवन जैसा होना चाहिए वैसा होने का अधिकार उसे अवश्य है। जे.पी. हस्तपेक्ष नहीं करते है। सिर्फ़ देखते हैं और आवेगहीन हो विश्लेषण करके दिखातें है; मानो किसी में भी चौंकाने जैसी कोई बात नहीं।

जे.पी. की कहानियों का मनुष्य लगभग एकाकी असहाय है; संत्रास, उत्कंठा और शून्यताबोध का शिकार है, अपराध किए बगै़र अपराधबोध का त्रस्त है। चारों ओर विरूप संसार है। गंतव्य निश्चित है, पर यात्रा में न आनन्द है न ही प्रकाश। जीवन विषर्ण्ण है। वह अर्थहीन-सा समय अथवा नियति के हाथों निरंतर धराशायी होता रहता है। ऐसा नहीं कि मनुष्य अपनी नियति से जूझता नहीं, जूझता है। लेकिन अंततः असहाय हो उसके साथ सहावस्थान करता है। नियति अलंघ्य है। परन्तु इस नियति का निवास न तो देश में है और न ही समाज में, नैतिकता में भी नहीं। उसका निवास मनुष्य के अस्तित्व में है। मनुष्य का अस्तित्व महज़ जटिल अथवा दुर्बोध्य नहीं, बेहद स्वार्थी भी है। काफ़ी भोग-सुख पसंद। इसी स्वार्थीपन के कारण मनुष्य सत्य, सौंदर्य और मानवीयता को सहन नहीं कर पाता है। अस्तित्व का मूल्य चुकाने के लिए वह स्वाभाविक रूप से प्रवंचनामय पात्र में बदल जाता है। कर्फ्यू, चरित्र और आपात्काल आदि कहानियों में ऐसे पात्र अनायस ही दिखाई देते हैं। ‘चरित्र’ कहानी में प्रमोद की राय याद रखने योग्य है। उसने उस लड़की के अच्छे स्वभाव को याद किया, लेकिन फिर अपनी बात में सुधार करते हुए बोला, ‘‘जिसका चरित्र ही ठीक नहीं, भला उसका स्वभाव अच्छा कैसे होगा ?’’ इस तरह जे.पी. कहानियों के अंत में एक-एक वाक्य में साधारण-सी बात को असाधारणत्व प्रदान करते हैं।

क्या यह मनुष्य की अपने स्वभाव के बारे में व्यक्तिगत राय नहीं है ? आत्म व्यंग्य नहीं है ? ‘चरित्र’ नामकरण में निहित व्यंग्य क्या किसी को समझाना होगा ? केवल व्यापार-व्यवसाय के क्षेत्र में ही नहीं, फ्रंटियर सोसायटी में प्रेम, साहित्य और सामाजिक तथा परिवारिक संबंधों में इस स्वार्थीपन का कठिन उपद्रव दुर्लक्ष्य नहीं। इसलिए जे.पी के पात्र बिल्कुल शर्मीले यह मुँह चोर नहीं है, बल्कि अशुभ अनुदार कुत्सित कोलाहल भरे माहौल में किस तरह जीना पड़ता है, यह वे लोग जानते हैं। जे.पी. भी उन्हें अपनी राह पर छोड़ देते है। वास्तव में पात्र सृजन में उनकी सत्यनिष्ठा आश्चर्यजनक है। कहानी की स्वतःस्फूर्त गतिशीलता बनी रहती है। जबकि सभी पात्र अपने-अपने संवाद और आचार-आचरण में खुद को गढते हैं। जे.पी. इतिहास लेखक की तरह राग द्वेष विवर्जित हो ठीक-ठीक विवरण भर देते चलते हैं। इसीलिए उनकी कहानियों में विवरण और विश्लेषण ने प्रधान भूमिका अपनायी है। जो कुछ घटनाओं या संवाद के ज़रिये प्रकट करना चाहिए, वह विवरण के ज़रिये प्रकट हुआ है। कहानी लेखन में निश्चित ही यह एक अपराध है। लेकिन इन दिनों देश-विदेश के अनेक अच्छे साहित्यकारों ने इसी रीति का दामन थाम रखा है। पाठकों का प्रत्यक्ष संबंध वे तोड़ते हैं। घटनाएँ घटेंगी नेपथ्य में, विवरणों में कहानी का खुलासा होगा। कहानी तो कहानी मात्र है–सच नहीं, यह चेतना पाठकों के मन में पैदा करनी होगी; ताकि वह उसमें डूब (involved) न जाए। जे.पी. इस रीति को स्वीकार करते हैं। किंतु इस रीति को स्वीकार करने की कोई कोशिश उनकी कहानियों में नहीं है। सबकुछ स्वाभाविक स्वच्छंद है। सफल सृष्टि-कार्य का एक अन्य अभिज्ञान है यही अनायास निपुणता। कृतिकार के सचेतन मन में कृति के उपादान उपकरण समेटे और संजोये होंगे, लेकिन उस सचेतन प्रयास का कोई चिह्न कृति में दिखाई नहीं देगा। कृति होगी इस तरह सहज। अर्जित करेगी आनायास दक्षता। कहानियाँ परिकल्पित अवश्य हैं। लेकिन कोई कहानी शुरू से अंत तक परिकल्पना के अनुसार नहीं बढ़ी है। किसी कहानी में कोई परिणामगत सिद्धांत भी नहीं है। कोई पात्र हालांकि आदर्श स्थापित नहीं करता, फिर भी अधिकतर कहानी विन्यास-कौशल के कारण पाठकों की सहानुभूति पाते हैं।

निर्वेद, निस्संगता और विच्छिन्नताबोध तथा उससे उपजा विषाद अस्तित्व के साथ पनपे हैं। आधुनिक युग में संस्थाएँ अतिकाय हो उठने के कारण निर्वेद और निस्संगता बढ़ी है। भीड़ जितनी है, मनुष्य उतना ही कटा-कटा है। इसलिए आधुनिक मनुष्य अलग-थलग पड़ गया है। बड़ा ही निस्संग। इस एकाकीपन की तस्वीर को निकालकर आधुनिक साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। जे.पी. की कहानियों में मनुष्य इसी एकाकीपन का समाना करता है। इसी व्याधि से गृहस्थ जीवन तक पीड़ित है। घर, बंधन को सहोदर कहानियों में तीनों शब्द हर तरह से तात्पर्यहीन हैं। पति-पत्नी, पुत्र-कन्या, भाई-भाई के बीच सारे संबंध संबंधहीनता के संबंध हैं। सबमें संबंधहीनता का हाहाकार है। मनुष्य मनुष्य का चेहरा देखकर अब खुश नहीं होता। इसके अलावा परिवार का प्रत्येक सदस्य आत्मकेंद्रित जीवन के संकीर्ण वृत्त में इस तरह चक्कर काट रहा है, अपने समस्यापूर्ण अस्तित्व की निस्संगतम पीड़ा से इस तरह तड़प रहा है कि एक दूसरे के लिए बाहर से ज़रा भी उद्वेग का अहसास नहीं करता; वहाँ अंतरंग संबंध बनाना या सक्रिय हितसाधन का प्रयोग करना कहाँ संभव है ? इन दिनों अनेक भारतीय विदेश जाकर वहाँ बस जाते हैं। केवल टेलीग्राम पाकर मृत्यु यात्री रिश्तेदार को देखने भर आते हैं, पर मन लौट जाने को व्याकुल रहता है।

आरामपसंद सुबोध किस दुःख से गांव की ज़मीन पर पड़ा रहेगा ? और फिर रहना चाहता ही कौन है ? ‘सहोदर’ कहानी के सहोदर इकट्ठे बैठ नहीं पाते, बेसब्र हो जाते हैं अंत में ठीक से फ़ोटो खिंचाएँगे, ‘‘मानो कि फ़ोटो का काग़ज़ी टुकड़ा उसके मिट खप गए पुराने सारे संबंधों को जोड़कर उन्हें फिर से एक कर देगा।’’ दांपत्य बंधन तो ‘नथिंग विथ नथिंग’ का बंधन है। ‘मायावी हिरण’ कहानी की मानसी अपना अतिरिक्त समय और ऊब मिटाने के लिए मायावी हिरण के पीछे भागती है और उसका पति उसकी मदद जी-जान से करता है; हालांकि प्रेम से नहीं, अपने समय पर से पत्नी का दावा कम करने के उद्देश्य से। क्या कोई इस तरह से अर्थपूर्ण संबंध स्थापित हो सकता है ? हालांकि इस कहानी में एक कंट्रास्ट व्यंग्य है, जहां आधुनिक सभ्यता संपूर्ण प्रवेश पथ नहीं पा सकी है, जहाँ प्रकृति के साथ मनुष्य का अंतरंग सद्भाव अभी भी अटूट है, वहां पारिवारिक आनंद है। उसे अलौकिक कहे बिना आधुनिक मनुष्य के लिए कोई चारा नहीं । कहानीकार ने पारिवारिक संबंधों में मनुष्य का आत्मिक उन्मोचन देखा है, फिर भी मनुष्य के लिए निश्चित आश्रय है।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book